मंगलवार, 21 जून 2011

भागवत २८४

कुछ ऐसा था दुर्योधन व भीम का युद्ध?
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भगवान् खुद भी शांति के ही पक्षधर हैं। कौरवों ने खासतौर पर दुर्योधन और कर्ण जैसे योद्धाओं ने युद्ध का अभ्यास भी शुरु कर दिया है।अभ्यास और वैराग्य क्रम में साधन का उच्च स्थान है। सतत् साधन करते मन निग्रह का अभ्यास होता है और वैराग्यीय वृत्ति बन जाती है।पवित्र नदी के पट पर ही माहिष्मतीपुरी है। बलरामजी वहां मनुतीर्थ में स्नान करके वे फिर प्रभास क्षेत्र में चले आए। वहीं उन्होंने ब्राह्मणों से सुना कि कौरव और पाण्डवों के युद्ध में अधिकांश क्षत्रियों का संहार हो गया। उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि अब पृथ्वी का बहुत सा भार उतर गया। जिस दिन रणभूमि में भीमसेन और दुर्योधन गदायुद्ध कर रहे थे उसी दिन बलरामजी उन्हें रोकने के लिए कुरुक्षेत्र जा पहुंचे।
भयंकर युद्ध हो रहा था। लाखों की संख्या में लोग लड़े और मारे गए। धरती पर तीन ही तरह के इन्सान जीवित रह गए, बच्चे बूढ़े और विधवाएं। दोनों कुलों की दुर्दशा देखकर वे दुखी भी थे और धरती से पाप का भार कम होने से प्रसन्न भी।
महाराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन ने बलरामजी को देखकर प्रणाम किया तथा चुप हो रहे। वे डरते हुए मन ही मन सोचने लगे कि ये न जाने क्या कहने के लिए यहां पधारे हैं? उस समय भीमसेन और दुर्योधन दोनों ही हाथ में गदा लेकर एक-दूसरे को जीतने के लिए क्रोध से भरकर भांति-भांति से पैंतरे बदल रहे थे।
कोई किसी से जीतता या हारता नजर नहीं आ रहा था। भारी युद्ध और गर्जना से माहौल भी रोमांचकारी हो गया था। बलरामजी से रहा नहीं गया और उन्होंने इस युद्ध को रोकने का प्रयास किया।बलरामजी ने कहा-राजा दुर्योधन और भीमसेन। तुम दोनों वीर हो। तुम दोनों में बल-पौरुष भी समान है। मैं ऐसा समझता हूं कि भीमसेन में बल अधिक है और दुर्योधन ने गदायुद्ध में शिक्षा अधिक पाई है।
इसलिए तुम लोगों जैसे समान बलशालियों में किसी एक की जय या पराजय होती नहीं दिखती। अत: तुम लोग व्यर्थ का युद्ध मत करो, अब इसे बंद कर दो। बलरामजी की बात दोनों के लिए हितकर थी, परन्तु उन दोनों का वैरभाव इतना दृढ़मूल हो गया था कि उन्होंने बलरामजी की बात न मानी। वे एक दूसरे की कटुवाणी और दुव्र्यवहारों का स्मरण करके उन्मत्त से हो रहे थे।
भगवान् बलराम ने निश्चय किया कि इनका प्रारब्ध ऐसा ही है, इसलिए उसके संबंध में विशेष आग्रह न करके वे द्वारिका लौट गए। द्वारिका में उग्रसेन आदि गुरुजनों तथा अन्य सम्बन्धियों ने बड़े प्रेम से आगे आकर उनका स्वागत किया। वहां से बलरामजी फिर नैमिशारण्य क्षेत्र में गए। वहां ऋषियों ने विरोधभाव से युद्धादि से निवृत्त बलरामजी के द्वारा बड़े प्रेम से सब प्रकार के यज्ञ कराए।

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