बुधवार, 22 जून 2011

ऐसी आदतों से हमेशा बचते रहना चाहिए...

संसार में रहते हुए हम कुछ आदतों को ओढ़ लेते हैं और कुछ को जीने लगते हैं। आदतों का स्वभाव होता है कि उसे बार-बार करने की इच्छा होती है। पुनरावृत्ति आदत का मूल स्वभाव है। देर से उठने की आदत है तो अगले दिन फिर देर से उठने की इच्छा होगी।
आदत अतीत से जुड़कर अतीत को ही भविष्य में पटकने पर उतारू होती है। इसीलिए कहा है आदतों से मुक्त सावधानी से हो जाएं। आदत से बचने के लिए अपने भीतर के स्वभाव को समझना होगा। अभी तो हमने भक्ति को भी आदत बना लिया है, जबकि भक्ति स्वभाव का विषय है।
सामान्य रूप से ऐसा समझा जाता है कि जो लोग भक्ति कर रहे हैं वे या तो कमजोर लोग हैं या छोटे ओहदे के व्यक्ति हैं। यह एक भ्रम है। जिनके पास मिटने की क्षमता है वे ही भक्ति कर सकेंगे, क्योंकि जितना हम मिटेंगे उतने ही हमारे भीतर के परमात्मा को रूप लेने कर अवसर मिलेगा।
जितना हमने अपने को बचाया, समझ लें उतना ही उसको खोया। भक्ति एक आत्मघाती आर्ट है। इसलिए जैसे-जैसे भक्ति जीवन में उतरेगी हमें भीतर उतरने में सुविधा होगी। मन को निष्क्रिय करने में सहारा मिलेगा। अभी मन मालिक है और शरीर गुलाम। लेकिन भक्ति के उतरते ही परमात्मा प्रकट होने लगता है और ईश्वर की अनुभूति के सामने मन गौण हो जाता है।
मन मौन हुआ और हमारी सारी मस्ती, तमाम शौर-शराबे, धूमधाम भौतिक सफलताओं के बाद भी हमें खूब शांत रखेंगी, प्रकाश ही प्रकाश होगा और इसी प्रकाश को आंतरिक उत्सव कहा गया है। जब हर काम आनंद हो जाए तो फिर जिन्दगी के अर्थ ही बदल जाते हैं।

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