सोमवार, 20 जून 2011

हर इंसान को बस इसी एक चीज की तलाश है...

पं. विजयशंकर मेहता
यदि जाना सीखा है तो लौटना भी सीखिए। व्यावहारिक जानकारी हमें संसार में जाना सिखाता है और आध्यात्मिक ज्ञान हमें भीतर मुडऩा बताता है। जीवन में भक्ति और भौतिकता का संतुलन बनाए रखना चाहिए। अति हर बात की बुरी है।
संयम की जरूरत हर क्षेत्र में है, पर संयम की भी अति न कर दें। हर परिस्थिति के दूसरे पहलू से परिचित जरूर रहें। संसार से भी परिचय रखें और संसार बनाने वाले को भी न भूलें। हम संसार में सफलता की खोज पर निकले हुए हैं। सभी यही कर रहे हैं, बस क्षेत्र अलग हैं, मार्ग अलग हैं, मंजिल अलग हैं।
कुल मिलाकर चाहिए सबको सफलता। आप जो कुछ भी खोज रहे हों थोड़ा रुकिए जरूर, फिर भीतर मुड़ जाएं। अपनी इस तलाश को थोड़ा रोक दें, अपने भीतर झाकें और कुछ पाने की कोशिश करें। जो भीतर मिलेगा वह बाहर की खोज और सफलता के अर्थ बदल देगा। अपना कुछ भी नहीं है बस पकडऩे के तरीके बदलना है। जैसे ही आपने अपने भीतर भगवान होने को जान लिया, फिर आपके कर्म में निष्कामता आ जाएगी और आपकी वाणी में विश्वसनीयता तथा प्रभाव आ जाएगा।
एक ऐसी स्थिति भी आ सकती है कि आपको बोलने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और लोग खुद ब खुद आपकी ओर खिंचे चले आएंगे। जैसे ही हम भीतर उतरते हैं, जिस ईश्वर से हमारा परिचय होता है वह परमपिता है, जो सबके भीतर जन्म से ही आया हुआ है। हम उसके निकट गए, उसको पहचाना और उसी के जैसे होना शुरू कर देते हैं। बाप की नकल बेटा करता ही है। संतानों में अपने जनक-जननी के लक्षण आ ही जाते हैं। इस अनुभूति के बाद हमारी बाहरी क्रियाएं ईश्वर की तरह दिव्य और पवित्र होने लगती हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें