बुधवार, 8 जून 2011

तब परशुरामजी ने मांगी माफी

जब परशुरामजी ने रामजी का प्रभाव जाना तो वे हाथ जोड़कर बोले आपकी जय हो। मैं अपने एक मुंह से आपकी क्या प्रशंसा करूं? मैंने अनजाने में आपको जो भी बात कही उसके लिए मुझे माफ कीजिए। ऐसा कहकर परशुराम जी वन को चले गए। देवताओं ने नगाड़े बजाए वे रामजी के ऊपर फूल बरसाने लगे। जनकपुर के स्त्री-पुरुष सब हर्षित हो गए। सभी महिलाएं मंगलगीत गाने लगी। सीताजी का डर भी चला गया। वे वैसा ही सुख महसूस कर रही हैं जैसा चंद्रमा के उगने पर चकोर महसूस करता है।
जनकजी ने विश्वामित्र को प्रणाम किया और कहा आपकी कृपा से रामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ा है। अब आप कहिए आप का क्या कहना है? तब विश्वामित्र जी बोले धनुष टूटते ही विवाह हो गया। अब तुम जैसा भी तुम्हारे कुल में रिवाज हो या वेदों में जो भी नियम हो वैसा करो। अयोध्या दूत भेजो जो राजा दशरथ को बुला लाए। तब राजा जनक ने उसी समय दूतों को अयोध्या भेजा।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें