बुधवार, 8 जून 2011

भागवत २७३

भगवान तो बस भक्तों के बस में है क्योंकि....
पं.विजयशंकर मेहता
भगवान् तो बस भक्तों के बस में हैं। युधिष्ठिर ने इच्छा जताई तो तुरंत हां कर दी। इसी बहाने वे अपनी कुछ और लीलाएं दिखाएंगे। इस राजसूय यज्ञ में दुनियाभर के राजा आएंगे।भगवान् ने कहा-आपका निश्चय बहुत ही उत्तम है। राजसूय यज्ञ करने से समस्त लोकों में आपकी मंगलमयी कीर्ति का विस्तार होगा। पृथ्वी के समस्त नरपतियों को जीतकर, सारी पृथ्वी को अपने वश में करके और यज्ञोचित सम्पूर्ण सामग्री एकत्रित करके फिर इस महायज्ञ का अनुष्ठान कीजिए। आपके चारों भाई वायु, इन्द्र आदि लोकपालों के अंश से पैदा हुए हैं।
वे सब के सब बड़े वीर हैं। आप तो परम मनस्वी और संयमी हैं ही। आप लोगों ने अपने सद्गुणों से मुझे अपने वश में कर लिया है। जिन लोगों ने अपनी इन्द्रियों और मन को वश में नहीं किया है, वे मुझे अपने वश में नहीं कर सकते। संसार में कोई बड़े से बड़ा देवता भी तेज, यश, लक्ष्मी, सौन्दर्य और ऐश्वर्य आदि के द्वारा मेरे भक्त का तिरस्कार नहीं कर सकता फिर कोई राजा उसका तिरस्कार कर दे, इसकी तो संभावना ही क्या है?
युधिष्ठिर को गुरु मंत्र मिल गया। भगवान् ने उसे जाने-अनजाने ही पृथ्वी पति होने का आशीर्वाद भी दे दिया लेकिन ये पाण्डवों की भी मर्यादा थी कि उन्होंने इसका तनिक भी अभिमान नहीं किया, बल्कि इसे भगवान् का ही आशीर्वाद और प्रताप समझा। पाण्डव राजसूय की तैयारी में लग गए, मार्गदर्शक थे स्वयं भगवान् कृष्ण।जीवन में गुरुमंत्र सद्ग्रुण के लिए बहुत उपयोगी और प्रभावशाली रहता है। गुरु मंत्र प्राप्त करते समय जो शक्तिपात होता है वह ही सद्गुणों को जीवन में उतरने में सहयोगी होता है।

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