सोमवार, 13 जून 2011

बिना जीवनसाथी के दान अधूरा क्यों माना जाता है?

दान करने के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि दान हमेशा अपने जीवनसाथी के साथ ही किया जाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि शिवजी के अद्र्धनारीश्वर स्वरूप में शिवजी के दाएं भाग में स्वयं शिवजी और बाएं भाग में माता पार्वती को दर्शाया जाता है। धर्म से संबंधित सभी कार्य पुरुषों से कराए जाने की बात हमेशा से ही कही जाती रही है।
दान सीधे हाथ से करना चाहिए लेकिन दान का धर्म तब और अधिक मिलता है जब दान जोड़े से किया जाए क्योंकि पत्नी को पति की अद्र्धांगिनी कहा जाता है, इसका मतलब यही है कि पत्नी के बिना पति अधूरा है। पति के हर कार्य में पत्नी हिस्सेदार होती है। शास्त्रों में इसी कारण सभी पूजा कर्म दोनों के लिए एक साथ करने का नियम बनाया गया है।
यदि दोनों एक साथ पूजादि कर्म करते हैं तो इससे पति-पत्नी को पुण्य तो मिलता है साथ ही परस्पर प्रेम भी बढ़ता है। स्त्री को पुरुष की शक्ति माना जाता है इसी वजह से सभी देवी-देवताओं के नाम के पहले उनकी शक्ति का नाम लिया जाता है जैसे सीताराम, राधाकृष्ण। इसी वजह से पत्नी के बिना पति को किसी भी तरह के दान का कोई पुण्य नहीं लगता और दिया गया दान अधूरा ही माना जाता है।
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