बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

स्त्रियों के कारण ही हुआ महाभारत!

० जर, जोरू और जमीन बंनी है लड़ाई की वजह
-अरुण कुमार बंछोर

यह बात सौ फीसदी सच है कि जर, जोरू और जमीन के लिए ही युद्ध होते रहे हैं। हालांकि कुछ विद्वान मानते हैं कि महाभारत युद्ध के कारण कुछ और भी थे।
महाभारत में भूमि बंटवारा युद्ध का सबसे बड़ा कारण था। लेकिन दूसरे लोग मानते हैं कि बंटवारा शांतिपूर्वक हो सकता था लेकिन कुछ महिलाओं की जिद के कारण कौरवों और पांडवों के बीच कटुता बढ़ गई जिसके परिणामस्वरूप युद्ध हुआ।
बहुत से लोग महाभारत युद्ध का दोषी महिलाओं को मानते हैं। धृतराष्ट्र और पांडु की माताएं अम्बिका और अम्बालिका काशी नरेन्द्र की पुत्रियां थी। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी और पांडु की पत्नी कुंती का जीवन बहुत ही संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन इन सबसे पहले अम्बिका और अम्बालिका के पति विचित्रवीर्य की माता सत्यवती का ही राजपाट और महल में दखल अधिक था। वही सारे फैसले लेती थी और भीष्म को उनकी बातें सुनना होती थी। उसके जाने के बाद सत्ता का केंद्र बदल गया। हालांकि कुछ लोग गंगा, सुभद्रा, लक्ष्मणा को भी युद्ध के कारणों में गिनते हैं। लेकिन असल में कौन- सी महिलाएं युद्ध का सबसे बड़ा कारण थी? आओ जानते हैं उन प्रमुख स्त्रियों को जिनके कारण महाभारत युद्ध हुआ।

सुभद्रा
सुभद्रा तो कृष्ण की बहन थी जिसने कृष्ण के मित्र अर्जुन से विवाह किया था, जबकि बलराम चाहते थे कि सुभद्रा का विवाह कौरव कुल में हो। बलराम के हठ के चलते ही तो कृष्ण ने सुभद्रा का अर्जुन के हाथों हरण करवा दिया था। बाद में द्वारका में सुभद्रा के साथ अर्जुन का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ। विवाह के बाद वे एक वर्ष तक द्वारका में रहे और शेष समय पुष्कर क्षेत्र में व्यतीत किया। 12 वर्ष पूरे होने पर वे सुभद्रा के साथ इंदप्रस्थ लौट आए।

लक्ष्मणा
श्रीकृष्ण की 8 पत्नियों में एक जाम्बवती थीं। जाम्बवती-कृष्ण के पुत्र का नाम साम्ब था। साम्ब का दिल दुर्योधन-भानुमती की पुत्री लक्ष्मणा पर आ गया था और वे दोनों प्रेम करने लगे थे। दुर्योधन के पुत्र का नाम लक्ष्मण था और पुत्री का नाम लक्ष्मणा। दुर्योधन अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र ने नहीं करना चाहता था। भानुमती सुदक्षिण की बहन और दुर्योधन की पत्नी थी। इसलिए एक दिन साम्ब ने लक्ष्मणा से प्रेम विवाह कर लिया और लक्ष्मणा को अपने रथ में बैठाकर द्वारिका ले जाने लगा। जब यह बात कौरवों को पता चली तो कौरव अपनी पूरी सेना लेकर साम्ब से युद्घ करने आ पहुंचे। कौरवों ने साम्ब को बंदी बना लिया। इसके बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम को पता चला, तब बलराम हस्तिनापुर पहुंच गए। बलराम ने कौरवों से निवेदनपूर्वक कहा कि साम्ब को मुक्त कर उसे लक्ष्मणा के साथ विदा कर दें, लेकिन कौरवों ने बलराम की बात नहीं मानी। तब बलराम ने अपना रौद्र रूप प्रकट कर दिया। वे अपने हल से ही हस्तिनापुर की संपूर्ण धरती को खींचकर गंगा में डुबोने चल पड़े। यह देखकर कौरव भयभीत हो गए। संपूर्ण हस्तिनापुर में हाहाकार मच गया। सभी ने बलराम से माफी मांगी और तब साम्ब को लक्ष्मणा के साथ विदा कर दिया। द्वारिका में साम्ब और लक्ष्मणा का वैदिक रीति से विवाह संपन्न हुआ।

सत्यवती
महाभारत की शुरुआत राजा शांतनु से होती है। शांतनु को गंगा से एक वीर और देवतुल्य संतान मिली थी, लेकिन शांतनु ने उस संतान की इच्छा या अनिच्छा का ध्यान रखे बगैर अपनी इच्छाओं को ज्यादा महत्व दिया।कहते हैं कि शांतनु भोग-विलासी राजा था, क्योंकि उनको राज्य से ज्यादा अपने कुल की वृद्धि की चिंता ज्यादा रहती थी। गंगा के चले जाने के बाद उनका जीवन जब अकेलेपन में बीतने लगा, तब एक दिन नदी के तट पर वे घूम रहे थे, तो उन्होंने एक निषाद कन्या को देखा। उसे देखकर वे मोहित हो गए। उन्होंने उसके साथ विवाह करने की ठानी। वे उस कन्या के पिता के पास गए। कन्या का नाम था सत्यवती।इस पर धीवर (कन्या के पिता) ने कहा, 'राजन्! मुझे अपनी कन्या का विवाह आपके साथ करने में कोई आपत्ति नहीं है, किंतु मैं चाहता हूं कि मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही आप अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाएं, तो ही यह विवाह संभव हो पाएगा।' यह बात सुनकर शांतनु महल लौट आए और उदास तथा चुप--चुप रहने लगे।महाराज की इस दशा को देखकर उनके पुत्र देवव्रत (भीष्म) को चिंता हुई। जब उन्हें मंत्रियों द्वारा पिता की इस प्रकार की दशा होने का कारण पता चला तो वे निषाद के घर जा पहुंचे और उन्होंने निषाद से कहा, 'हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शांतनु के साथ कर दें। मैं आपको वचन देता हूं कि आपकी पुत्री के गर्भ से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। कालांतर में मेरी कोई संतान आपकी पुत्री के संतान का अधिकार छीन न पाए इस कारण से मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं आजन्म अविवाहित रहूंगा।'उनकी इस प्रतिज्ञा को सुनकर निषाद ने हाथ जोड़कर कहा, 'हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है।' इतना कहकर निषाद ने तत्काल अपनी पुत्री सत्यवती को देवव्रत तथा उनके मंत्रियों के साथ हस्तिनापुर भेज दिया।

परिणाम
मित्रों आप ही सोचिए, यदि शांतनु सत्यवती को न चाहते तो कुरु वंश का भाग्य कुछ और ही होता। इस राजा ने एक स्त्री के लिए अपने पुत्र के जीवन को नष्ट कर दिया। इससे पता चलता है कि शांतनु एक सामान्य राजा था। उसने अपने राज्य तथा पुत्र को प्राथमिकता न देकर अपनी भोगवृत्ति को प्राथमिकता दी। तो यह कहना उचित होगा कि सत्यवती ही एक प्रमुख कारण थी जिसके चलते हस्तिनापुर की गद्दी से कुरुवंश नष्ट हो गया। यदि भीष्म सौगंध नहीं खाते तो वेदव्यास के 3 पुत्र पांडु, धृतराष्ट्र और विदुर हस्तिनापुर के शासक नहीं होते या यह कहें कि उनका जन्म ही नहीं होता। तब इतिहास ही कुछ और होता।

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