बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

त्रिपुरा - एक मनोरम राज्य

    भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बढाता हुआ, भारत के कई अत्यंत सुंदर राज्यों में से एक है - त्रिपुरा। अपनी हरी-भरी घाटियों और पहाड़ियों के कारण त्रिपुरा ने भारत के मुख्य पर्यटन स्थलों में अपना विशेष स्थान बनाया है। त्रिपुरा भारत का तीसरा सबसे छोटा राज्य है। भारत के उत्तर-पूर्व और बांग्लादेश के बीच स्थित यह राज्य एक बिंदु की तरह है। यह राज्य उन्नीस स्वदेशी समुदायों और गैर-आदिवासी बंगाली लोगों के सामंजस्य का मिश्रण है। इसके अलावा त्रिपुरा पर्यटन का एक रोचक इतिहास है और यह स्थान प्रचुर जैव विविधता का दावा करता है।


त्रिपुरा
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त्रिपुरा – एक शुरूआत
त्रिपुरा के नाम की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के विभिन्न मत हैं। त्रिपुरा के उल्लेखनीय कोर्ट क्रॉनिकल ‘राजमाला’ के अनुसार, कई साल पहले त्रिपुरा पर ‘त्रिपुर’ नाम का राजा राज्य करता था, इसलिए इसका यह नाम पड़ा। आधुनिक त्रिपुरा पर पहले ‘त्रिपुरी राजवंश’ और इसके बाद अंग्रेजों का शासन था। अंग्रेजों के शासन काल के दौरान यह राजशाही राज्य था।
त्रिपुरा पर्यटन – यहाँ के भूगोल और जलवायु की एक झलक
त्रिपुरा उत्तर भारत के सात सन्निहित राज्यों में से एक है, जिन्हें ‘सेवेन सिस्टर्स’ के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरा में मुख्य रूप से पहाड़ियाँ, घाटियाँ और मैदान है। यहाँ पांच पर्वत श्रेणियां हैं जो एक दूसरे से संकरी घाटियों द्वारा अलग हैं। इसके सुदूर पूर्व में जामपुई पर्वत श्रेणी, पश्चिम में उनोकोटी-सखान्त्लंग, लॉन्गथोराई, अथारामुरा-कालाझारी और बारामुरा-देओतामुरा आदि हैं।
त्रिपुरा का मौसम
त्रिपुरा का मौसम इसकी उंचाई से प्रभावित है और लगभग वैसा ही है जैसा कि आम तौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में होता है। त्रिपुरा में एक उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु है और यहाँ मुख्य चार ऋतुएं होती हैं: ठंड – दिसंबर से फरवरी। मानसून पूर्व ऋतु मार्च से अप्रैल तक। मानसून- मई से सितंबर तक। त्रिपुरा में ठंड के दौरान तापमान दस डिग्री तक गिर सकता है और गर्मियों में 35 डिग्री तक जा सकता है। यहाँ जून के महीने में भारी बारिश होती है।
त्रिपुरा और इसकी समृद्ध संस्कृति
पर्यटक वर्ष भर यहाँ होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद ले सकते हैं क्योंकि त्रिपुरा में कई विभिन्न जातियों, विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले एवं धार्मिक समूहों के लोग निवास करते हैं। इस राज्य की प्रत्येक जनजाति कई त्यौहार मनाती है और इसमें उनकी अपनी परंपरा का नज़ारा देखने को मिलता है।
आप यहाँ पर कई त्योहारों का लुत्फ़ उठा सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि साल के किस समय आप यहाँ आते हैं। अक्टूबर महीने में यहाँ दुर्गापूजा का त्यौहार मानाया जाता है, इसके तुरंत बाद दीवाली, इसके अलावा चौदह देवताओं की पूजा का त्योहार कराची पूजा, जो जुलाई के महीने में मनाया जाता है। त्रिपुरा और भी कई त्यौहार मनाये जाते है जैसे कि गरिया पूजा, केर पूजा, अशोक अष्टमी मेला, बुद्ध पूर्णिमा, पौष-संक्रांति मेला और वाह (लैंप) त्योहार।
भव्यता से मनाये जाने वाले त्योहारों के अलावा, त्रिपुरा पर्यटन नृत्य, संगीत एवं हस्तशिल्प के रूप में एक समृद्ध परंपरा को अपने में समेंटे हुए है। त्रिपुरा की स्वदेशी जनजातियों के संगीत एवं नृत्य के अपने अलग अलग पारंपरिक रूप हैं। गोरिया पूजा के दौरान आप गोरिया नृत्य की सुंदरता एवं क्रियात्मकता को देख सकते हैं जो त्रिपुरी और जमातिया लोगों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।इसी तरह होजागिरी नृत्य देखना भी एक बहुत अच्छा अनुभव होगा जिसमें लड़कियां मिट्टी के मटकों पर संतुलन बनाते हुए नृत्य करती हैं। इसके अलावा लेबांग नृत्य, ममिता नृत्य, मोसक सुल्मानी नृत्य, बिज्हू नृत्य, हिक-हक़ नृत्य त्रिपुरा के अन्य प्रसिद्ध नृत्य हैं।
इसके अलावा त्रिपुरा की जनजातियां, स्थानीय स्तर पर पसंद किये जाने वाले, कई वाद्य यंत्र भी बनाते हैं जैसे कि, सरिंदा, चोंगप्रेंग और सुमुई। इसके अलावा बांस और केन से बनाए जाने वाले हेंडीक्राफ्ट, फर्नीचर, बर्तन और सजावट के सामान भी बहुत लोकप्रिय हैं।
त्रिपुरा पर्यटन – त्रिपुरा एवं इसके आसपास के पर्यटन स्थल
प्रदूषण मुक्त हवा, सुहावना मौसम और रोचक कई पर्यटन स्थलों के कारण त्रिपुरा पर्यटन के लिए एक आदर्श स्थान हो सकता है। त्रिपुरा पर्यटन, आगंतुकों के आमोद-प्रमोद लिए धार्मिक स्थलों और सुंदर स्थानों का एक उचित संयोजन है। त्रिपुरा में सदाबहार जंगल और कई जलीय संसाधन भी हैं।
एक बार त्रिपुरा पहुँच जाने पर पर्यटक आश्वस्त हो सकते हैं कि इस स्थान की सुंदरता के द्वारा वे अपनी आँखों को आराम पहुंचाने जा रहे हैं। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में भी कई पर्यटक स्थल हैं। समृद्ध पुरातात्विक इतिहास से युक्त कई प्रसिद्ध मंदिर जैसे कि जगन्नाथ मंदिरउमामहेश्वर मंदिर, बेनुबन बिहार/बुद्ध मंदिर यहाँ पर देखे जा सकते हैं।
इसके अलावा आप अगरतला के सेपहिजाला चिड़ियाघर में विभिन्न प्राणियों के देखने का आनंद भी उठा सकते हैं। नवयुवक/युवतियों के लिए अगरतला में रोज वैली एम्यूजमेंट पार्क भी है।अगरतला के अतिरिक्त त्रिपुरा में अन्य कई पर्यटक आकर्षण भी हैं जैसे कि धलाई, कैलाशहर, उनकोटी और उदयपुर। उदयपुर में जहाँ त्रिपुर सुंदरी और भुवनेश्वरी जैसे मंदिर हैं, वहीं कैलाशहर में चौदू देवोतार मंदिर और चाय के बागान हैं जो सभी को प्रभावित करते हैं।
उज्जयनता पैलेस, त्रिपुरा राज्य संग्रहालय, सुकांता अकादमी, लॉन्गथराई मंदिर, मणिपुरी रास लीला, उनकोटी, लक्ष्मी नारायण मंदिर, पुरानो राजबाड़ी, और नजरुल ग्रंथागार क्लाउडेड लेपर्ड राष्ट्रीय उद्यान और राजबाड़ी राष्ट्रीय उद्यान त्रिपुरा के कुछ अन्य आकर्षक स्थल है।
तो आप किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं? अपना सामान बांधिए और त्रिपुरा के आकर्षण का अनुभव लेने के लिए तैयार हो जाइए। आप निराश नहीं लौटेंगे।

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

जयपुर के दर्शनीय स्थल


जयपुर का हवाई दृश्य।
राजस्थान की राजधानी जयपुर को गुलाबी नगरी नाम से भी जाना जाता है। इस नगर में सुंदर नगरों, हवेलियों और किलों की भरमार है। जयपुर का अर्थ है - जीत का नगर। इसे कुशवाह राजपूत राजा सवाई जय सिंह, द्वितीय ने १७२७ में बसाया था। उस समय का यह प्रथम नगर था जो योजनाबद्ध ढ़ंग से बसाया गया था। इसका ख़ाका तैयार किया था वास्तु शिल्पी विद्याधर भट्टाचार्य ने।
मुगलों ने जो भवन बनवाए उनमें लाल पत्थर का उपयोग किया जबकि राजा जय सिंह ने पूरे नगर को गुलाबी रंग से पुतवाया।
जयपुर को यदि पास से देखना हो तो पूरे नगर को पैरों से नापना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से यह नगर २६२ किमी की दूरी पर स्थित है और बस, रेल और हवाई यातायात से अच्छे से जुड़ा है। यहाँ की प्रमुख भाषाएँ हिन्दी और राजस्थानी है।

जयपुर का रात में हवाई दृश्य।
जयपुर में आने के बाद पता चलता है, कि आप किसी रजवाडे में प्रवेश कर गये है हैं, शाही साफ़ा बांधे जयपुर के बना और लंहगा-चुन्नी से सजी जयपुर की नारियां, गपशप मारते जयपुर के वृद्ध लोग, राजस्थानी भाषा में कितनी प्यारी बोलियां,पधारो म्हारे देश जैसा स्वागत और बैठो सा, जीमो सा, जैसी बातें, कितनी सुहावनी लगती है।
यहाँ के विभिन्न दर्शनीय स्थल इस प्रकार हैं।

सिटी पैलेस


सिटी पैलेस।
सिटी पैलेस जयपुर का एक प्रमुख लैंडमार्क है। राजस्थानी व मुगल शैलियों की मिश्रित रचना एक पूर्व शाही निवास जो पुराने शहर के बीचों बीच खड़ा है। भूरे संगमरमर के स्तंभों पर टिके नक्काशीदार मेहराब, सोने व रंगीन पत्थरों की फूलों वाली आकृतियों ले अलंकृत है। संगमरमर के दो नक्काशीदार हाथी प्रवेश द्वार पर प्रहरी की तरह खड़े है। जिन परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी राजाओं की सेवा की है वे लोग गाइड के रूप में कार्य करते है। पैलेस में एक संग्राहलय है जिसमें राजस्थानी पोशाकों व मुगलों तथा राजपूतों के हथियार का बढ़िया संग्रह हैं। इसमें विभिन्न रंगों व आकारों वाली तराशी हुई मूंठ वाकी तलवारें भी हैं, जिनमें से कई मीनाकारी के जड़ऊ काम व जवाहरातों से अलंकृत है तथा शानदार जड़ी हुई म्यानों से युक्त हैं। महल में एक कलादीर्घा भी हैं जिसमें लघुचित्रों, कालीनों, शाही साजों सामान और अरबी, फारसी, लेटिन व संस्कृत में दुर्लभ खगोल विज्ञान की रचनाओं का उत्कृष्ट संग्रह है जो सवाई जयसिंह द्वितीय ने विस्तृत रूप से खगोल विज्ञान का अध्ययन करने के लिए प्राप्त की थी।

जंतर मंतर


जंतर मंतर।
सिटी पैलेस से कुछ दूरी पर स्थित है, जयपुर का जंतर मंतर। यह एक पत्थर की वेगशाला है। यह जयसिंह की पाँच वेगशालाओं में से सबसे विशाल है। इसके जटिल यंत्र, इसका विन्यास व आकार वैज्ञानिक ढंग से तैयार किया गया है। यह मध्ययुगीन भारत के खगोल विज्ञान के उच्च सूत्रों का प्रतिनिधित्व करतें है। इनमें सबसे प्रभावशाली रामयंत्र है जिसका उपयोग ऊंचाई नापने के लिए किया जाता है। जंतर मंतर परिसर में सवाई जय सिंह द्वारा तारों की गणना करने में उपयोग करने वाले कई उपकरण रखें हैं।

हवा महल


हवा महल।
ईसवी सन् १७९९ में निर्मित हवा महल राजपूतो का मुख्य प्रमाण चिन्ह है। यह जयपुर की पहचान भी है। पुरानी नगरी की मुख्य गलियों के साथ यह पाँच तलीय भवन गुलाबी रंग में अर्धअष्टभुजाकार और परिष्कृत छतेदार बलुए पत्थर की खिड़कीयों से सुसज्जित है। शाही घरानों की स्त्रियां नगर का दैनिक जीवन व नगर के जुलूस देख सके इसी उद्देश्य से इस भवन की रचना की गई थी। यहाँ से नगर का अच्छ दृश्य दिखता है। इस महल को इस प्रकार बनाया गया है, की अंदर से बाहर तो देखा जा सकता है, लेकिन बाहर से अंदर नहीं।

गोविंद देवजी का मंदिर

भगवान कृष्ण का जयपुर का सबसे प्रसिद्ध बिना शिखर का मंदिर। यह चन्द्र महल के पूर्व में बने जन निवास बगीचे के मध्य अहाते में स्थित है। संरक्षक देवता गोविंदजी की मुर्ति पहले वृंदावन के मंदिर में स्थापित थी जिसको सवाई जय सिंह द्वितीय ने अपने परिवार के देवता के रूप में यहाँ पुनः स्थापित किया था।

सरगासूली

(ईसर लाट) - त्रिपोलिया बाजार के पशिचमी किनारे पर क्षितिज को छूती उच्चतम इमारत जिसका निर्माण ईसवी सन् 1749 में सवाई ईश्वरी सिंह मे महान विजय को मनाने के लिए किया था।

राम निवास बाग


राम निवास बाग।
एक चिड़ियाघर, दरबा, पौधाघर, वनस्पति संग्राहलय से युक्त एक हरा भरा विस्तृत बाग, खेल का प्रसिद्ध मैदान भी है। बाढ राहत परियोजना के अंतर्गत ईसवी सन् १८६५ में सवाई राम सिंह द्वितीय ने इसे बनवाया था। सर सवीटन जैकब द्वारा रूपांकित, अल्बर्ट हाल जो भारतीय वास्तुकला शैली का परिष्कृत नमूना है, जिसे बाद में उत्कृष्ट मूर्तियों, चित्रों, सज्जित बर्तनों, प्राकृतिक विज्ञान के नमूनों, इजिप्ट की एक ममी और प्रख्यात फारस के कालीनों से सुसज्जित कर खोला गया। हाल ही में, सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए एक प्रेक्षागृह के साथ रवीन्द्र मंच, एक आधुनिक कलादीर्घा व एक खुला थियेटर इसमें बनाया गया हैं।

गुड़िया घर[संपादित करें]

(समयः १२ बजे से सात बजे तक) - पुलिस स्मारक के पास गूंगे बहरों के विद्यालय के अहाते में विभिन्न देशों की प्यारी गुड़ियाँ यहाँ प्रदर्शित हैं।

बी एम बिड़ला तारामण्डल

(समयः १२ बजे से सात बजे तक)- अपने आधुनिक कम्पयूटर युक्त प्रक्षेपण व्यवस्था के साथ इस ताराघर में श्रव्य व दृश्य शिक्षा व मनोरंजनों के साधनों की अनेखी सुविधा उपलब्घ है। विद्यालयों के दलों के लिये रियायत उपलब्ध है। प्रत्येक महीने के आखिरी बुघवार को यह बंद रहता है।

गलताजी

एक प्राचीन तार्थस्थल, निचली पहाड़ियों के बीच बगीचों से परे स्थित। मंदिर, मंडप और पवित्र कुंडो के साथ हरियाली युक्त प्राकृतिक दृश्य इसे आन्नददायक स्थल बना देते हैं। दीवान कृपाराम द्वारा निर्मित उच्चतम चोटी के शिखर पर बना सूर्य देवता का छोटा मंदिर शहर के सारे स्थानों से दिखाई पड़ता है।

जैन मंदिर

आगरा मार्ग पर बने इस उत्कृष्ट जैन मंदिर की दीवारों पर जयपुर शैली में उन्नीसवीं सदी के अत्यधिक सुंदर चित्र बने हैं।Galta Ji Lake

मोती डूंगरी और लक्ष्मी नारायण मंदिर[संपादित करें]

मोती डूंगरी एक निजी पहाड़ी ऊचाँई पर बना किला है जो स्कॉटलैण्ड के महल की तरह निर्मित है। कुछ वर्षों पहले, पहाड़ी पादगिरी पर बना गणेश मंदिर और अद्भुत लक्ष्मी नारायण मंदिर भी उल्लेखनीय है।

स्टैच्यू सर्किल

चक्कर के मध्य सवाई जयसिंह का स्टैच्यू बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से बना हुआ है। इसे जयपुर के संस्थापक को श्रद्धांजलि देने के लिए नई क्षेत्रीय योजना के अंतर्गत बनाया गया है।

अन्य स्थल

आमेर मार्ग पर रामगढ़ मार्ग के चौराहे के पास रानियों की याद में बनी आकर्षक महारानी की छतरी है। मानसागर झील के मध्य, सवाई माधोसिंह प्रथम द्वारा निर्मित जल महल, एक वशीभूत करने वाला स्थल है। परिष्कृत मंदिरों व बगीचों वाले कनक वृंदावन भवन की पुरातन पूर्णता को अभी हाल ही में पुनर्निर्मित किया गया है। इस सड़क के पश्चिम में गैटोर में शाही शमशान घाट है जिसमें जयपुर के सवाई ईश्वरी सिंह के सिवाय समस्त शासकों के भव्य स्मारक हैं। बारीक नक्काशी व लालित्यपूर्ण आकार से युक्त सवाई जयसिंह द्वितीय की बहुत ही प्रभावशाली छतरी है। प्राकृतिक पृष्ठभूमि से युक्त बगीचे आगरा मार्ग पर दीवारों से घिरे शहर के दक्षिण पूर्वी कोने पर घाटी में फैले हुए हैं।

गैटोर

सिसोदिया रानी के बाग में फव्वारों, पानी की नहरों, व चित्रित मंडपों के साथ पंक्तिबद्ध बहुस्तरीय बगीचे हैं व बैठकों के कमरे हैं। अन्य बगीचों में, विद्याधर का बाग बहुत ही अच्छे ढ़ग से संरक्षित बाग है, इसमें घने वृक्ष, बहता पानी व खुले मंडप हैं। इसे शहर के नियोजक विद्याधर ने निर्मित किया था।

आमेर

यह कभी सात शताव्दियों तक ढूंडार के पुराने राज्य के कच्छवाहा शासकों की राजधानी थी। आरंभिक ढ़ाचा अब थोड़ा ही बचा है।

आमेर और शीला माता मंदिर

लगभग दो शताब्दी पूर्व राजा मान सिंह, मिर्जा राजा जय सिंह और सवाई जय सिंह द्वारा निर्मित महलों, मंडपों, बगीचों और मंदिरों का एक आकर्षक भवन है। मावठा झील के शान्त पानी से यह महल सीधा उभरता है और वहाँ कठिन रास्ते द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। सिंह पोल और जलेब चौक तक अकसर पर्यटक हाथी पर सवार होकर जाते हैं। चौक के सिरे से सीढ़ियों की पंक्तियाँ उठती हैं, एक शिला माता के मंदिर की ओर जाती है और दूसरी महल के भवन की ओर। यहां स्थापित करने के लिए राजा मान सिंह द्वारा संरक्षक देवी की मूर्ति, जिसकी पूजा हजारों श्रद्धालु करते है, पूर्वी बंगाल (जो अब बंगला देश है) के जेसोर से यहां लाई गई थी। एक दर्शनीय खंभो वाला हॉल दीवान-ए-आम और एक दोमंजिला चित्रित प्रवेशद्वार, गणेश पोल आगे के पंरागण में है। गलियारे के पीछे चारबाग की तरह का एक रमणीय छोटा बगीचा है जिसकी दाई तरफ सुख निवास है और बाई तरफ जसमंदिर। इसमें मुगल व राजपूत वास्तुकला का मिश्रित है, बारीक ढंग से नक्काशी की हुई जाली की चिलमन, बारीक शीशों और गचकारी का कार्य और चित्रित व नक्काशीदार निचली दिवारें। मावठा झील के मध्य में सही अनुपातित मोहन बाड़ी या केसर क्यारी और उसके पूर्वी किनारे पर दिलराम बाग ऊपर बने महलों का मनोहर दृश्य दिखाते है।

पुराना शहर

कभी राजाओं, हस्तशिल्पों व आम जनता का आवास आमेर शहर अब खंडहर बन गया है। आकर्षक ढंग से नक्काशी किया व सुनियोजित जगत शिरोमणि मंदिर, मीराबाई से जुड़ा एक कृष्ण मंदिर, नरसिंहजी का पुराना मंदिर व अच्छे ढ़ग से बना सीढ़ियों वाला कुआँ, पन्ना मियां का कुण्ड समृद्ध अतीत के अवशेष है।

जयगढ़ किला

मध्ययुगीन भारत के कुछ सैनिक इमारतों में से एक। महलों, बगीचों, टांकियों, अन्य भन्डार, शस्त्रागार, एक सुनोयोजित तोप ढलाई-घर, अनेक मंदिर, एक लंबा बुर्ज और एक विशालकाय चढी हुई तोप - जय बाण जो देश की सबसे बड़ी तोपों में से एक है, इसमें अपना प्राचीन वैभव सुरक्षित करके रखा हुआ है। जयगढ़ के फैले हुए परकोटे, बुर्ज और प्रवेश द्वार पश्चिमी द्वार क्षितिज को छूते है। नाहरगढः जयगढ की पहाड़ियों के पीछे स्थित गुलाबी शहर का पहरेदार है - नाहरगढ़ किला। यद्यपि इसका बहुत कुछ हिस्सा ध्वस्त हो गया है, फिर भी सवाई मान सिंह द्वितीय व सवाई माधव सिंह द्वितीय द्वारा बनाई मनोहर इमारतें किले की रौनक बढ़ती है।

सांगानेर

(१२ किलोमीटर) - यह टोंक मार्ग पर स्थित है। इसके ध्वस्त महलों के अतिरिक्त, सांगानेर के उत्कृष्ट नक्काशीदार जैन मंदिर है। दो त्रिपोलिया (तीन मुख्य द्वार) के अवशेषो द्वारा नगर में प्रवेश किया जाता है। शिल्प उद्योग के लिए शहर महत्वपूर्ण केन्द्र है और ठप्पे व जालीदार छपाई की इकाइयों द्वारा हाथ से बने बढिया कपड़े यहां बनते है। यह कपड़ा देश व विदेश में प्रसिद्ध है।

बगरू

(३४ किलोमीटर) - अजमेर मार्ग पर, भूमि के छूता किला, अभी भी अच्छी अवस्था में है। यह अपने हाथ की छपाई के हथकरघा उद्योग के लिए उल्लेखनीय है, जहां सरल तकनीको का प्रयोग होता है। इस हथकरघाओं के डिजाइन कम जटिल व मटियाले रंगो के होते है।

रामगढ़ झील

(३२ किलोमीटर उत्तर-पूर्व) - पेड़ो से आच्छादित पहाड़ियो के बीच एक ऊंचा बांध बांधकर एक विशाल कृत्रिम झील की निर्माण किया गया है। यद्यपि जमवा माता का मंदिर व पुराने किले के खंडहर इसके पुरावशेष है। विशेषकर बारिश के मौसम में इसके आकर्षक प्राकृतिक दृश्य इसको एक बेहतर पिकनिक स्थल बना देते है।

सामोद

(४० किलोमीटर उत्तर-पूर्व) - सुन्दर सामोद महल का पुनर्निमाण किया गया तथा यह राजपूत हवेली वास्तुकला का बेहतर नमुना है व घूमने के लिए उत्तम स्थल।

बैराठ

(शाहपुरा - अलवर मार्ग ८६ किलोमीटर दूर) - खुदाई करने पर निकले एक वृताकार बौध मंदिर के अवशेषों से युक्त एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान है जो राजस्थान का असाधारण व भारत का आरंभिक प्रसिद्ध मंदिर है। बैराठ के मौर्य, मुगल व राजपूत समय के स्मृतिचिन्ह भी है। अकबर द्वारा निर्मित एक खान, एक रमणीय मुगल बगीचा औक जहांगीर द्वारा निर्मित चित्रित छतरियों व दीवारों से युक्त असाधारण इमारत अन्य आकर्षण है।

सांभर

(पश्चिम से १४ किलोमीटर) - विशाल टापू वाली भारत की नमक की झील, पवित्र देवयानी कुंड, महल और पास ही स्थित नालियासार के प्रसिद्ध है।

जयसिंहपुरा खोर

(अजमेर मार्ग से १२ किलोमीटर) - मीणा कबीले के इस आवास में एक दुर्जय किला, एक जैन मंदिर और हरे भरे वातावरण के बीच एक बावड़ी है।

माधोगढ़

तुंगा (बस्सी लालसोट आगरा मार्ग से ४० किलोमीटर) - जयपुर व मराठा सेना के बीच हुए एतिहासिक युग का तुंगा गवाह है। सुंदर आम के बागो के बीच यह किला बसा है।