शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

अब बस भी करो

सीन 1 : ऑल राउंडर होना जरूरी
जैक एंड जिल..वाली पोयम सुनाओ...
जॉनी-जॉनी यस पापा..
गिटार पर अरेबियन धुन तो सुनाओ
शाहरुख के डायलॉग्स बोलकर सुनाओ..
रॉक एंड रॉल..पर डांस करो..
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सीन 2 : ऑल इज नॉट वेल
80 परसेंट मा‌र्क्स? अब क्या होगा..!
कितनी बार कहा कम से कम 8 घंटे पढो..कंपिटीशन बहुत टफ है। ऑल इज नॉट वेल बेटा, समझे न!
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सीन 3 : टाइम मैनेजमेंट
सुबह छह बजे : वेक अप टाइम
आठ बजे : स्कूल टाइम
दोपहर दो बजे : छुट्टी
तीन बजे : लंच
चार से छह बजे : होमवर्क
छह से सात बजे : हॉबी क्लासेज
सात से आठ बजे : ट्यूशन टाइम
साढे आठ बजे : डिनर टाइम
दस से साढे दस : गुड नाइट
(गिव मी सम सनशाइन..गिव मी सम रेन...लेकिन टाइम-टेबल में ऐसा कोई समय नहीं)
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सीन 4 : पापा कहते हैं
आर्ट, म्यूजिक, स्पो‌र्ट्स ठीक है, लेकिन एम.बी.ए. तो करना होगा..।
पापा, मुझे इसमें इंटरेस्ट नहीं है।
मैंने कहा कि वही करना है..
लेकिन मुझे ग्राफिक अच्छा लगता है..
मैंने कहा न, जो कह रहा हूं-वही करो...।
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कल्पना ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है। ज्ञान की तो सीमा है, लेकिन कल्पना दुनिया के किसी भी छोर तक पहुंच सकती है।
-अल्बर्ट आइंस्टाइन
महान वैज्ञानिक का कथन जो भी हो, लेकिन टाइम-टेबल में बंधे बचपन के पास आज कल्पना का समय कहां है! होमवर्क से समय बचे तो टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट, विडियो गेम्स की दुनिया है। हाइटेक हैं ये बच्चे, सूचनाओं से लबालब हैं। हाथ से चम्मच पकडना ठीक से आए न आए, पेंसिल-पेन और माउस ठीक से पकडना आना चाहिए। साबित करो खुद को..। ढाई वर्ष की उम्र से यही तो सिखाया जाने लगता है।

अपेक्षाएं बडी-बडी

अधिकतर छात्र मानते हैं कि अब पढाई बहुत मुश्किल होती जा रही है।उन्हें यह डर है कि माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरे न उतरे तो क्या होगा। सी.बी.एस.ई. में सी.सी.ई. (कंटिन्युअस एंड कॉम्प्रिहेंसिव इवैल्यूएशन) सिस्टम लागू होने पर नवीं-दसवींकक्षा के ज्यादातर छात्र नाखुश दिखते हैं। डी.पी.एस. (दिल्ली) में नवीं कक्षा में पढने वाले शिवम कहते हैं, इस सिस्टम में एक हफ्ते में तीन-चार असाइनमेंट्स, क्लास टेस्ट, एक्स्ट्रा एक्टिविटीज जैसे तमाम काम करने होते हैं। इस वर्ष कभी बारिश तो कभी कॉमनवेल्थ के कारण छुट्टियां ज्यादा हुई। स्कूल खुलते ही सुपर फास्ट ट्रेन की तरह कोर्स पूरा कराया जाने लगता है। एक चैप्टर के कंसेप्ट स्पष्ट नहीं होते कि दूसरा शुरू हो जाता है। मॉम-डैड को लगता है हम ध्यान नहीं दे रहे हैं। ट्यूटर को समझ नहीं आता..।

मा‌र्क्स कम आने पर अभिभावकों का क्रोध भी छात्रों का स्ट्रेस बढाता है। बारहवीं के छात्र करियर का दबाव महसूस करते हैं। उन्हें मीडिया व कोचिंग सेंटर्स से भी शिकायत है जो टॉपर्स की खूबियों को बढा-चढाकर पेश करते हैं। इससे एवरेज मा‌र्क्स या ग्रेड वाले स्टूडेंट्स व उनके पेरेंट्स हीन-भावना से ग्रस्त होते हैं।

सी.सी.ई.सिस्टम

सी.बी.एस.ई.ने बच्चों के मन से बोर्ड परीक्षा का भय कम करने के लिए अभी नवीं-दसवीं कक्षा में सी.सी.ई. सिस्टम लागू किया है। यह एक ग्रेडिंग प्रणाली है, जिसमें साल भर के परफॉर्र्मेस के आधार पर छात्रों को ग्रेड दिए जाते हैं। हालांकि कुछ छात्र चाहें तो बोर्ड परीक्षा भी दे सकते हैं। इनमें अधिकतर वे हैं, जो स्कूल या बोर्ड बदलने वाले हों।

दिल्ली स्थित जंप संस्था के डायरेक्टर व करियर काउंसलर जितिन चावला कहते हैं, इस सिस्टम को समझने में अभी छात्रों को समय लगेगा। कुछ दिन पहले मैं नवीं कक्षा के छात्रों के साथ था तो उन्होंने कहा कि ग्रेडिंग सिस्टम से उन पर दबाव बढ गया है। लगता है जैसे हमेशा परीक्षाएं चल रही हैं। अच्छी बात यह है कि इसमें प्रतिभाशाली बच्चों को अवसर मिल सकते हैं।

एक बात यह भी है कि जिस रफ्तार से करियर के नए विकल्प आए हैं, उस तेजी से माता-पिता का माइंडसेट नहीं बदल पा रहा है। उन्हें भी नई पीढी के हिसाब से खुद को अपडेट करना चाहिए। एक लडकी हमारे पास आई थी, जिसने डी.पी.एस. फरीदाबाद से इंटरमीडिएट की परीक्षा 96.4 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की थी। पेरेंट्स की सलाह से उसने इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा दी। कई जगह चयन भी हुआ। हमारे पास आई तो उसे पता चला कि उसकी रुचि अर्थशास्त्र विषय में है। अब उसने इकोनॉमिक्स में ऑनर्स करने का मन बनाया है। इसमें कई करियर विकल्प भी खुले हैं।

दूसरी ओर नोएडा (उत्तर प्रदेश) में रहने वाली सीमा कहती हैं, सी.सी.ई. से दबाव तो बढा है, लेकिन पढाई में एक निरंतरता भी आई है। मेरा बेटा सिद्धार्थ दसवींकक्षा में है। पहले बोर्ड परीक्षा से कुछ समय पहले ही छात्र पढना शुरू करते थे, लेकिन अब हर हफ्ते क्लास टेस्ट व असाइनमेंट्स से उनकी पढाई की आदत बनी रहती है। हालांकि एकाएक इस बदलाव को वे अभी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।

दबाव और सेहत

गगनदीप कौर (क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सेंटर फॉर चाइल्ड डेवलपमेंट एंड एडोलोसेंट हेल्थ, मूलचंद मेडिसिटी, नई दिल्ली) का कहना है, बच्चों पर दबाव बहुत ज्यादा है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। इससे हाइपरटेंशन, एनॉरोक्सिया, ओबेसिटी, डिप्रेशन, ईटिंग डिसॉर्डर, एनेक्जाइटी, बेड-वेटिंग, नेल-बाइटिंग, लो सेल्फ-इस्टीम, स्लीपिंग डिस्टर्बेस और सुसाइडल टेंडेंसी बढ रही है।

दूसरी ओर वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पी.के. सिंघल (इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल) कहते हैं, पढाई के दबाव से बच्चे कभी बीमार नहीं होते। आजकल बच्चों का अधिकतर समय टीवी-इंटरनेट के आगे गुजरता है। माता-पिता व्यस्त हैं और बच्चे जंक फूड खाते हैं। उन्हें पर्याप्त प्रोटीन, कैल्शियम नहीं मिलता, जिससे वे हाइपरटेंशन से ग्रस्त हो जाते हैं। यदि दिनचर्या नियमित हो, बच्चा सही डाइट ले, बाहर खेले तो वह बीमार नहीं होगा। प्रोटीन की कमी से अवसाद होता है, सुस्ती रहती है और गुस्सा आता है। इसलिए पौष्टिक आहार, व्यायाम, योग, बाहर खेलना जरूरी है।

पेरेंट्स-टीचर्स की जिम्मेदारी

गगनदीप कौर फिर कहती हैं, सी.सी.ई. सिस्टम की दिक्कत यह है कि इसमें बेसिक होमवर्क कम किया गया, जिससे छात्रों पर प्रेशर बढ गया। बोर्ड परीक्षाओं का भय तो कम हुआ, लेकिन दूसरे कई दबाव बढ गए। पहले वे जिन अतिरिक्त गतिविधियों को मजे के लिए करते थे, अब वे मजबूरी बन गए। इस सिस्टम के साथ स्कूलों की व्यवस्था में सुधार भी करने चाहिए। एक टीचर अकेले 40-50 बच्चों पर ध्यान नहीं दे सकता। दूसरे विषयों के टीचर्स को भी यह जिम्मेदारी बांटनी चाहिए।

छात्रों की परेशानियों को सुलझाने के लिए एक अलग पीरियड हो, जिसमें काउंसलर उनकी समस्याएं सुने और उनका निदान करे। इसके अलावा कुछ तेज-समझदार छात्रों के नेतृत्व में ग्रुप्स बनाए जाएं। उनके बीच विभिन्न विषयों पर वाद-विवाद कराया जाए, ताकि छात्रों में अपनी बात कहने-सुनने की योग्यता पनपे।

यह बात सही है कि कंपिटीशन टफ है। नंबर वन ही सही है, मान लिया जाता है। नंबर दो पर रहने की बात न पेरेंट्स को भाती है, न टीचर्स को। लगातार जीत मिले तो अचानक हुई हार को छात्र बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसलिए उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि जीत-हार से अधिक महत्वपूर्ण प्रतियोगिता में भाग लेना है।

टेक्नोलॉजी का ज्ञान हाईटेक युग में जरूरी है, लेकिन यह छात्रों में तनाव भी पैदा कर रहा है। इसकी सीमा तय करना पेरेंट्स का काम है। आज के दौर में करियर ऑप्शंस बढे हैं, लेकिन कंपिटीशन भी बढा है। अभिभावक इंजीनियर बनाना चाहते हैं, बेटा-बेटी रेडियो जॉकी बनना चाहते हैं। दो छोरों के बीच तालमेल नहीं होगा तो स्ट्रेस होगा। इसलिए माता-पिता और बच्चों के बीच निरंतर-सार्थक संवाद भी जरूरी है।

स्नेह एवं सहयोग जरूरी

देहरादून (उत्तराखंड) स्थित इंडियन पब्लिक स्कूल की आर्ट एंड क्राफ्ट टीचर मौशमी कविराज कहती हैं, मैं रेजिडेंशियल स्कूल में टीचर हूं। यहां छात्रों पर बहुत अधिक दबाव होता है। रात के दस बजे तक किसी न किसी एक्टिविटी में उन्हें लगे रहना होता है। हमारे यहां आई.सी.एस.ई. है। बोर्ड परीक्षा देने वाले बच्चों को स्कूल की अन्य गतिविधियों में भाग लेने से रोक दिया जाता है, ताकि पढाई बाधित न हो। यह बात सही है कि कोर्स टफ है, पढाई के तौर-तरीके भी बदले हैं। करियर ऑप्शंस के साथ कंपिटीशन भी बढा है। पेरेंट्स-टीचर्स की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को पूरा सहयोग दें। बडों के स्नेह व मार्गदर्शन पर बच्चों का हक है और यह उन्हें मिलना ही चाहिए।

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खेल-खिलौने कई हैं मगर समय नहीं

करिश्मा कपूर (अभिनेत्री)

मां बनने के बाद बच्चों की परेशानियां समझ में आने लगी हैं। मेरी बेटी समायरा सात साल की है और सीनियर के.जी. में पढ रही है। बेटा आठ महीने का है। मां होने के नाते कह सकती हूं कि भले ही बच्चों को एक समय का खाना न मिले, लेकिन माता-पिता अवश्य मिलें। बढती उम्र में माता-पिता जितना मार्गदर्शन दे सकते हैं, उतना कोई और नहीं।

आज के दौर में बच्चों पर बहुत दबाव है। मेरी बेटी तो अभी छोटी है, मैं उसे पूरा समय भी देती हूं, लेकिन उसे भी कई बार तनाव हो जाता है। ऐसे में अकेले रहने वाले बच्चों के बारे में सोचकर देखें। माता-पिता घर से बाहर काम करते हैं। बच्चा क्या करे-किसके साथ खेले और पढाई में कोई दिक्कत हो तो किससे पूछे। वह धीरे-धीरे सारे प्रेशर खुद पर लेने लगता है और तनावग्रस्त हो जाता है। इस पर उन्हें बाहर खेलने, माता-पिता से खुलकर बात करने का समय न मिले तो उनका तनाव बढता चला जाता है। हमारे समय में पढाई का दबाव थोडा कम था, अब बहुत ज्यादा है। लेकिन इससे भी बडी समस्या है बच्चों का अकेलापन और घंटों कंप्यूटर-नेट के आगे बैठे रहना। आउटडोर गेम्स में दिलचस्पी पैदा करना पेरेंट्स की जिम्मेदारी है। बच्चों में इतनी ऊर्जा होती है कि खाली बैठ ही नहीं सकते। उन्हें हमेशा व्यस्त रखने की जरूरत होती है। अगर पेरेंट्स साथ नहीं हैं तो जाहिर है वे टीवी-कंप्यूटर के आगे बैठेंगे और उनका स्ट्रेस बढेगा। टीवी ज्यादा देखने से उनमें आक्रामकता आ रही है। वे टीवी देखते हुए कुछ न कुछ खाते रहते हैं, जिस कारण उनका वजन भी बढ रहा है। पिछले 5-6 वर्षो में बच्चों में ओबेसिटी की समस्या जितनी बढी है, उतनी कभी नहीं देखी गई। बच्चों के साथ स्पेशल बॉन्डिंग तभी हो सकती है, जब पेरेंट्स पढाई, अनुशासन के अलावा भी अपने बच्चों के साथ बच्चा बनकर खेलें। व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय पूरी तरह बच्चों को दें।

शिक्षा व्यवस्था में खामियां तो हैं। पूरा एजुकेशन सिस्टम बदल चुका है। मैं और बेबो (करीना) छोटे थे तो पढाई का ऐसा दबाव कभी महसूस नहीं किया। हमें माता-पिता, दादा-दादी का साथ मिला। हमारे समय में खेलने के साधन आज की तुलना में कम थे। अकसर मैं मां का दुपट्टा ओढकर टीचर बनती और बेबो स्टूडेंट। आज के बच्चों के पास खेलने के कई साधन हैं लेकिन समय ही नहीं है। कोर्स इतना मुश्किल है कि लगभग सभी विषय ट्यूटर को पढाने होते हैं। पढाई से भागा तो नहीं जा सकता।

अपनी बात करूं तो बच्चों को अनुशासन में अवश्य रखती हूं, लेकिन बहुत कठोर नहीं हूं। बडे होकर वे जो भी बनना चाहें, मैं व मेरे पति संजय उन्हें अपना पूरा सहयोग देंगे। अभी तो सिर्फ इतना ही कह सकती हूं।

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माता-पिता का साथ सबसे जरूरी

ट्विंकल खन्ना भाटिया (अभिनेत्री)

पारिवारिक जीवन को मैं बहुत महत्व देती हूं। मेरे माता-पिता लंबे समय तक अलग-अलग रहे हैं। मैंने व रिंकी ने यह पीडा महसूस की है। लेकिन मां ने हम दोनों बहनों की परवरिश बहुत प्यार से की है। मेरा मानना है कि बच्चे को बनाने में पेरेंट्स का सबसे बडा हाथ होता है। हमारी मां ने कभी हमें कोई कमी नहीं होने दी। हमारे बडे होने के बाद ही उन्होंने दोबारा काम शुरू किया। मैं मां की तरह परफेक्ट मॉम नहीं हूं। लेकिन बेटे आरव की खुशी का मैं और मेरे पति अक्की (अक्षय कुमार) पूरा खयाल रखते हैं।

बच्चों पर पढाई का प्रेशर बढ रहा है, लेकिन यह प्रेशर तनाव में तभी बदलता है, जब माता-पिता बच्चों को वक्त नहीं दे पाते। अकेले रहने वाले बच्चे टीवी-कंप्यूटर देखकर समय बिताते हैं और ज्यादा एडिक्शन होने पर वे प्रॉब्लम चाइल्ड भी बन सकते हैं।

मेरा मानना है कि आज छात्रों पर करियर का दबाव बढा है। हमारे समय में यह इतना नहींथा। मां ने कभी हम पर यह दबाव नहीं बनाया कि कोई खास करियर ही चुनें या खास विषय की पढाई करें। मैंने आर्किटेक्चर-इंटीरियर डिजाइनिंग की पढाई की। मुझे याद नहीं आता कि पढाई या करियर को लेकर कभी मां के साथ हमारी बहस हुई हो या उन्होंने अपनी इच्छाएं हम पर थोपने की कोशिश की हो। उन्होंने भरसक हमें सहयोग ही दिया।

मेरे बेटे आरव को पढाई के साथ ही मार्शल आर्ट और एक्टिंग में दिलचस्पी है। अभी तो वह छोटा है और उसकी इच्छाएं बदलती रहती हैं। कभी वह पायलट बनना चाहता है तो कभी एक्टिंग करने में उसे मजा आता है। बडा होकर वह क्या करेगा, यह उसे ही तय करना है, लेकिन माता-पिता होने के नाते हर कला के प्रति उसे प्रेरित करना हमारी जिम्मेदारी है।

शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पणियां करना मैं उचित नहीं समझती। मेरा मानना है कि बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं। उन्हें बनाना माता-पिता की ही जिम्मेदारी है। स्कूल और टीचर्स तो बाद में आते हैं। आज इतना जबर्दस्त कंपिटीशन है। ऐसे में पढाई का दबाव बढेगा ही। पेरेंट्स का कर्तव्य है कि अपने बच्चों को गाइड करें, ताकि पढाई उन्हें बोझ न लगे। उन्हें खेलने और अन्य गतिविधियों के लिए भी अवश्य प्रेरित किया जाना चाहिए। साथ ही यदि बचपन से ही उन्हें थोडा अनुशासित और व्यवस्थित होने की सीख दे दी जाए, तो आगे परेशानी नहीं होगी।

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प्रतिभा को उभरने का मौका मिले

साजिद खान (फिल्म निर्माता)

हर इंसान के भीतर एक बच्चा होता है। बडे होने पर भी लगता है, काश पंख होते तो उड जाते, बौछारों में भीगते, पानी में खेलते, रेत के घर बनाते...। लेकिन बडे होने की अपनी दिक्कतें हैं। जब हमारे मन में ये बातें आती हैं तो बच्चों को तो पूरा हक है कि जो उनका दिल कहे, उसी पर चलें। मैं उन पर बहुत अनुशासन रखने के पक्ष में नहीं हूं। ज्यादा अंकुश से बचपन मुरझा सकता है। मेरे बचपन में हमारे परिवार की माली हालत कुछ खास नहीं थी, लेकिन हमारा बचपन बहुत समृद्ध था। बहन फराह खान का पूरा सपोर्ट था। इंडियाज गॉट टैलेंट रिअलिटी शो में जज बनने के बाद मुझे एहसास हुआ कि बच्चों के साथ हम अन्याय करते हैं। हमने दो दूनी चार सीखा है, वही बच्चों को भी सिखाना चाहते हैं। दो दूनी पांच भी हो सकता है, यह दरअसल बच्चे ही हमें सिखाते हैं।

अगर अपनी बात करूं तो बचपन में पढाई मुझे बोझ लगती थी। लेकिन यह बात भी सच है कि न्यूनतम पढाई के बिना जिंदगी में आगे नहींबढा जा सकता। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हम यह कह नहीं सकते कि शिक्षा व्यवस्था में खामियां हैं। पढाई का प्रेशर तो रहेगा ही, सोचना यह पडेगा कि बच्चों का यह दबाव कम कैसे करें। पढाई जरूरी है, बाकी ज्ञान भी हासिल करना है। लेकिन पढाई बोझ न लगे, बचपन इन सबके बीच खो न जाए, इस पर अगर काम किया जा सके तो बेहतर होगा।

मैंने महसूस किया कि भारतीय बच्चे वाकई बहुत टैलेंटेड हैं। बुरी से बुरी स्थितियों में रहने वाले बच्चों में भी कई कलाएं जन्म ले रही होती हैं। पढाई, भारी बस्तों, होमवर्क, प्रोजेक्ट्स, ट्यूशंस के बीच उनका सारा टैलेंट कहीं दबकर रह जाता है। क्या हम ऐसा कर सकते हैं कि किसी बच्चे में यदि संगीत की क्षमता है तो स्कूल में ही उसे पूरी तरह निखरने का मौका मिल सके! उसे पढाई को लेकर बहुत न सोचना पडे!

बच्चे देश का भविष्य हैं। उनका वर्तमान कैसा है, इसी पर देश का आने वाला कल निर्भर करता है। हमारे समाज में यह अच्छी बात है कि हम बच्चों को भरसक पारिवारिक माहौल देते हैं। शादी के बाद भी जब तक बेटा-बेटी अलग होने की बात न करें, उन्हें अलग नहीं होने देते। यह दृष्टिकोण एक तरह से फायदेमंद भी है, क्योंकि उन्हें माता-पिता सहित दादा-दादी या नाना-नानी का साथ मिलता है।

हालांकि आज अभिभावक बच्चों को लेकर पहले की तुलना में ज्यादा सोच रहे हैं। कोशिश कर रहे हैं कि बच्चों की प्रतिभा निखर कर आए। हमारे बच्चे मानसिक व शारीरिक रूप से दुनिया के किसी भी अन्य बच्चों से बेहतर हैं। यू.एस. और विदेशों में रहने वाले बच्चों की कई दूसरी समस्याएं हैं, जो हमारे यहां नहीं हैं। अगर हमारे यहां थोडी सुविधाएं बढाई जाएं तो यहां के बच्चे बहुत बेहतर रिजल्ट दे सकते हैं।

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बचपन को थोडा बेफिक्र बनाना होगा

स्वाति पोपट वैट्स (अध्यक्ष, पोद्दार एजुकेशन नेटवर्क और एजुकेशनल एडवाइजर, टाटा स्काई)

बच्चों की जिंदगी जितनी हसीन लगती है, उतनी है नहीं। यह यूटोपिया की तरह है, दूर से सुहानी दिखती है। वे होमवर्क, पेरेंट्स और स्कूल के दबाव में दबे रहते हैं। बच्चों का भविष्य काफी हद तक पेरेंट्स पर निर्भर होता है। उन्हें पंद्रह वर्ष की उम्र तक सबसे ज्यादा अटेंशन की जरूरत होती है। यह न मिलने पर वे अकेले समस्याओं से जूझते हैं और अवसादग्रस्त हो जाते हैं। कामकाजी माता-पिता, संयुक्त परिवारों का बिखरना, सिंगल पेरेंटिंग से मिले अकेलेपन ने उन्हें टीवी-इंटरनेट की दुनिया की ओर धकेल दिया है। बच्चों के ब्रेन को हमेशा एक्साइटमेंट चाहिए। उनकी खुशी-उनके इमोशंस हमेशा जाग्रत अवस्था में रहते हैं। दुर्भाग्य से व्यस्त पेरेंट्स बच्चों को पैसे देते हैं, हर जरूरत पूरी करते हैं, लेकिन समय नहीं दे पाते। अतिरिक्त व्यस्तता उनमें अपराध-बोध को जन्म देती है और इसकी भरपाई के लिए वे दूसरी गलती यह करते हैं कि बच्चों की नाजायज मांगें पूरी करते हैं। पहले समझौते करते हैं, बाद में पछताते हैं।

दूसरी ओर स्कूल में होमवर्क, परीक्षाओं, प्रोजेक्ट वर्क का इतना दबाव है कि उनके पास आउटडोर गेम्स के लिए समय ही नहीं। जो एकाध घंटे बचते हैं, टीवी की भेंट चढ जाते हैं। मेरे एक संबंधी का इकलौता नौ वर्षीय बेटा अवसादग्रस्त हो गया। माता-पिता नौकरी के सिलसिले में भारत से गल्फ चले गए तो बच्चा वहां एडजस्ट नहीं कर सका। बच्चों को स्नेह से सींचने की जरूरत होती है। उनमें अपार क्षमताएं हैं। माता-पिता समय नहीं देंगे तो वे कहीं और अपनी जिज्ञासाओं को शांत करेंगे। उनके पास लेटेस्ट टेक्नोलॉजी है। दुनिया उन्हें माउस के एक क्लिक पर मुहैया है। मैं लंबे समय से गुजरात सरकार के लिए किड्स ग्रासरूट एजुकेशन पर काम कर रही हूं। हमें फिर से ट्रडिशनल पेरेंटिंग को अपनाना होगा। पेरेंट्स को बच्चों का सम्मान करना चाहिए, साथ ही यह भी पता रहे कि कहां उन्हें ढीला छोडना है, कहां सख्ती करनी है। अभिभावकों व बच्चों के बीच एक बेहतर व नियमित संवाद दुर्भाग्य से आज के समय में कम हो चुका है।

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अपनी इच्छाएं बच्चों पर न थोपें पेरेंट्स

डॉ. श्वेता मिश्रा, हेड ऑफ स्पेशल नीड डिपार्टमेंट फॉर कंगारू किड्स एजुकेशन ट्रस्ट

इस जेनरेशन के बच्चों को कई समस्याएं झेलनी पड रही हैं। कुछ पेरेंट्स को तो बच्चों के रूप में ऑल राउंडर चाहिए। ईश्वर ने हर मनुष्य को किसी न किसी कला में माहिर बनाया है। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट में बेस्ट हैं, जरूरी नहीं कि वह हॉकी या फुटबॉल में भी बेस्ट हों। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर गायकी में अव्वल हैं, जरूरी नहीं कि वह कुकिंग में भी आगे रहें। दिक्कत यह है कि अभिभावक अपनी इच्छाएं-आकांक्षाएं बच्चों पर थोपते हैं। अपनी जिंदगी में जिन ख्वाबों को पूरा नहीं कर पाते, चाहते हैं कि बच्चों के जरिये उन्हें पूरा करें। क्या यह जरूरी है कि बच्चा पढाई में तो टॉप रहे ही, ड्राइंग-पेंटिंग, खेलकूद या अन्य तमाम गतिविधियों में भी अव्वल रहे? अकसर माता-पिता गर्व से बताते हैं कि उनके बच्चे को अच्छे मा‌र्क्स मिले हैं। इस पर यदि दोस्तों के नंबर अधिक आ जाएं तो बच्चे की शामत आ जाती है। कई बार टीचर्स भी बच्चों की परफॉर्र्मेस को अपनी खुद की परफॉर्र्मेस से जोड लेते हैं। अगर किसी क्लास में बच्चे 80 प्रतिशत मा‌र्क्स लाते हैं तो क्रेडिट क्लास-टीचर को जाता है। जो छात्र कम मा‌र्क्स लाता है, उसे टीचर अपने अपराध-बोध के कारण प्रताडित करती है। यानी कम मा‌र्क्स लाने पर उसे दोहरी यातना झेलनी पडती है, घर में भी और स्कूल में भी। टॉपर बच्चे चाहे जैसे हों, सबके लाडले होते हैं। ऐसे में पढाई में कमजोर बच्चे डिप्रेशन में चले जाते हैं। समाज के रवैये से वे कुंठित भी हो जाते हैं और कंप्यूटर, टीवी या विडियो गेम ही उनके दोस्त बन जाते हैं, जो उनसे कोई सवाल नहीं करते, जो उन्हें किसी कसौटी पर नहीं कसते। मेरा सुझाव यह है कि बच्चों में तनाव कम करने के लिए स्कूल में विशेष पैनल बनाया जाए। उनके पास खेलने के लिए वक्त हो। उनका आई क्यू केवल लिखित परीक्षा तक न हो, इसे हर क्षेत्र में परखा जाए। बच्चों को बौद्धिक खुराक चाहिए, प्यार-स्नेह-खानपान के बाद उन्हें ऐसा साझीदार चाहिए, जो उनसे हर विषय पर बात कर सके। यह माता-पिता ही कर सकते हैं, इसलिए 24 घंटे में केवल एक घंटा पूरी तरह बच्चों के लिए सुरक्षित रखें।

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हेल्थ मीटर
शहरी बच्चों के पास अच्छे कपडे, खिलौने, लेटेस्ट टेक्नोलॉजी व अन्य सामान हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी सेहत भी अच्छी है।
1. 12 फीसदी छात्र नियमित अस्पताल जाते हैं। जबकि 3 फीसदी वयस्क ही लगातार हॉस्पिटल जाते हैं।
2. 62 फीसदी का खानपान ठीक नहीं है। 32 प्रतिशत हफ्ते में कम से कम तीन बार जंक फूड खाते हैं।
3. 34 प्रतिशत रोगग्रस्त हैं तो 37 फीसदी शारीरिक तौर पर फिट नहीं हैं।
4. 43 पर्र्सेट नियमित सब्जियां व फल नहीं खाते, जबकि 31 प्रतिशत रोज दो कप दूध भी नहींपीते।
5. 49 प्रतिशत बच्चों को प्रोटीन कम मात्रा में मिलता है।
6. 19 फीसदी पढाई में कमजोर हैं।
7. 33 प्रतिशत बच्चों की आंखें और 30 प्रतिशत के दांत कमजोर हैं।
8. 40 प्रतिशत बच्चे ओवरवेट हैं तो 30 फीसदी की मांसपेशियां कमजोर हैं।
9. सीढियां चढते हुए 63 प्रतिशत बच्चों की सांस फूलने लगती है।
10. 54 प्रतिशत स्कूल खत्म होने के बाद कोचिंग क्लासेज में जाते हैं।
11. 30 फीसदी छात्रों के पास आउटडोर गेम्स के लिए वक्त नहीं है।
12. 65 प्रतिशत बच्चे निजी, शैक्षिक व घरेलू समस्याएं झेल रहे हैं और 16 फीसदी बच्चे प्यार-स्नेह से वंचित हैं।
(अपोलो हॉस्पिटल्स की ओर से हैदराबाद, मुंबई, बैंगलोर, चेन्नई, पुणे, कोच्चि, इलाहाबाद, लखनऊ में 50 स्कूलों के करीब 40 हजार बच्चों पर कराए गए सर्वे के नतीजे। ये सभी छठी से बारहवींकक्षा के छात्र थे।)
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पीठ पर लदे भारी बस्ते बच्चों की सेहत बिगाड रहे हैं। एक शोध के अनुसार यदि बस्ते का वजन बच्चे के कुल वजन का पांच फीसदी है तो उसके धड वाले हिस्से को हानि पहुंच सकती है। यदि बस्ते का वजन बच्चे के कुल वजन का 15 प्रतिशत है तो उसके सिर, कंधे, धड सहित पूरे शरीर पर असर पडता है।
(मैंगलोर के एक फिजियोथेरेपी सेंटर व मेडिकल कॉलेज द्वारा कराया गया सर्वे)
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छात्रों के लिए कुछ व्यावहारिक टिप्स
. सोच को सकारात्मक बनाएं। पढाई में दिक्कत है तो उसे चुनौती मानकर उसका सामना करें। ये सोचें कि आपको सब-कुछ आता है और आप बिना दबाव के काम कर सकते हैं।
2. खुद को कम करके न आंकें । हर विषय में आप एक्सलेंट नहीं हैं तो कोई बात नहीं। यह जरूरी नहीं है कि हर विषय में रुचि हो। जिनमें रुचि है, उनमें एक्सलेंट बनकर दिखाएं।
3. मा‌र्क्स कम आए, इसे लेकर अपराध-बोध पालने के बजाय वास्तविक समस्या पर सोचें। पढाई में क्या कठिनाई आ रही है, कंसंट्रेट कर पा रहे हैं या नहीं। हो सकता है आप परीक्षा के लिहाज से न पढ रहे हों। पढाई के सही तरीके को लेकर माता-पिता व टीचर्स से बात करें। कई बार कठिन मेहनत के बावजूद परीक्षाएं अच्छी नहीं होतीं। इसका कारण होता है पढाई का तरीका सही न होना। कारण ढूंढें और उसके निदान में बडों की मदद लें।
4. यदि लगातार तनाव, बेचैनी या कंसंट्रेशन प्रॉब्लम हो रही हो और किसी भी तरह उससे बाहर नहींआ पा रहे हैं तो किसी काउंसलर की मदद लें।
5. घंटों पढने के बजाय कम समय में अधिक कंसंट्रेशन के साथ पढने का अभ्यास करें। रोज एक घंटा बाहर खेलें। मौज-मस्ती, आउटडोर गेम्स, एक्स्ट्रा एक्टिविटीज न छोडें।

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