शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

भागवत: १२७: भगवान को पाना है तो मर्यादा व प्रेम को जीवन में उतारें


भागवत में अब श्रीराम व श्रीकृष्ण की कथा आएगी। सूर्यवंश में श्री रघुनाथजी और चंद्रवंश में श्रीकृष्ण अवतरित हुए। वासना के विनाश हेतु सन्त धर्म बताने पर भी शुकदेवजी को लगा कि परीक्षित के मन में अब भी सूक्ष्म वासना बाकी रह गई है। जब तक बुद्धि में काम वासना है श्रीकृष्ण के दर्शन उसे नहीं होंगे। अत: राजा के मन में शेष रही काम-वासना का पूर्णत: नाश करने के लिए शुकदेवजी ने सूर्यवंश और चन्द्रवंश की कथा सुनाई।
यदि रामजी को मन में बसाओगे, मर्यादा पुरूषोत्तम रामचन्द्र का अनुकरण करोगे तो भगवान मिलेंगे। उनकी लीला का अनुकरण नहीं कर सकते। श्रवण करना चाहिए। उनका चरित्र चिंतनीय है। श्रीकृष्ण की लीला चिंतन करने के लिए और चिंतन करके तन्मय होने के लिए साधक का बर्ताव कैसा होना चाहिए? वह रामचन्द्रजी ने बताया। सिद्ध पुरूष का बर्ताव श्रीकृष्ण जैसा होना चाहिए। रामचन्द्र की लीला सरल है जबकि श्रीकृष्ण की सारी लीला गहन है।
राम दिन के 12 बजे आए और कृष्ण रात्रि को 12 बजे आए। एक मध्यान्ह में आए दूसरे मध्यरात्रि में आए। एक तो राजा दशरथ के भव्य राजप्रसाद में अवतरित हुए और दूसरे कंस के कारागृह में। रामचन्द्र मर्यादा में हैं तो श्रीकृष्ण प्रेम में हैं। मर्यादा और प्रेम को जीवन में उतारेंगे तो सुखी हो जाएंगे। नृसिंह अवतार की कथा में क्रोध नाश की, वामन अवतार की कथा में लोभ के नाश की बात कही गई है। काम का जब नाश होता है तब श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं। राम और कृष्ण हमारे जीवन का हिस्सा हैं। हमारी सांस-सांस में बसते हैं। राम सीधा-सीधा शब्द है। राम शब्द में ही कोई तोडफ़ोड़ नहीं है। र, आ और म। श्रीकृष्ण नाम में ही बांके हैं।

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