गुरुवार, 23 जून 2011

भागवत २८६

दोस्ती निभाएं तो कुछ इस तरह ...
पं.विजयशंकर मेहता
जीवन में एक सिद्धांत बनाइए, हम जिनकी कृपा पाना चाहते हैं उसके पास कभी खाली हाथ न जाएं। श्रीकृष्ण को क्या कमी थी और सुदामा के थोड़े से चावलों से उन्हें मिलता भी क्या लेकिन यह मामला वस्तु के मूल्य या महत्व का नहीं, भाव का है। विद्वानों और संतों का ऐसा मानना है कि राजा, ब्राह्मण, गुरु और बालक के पास कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। छोटा ही सही एक उपहार अवश्य ले जाएं, इससे वे प्रसन्न होते हैं।
आइये देखें सुदामा के दाम्पत्य का आधार भगवान् थे, रामायण के प्रसंग से समझें। मनुष्य साधक भौतिक, दैहिक व दैविक त्रि-तापों से नित्य प्रति तनु होता जाता है। सतोगुण, रजोगुण व तमोगुण के बीच से गुजरना सहज गति है। कभी इसमें परस्पर मिश्रण हो जाता है, तदनुसार होते जाते हैं। त्रि-चक्रम में उलझा साधक जप, तप व योग बल से अनुसूया साध्वी का संग करने अर्थात् बुद्धि शुद्ध करके चले तो ब्रम्हा, विष्णु व शंकर को शिशुवत अपने आश्रम (मन मंदिर) में लीला कराके असीम दैवी आनंद प्राप्त कर सकता है।
इस दैवी दम्पत्ति त्यागमूर्ति के सम्पर्क में भरतजी के जाने के पश्चात राम आए। चित्रकूट का त्याग किया अर्थात् जगत-जन्य विकार (गन्दगी) त्याग दी तब कहीं त्यागमूर्ति युगल के सम्पर्क का लाभ मिल सका। तात्पर्य यह कि सतसंग के लिए अविकार अवस्था (तन-मन की) होना आवश्यक है। परिवार में प्रेम का प्रसंग देखें।
वाल्मिकी रामायण में वर्णन है कि भरत के साथ सैन्य, हाथी, नागरिक आदि आए थे-राम के चित्रकूट में रहने के कारण लोगों का आवागमन भी बढ़ गया था, ऋषि-मुनियों के जप-तप में विघ्न पड़ता था, वे चित्रकूट से दूर कहीं घने वन में चले गए थे और भरतजी के सैन्य से गंदगी फैल गई थी इसलिए श्रीराम ने चित्रकूट भी छोड़ दिया। अर्थ है चित्त में अपनों के प्रति जग राग हो तो विकार आता है - उस राग को भी चित्त से हटाना है क्योंकि जहां राग होगा वहां द्वेश भी होगा।
इन राग द्वेश के रहते न तो जप हो पाता है और न ही तप और न ही योग इनसे परे ही साधक साधन कर सकता है।सुदामा का श्रीकृष्ण के चरणों में राग है, वे उसे धन-सम्पदा से नहीं जोड़ते, कृष्ण राजा हैं और सुदामा एक ब्राम्हण भिक्षु की तरह लेकिन फिर भी रिश्ता एकदम आत्मीय है। सुदामा ने कभी कृष्ण से कोई अपेक्षा नहीं रखी और श्रीकृष्ण ने भी ऐसा नहीं दर्शाया कि वे अपने मित्र की दरिद्रता को दूर करना चाहते हैं, कृपा कर रहे हैं। उन्होंने कुछ दिया ही नहीं प्रत्यक्ष रूप से।

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