शनिवार, 23 जुलाई 2011

भागवत २१८-२१९

वो हमें गिरने नहीं देते, सभांल लेते हैं...
अर्जुन को यह अनुभव होता था कि वह अकेला ही श्रीकृष्ण का बड़ा भक्त है लेकिन कृष्ण ने उसे उस ब्राह्मण से मिलाकर यह भ्रम दूर कर दिया। भगवान की यह विशेषता है कि अगर उनका भक्त अभिमान के वशीभूत होने लगे, किसी बुराई के समीप जाने लगे तो भगवान उसे गिरने नहीं देते, उसे संभाल लेते हैं। भक्त को अहसास भी नहीं होने देते हैं और उसके सारे कष्ट, अभिमान, कुराइयां हर लेते हैं। अगर भक्त लायक है तो स्वत: ही समझ जाता है। भगवान ऐसी ही लीलाएं दिखा रहे हैं, अर्जुन का अभिमान अब जाता रहा। भक्ति निष्काम हो गई। अर्जुन श्रीकृष्ण के और नजदीक हो गए। अभी सर्वस्व समर्पित नहीं किया था अब वह भी कर दिया। भक्त और भगवान एक हो गए हैं।

वैसे भी माना जाता है कि अर्जुन श्रीकृष्ण एक ही हैं, नर और नारायण के अवतार हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं सभी में मेरा अंश है। हम भी उन्हीं नारायण के अंश हैं।
एक कथा है - एक गांव में कोई ग्वाला था, भगवान को बहुत मानता था। गांवों में जात-पात की परम्परा बहुत थी उन दिनों। ब्राम्हण और क्षत्रियों का दबदबा था। अछूतों का कोई दर्जा नहीं था उनके बीच। गांव में सबसे अलग उनका स्थान था।
एक दिन गांव में कोई संत पहुंचे। वे जात-पात नहीं मानते थे सो हर किसी को उनके दर्शन करने की, उपदेश सुनने की आजादी थी। फिर भी श्रेष्ठी वर्ग का दबदबा था सो छोटी जात वालों को दर्शन के लिए बाद में बुलाया जाता।संत से यह सुब देखा न गया। उन्होंने समझाया कि सब समान हैं, सभी भगवान का अंश हैं। उस ग्वाले ने संत की बात सुनी, वह बात उसके दिल में बैठ गई। वह भी सबसे कहने लगा कि हम भी भगवान के ही बनाए हैं, उसके ही अंश हैं। यह सुन ऊंचे समाज वालों से नहीं रहा गया। गरीबों पर अत्याचार और बढ़ गए। संत से यह अमानवीयता देखी न गई। वे गांव छोड़कर चले गए।

रावण क्यों मारा गया, उसका सारा वैभव क्यों नष्ट हो गया?
कहने का आशय यह है कि हम भले ही मूर्ति पूजा करें लेकिन चित्त को उसमें स्थिर करके करें। बस उसी में खुद को पूरी तरह टिका दें। भगवान उस प्रतिमा, उस पत्थर से भी प्रकट हो जाएगा।ऐसी ही भक्ति के हमारे शास्त्रों में दो उदाहरण हैं। एक भक्त प्रहलाद का जिसे उसके पिता ने खम्भे से भगवान को बुलाने की चुनौती दी और खम्भा तोड़कर खुद नारायण नृसिंह के रूप में प्रकट हो गए। दूसरा उदाहरण मीराबाई का है, जिन्होंने कृष्ण की प्रतिमा को ही अपना पति मान लिया। जिन्दगीभर उसी प्रतिमा को लेकर भक्ति की। जब जहर दिया गया तो गोविन्द का नाम लेकर हंसकर पी गई। मीराबाई को कुछ नहीं हुआ, उधर प्रतिमा नीली पड़ गई।
मिथिला के राजा का नाम था बहुलाष्व। उनमें अहंकार का लेश भी न था। श्रुतदेव और बहुलाष्व दोनों ही भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे भक्त थे। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने उन दोनों पर प्रसन्न होकर दारुक से रथ मंगवाया और उस पर सवार होकर द्वारका से विदेह देश की ओर प्रस्थान किया। भगवान के साथ नारद, वामदेव, अत्रि, वेदव्यास, परशुराम, असित, आरुणि, शुकदेव, बृहस्पति, कण्व, मैत्रेय, च्यवन आदि ऋषि भी थे। वे जहां-जहां पहुंचते, वहां-वहां के नागरिक और ग्रामवासी प्रजा पूजा की सामग्री लेकर उपस्थित होती।
भगवान अपने साथ अनेक ऋषिमुनियों को लेकर चलते हैं। वैसे भी श्रीकृष्ण अकेले कम ही रहे। उनका उद्देश्य रहता है भक्तों को साधु-संत और विद्वान पुरुषों की निकटता प्राप्त हो। कृष्ण का हमेशा यही प्रयास रहा कि पूजनीय संत, विद्वान उनके आसपास रहें। किसी भी समय वे अकेले न रहें। हर परेशानी के समय विद्वान और संत उनके पास रहें। दरअसल श्रीकृष्ण ने मानवजाति को यह संदेश दिया है कि आप स्वयं कितने ही विद्वान क्यों न हो जाएं। कितने ही सक्षम क्यों न हों फिर भी आपके साथ विद्वानों का होना जरूरी है। हमेशा संतों की छत्रछाया में रहें। आप पर आती मुश्किलें स्वत: लौट जाएंगी।
यह बात विचारणीय है कृष्ण के जीवन के हर पल में मानव जाति के लिए कई संकेत छिपे हैं। संतों का, विद्वानों का साथ क्यों जरूरी है, वो भी श्रीकृष्ण जैसे सर्वसमर्थ पूर्णावतार को। यह जिन्दगी के लिए एक संकेत है। हम अपने मद में संत-विद्वानों का अपमान कर देते हैं। इससे हमारी सिद्धि नष्ट हो जाती है।
रावण क्यों मारा गया, सारा वैभव क्यों नष्ट हो गया उसका। रावण ने तमाम जिन्दगी संतों, विद्वानों का विरोध किया, तपस्वियों को मरवा डाला। उसकी लंका में भी एक ही साधु पुरुष था विभीषण। रावण अगर सुरक्षित था तो वह केवल लंका में विभीषण की उपस्थिति के कारण। याद रखिए आप तब तक सुरक्षित रहेंगे जब तक एक भी सज्जन आपके साथ है, जैसे ही संत पुरुष आपका साथ छोड़ दें समझ लें कि अब अंत नजदीक है। विभीषण को छोडऩे के बाद रावण खुद कितने दिन जी पाया।इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संतों का साथ हमेशा चाहिए। अगर जीवन में कोई पुण्य काम न आए तो आपको एक यही पुण्य बचा सकता है।
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