रविवार, 3 अप्रैल 2011

जो प्रेम मांगकर मिले उसका कोई मूल्य नहीं...

माता-पिता का एक मनोविज्ञान होता है सभी माता-पिता एक समय बाद बच्चों से प्रेम मांगने लगते हैं। प्रेम कभी मांगकर नहीं मिलता है और जो प्रेम मांगकर मिले उसका कोई मूल्य नहीं होता।
एक बात और समझ लें कि यदि माता-पिता बच्चों से प्रेम करें तो वह बड़ा स्वाभाविक है, सहज है, बड़ा प्राकृतिक है, क्योंकि ऐसा होना चाहिए। नदी जैसे नीचे की ओर बहती है, ऐसा माता-पिता का प्रेम है। लेकिन बच्चे का प्रेम माता-पिता के प्रति बड़ी अस्वाभाविक घटना है। ये बिल्कुल ऐसा है जैसे पानी को ऊपर चढ़ाना। कई मां-बाप यह सोचते हैं कि हमने बच्चे को जीवनभर प्रेम दिया और जब अवसर आया तो वह हमें प्रेम नहीं दे रहा, वह लौटा नहीं रहा।
इसमें एक सवाल तो यह है कि क्या उन्होंने अपने मां-बाप को प्रेम दिया था? यदि आप अपने माता-पिता को प्रेम, स्नेह और सम्मान नहीं दे पाए तो आपके बच्चे आपको कैसे दे सकेंगे? इसलिए हमारे यहां सभी प्राचीन संस्कृतियां माता-पिता के लिए प्रेम की के स्थान पर आदर की स्थापना भी करती हैं। इसे सिखाना होता है, इसके संस्कार डालने होते हैं, इसके लिए एक पूरी संस्कृति का वातावरण बनाना होता है।
जब बच्चा पैदा होता है तो वह इतना निर्दोष होता है, इतना प्यारा होता है कि कोई भी उसको स्नेह करेगा, तो माता-पिता की तो बात ही अलग है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है, हमारा प्रेम सूखने लगता है। हम कठोर हो जाते हैं। बच्चा बड़ा होता है, अपने पैरों पर खड़ा होता है तब हमारे और बच्चे के बीच एक खाई बन जाती है। अब बच्चे का भी अहंकार बन चुका है वह भी संघर्ष करेगा, वह भी प्रतिकार करेगा, उसको भी जिद है, उसका भी हठ है। इसलिए प्रेम का सौदा न करें इसे सहज बहने दें।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

किन्नर को दान क्यों देना चाहिए?


किन्नर एक ऐसा वर्ग है जो सभी के लिए अक्सर जिज्ञासा और आश्चर्य का विषय होता है। इनके जीवन का एक मात्र सहारा क्षेत्रीय नाच-गान ही है। हमारे यहां कोई भी तीज-त्यौहार या शादी ब्याह होता है तो किन्नरों को दान दिया जाता है। साथ ही कहा जाता है कि किन्नरों को दान देना चाहिए क्योंकि इन्हें दान देने से आर्थिक तरक्की होती है। कहते हैं यह अगर बुधवार के दिन किसी जातक को आशीर्वाद दे दें तो उसकी किस्मत खुल जाती है। शास्त्रों के अनुसार संचित,प्रारब्ध और वर्तमान मनुष्य के जीवन का कालचक्र है।
संचित कर्मों का नाश प्रायश्चित और औषधि आदि से होता है। आगामी कर्मों का निवारण तपस्या से होता है किन्तु प्रारब्ध कर्मों का फल वर्तमान में भोगने के सिवा अन्य कोई उपाय नहीं है। कर्मों के अनुसार स्त्री-पुरुष या नपुंसक योनि में जन्म लेना पड़ता है। ज्योतिष के अनुसार बुध को नपुंसक ग्रह माना गया है। माना जाता है कि किन्नरों पर बुध का विशेष प्रभाव होता है। इसीलिए किन्नरों को दान देने से बुध प्रसन्न होते हैं। बुध को धन, बुद्धि तर्क व कर्म का कारक ग्रह माना गया है। ऐसी मान्यता है कि बुध से संबंधित दान करने से संचित कर्मों का नाश होता है और अगले जन्म में किन्नर के रूप में जन्म नहीं लेना पड़ता है। इसीलिए किन्नरों को दान करने को विशेष महत्व दिया गया है।
आपकी राय
आपको विभिन्न परंपराओं के बारे में मिल रही इन जानकारियों को पढ़कर कैसा लगा? भारतीय धार्मिक परंपराओं या प्रथाओं के संबंध में आपके पास कोई रोचक जानकारी है या आप कुछ और जानना चाहते हैं तो यहां कमेंट कर अन्य पाठकों से शेयर करें। आपकी जिज्ञासाओं का जवाब अगली स्टोरी के रूप में दिया जाएगा।

पूजा में कुमकुम का ही तिलक लगाने का रिवाज क्यों?

हमारे हिन्दू धर्म में पूजा-पाठ से जुड़ी अनेक परंपराएं हैं जैसे पूजा के समय कलाई पर पूजा का धागा बांधना, फल चढ़ाना, तिलक लगाना आदि। बिना तिलक धारण किए कोई भी पूजा-प्रार्थना शुरू नहीं होती है।

मान्यताओं के अनुसार, सूने मस्तक को शुभ नहीं माना जाता।पूजन के समय माथे पर अधिकतर कुमकुम का तिलक लगाया जाता है। तिलक ललाट पर या छोटी सी बिंदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तिलक लगाने से दिमाग में शांति, तरावट एवं शीतलता बनी रहती है। मस्तिष्क में सेराटोनिन व बीटाएंडोरफिन नामक रसायनों का संतुलन होता है। मेघाशक्ति बढ़ती है तथा मानसिक थकावट विकार नहीं होता।
लेकिन पूजा में अधिकतर कुमकुम का तिलक ही लगाया जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि कुमकुम हल्दी का चूर्ण होता है। जिसमें नींबु का रस मिलाने से लाल रंग का हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार कुमकुम त्वचा के शोधन के लिए सबसे बढिय़ा औषघी है। इसका तिलक लगाने से मस्तिष्क तन्तुओं में क्षीणता नहीं आता है। इसीलिए पूजा में कुमकुम का तिलक लगाया जाता है।

रोज मंदिर क्यों जाना चाहिए?

आपने अक्सर हमारे बड़े-बुजूर्गो को कहते हुए सुना होगा कि रोज मंदिर जाना चाहिए। दरअसल मंदिर जाने की परंपरा किसी एक कारण से नहीं बनाई गई नहीं बल्कि इसके पीछे कई कारण है। सबसे पहला कारण है भगवान, हम इस मनोभाव से भगवान की शरण में जाते हैं कि हमारी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी, जो बातें हम दुनिया से छिपाते हैं वो भगवान के आगे बता देते हैं, इससे भी मन को शांति मिलती है, बेचैनी खत्म होती है। दूसरा कारण है वास्तु, मंदिरों का निर्माण वास्तु को ध्यान में रखकर किया जाता है।
हर एक चीज वास्तु के अनुरूप ही बनाई जाती है, इसलिए वहां सकारात्मक ऊर्जा ज्यादा मात्रा में होती है। तीसरा कारण है वहां जो भी लोग जाते हैं वे सकारात्मक और विश्वास भरे भावों से जाते हैं सो वहां सकारात्मक ऊर्जा ही अधिक मात्रा में होती है। चौथा कारण है मंदिर में होने वाले नाद यानी शंख और घंटियों की आवाजें, ये आवाजें वातावरण को शुद्ध करती हैं। पांचवां कारण है वहां लगाए जाने वाले धूप-बत्ती जिनकी सुगंध वातावरण को शुद्ध बनाती है। इस तरह मंदिर में लगभग सभी ऐसी चीजें होती हैं जो वातावरण की सकारात्मक ऊर्जा को संग्रहित करती हैं। हम जब मंदिर में जाते हैं तो इसी सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हम पर पड़ता है और हमें भीतर तक शांति का अहसास होता है। इसीलिए रोज मंदिर जाना चाहिए।

पत्नी को पति के पैर क्यों छूना चाहिए?

हमारी भारतीय परंपरा के अनुसार सामान्यत: सभी लोगों के घर में बड़े-बुजूर्ग, संत-महात्मा, वृद्ध आदि के पैर अवश्य छूते हैं। पैर छूने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। इस परंपरा के पीछे कई कारण मौजूद हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि बड़े लोगों के पैर छूने से हमारे पुण्य में बढ़ोतरी होती है। साथ ही उनके आशीर्वाद स्वरूप हमारा दुर्भाग्य दूर होता है और मन को शांति मिलती है लेकिन हमारे यहां बड़े- बजूर्गो का आर्शीवाद लेने के साथ ही पति के पैर छूने की भी परंपरा बनाई गई है।
वैसे आजकल अधिकांश लोग इसे दकियानुसी सोच मानते हैं लेकिन ऐसा माना जाता है कि सुबह उठकर सबसे पहले पति के पैर छूने चाहिए क्योंकि इससे पति-पत्नी में प्रेम बढ़ता है। कहते हैं पति के पैर छूना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलिए पति के चरण स्पर्श की परंपरा बनाई गई ताकि पत्नी के मन में हमेशा पति के लिए सम्मान की भावना रहे और पति के मन में अपनी पत्नी के प्रति जिम्मेदारी का एहसास बना रहे। दोनों के रिश्ते में प्रगाड़ता बनी रहे इसलिए प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया।

भागवत २१९-२२१ कृष्ण को रणछोड़ क्यों कहते हैं?

देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए मुचुकुन्द से प्रार्थना की अब आगे...उस समय देवताओं ने कह दिया था कि सोते समय यदि आपको कोई मूर्ख बीच में ही जगा देगा, तो वह आपकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जाएगा।कालयवन के भस्म होते ही भगवान श्रीकृष्ण मुचुकुंद के समक्ष प्रकट हुए मुचुकुंद ने उनको प्रणाम किया। भगवान् ने उसे बद्रिकाश्रम जाने के लिए कहा। दोनों भाई वापस मथुरा लौट आए। इधर भगवान् श्रीकृष्ण मथुरापुरी में लौट आए। अब तक कालयवन की सेना ने उसे घेर रखा था।
अब उन्होंने म्लेच्छों की सेना का संहार किया और उसका सारा धन छीनकर द्वारका को ले चले। जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण के आज्ञानुसार मनुष्यों और बैलों पर वह धन ले जाया जाने लगा, उसी समय मगधराज जरासन्ध फिर (अठारहवीं बार) तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर आ धमका। शत्रु-सेना का प्रबल वेग देख कर भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम मनुष्यों की सी लीला करते हुए उसके सामने से बड़ी फुर्ती के साथ भाग निकले।
उनके मन में तनिक भी भय न था। फिर भी मानो अत्यन्त भयभीत हो गए हों इस प्रकार का नाट्य करते हुए, वह सब का सब धन वहीं छोड़कर अनेक योजनों तक वे अपने कमलदल के समान सुकोमल चरणों से ही पैदल भागते चले गए। जीवन में शांति के महत्व पर भगवान की यह सबसे अद्भुत लीला थी। जिनका एक केश मात्र ही पूरी पृथ्वी का भार कम करने में सक्षम है वे श्रीकृष्ण नंगे पैर भागे। कृष्ण, कंस के अत्याचार झेल चुके मथुरावासियों के जीवन में अब पूर्ण शांति चाहते थे।

इस तरह काल को भी जीता जा सकता है
भागवत में अब तक आपने पढ़ा...जरासंध का मथुरा पर आक्रमण करना अब आगे...पचास वर्ष पूर्ण होने पर जरासंध आता है। जीव का पूर्वाद्र्ध समाप्त हुआ और अब उत्तरार्ध आया है वृद्धावस्था। वृद्धावस्था शुरू हो गई है। जरासंध के आने पर मथुरा का गढ़ टूटने लगता है। आंखों की, कानों की, हाथ पैरों की शक्ति क्षीण होती जाती है। चालीसवां वर्ष शुरू होते ही प्रवृत्ति में कटौती करनी शुरू करनी चाहिए। प्रभु की सेवा का समय बढ़ा देना चाहिए।जब जरासंध वृद्धावस्था अपने साथ काल को भी ले आता है तब बचना और कठिन है।
जरासंध और कालयवन एक साथ आ धमके तो श्रीकृष्ण को मथुरा छोड़ द्वारिका आना पड़ा।कालयवन का आगमन का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण ने उसको कंस के समान ही समझा और यादवों की रक्षा के लिए एक नए दुर्ग का निर्माण किया। सभी यादवों को उस जगह भेजकर सुरक्षित कर दिया। स्वयं दुर्ग से बाहर निकल आए। जब कालयवन भगवान् श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा, तब वे दूसरी ओर मुंह करके रणभूमि से भाग चले और उन योगिदुर्लभ प्रभु को पकडऩे के लिए कालयवन उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगा। रणछोड़ भगवान् लीला करते हुए भाग रहे थे, कालयवन पग-पग पर यही समझता था कि अब पकड़ा, तब पकड़ा। इस प्रकार भगवान् बहुत दूर एक पहाड़ की गुफा में घुस गए। उनके पीछे कालयवन भी घुसा। वहां उसने एक दूसरे ही मनुष्य को सोते हुए देखा। उसे देखकर कालयवन ने सोचा ''देखो तो सही, यह मुझे इस प्रकार इतनी दूर ले आया और अब इस तरह-मानो इसे कुछ पता ही न हो, साधु बाबा बनकर सो रहा है।
यह सोचकर उस मूढ़ ने उसे कसकर एक लात मारी। वह पुरुषबहुत दिनों से वहां सोया हुआ था। पैर की ठोकर लगने से वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आंखें खोलीं। इधर-उधर देखने पर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखाई दिया। वह पुरुष इस प्रकार ठोकर मारकर जगाए जाने से कुछ रुष्ट हो गया था। उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन के शरीर में आग पैदा हो गई और वह क्षणभर में जलकर राख का ढेर हो गया।यह काल को जीतने का तरीका है, जब हम पर काल का हमला हो तो डरे नहीं, परमात्मा को उसके आगे कर दें। परमात्मा को आगे कर देने से लाभ यह होगा कि काल आपको सताएगा नहीं। परमात्मा जब आगे हो जाएगा तो फिर सद्गुरु, सद्पुरुषों और सत्संग की इच्छा जागेगी। जीवन में सत्संग घटने लगेगा तो काल और उससे भयंकर उसका भय दोनों स्वत: ही समाप्त हो जाएंगे। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले.....।वे इक्ष्वाकुवंषी महाराजा मान्धाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे। वे ब्राह्मणों के परम भक्त, सत्यप्रतिज्ञ, संग्राम विजयी और महापुरुष थे। एक बार इन्द्रादि देवता असुरों से अत्यन्त भयभीत हो गए थे। उन्होंने अपनी रक्षा के लिए राजा मुचुकुन्द से प्रार्थना की और उन्होंने बहुत दिनों तक उनकी रक्षा की।

जरूरत है तो सिर्फ तरीका बदलने की
जब महाबली मगधराज जरासन्ध ने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम तो भाग रहे हैं, तब वह हंसने लगा। उसे भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी के ऐश्वर्य, प्रभाव आदि का ज्ञान न था। बहुत दूर तक दौडऩे के कारण दोनों भाई कुछ थक से गए। अब वे बहुत ऊंचे प्रवर्शण पर्वत पर चढ़ गए। उस पर्वत का प्रवर्षण नाम इसलिए पड़ा था कि वहां सदा ही मेघ वर्षा किया करते थे। जब जरासन्ध ने देखा कि वे दोनों पहाड़ में छिप गए और बहुत ढूंढने पर भी पता न चला, तब उसने ईंधन से भरे हुए प्रवर्शण पर्वत के चारों ओर आग लगवा कर उसे जला दिया। जब भगवान् ने देखा कि पर्वत के छोर जलने लगे हैं, तब दोनों भाई जरासन्ध की सेना के घेरे को लांघते हुए बड़े वेग से उस ग्यारह योजन (44 कोस) ऊंचे पर्वत से एकदम नीचे धरती पर कूद आए। उन्हें जरासन्ध ने अथवा उसके किसी सैनिक ने देखा नहीं और वे दोनों भाई वहां से चलकर फिर अपनी समुद्र से घिरी हुई द्वारकापुरी में चले आए।
जरासन्ध ने ऐसा मान लिया कि श्रीकृष्ण और बलराम तो जल गए और फिर वह अपनी बहुत बड़ी सेना लौटाकर मगध देश को चला गया।इस बात की बड़ी चर्चा होती है कि भगवान युद्ध से भागे थे। आईए इस फिलॉसाफी पर चर्चा करें....। गीता में भगवान ने कहा-हे पार्थ! मुझे तीनों लोकों में कुछ भी करने को नहीं है। पाने योग्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो पाई न हो। तो भी मैं कार्य में लगा रहता हूं। भगवान के कार्य सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, पवन इत्यादि को अविराम और अचूक गति से चलने में दिखाई देते हैं। भगवान् वह ईश्वर ही तो ''सब कारणों का एक मात्र अधिष्ठाता है, इस जगत् के रूप में व्यक्त हो रहा है।ईश्वर प्रकृति रूप में जब अबाधगति से कर्मरत है तो व्यक्ति क्यों कर्म विमुख हो? कर्म समाप्त नहीं होते।
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सबसे पहले द्रोपदी को लेने के लिए दुर्योधन ने किसे भेजा?

दुर्योधन ने विदुर जी को कहा तुम यहां आओ। तुम जाकर पाण्डवों की पत्नी द्रोपदी को जल्दी ले आओ। वह अभागिन यहां आकर हमारे महल की झाड़ू निकाले। हमारे महल की दासियों के साथ रहे। तब विदुर जी ने कहा दुर्योधन तुझे पता नहीं है कि तू फांसी पर लटक रहा है और मरने वाला है। तभी तो तेरे मुंह से ऐसी बात निकल रही है। अरे तुने शेर के मुंह में हाथ डाला है। तेरे सिर पर सांप फैलाकर फुफकार रहे है। तू उनसे छेडख़ानी करके यमपुरी मत जा।
द्रोपदी कभी तुम्हारी दासी नहीं हो सकती है। दुर्योधन ने प्रतिकामी से कहा युधिष्ठिर ने द्रोपदी को दावं पर लगाया है तुम इसी समय जाकर द्रोपदी को ले आओ। पाण्डवों से डरने की कोई बात नहीं है। प्रतिकामी दुर्योधन की आज्ञा के अनुसार द्रोपदी के पास गया। द्रोपदी से कहा महाराज युधिष्ठिर जूए में सब धन के साथ आपको भी हार गए हैं। जब दावं पर लगाने के लिए कुछ नहीं रहा तो उन्होंने आपको ही दावं पर लगा दिया। आप भी दुर्योधन की जीती हुई वस्तुओं में से है इसलिए आप मेरे साथ सभा में चलिए। तब द्रोपदी बोली जगत में धर्म सबसे बड़ी वस्तु है। मैं धर्म का उल्लंघन नहीं करना चाहती। तुम सभा में जाकर धर्मावलंबियों से पूछो की मुझे क्या करना चाहिए?