आस्था सिर्फ तब से नहीं है, जब से आस्था चैनल है। हां, यह हो सकता है कि मेरे अपने दिल में किसी विशेष ईश्वर, संत, वैद्य के लिए कोई खास स्थान बन खड़ा हुआ हो। अगर किताबी और बेताबी ढंग से ना देखें तो मन्दिर, मस्जिद, चर्च की इमारतें आस्था और श्रद्धा ही तो हैं। बस इनमें हमारी भावनाओं ने मजबूती की कलई भर दी है और हमारे यकीन ने इन्हें सजा-संवार दिया है। ताजा मामला इतना बासी है कि इसे टटोलना थोड़ा सा जरूरी है। साईं बाबा, बाबा थे, या संत थे, या ईश्वर थे या हिंदु-मुस्लिम तम एकता का प्रतीक थे या वगैरह-वगैरह थे....हम भी इसी बहस में पड़कर देखते हैं। शंकराचार्य की साध्य विचारधारा में ऐसा क्या था जो लोगों, मीडिया व शिरडी वाले के लिए असाध्य हो गया। यह वाकई कोई मामला है या बनाया जा रहा है या बन चुका है या अब बनेगा। आइए आगे बढ़ते हैं। शंकराचार्य के बयान को ध्यान से सुनने, देखने पर उनकी आधी बात पर निगाह टिक जाती है। वे कह रहे हैं कि साईं बाबा के नाम पर देश में कमाई हो रही है। कमाई होना और कमाई गलत हाथों में जाना, दो अलग बातें हैं। यदि इस तरह के कमाऊ मामले हो रहे हैं, तब इस बात को अहमियत देनी होगी कि संत समाज की नज़र अपने समाज पर रहती है, ऐसे में यह देश के हित में है कि शंकराचार्य या उन जैसा कोई और या उनसे बिल्कुल अलग कोई ऐसे सच सामने लाए। एक मामले पर नजर डालना यहां जरूरी है। अप्रैल 2013 में आरटीआई कार्यकर्ता संजय काले की ओर से आरोप लगा था कि शिर्डी मन्दिर में जो भी आभूषण चढ़ाए जाते हैं, उनके रखरखाव सम्बंधी नियमों पर आंखें मूंद ली गईं। कहा गया कि जो खजाना गुरुवार-रविवार मन्दिर में मनाए जाने वाले उत्स वों के दौरान नीलाम होना चाहिए था, उसकी नीलामी नहीं की गई व सोने को गला कर रखा गया, जो कि नियमों के सख्त खिलाफ था। हालांकि इस मामले की भनक राज्य सरकार तक पहुंची। शिरडी से लेकर तिरुपति तक के तीर्थस्थलों में इस तरह की शिकायतें आम हैं। हमारे देश में धर्म का 'ध' भी फूंक-फूंक कर लिखा जाता हे, ऐसे में कोई आम आदमी इस तरह के घपलों की खबरें सामने लाने में कई बार सोचता है। इसी सोच-विचार की आड़ में सिक्के गिने जाते हैं और अंध श्रद्धा की आलीशान कोठियां खड़ी होती रहती हैं। जिन शंकराचार्य स्वरूपानंद ने साईं पर सवाल उठाया है, वे मोदी के ‘हर-हर मोदी' पर भी बोलने की हिम्मत दिखा चुके हैं। अपनी बात कहते हुए भले ही उन्हेांने मीडिया और अटपटे शब्दों की फिराक में रहने वालों के लिए मुद्दा खड़ा किया हो, पर उन्हेांने देश में आस्था के नाम पर हो रही कमाई पर भी आंखें तरेरी हैं। हालांकि अगर आप लोग मेरी कलम को पक्षपात की स्याोही में डूबी हुई ना समझें तो कह सकता हूं कि साईं की ओर भक्त और भक्ति का झुकाव का कारण सरलता और सहजता है। वहीं शंकराचार्य जैसी मान्यतताओं को भक्तों के दर्शन तो मिल रहे हैं, पर चर्चित चढ़ौतियां नहीं। कहने में कड़वा लगता है पर शंकराचार्य का महत्व व्यारवहारिक जिंदगी में एकदम उतना और वहीं तक है, जैसे कि आज के दौर में संस्कृच भाषा का। जहां तक बात संपूर्णानंद की है, तो यह वही शख्स हैं, जिनकी राय अयोध्या मसले के वक्त बाकी शंकराचार्यों से अलग थी। राजनैतिक इतिहास व राजनैतिक दलों में इनका इतिहास खोजना जरूरी नहीं समझा। पूरे बयान और मामले में जो एक बात जरूरी है, वह है श्रद्धा के नाम पर हो रही कमाई और किसी व्यक्ति-वर्ग विशेष को उससे हो रहा लाभ। क्या किसी भी धर्म, व्यवसाय या पेशे की जंजीरें तोड़कर हम उस सच्चे इंसान की तरह नहीं सोच सकते कि कोई हमारी मेहनत से कमाई रकम का दुरुपयोग ना करे। अगर मठ-श्रद्धालयों में इस तरह की कमाई को लेकर किसी संत ने चेतावनी दी है, तो हमें सिर्फ उतनी ही बात स्वीकार कर बाकी के कुतर्क निम्न सोच वालों के लिए छोड़ देने चाहिए। जहां तक बात साईं बाबा के ईश्वर होने या ना होने की है, तो इस बात पर तो कब की गांठ बंध चुकी है कि ईश्वर सिर्फ हमारी श्रद्धा और भरोसे का रूप है, जो हमारे अंदर है, समाने है, हममें है, सब में है। जिन कबीर, तुलसी, ब्यास और रविदास को संत-साधु का लिखित दर्जा मिला है, उन्हें हम अक्सर दसवीं-बारहवीं में जीवन परिचय की शक्ल में पढ़ लिया करते हैं। बेचारे साईं बाबा को तो किसी पाठ्यक्रम ने अनिवार्य भी नहीं किया। उनकी अनिवार्यता आधुनिक पूज्यनीय व सराहनीय देवता के तौर पर हुई, जो गुरुवार को अपने भक्तों के बीच खिचड़ी बांटता है व मानवता और क्रूरता की खिचड़ी नहीं बनने देता। तो जिसे सोने-चांदी के मुकुट चढ़ाओ या बारह रुपए किलो वाले केले, अगर हम साईं मन्दिर ना भी जाएं, तो भी मनोरंजन चैनलों के प्राइम टाइम सीरियल में हमसे मिलने चला आता है। साईं जो ठहरा...
बच्चों की मासिक पत्रिका भोपाल से प्रकाशित , सम्पादक -अरुण बंछोर, उपसंपादक -ओमप्रकाश बंछोर
रविवार, 6 जुलाई 2014
महागणित और अबूझ पहेली
मशहूर विचारक ऑसपेन्सकी कहते हैं कि साधारण गणित के अनुसार दो और दो चार होता है। चार में से अगर चार घटा दिया जाए, तो शून्य बचता है, लेकिन एक महागणित भी होता है जिसमें पूर्ण से पूर्ण को घटा दिया जाए, तब भी पूर्ण ही बचता है। यह गणित विज्ञान को समझ में नहीं आता। प्राण को अगर समझना हो तो केवल अध्यात्म से ही समझा जा सकता है, क्योंकि उसके पास अनुभव है। विज्ञान के आंकड़ों से प्राण को नहीं समझा जा सकता। यह केवल अनुभव से समझा जा सकता है। सच पूछा जाए तो प्राण ऊर्जा को समझने की शक्ति विज्ञान में नहीं है।
इसलिए जो प्राण को समझना चाहते हैं, उन्हें इसका उत्तर अध्यात्म से ही मिलेगा। प्राण ब्रह्मांड का स्पंदन है। यह ब्रह्मांड ग्रहों व नक्षत्रों के माध्यम से सांस लेता है और मनुष्य भी अपनी सांसों के माध्यम से इस ब्रह्मंड से जुड़ा है। प्राण के कारण ही जीव को प्राणी कहा जाता है। प्राणवायु से ही हमारा शरीर स्वस्थ रहता है, लेकिन मनुष्य जब बीमार पड़ जाता है, तब प्राणवायु का प्रवाह शरीर में कम होने लगता है। इस कारण शरीर कमजोर हो जाता है, उत्साह में कमी आ जाती है, थकान महसूस होने लगती है, आलस्य बढ़ जाता है, जीवन से मोह कम हो जाता है और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
दूसरी ओर शरीर में अगर प्राणवायु की विपुलता है तो चेहरा लावण्यपूर्ण हो जाता है, मन प्रसन्न रहता है, उत्साह बना रहता है। किसी भी काम को करने में मन लगता है। वह गीत गाता है, किसी से प्रेम करता है, मुस्कराता है, खेलता है और नाचने लगता है। इसका अर्थ है, उसके शरीर में प्राणवायु का निरंतर प्रवाह चल रहा है। इसी से प्राणवायु की पहचान होती है। अब विज्ञान के आईने में इस प्राणवायु या प्राणशक्ति के संबंध में चर्चा की जाए। पहली बात तो यह है कि विज्ञान के पास प्राण को पहचानने का कोई यंत्र नहीं है। विज्ञान केवल पदार्थ का अध्ययन करता है। पदार्थ के अतिरिक्त वह कहीं झांक भी नहीं सकता।
शुक्रवार, 4 जुलाई 2014
कृष्ण की द्वारिका को किसने किया था नष्ट?
मथुरा से निकलकर भगवान कृष्ण ने द्वारिका क्षेत्र में ही पहले से स्थापित खंडहर हो चुके नगर क्षेत्र में एक नए नगर की स्थापना की थी। कहना चाहिए कि भगवान कृष्ण ने अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से रहने लायक बनाया था लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि द्वारिका नष्ट हो गई? किसने किया द्वारिका को नष्ट? क्या प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो गई द्वारिका? क्या किसी आसमानी ताकत ने नष्ट कर दिया द्वारिका को या किसी समुद्री शक्ति ने उजाड़ दिया द्वारिका को। आखिर क्या हुआ कि नष्ट हो गई द्वारिका और फिर बाद में वह समुद्र में डूब गई। अंतिम पेज पर खुलेगा इसका रहस्य जो आज तक कोई नहीं जानता।
इस सवाल की खोज कई वैज्ञानिकों ने की और उसके जवाब भी ढूंढे हैं। सैकड़ों फीट नीचे समुद्र में उन्हें ऐसे अवशेष मिले हैं जिसके चलते भारत का इतिहास बदल गया है। अब इतिहास को फिर से लिखे जाने की जरूरत बन गई है। आओ, इस सबके खुलासे के पहले जान लें इस क्षेत्र की प्राचीन पृष्ठभूमि को। पहले जान लें इस क्षेत्र का इतिहास... तब खुलेगा द्वारिका का एक ऐसा रहस्य, जो आप आज तक नहीं जान पाए हैं।
ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने-अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई। इन पांचों कुल के लोगों ने आपस में कई प्रसिद्ध लड़ाइयां लड़ी हैं जिसमें से एक दासराज्ञ का युद्ध और दूसरा महाभारत का युद्ध प्रसिद्ध है।
पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गया था और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य न प्राप्त होगा। (हरिवंश पुराण, 1, 30, 29)। ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहता था और उसी को उसने राज्य देने का विचार प्रकट किया, परंतु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया। (महाभारत, 1, 85, 32)
किसको कौन सा क्षेत्र मिला : ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (पंजाब से उत्तरप्रदेश तक), पश्चिम में द्रुहु को, दक्षिण में यदु को (आज का सिन्ध-गुजरात प्रांत) और उत्तर में अनु को मांडलिक पद पर नियुक्त किया तथा पुरु को संपूर्ण भूमंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए।
यदु ने पुरु पक्ष का समर्थन किया और स्वयं मांडलिक पद से इंकार कर दिया। इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक हुआ। उसके वंशज पौरव कहलाए। अन्य चारों भाइयों को जो प्रदेश दिए गए, उनका विवरण इस प्रकार है- यदु को चर्मरावती अथवा चर्मण्वती (चंबल), बेत्रवती (बेतवा) और शुक्तिमती (केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। तुर्वसु को प्रतिष्ठान के दक्षिण-पूर्व का भू-भाग मिला और द्रुहु को उत्तर-पश्चिम का। गंगा-यमुना दो-आब का उत्तरी भाग तथा उसके पूर्व का कुछ प्रदेश जिसकी सीमा अयोध्या राज्य से मिलती थी, अनु के हिस्से में आया।
यदि हम यादवों के क्षेत्र की बात करें तो वह आज के पाकिस्तान स्थित सिन्ध प्रांत और भारत स्थित गुजरात का प्रांत है। इसके बीच का क्षेत्र यदु क्षेत्र कहलाता था। पहले राज्य का विभाजन नदी और वन क्षेत्र के आधार पर था। सरस्वती नदी पहले गुजरात के कच्छ के पास के समुद्र में विलीन होती थी। सरस्वती नदी के इस पार (अर्थात विदर्भ की ओर गोदावरी-नर्मदा तक) से लेकर उस पार सिन्धु नदी के किनारे तक का क्षेत्र यदुओं का था। सिन्धु के उस पार यदु के दूसरे भाइयों का क्षेत्र था।
द्वारिका का परिचय : कई द्वारों का शहर होने के कारण द्वारिका इसका नाम पड़ा। इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है। भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका। ये 7 नगर हैं- द्वारिका, मथुरा, काशी, हरिद्वार, अवंतिका, कांची और अयोध्या। द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान भी कहा जाता है।
गुजरात राज्य के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे स्थित 4 धामों में से 1 धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है द्वारिका। द्वारिका 2 हैं- गोमती द्वारिका, बेट द्वारिका। गोमती द्वारिका धाम है, बेट द्वारिका पुरी है। बेट द्वारिका के लिए समुद्र मार्ग से जाना पड़ता है।
द्वारिका का प्राचीन नाम कुशस्थली है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र में कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण ही इस नगरी का नाम कुशस्थली हुआ था। यहां द्वारिकाधीश का प्रसिद्ध मंदिर होने के साथ ही अनेक मंदिर और सुंदर, मनोरम और रमणीय स्थान हैं। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने यहां के बहुत से प्राचीन मंदिर तोड़ दिए। यहां से समुद्र को निहारना अति सुखद है।
कृष्ण क्यों गए थे द्वारिका : कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के श्वसुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण और यदुओं का नामोनिशान मिटा देने की ठान रखी थी। वह मथुरा और यादवों पर बारंबार आक्रमण करता था। उसके कई मलेच्छ और यवनी मित्र राजा थे। अंतत: यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने मथुरा को छोड़ने का निर्णय लिया। विनता के पुत्र गरूड़ की सलाह एवं ककुद्मी के आमंत्रण पर कृष्ण कुशस्थली आ गए। वर्तमान द्वारिका नगर कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान थी, कृष्ण ने इसी उजाड़ हो चुकी नगरी को पुनः बसाया।
कृष्ण अपने 18 नए कुल-बंधुओं के साथ द्वारिका आ गए। यहीं 36 वर्ष राज्य करने के बाद उनका देहावसान हुआ। द्वारिका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुलों के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।
द्वारिका के इन समुद्री अवशेषों को सबसे पहले भारतीय वायुसेना के पायलटों ने समुद्र के ऊपर से उड़ान भरते हुए नोटिस किया था और उसके बाद 1970 के जामनगर के गजेटियर में इनका उल्लेख किया गया। उसके बाद से इन खंडों के बारे में दावों-प्रतिदावों का दौर चलता चल पड़ा। बहरहाल, जो शुरुआत आकाश से वायुसेना ने की थी, उसकी सचाई भारतीय नौसेना ने सफलतापूर्वक उजागर कर दी।एक समय था, जब लोग कहते थे कि द्वारिका नगरी एक काल्पनिक नगर है, लेकिन इस कल्पना को सच साबित कर दिखाया ऑर्कियोलॉजिस्ट प्रो. एसआर राव ने।
प्रो. राव ने मैसूर विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद बड़ौदा में राज्य पुरातत्व विभाग ज्वॉइन कर लिया था। उसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग में काम किया। प्रो. राव और उनकी टीम ने 1979-80 में समुद्र में 560 मीटर लंबी द्वारिका की दीवार की खोज की। साथ में उन्हें वहां पर उस समय के बर्तन भी मिले, जो 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा सिन्धु घाटी सभ्यता के भी कई अवशेष उन्होंने खोजे। उस जगह पर भी उन्होंने खुदाई में कई रहस्य खोले, जहां पर कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ था।
नौसेना और पुरातत्व विभाग की संयुक्त खोज : पहले 2005 फिर 2007 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निर्देशन में भारतीय नौसेना के गोताखोरों ने समुद्र में समाई द्वारिका नगरी के अवशेषों के नमूनों को सफलतापूर्वक निकाला। उन्होंने ऐसे नमूने एकत्रित किए जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। 2005 में नौसेना के सहयोग से प्राचीन द्वारिका नगरी से जुड़े अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छंटे पत्थर मिले और लगभग 200 नमूने एकत्र किए गए।
गुजरात में कच्छ की खाड़ी के पास स्थित द्वारिका नगर समुद्र तटीय क्षेत्र में नौसेना के गोताखोरों की मदद से पुरा विशेषज्ञों ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद समुद्र के भीतर उत्खनन कार्य किया और वहां पड़े चूना पत्थरों के खंडों को भी ढूंढ निकाला।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समुद्री पुरातत्व विशेषज्ञों ने इन दुर्लभ नमूनों को देश-विदेशों की पुरा प्रयोगशालाओं को भेजा। मिली जानकारी के मुताबिक ये नमूने सिन्धु घाटी सभ्यता से कोई मेल नहीं खाते, लेकिन ये इतने प्राचीन थे कि सभी दंग रह गए।
नौसेना के गोताखोरों ने 40 हजार वर्गमीटर के दायरे में यह उत्खनन किया और वहां पड़े भवनों के खंडों के नमूने एकत्र किए जिन्हें आरंभिक तौर पर चूना पत्थर बताया गया था। पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि ये खंड बहुत ही विशाल और समृद्धशाली नगर और मंदिर के अवशेष हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक (धरोहर) एके सिन्हा के अनुसार द्वारिका में समुद्र के भीतर ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी खुदाई की गई थी और 10 मीटर गहराई तक किए गए इस उत्खनन में सिक्के और कई कलाकृतियां भी प्राप्त हुईं।
इस समुद्री उत्खनन के बारे में सहायक नौसेना प्रमुख रियर एडमिरल एसपीएस चीमा ने तब बताया था कि इस ऐतिहासिक अभियान के लिए उनके 11 गोताखोरों को पुरातत्व सर्वेक्षण ने प्रशिक्षित किया और नवंबर 2006 में नौसेना के सर्वेक्षक पोत आईएनएस निर्देशक ने इस समुद्री स्थल का सर्वे किया। इसके बाद इस साल जनवरी से फरवरी के बीच नौसेना के गोताखोर तमाम आवश्यक उपकरण और सामग्री लेकर उन दुर्लभ अवशेषों तक पहुंच गए। रियर एडमिरल चीमा ने कहा कि इन अवशेषों की प्राचीनता का वैज्ञानिक अध्ययन होने के बाद देश के समुद्री इतिहास और धरोहर का तिथिक्रम लिखने के लिए आरंभिक सामग्री इतिहासकारों को उपलब्ध हो जाएगी।
इस उत्खनन के कार्य के आंकड़ों को विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सामने पेश किया गया। इन विशेषज्ञों में अमेरिका, इसराइल, श्रीलंका और ब्रिटेन के विशेषज्ञ भी शामिल हुए। नमूनों को विदेशी प्रयोगशालाओं में भी भेजा गया ताकि अवशेषों की प्राचीनता के बारे में किसी प्रकार की त्रुटि का संदेह समाप्त हो जाए।
द्वारिका पर ताजा शोध : 2001 में सरकार ने गुजरात के समुद्री तटों पर प्रदूषण के कारण हुए नुकसान का अनुमान लगाने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी द्वारा एक सर्वे करने को कहा। जब समुद्री तलहटी की जांच की गई तो सोनार पर मानव निर्मित नगर पाया गया जिसकी जांच करने पर पाया गया कि यह नगर 32,000 वर्ष पुराना है तथा 9,000 वर्षों से समुद्र में विलीन है। यह बहुत ही चौंका देने वाली जानकारी थी।
माना जाता है कि 9,000 वर्षों पूर्व हिमयुग की समाप्ति पर समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण यह नगर समुद्र में विलीन हो गया होगा, लेकिन इसके पीछे और भी कारण हो सकते हैं।
कैसे नष्ट हो गई द्वारिका :
वैज्ञानिकों के अनुसार जब हिमयुग समाप्त हुआ तो समद्र का जलस्तर बढ़ा और उसमें देश-दुनिया के कई तटवर्ती शहर डूब गए। द्वारिका भी उन शहरों में से एक थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि हिमयुग तो आज से 10 हजार वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। भगवान कृष्ण ने तो नई द्वारिका का निर्माण आज से 5 हजार 300 वर्ष पूर्व किया था, तब ऐसे में इसके हिमयुग के दौरान समुद्र में डूब जाने की थ्योरी आधी सच लगती है। लेकिन बहुत से पुराणकार और इतिहासकार मानते हैं कि द्वारिका को कृष्ण के देहांत के बाद जान-बूझकर नष्ट किया गया था। यह वह दौर था, जबकि यादव लोग आपस में भयंकर तरीके से लड़ रहे थे। इसके अलावा जरासंध और यवन लोग भी उनके घोर दुश्मन थे। ऐसे में द्वारिका पर समुद्र के मार्ग से भी आक्रमण हुआ और आसमानी मार्ग से भी आक्रमण किया गया। अंतत: यादवों को उनके क्षेत्र को छोड़कर फिर से मथुरा और उसके आसपास शरण लेना पड़ी। हाल ही की खोज से यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि यह वह दौर था जबकि धरती पर रहने वाले एलियंस का आसमानी एलियंस के साथ घोर युद्ध हुआ था जिसके चलते यूएफओ ने उन सभी शहरों को निशाना बनाया, जहां पर देवता लोग रहते थे या जहां पर देवताओं के वंशज रहते थे।
वैज्ञानिकों के अनुसार जब हिमयुग समाप्त हुआ तो समद्र का जलस्तर बढ़ा और उसमें देश-दुनिया के कई तटवर्ती शहर डूब गए। द्वारिका भी उन शहरों में से एक थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि हिमयुग तो आज से 10 हजार वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। भगवान कृष्ण ने तो नई द्वारिका का निर्माण आज से 5 हजार 300 वर्ष पूर्व किया था, तब ऐसे में इसके हिमयुग के दौरान समुद्र में डूब जाने की थ्योरी आधी सच लगती है। लेकिन बहुत से पुराणकार और इतिहासकार मानते हैं कि द्वारिका को कृष्ण के देहांत के बाद जान-बूझकर नष्ट किया गया था। यह वह दौर था, जबकि यादव लोग आपस में भयंकर तरीके से लड़ रहे थे। इसके अलावा जरासंध और यवन लोग भी उनके घोर दुश्मन थे। ऐसे में द्वारिका पर समुद्र के मार्ग से भी आक्रमण हुआ और आसमानी मार्ग से भी आक्रमण किया गया। अंतत: यादवों को उनके क्षेत्र को छोड़कर फिर से मथुरा और उसके आसपास शरण लेना पड़ी। हाल ही की खोज से यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि यह वह दौर था जबकि धरती पर रहने वाले एलियंस का आसमानी एलियंस के साथ घोर युद्ध हुआ था जिसके चलते यूएफओ ने उन सभी शहरों को निशाना बनाया, जहां पर देवता लोग रहते थे या जहां पर देवताओं के वंशज रहते थे।
मंगलवार, 3 जून 2014
स्त्रियां नारियल नहीं फोड़ती हैं
० ये हैं नारियल से जुड़ी प्राचीन बातें
हम सभी जानते हैं पूजन कर्म में नारियल का महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी देवी-देवता की पूजा नारियल के बिना अधूरी मानी जाती है। क्या आप जानते हैं कि नारियल खाने से शारीरिक दुर्बलता दूर होती है एवं भगवान को नारियल चढ़ाने से धन और घर-परिवार से संबंधित समस्याएं दूर हो जाती हैं। नारियल ऊपर से कठोर किंतु अंदर से नरम और मीठा होता है। हमें भी जीवन में नारियल की तरह अंदर से नरम व मधुर स्वभाव बनाना चाहिए। हम बाहर से जैसे भी दिखते हो, लेकिन अंदर से नारियल के समान व्यवहार रखना चाहिए।
प्राचीन समय से ही नारियल से संबंधित कई प्रकार की परंपराएं प्रचलित हैं। इन परंपराओं में से एक अनिवार्य परंपरा यह है कि स्त्रियां नारियल नहीं फोड़ती हैं। आमतौर पर ऐसा स्त्रियों द्वारा नारियल फोड़ने को अपशकुन माना जाता है। क्या आप जानते हैं इस परंपरा के पीछे का रहस्य, यदि नहीं तो आगे दिए गए फोटो क्लिक करें और जानिए नारियल से जुड़ी खास बातें ।
यह एक महत्वपूर्ण परंपरा है कि महिलाएं नारियल नहीं फोड़तीं। वास्तव में नारियल बीज रूप है, इसलिए इसे उत्पादन (प्रजनन) क्षमता से जोड़कर देखा गया है। स्त्रियां प्रजनन क्रिया की कारक हैं और इसी वजह से स्त्रियों के लिए बीज रूपी नारियल को फोडऩा वर्जित किया गया है। इसके साथ ही नारियल बलि का प्रतीक है और बलि पुरुषों द्वारा ही दी जाती है। इस कारण से भी महिलाओ द्वारा नारियल नहीं फोड़ा जाता है। ऐसी प्राचीन परंपरा है। नारियल के जल से किया जाता है अभिषेक आमतौर पर नारियल को बधार कर (फोड़कर) ही देवी-देवताओं को चढ़ाते हैं। देवताओं को खुश करने के लिए पशुओं की बलि देने की परंपरा थी, लेकिन जब इस परंपरा पर रोक लगी तो नारियल की बली देने की प्रथा शुरु हो गई। देवी-देवताओं को श्रीफल चढ़ाने के बाद पुरुष ही इसे फोड़ते हैं। नारियल से निकले जल से भगवान की प्रतिमाओं का अभिषेक भी किया जाता है। सौभाग्य का प्रतीक है नारियल नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है, जब भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर अवतार लिया तो वे अपने साथ तीन चीजें- लक्ष्मी, नारियल का वृक्ष तथा कामधेनु लेकर आए थे। इसलिए नारियल के वृक्ष को कल्पवृक्ष भी कहते है। नारियल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही देवताओं का वास माना गया है। श्रीफल भगवान शिव का परम प्रिय फल है। नारियल में बनी तीन आंखों को त्रिनेत्र के रूप में देखा जाता है। सम्मान का सूचक है नारियल श्रीफल शुभ, समृद्धि, सम्मान, उन्नति और सौभाग्य का सूचक है। सम्मान करने के लिए शॉल के साथ श्रीफल भी दिया जाता है। सामाजिक रीति-रिवाजों में भी नारियल भेंट करने की परंपरा है। जैसे बिदाई के समय तिलक कर नारियल और धनराशि भेंट की जाती है। रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों को राखी बांध कर नारियल भेंट करती हैं और रक्षा का वचन लेती हैं। एकाक्षी नारियल से होते हैं मालामाल एकाक्षी नारियल बहुत ही दुर्लभ है। आमतौर पर नारियल की जटा की नीचे दो बिंदू होते हैं, लेकिन एकाक्षी नारियल में यहां सिर्फ एक ही बिंदू होता है। यह एक बिंदू वाला नारियल बहुत चमत्कारी होता है। जिस घर में यह नारियल होता है वहां महालक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और पैसों की समस्याएं समाप्त हो जाती हैं। इस नारियल के प्रभाव से घर से वास्तु दोष भी नष्ट होते हैं और परिवार के सदस्यों को कार्यों में सफलता मिलती है।
यह एक महत्वपूर्ण परंपरा है कि महिलाएं नारियल नहीं फोड़तीं। वास्तव में नारियल बीज रूप है, इसलिए इसे उत्पादन (प्रजनन) क्षमता से जोड़कर देखा गया है। स्त्रियां प्रजनन क्रिया की कारक हैं और इसी वजह से स्त्रियों के लिए बीज रूपी नारियल को फोडऩा वर्जित किया गया है। इसके साथ ही नारियल बलि का प्रतीक है और बलि पुरुषों द्वारा ही दी जाती है। इस कारण से भी महिलाओ द्वारा नारियल नहीं फोड़ा जाता है। ऐसी प्राचीन परंपरा है। नारियल के जल से किया जाता है अभिषेक आमतौर पर नारियल को बधार कर (फोड़कर) ही देवी-देवताओं को चढ़ाते हैं। देवताओं को खुश करने के लिए पशुओं की बलि देने की परंपरा थी, लेकिन जब इस परंपरा पर रोक लगी तो नारियल की बली देने की प्रथा शुरु हो गई। देवी-देवताओं को श्रीफल चढ़ाने के बाद पुरुष ही इसे फोड़ते हैं। नारियल से निकले जल से भगवान की प्रतिमाओं का अभिषेक भी किया जाता है। सौभाग्य का प्रतीक है नारियल नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है, जब भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर अवतार लिया तो वे अपने साथ तीन चीजें- लक्ष्मी, नारियल का वृक्ष तथा कामधेनु लेकर आए थे। इसलिए नारियल के वृक्ष को कल्पवृक्ष भी कहते है। नारियल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही देवताओं का वास माना गया है। श्रीफल भगवान शिव का परम प्रिय फल है। नारियल में बनी तीन आंखों को त्रिनेत्र के रूप में देखा जाता है। सम्मान का सूचक है नारियल श्रीफल शुभ, समृद्धि, सम्मान, उन्नति और सौभाग्य का सूचक है। सम्मान करने के लिए शॉल के साथ श्रीफल भी दिया जाता है। सामाजिक रीति-रिवाजों में भी नारियल भेंट करने की परंपरा है। जैसे बिदाई के समय तिलक कर नारियल और धनराशि भेंट की जाती है। रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों को राखी बांध कर नारियल भेंट करती हैं और रक्षा का वचन लेती हैं। एकाक्षी नारियल से होते हैं मालामाल एकाक्षी नारियल बहुत ही दुर्लभ है। आमतौर पर नारियल की जटा की नीचे दो बिंदू होते हैं, लेकिन एकाक्षी नारियल में यहां सिर्फ एक ही बिंदू होता है। यह एक बिंदू वाला नारियल बहुत चमत्कारी होता है। जिस घर में यह नारियल होता है वहां महालक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और पैसों की समस्याएं समाप्त हो जाती हैं। इस नारियल के प्रभाव से घर से वास्तु दोष भी नष्ट होते हैं और परिवार के सदस्यों को कार्यों में सफलता मिलती है।
बुधवार, 2 अप्रैल 2014
दोस्ती एक एहसास है
(लेखिका-हेमलता यादव,जयपुर)
दोस्ती नाम है
शरारत का, मुस्कुराहट का,
उम्रभर की चाहत का।
दोस्ती एक अहसास है,
न भूल सको वो ख्वाब है।
कभी यादों में, कभी ख्वाबों में,
वो हर कहीं मिल जाता है।
कोई आए या ना आए,
दोस्त हर मुसीबत में
दौड़ा चला आता है।
दोस्ती जुनून है,
जिसे पाकर मिलता है
असीम सुख।
दोस्ती सुकून है,
जो हमें हर तकलीफ से
निज़ात दिलाता है।
दु:ख की तपन में दोस्त
शीतल बयार बन आता है।
कभी छेड़छाड़, कभी इकरार,
हर दिन की तकरार,
मगर दिलों में है प्यार।
दोस्ती इसी का नाम है सरकार।
कुदरत का नायाब तोहफा है दोस्ती
(लेखिका- अपेक्षा शर्मा)
दोस्ती एक ऐसा संबंध है जो मिलता तो हमें खून के रिश्तों के बाद है पर खून के रिश्तों से कम महत्वपूर्ण भी नहीं होता है। ये कुदरत का एक ऐसा नायाब तोहफा है जिसे हम अपनी पंसद नापसंद से बनाते है और निभाते हैं। किसी भी समाज से सरोकार रखने वाले मनुष्य के लिए 'रिश्ता' शब्द बड़ी अहमियत रखता है। हम परिवार में विभिन्न रिश्तों की डोर से बँधे होते हैं। लेकिन इन पारिवारिक रिश्तों के अलावा एक और महत्वपूर्ण रिश्ता हमारे जीवन में काफी महत्व रखता है और वह है दोस्ती अथवा मित्रता का रिश्ता, जो विश्वास व सहयोग के आधार पर टिका होता है। मित्र राजदार भी होते हैं और सुख-दुःख के साथी भी।
रिश्तों में जहां मर्यादा होती है वह रिश्ते की सीमा निश्चित कर देती है। रिश्तों में चाहे घुन का कीड़ा आ जाये वो एक सीमा में निभाने का हमारा कर्तव्य बन जाता है, पर दोस्ती में कोई सीमा नहीं होती । यह गंगा सी निर्मल और पवित्र होती है, दोस्त के सामने हम सब कुछ सच बोलते है क्योंकि वहा किसी मर्यादा, दिखावा या बड़प्पन का सवाल नहीं होता है। रिश्तों में अगर दोस्ती का रस डाल दिया जाये तो वह रिश्ता अति मधुर और मजबूत हो जाता है, जैसे उसके भाई, मित्र समान है, उसका पति मित्र समान है ये वाक्य जहां कहने-सुनने में अच्छे लगते है उससे कई गुना ज्यादा ये रिश्ते दृढ़ और कठोर होते हैं। एक सच्चा दोस्त आईने की भांति होता है जो हमें हमारी अच्छाई और बुराई दोनों से अवगत कराता है। जैसे भूखे से ज्यादा भोजन का स्वाद कोई और नहीं बता सकता ठीक उसी प्रकार सच्चे मित्र का परिचय संकट में फंसा इंसान ही जान सकता है। इसमें न कोई पैमाना निश्चित होता है और न ही यह "गिव एण्ड टेक पॉलिसी "पर आधारित होता है। यह ऐसा संबंध है जो समुद्र सा गहरा और अथाह सीमा लिए है। इसके उत्साह में अलग का दरिया हो या दलदल इंसान हंसते हुए पार कर सकता है। दोस्तो अभी तक मैंने जो लिखा वो एक सच्चे दोस्त के लिए है पर 21 वीं सदी के जिस पडाव पर आज युवा वर्ग जिसे मित्रता भ्रमित हो रहा है और उनके साथ आगे बढ़ता है वहां उसकी परिभाषा बदल सी गई है। आज हम अपने से उच्च वर्ग से मेलजोल रखकर उन्हें अपना मित्रा बताकर गर्व महसूस करते है उनसे मित्रता निभाने के लिए मुझे ही सैकड़ो झूठ बोलने पड़े पर हम वो सब करते है ऐसे लोग क्या कभी मित्र बन सकते है जिनकी मित्रता के लिए हम झूठ बोलते है। युवा वर्ग सोचता है कि ये सब हमे भविष्य में काम आएंगे पर वे तब तक ही काम आएंगे आते है जब तक हमारे कामजी महल उन्हें दिखते है और अगर मान भी ले कि जो हमारी मदद करते भी है तो भी मित्रता में कटुता आती ही है क्योंकि मित्रता की नीव में झूठ का खोखलापन है। एक सच्ची मित्रता में स्वार्थ, ईष्र्या और द्वेष नहीं होता है और ना ही न वह हमारा स्टेटस सिम्बल होती । दोस्ती में लोग रेलगाड़ी के अजनबी यात्री की तरह मिलते है कुछ ही क्षणो में दोस्ती भी हो जाती है तो वही कुछ से प्रगाड़ संबंध बन जाते है । बात तब बिगड़ती है जब दोनों तरफ से या एक तरफ से भावनाओं में स्वार्थ का प्रवेश होता है। किसी भी तरह की इच्छा रखने वाले हमारे अच्छे मित्र नहीं हो सकते और ना ही हम उनके। मित्रता की बुनियाद अनकंडिशनल होती है। जब किसी संबंध को रिश्ते की नाम नहीं दिया जा सकता तो उसे दोस्त कहते हैं। और स्वार्थ रिश्तों और दोस्ती में प्रवेश कर गया है। इसकी वजह से मित्र-मित्र का और भाई-भाई का शत्रु भी बन सकता है। मित्रों हमें आवश्यकता है अपने दिल की मित्रता को पहचानने की। यदि हम नजर उठाकर अपने चारो तरफ देखे तो हमें शायद एक भी मित्र ऐसा ना मिले जिसे हमसे या हमें उससे कोई स्वार्थ न हो और फिर भी हम आपस में मित्र हो, ऐसे में दोस्तों आवश्यकता है संबंधों को एक दायरे में रखने की और रिश्तों पर मित्रता की चासनी चढ़ाने की ,ताकि हमारे रिश्ते मजबूत बने रहे और दोस्ती भी एक मिसाल बने। * सच्चा मित्र वह है जो दर्पण की तरह तुम्हारे दोषों को तुम्हें दिखाए। जो तुम्हारे अवगुणों को गुण बताए वह तो खुशामदी है। * विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि व मृतक का मित्र धर्म होता है। * मित्र वे दुर्लभ लोग होते हैं, जो हमारा हालचाल पूछते हैं और उत्तर सुनने को रुकते भी हैं। * ज्ञानवान मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। * सच्चे मित्र हीरे की तरह कीमती और दुर्लभ होते हैं, झूठे दोस्त पतझड़ की पत्तियों की तरह हर कहीं मिल जाते हैं। * मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु हर स्थिति में अच्छा है। * मित्र पाने की राह है, खुद किसी का मित्र बन जाना। * मित्रता करने में धैर्य से काम लो। किंतु जब मित्रता कर ही लो तो उसे अचल और दृढ़ होकर निभाओ। * अपने मित्र को एकांत में नसीहत दो, लेकिन प्रशंसा (सही) खुलेआम करो। * तुम्हारा अपना व्यवहार ही शत्रु अथवा मित्र बनाने के लिए उत्तरदायी है। लेखिका मस्कट ओमान में रहती है
रिश्तों में जहां मर्यादा होती है वह रिश्ते की सीमा निश्चित कर देती है। रिश्तों में चाहे घुन का कीड़ा आ जाये वो एक सीमा में निभाने का हमारा कर्तव्य बन जाता है, पर दोस्ती में कोई सीमा नहीं होती । यह गंगा सी निर्मल और पवित्र होती है, दोस्त के सामने हम सब कुछ सच बोलते है क्योंकि वहा किसी मर्यादा, दिखावा या बड़प्पन का सवाल नहीं होता है। रिश्तों में अगर दोस्ती का रस डाल दिया जाये तो वह रिश्ता अति मधुर और मजबूत हो जाता है, जैसे उसके भाई, मित्र समान है, उसका पति मित्र समान है ये वाक्य जहां कहने-सुनने में अच्छे लगते है उससे कई गुना ज्यादा ये रिश्ते दृढ़ और कठोर होते हैं। एक सच्चा दोस्त आईने की भांति होता है जो हमें हमारी अच्छाई और बुराई दोनों से अवगत कराता है। जैसे भूखे से ज्यादा भोजन का स्वाद कोई और नहीं बता सकता ठीक उसी प्रकार सच्चे मित्र का परिचय संकट में फंसा इंसान ही जान सकता है। इसमें न कोई पैमाना निश्चित होता है और न ही यह "गिव एण्ड टेक पॉलिसी "पर आधारित होता है। यह ऐसा संबंध है जो समुद्र सा गहरा और अथाह सीमा लिए है। इसके उत्साह में अलग का दरिया हो या दलदल इंसान हंसते हुए पार कर सकता है। दोस्तो अभी तक मैंने जो लिखा वो एक सच्चे दोस्त के लिए है पर 21 वीं सदी के जिस पडाव पर आज युवा वर्ग जिसे मित्रता भ्रमित हो रहा है और उनके साथ आगे बढ़ता है वहां उसकी परिभाषा बदल सी गई है। आज हम अपने से उच्च वर्ग से मेलजोल रखकर उन्हें अपना मित्रा बताकर गर्व महसूस करते है उनसे मित्रता निभाने के लिए मुझे ही सैकड़ो झूठ बोलने पड़े पर हम वो सब करते है ऐसे लोग क्या कभी मित्र बन सकते है जिनकी मित्रता के लिए हम झूठ बोलते है। युवा वर्ग सोचता है कि ये सब हमे भविष्य में काम आएंगे पर वे तब तक ही काम आएंगे आते है जब तक हमारे कामजी महल उन्हें दिखते है और अगर मान भी ले कि जो हमारी मदद करते भी है तो भी मित्रता में कटुता आती ही है क्योंकि मित्रता की नीव में झूठ का खोखलापन है। एक सच्ची मित्रता में स्वार्थ, ईष्र्या और द्वेष नहीं होता है और ना ही न वह हमारा स्टेटस सिम्बल होती । दोस्ती में लोग रेलगाड़ी के अजनबी यात्री की तरह मिलते है कुछ ही क्षणो में दोस्ती भी हो जाती है तो वही कुछ से प्रगाड़ संबंध बन जाते है । बात तब बिगड़ती है जब दोनों तरफ से या एक तरफ से भावनाओं में स्वार्थ का प्रवेश होता है। किसी भी तरह की इच्छा रखने वाले हमारे अच्छे मित्र नहीं हो सकते और ना ही हम उनके। मित्रता की बुनियाद अनकंडिशनल होती है। जब किसी संबंध को रिश्ते की नाम नहीं दिया जा सकता तो उसे दोस्त कहते हैं। और स्वार्थ रिश्तों और दोस्ती में प्रवेश कर गया है। इसकी वजह से मित्र-मित्र का और भाई-भाई का शत्रु भी बन सकता है। मित्रों हमें आवश्यकता है अपने दिल की मित्रता को पहचानने की। यदि हम नजर उठाकर अपने चारो तरफ देखे तो हमें शायद एक भी मित्र ऐसा ना मिले जिसे हमसे या हमें उससे कोई स्वार्थ न हो और फिर भी हम आपस में मित्र हो, ऐसे में दोस्तों आवश्यकता है संबंधों को एक दायरे में रखने की और रिश्तों पर मित्रता की चासनी चढ़ाने की ,ताकि हमारे रिश्ते मजबूत बने रहे और दोस्ती भी एक मिसाल बने। * सच्चा मित्र वह है जो दर्पण की तरह तुम्हारे दोषों को तुम्हें दिखाए। जो तुम्हारे अवगुणों को गुण बताए वह तो खुशामदी है। * विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि व मृतक का मित्र धर्म होता है। * मित्र वे दुर्लभ लोग होते हैं, जो हमारा हालचाल पूछते हैं और उत्तर सुनने को रुकते भी हैं। * ज्ञानवान मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। * सच्चे मित्र हीरे की तरह कीमती और दुर्लभ होते हैं, झूठे दोस्त पतझड़ की पत्तियों की तरह हर कहीं मिल जाते हैं। * मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु हर स्थिति में अच्छा है। * मित्र पाने की राह है, खुद किसी का मित्र बन जाना। * मित्रता करने में धैर्य से काम लो। किंतु जब मित्रता कर ही लो तो उसे अचल और दृढ़ होकर निभाओ। * अपने मित्र को एकांत में नसीहत दो, लेकिन प्रशंसा (सही) खुलेआम करो। * तुम्हारा अपना व्यवहार ही शत्रु अथवा मित्र बनाने के लिए उत्तरदायी है। लेखिका मस्कट ओमान में रहती है
शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014
रोमांटिक जोक : आइटम नंबर 3
एक बार एक लड़की ने अपने बॉयफ्रेंड को फोन किया, तो फोन बॉयफ्रेंड के भतीजे ने उठाया।
लड़की ने प्यार से कहा- जरा अपने अंकल को फोन देना।
चिंटू ने पूछा- मैं उन्हें आपका क्या नाम बताऊं?
लड़की ने इतरा कर कहा- उनसे कहो कि उनकी जानेमन का फोन है।
चिंटू बोला- लेकिन फोन में तो आपके नंबर के आगे आइटम नंबर 3 लिखा है।
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