सोमवार, 2 सितंबर 2019

रामायण सिखाती है जीने के तरीके

Ramayana Teaches Ways to Live, 5 Things That Are Important for Growth According to Ramayana
 रामायण हिंदुओं का प्रमुख ग्रन्थ है। रामायण बताती है कि कुछ गुणों को अपनाकर और कुछ खास बातों का ध्यान में रखकर मर्यादा एवं अनुशासन वाला जीवन जीना चाहिए। इससे बुराई पर अच्छाई की जीत होती है। रामायण एक राजपरिवार और राजवंश की कहानी है जो पति-पत्नी, भाई और परिवार के अन्य सदस्यों के आपसी रिश्तों के आदर्श पेश करती है। रामायण से हर इंसान को कुछ न कुछ सीखकर अपने जीवन में अच्छी बातें शामिल करनी चाहिए। इससे जीवन का स्तर बढ़ेगा। वहीं अच्छे गुणों के प्रभाव से हर कामों सफलता मिलेगी। मानसिक तनाव से बचेंगे और परेशानियों से भी दूर रहेंगे।  ये बातें सीख सकते हैं रामायण से
1. विविधता में एकता
  • विविधता में एकता रामायण की बड़ी सीख है । इस महाकाव्य में जब श्रीराम लंका पर चढ़ाई करने जाते हैं तो उनकी सेना में मनुष्यों से लेकर बंदर और अन्य जानवर भी शामिल थे। सभी ने श्रीराम का साथ दिया इसके अलावा राजा दशरथ के चारों बेटों का चरित्र अलग होने के बावजूद उनमें एकजुटता रहती है यह हर परिवार के लिए दुःख के समय से बाहर निकलने की सीख है।
2. रिश्‍ते और विश्वास का महत्व
  • श्रीराम ने सब कुछ जानते हुए भी कैकई को दिया वचन को निभाया। वहीं सभी भाइयों में प्रेम था। ऐसे प्रेम में लालच, गुस्से या विश्वासघात के लिए जगह ही नहीं थी। लक्ष्मण ने 14 साल तक भाई राम के साथ वनवास किया, वहीं दूसरे भाई भरत ने राजगद्दी के अवसर को ठुकरा दिया। भाइयों के प्यार की ये सीख हमें लालच और सांसारिक सुखों के बजाय रिश्तों को महत्व देने के लिए प्रेरित करती है।
3. मर्यादा और अनुशासन
  • श्रीराम का व्यक्तित्व मर्यादा और अनुशासनपूर्ण था। उन्होने मर्यादओं में रहकर अपने जीवन की हर जिम्मेदारी को अच्छे से पूरा किया। उनके जीवन से हमें यही सीखना चाहिए कि मर्यादा और अनुशासन में रहकर हम एक अच्छे इंसानबन सकते हैं।  
4. दया और प्रेम
  • श्रीराम शांत स्वभाव के थे। उनमें हर इंसान के लिए दया का भाव था। उन्होंने प्रेम और दया के साथ एक पुत्र, पति, भाई और एक राजा की जिम्मेदारियों को भी अच्छे से निभाया। श्रीराम का ये स्वभाव आपसी प्रेम और सम्मान जैसेमानवीय गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। इन गुणों को अपनाकर हम खुशहाल और संतुष्ट जीवन जी सकते हैं। इसी की मदद से हम समाज की बुराइयों पर जीत हासिल कर सकते हैं।
5. सबसे समान व्यवहार
  • भगवान राम का विनम्र आचरण और सभी के प्रति सम्मान का भाव हमको सीख देता है। हमें पद, उम्र, लिंग आदि के भेदभावों के बावजूद सबसे समान व्यवहार करना चाहिए। पशुओं के प्रति प्यार और दया भी हमारे मन में होनी चाहिए। सच्चा मानव वही है जो सबसे समानता से पेश आता है।

रविवार, 1 सितंबर 2019

द्रौपदी यदि पांचों पांडवों से विवाह नहीं करती तो..............!

महाभारत में द्रौपदी एक अहम् किरदार है। द्रौपदी के जीवन और चरित्र को समझना बहुत ही कठिन है। उन्हें तो सिर्फ कृष्ण ही समझ सकते थे। द्रौपदी श्रीकृष्ण की मित्र थी। मित्र ही मित्र को समझ सकता है। दरअसल, ऐसा माना जाता है कि द्रौपदी ने 4 ऐसी गलतियां की थी जिसके चलते महाभारत का युद्ध हुआ था।पहली गलती खुद
के स्वयंवर में कर्ण को सूत पुत्र कहकर उसका अपमान करना, दूसरी गलती दुर्योधन को इंद्रप्रस्थ में 'अंधे का पुत्र भी अंधा' कहकर अपमानित करना, तीसरी गलती जयद्रथ के सिर के बाल मुंडवाकर उसको अपमानित करना और चौथी गलती चिरहरण के बाद पांडवों को युद्ध के लिए प्रेरित करना। हालांकि उपरोक्त सभी गलतियों में से तीसरी और चौथी गलती को गलती नहीं मान सकते हैं, क्योंकि यह परिस्थितिवश किया गया कार्य था। मतलब यह कि द्रौपदी ने कर्ण और दुर्योधन को अपमानित किया था जिसके बदले में जयद्रथ और दुर्योधन ने द्रौपदी को अपमानित किया। लेकिन द्रौपदी की एक सबसे बड़ी गलती यह थी कि उसने पांचों पांडवों के साथ विवाह करने को मंजूरी दे दी। दरअस्ल, अर्जुन ने स्वयंवर की प्रतियोगिता को जीत लिया था लेकिन किन्हीं भी परिस्थितियों में द्रौपदी यदि पांचों पांडवों की पत्नी बनना स्वीकार नहीं करती तो आज इतिहास कुछ ओर होता। द्रौपदी कुंति के कहने या स्वयंवर के बाद युधिष्ठिर और वेद व्यासजी के कहने पर पांचों से विवाह करना स्वीकार किया था।यदि द्रौपदी ऐसा नहीं करती तो वह सिर्फ अर्जुन की ही पत्नी होती। यह भी कि यदि वह पांचों से ही विवाह नहीं करती तो फिर संभवत: वह कर्ण की पत्नी होती। तब महाभारत कुछ और होती।एक कथा के अनुसार द्रौपदी ने सभी पांडवों और श्रीकृष्ण के सामने यह स्वीकारा भी था कि 'मैं आप पांचों से प्यार करती हूं लेकिन मैं किसी 6वें पुरुष से भी प्यार करती हूं। मैं कर्ण से प्यार करती हूं। जाति की वजह से उससे विवाह नहीं करने का मुझे अब पछतावा होता है। अगर मैंने कर्ण से विवाह किया होता तो शायद मुझे इतने दुख नहीं झेलने पड़ते। तब शायद मुझे इस तरह के कड़वे अनुभवों से होकर नहीं गुजरना पड़ता। मैं शिक्षित होने के बावजूद बिना सोच-विचारकर किए गए अपने कार्यों के लिए पछता रही हूं। उल्लेखनीय है कि इसी कथा में युधिष्ठिर ने पांडवों के साथ हुए सभी बुरे घटनाक्रमों के लिए द्रौपदी को जिम्मेदार ठहराया था।

श्री गणेश के 108 नाम देते हैं यश, कीर्ति, पराक्रम और वैभव

श्री गणेश, गजानन, लंबोदर, विनायक के कई हजार नाम हैं लेकिन उन सभी का वाचन संभव नहीं अत: भक्त अपनी सुविधा से 108 नामों का पाठ कर सकते हैं। यह 108 गजानन नाम श्री गणेश को प्रसन्न करते हैं और वे यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक, ज्ञान और तेजस्विता का आशीष प्रदान करते हैं।

श्री गणेश के 108 नाम 
1) बालगणपति – Baalganapati
2) भालचन्द्र – Bhalchandra
3) बुद्धिनाथ – Buddhinath
4) धूम्रवर्ण – Dhumravarna
5) एकाक्षर – Ekakshar
6) एकदंत – Ekdant
7) गजकर्ण – Gajkarn
8) गजानन – Gajaanan
9) गजनान – Gajnaan
10) गजवक्र – Gajvakra
11) गजवक्त्र – Gajvaktra
12) गणाध्यक्ष – Ganaadhyaksha
13) गणपति – Ganapati
14) गौरीसुत – Gaurisut
15) लंबकर्ण – Lambakarn
16) लंबोदर – Lambodar
17) महाबल – Mahaabal
18) महागणपति – Mahaaganapati
19) महेश्वर – Maheshwar
20) मंगलमूर्ति – Mangalmurti
21) मूषकवाहन – Mushakvaahan
22) निदीश्वरम – Nidishwaram
23) प्रथमेश्वर – Prathameshwar
24) शूपकर्ण – Shoopkarna
25) शुभम – Shubham
26) सिद्धिदाता – Siddhidata
27) सिद्धिविनायक – Siddhivinaayak
28) सुरेश्वरम – Sureshvaram
29) वक्रतुंड – Vakratund
30) अखूरथ – Akhurath
31) अलंपत – Alampat
32) अमित – Amit
33) अनंतचिदरुपम – Anantchidrupam
34) अवनीश – Avanish
35) अविघ्न – Avighn
36) भीम – Bheem
37) भूपति – Bhupati
38) भुवनपति – Bhuvanpati
39) बुद्धिप्रिय – Buddhipriya
40) बुद्धिविधाता – Buddhividhata
41) चतुर्भुज – Chaturbhuj
42) देवदेव – Devdev
43) देवांतकनाशकारी – Devantaknaashkari
44) देवव्रत – Devavrat
45) देवेन्द्राशिक – Devendrashik
46) धार्मिक – Dharmik
47) दूर्जा – Doorja
48) द्वैमातुर – Dwemaatur
49) एकदंष्ट्र – Ekdanshtra
50) ईशानपुत्र – Ishaanputra
51) गदाधर – Gadaadhar
52) गणाध्यक्षिण – Ganaadhyakshina
53) गुणिन – Gunin
54) हरिद्र – Haridra
55) हेरंब – Heramb
56) कपिल – Kapil
57) कवीश – Kaveesh
58) कीर्ति – Kirti
59) कृपाकर – Kripakar
60) कृष्णपिंगाक्ष – Krishnapingaksh
61) क्षेमंकरी – Kshemankari
62) क्षिप्रा – Kshipra
63) मनोमय – Manomaya
64) मृत्युंजय – Mrityunjay
65) मूढ़ाकरम – Mudhakaram
66) मुक्तिदायी – Muktidaayi
67) नादप्रतिष्ठित – Naadpratishthit
68) नमस्तेतु – Namastetu
69) नंदन – Nandan
70) पाषिण – Pashin
71) पीतांबर – Pitaamber
72) प्रमोद – Pramod
73) पुरुष – Purush
74) रक्त – Rakta
75) रुद्रप्रिय – Rudrapriya
76) सर्वदेवात्मन – Sarvadevatmana
77) सर्वसिद्धांत – Sarvasiddhanta
78) सर्वात्मन – Sarvaatmana
79) शांभवी – Shambhavi
80) शशिवर्णम – Shashivarnam
81) शुभगुणकानन – Shubhagunakaanan
82) श्वेता – Shweta
83) सिद्धिप्रिय – Siddhipriya
84) स्कंदपूर्वज – Skandapurvaj
85) सुमुख – Sumukha
86) स्वरुप – Swarup
87) तरुण – Tarun
88) उद्दण्ड – Uddanda
89) उमापुत्र – Umaputra
90) वरगणपति – Varganapati
91) वरप्रद – Varprada
92) वरदविनायक – Varadvinaayak
93) वीरगणपति – Veerganapati
94) विद्यावारिधि – Vidyavaaridhi
95) विघ्नहर – Vighnahar
96) विघ्नहर्ता – Vighnahartta
97) विघ्नविनाशन – Vighnavinashan
98) विघ्नराज – Vighnaraaj
99) विघ्नराजेन्द्र – Vighnaraajendra
100) विघ्नविनाशाय – Vighnavinashay
101) विघ्नेश्वर – Vighneshwar
102) विकट – Vikat
103) विनायक – Vinayak
104) विश्वमुख – Vshvamukh
105) यज्ञकाय – Yagyakaay
106) यशस्कर – Yashaskar
107) यशस्विन – Yashaswin
108) योगाधिप – Yogadhip

माता पार्वती जब शिशु गणेश को छोड़ आई जंगल में

कहते हैं कि एक घने जंगल में शिशु गणेश को माता पार्वती छोड़कर चली गई। उस जंगल में हिंसक जीव ही घूमते रहते थे। वहां कभी कभार ऋषि मुनि भी उस जंगल से गुजरते थे। उस भयानक जंगल में एक सियार ने उस शिशु को देखा और वह उसके पास जाने लगा।तभी उसी समय ही वहां से ऋषि वेद व्यास के पिता पराशर मुनि गुजरे और उनकी दृष्टि उस अबोध बालक पर पड़ी और उन्होंने देखा की एक सियार भी उस शिशु की ओर धीरे-धीरे आ रहा है। पहले तो पराशर मुनि ने सोच कि कहीं यह इंद्र का कोई खेल या माया तो नहीं जो मेरा तप भंग करना चाहता हो? यह सोचते हुए महर्षि पराशर तेजी से शिशु की ओर बढ़े और यह देखकर वह सियार अपनी जगह पर ही रुक गया और फिर चुपचाप ही वन में कहीं गुम हो गया। महर्षि पराशर ने उस बालक को ध्यान देखा। उसकी चार भुजाएं थीं। रक्त वर्ण और गजवदन था। सुंदर वस्त्र पहन रखे थे। तब उन्होंने उसके छोटे छोटे चरणों को देखा तो उस पर ध्वज, अंकुश और कमल की रेखाएं स्पष्ट नजर आ रही थी।
यह देखकर महर्षि के शरीर में रोमांच हो आया और वे समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं बल्की स्वयं प्रभु थे। तब उन्होंने शिशु के चरणों में अपना मस्तक रख दिया और वे खुद को भाग्यशाली समझने लगे। वे उस शिशु को लेकर अपने आश्रम चल पड़े।
उनकी पत्नी वत्सला ने जब महर्षि के हाथों में एक नन्हें बालक को देखा तो पूछा यह आपको कहां से मिला। महर्षि ने कहा कि यह जंगल के एक सरोवर के तट पर पड़ा था। लगता है कि को क्रूर हृदय अभागा इसे वहां छोड़ गया है। वत्सला शिशु को देखककर प्रसन्न हो गई। तब पराशर ने अपनी पत्नी को समझाया कि यह साक्षात त्रिलोकी नाथ है। यह हमारा उद्धार करने के लिए आया है। यह वचन सुनकर वत्सला रोमांचित हो गई। दोनों ने मिलकर गणेश का लालन पालन किया।कहते हैं कि भगवान श्री गणपति ने कृत युग में कश्यप व अदिति के यहां श्रीअवतार महोत्कट विनायक नाम से जन्म लिया। इस अवतार में गणपति ने देवतान्तक व नरान्तक नामक राक्षसों का संहार कर धर्म की स्थापना की व अपने अवतार की समाप्ति की।त्रेता युग में गणपति ने उमा के गर्भ से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन जन्म लिया और उन्हें गुणेश नाम दिया गया। इस अवतार में गणपति ने सिंधु नामक दैत्य का विनाश किया व ब्रह्मदेव की कन्याएं, सिद्धि व रिद्धि से विवाह किया।
द्वापर युग में गणपति ने पुन: पार्वती के गर्भ से जन्म लिया व गणेश कहलाए। परंतु गणेश के जन्म के बाद किसी कारणवश पार्वती ने उन्हें जंगल में छोड़ दिया, जहां पर पराशर मुनि ने उनका पालन-पोषण किया। इन्ही गणेश ने ही ऋषि वेद व्यास के कहने पर महाभारत लिखी थी।
इस अवतार में गणेश ने सिंदुरासुर का वध कर उसके द्वारा कैद किए अनेक राजाओं व वीरों को मुक्त कराया था। इसी अवतार में गणेश ने वरेण्य नामक अपने भक्त को गणेश गीता के रूप में शाश्वत तत्व ज्ञान का उपदेश दिया। ऐसा भी कहा जाता है कि वे महिष्मति वरेण्य वरेण्य के पुत्र थे। कुरुप होने के कारण उन्हें जंगल में छोड़ दिया गया था।

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

आखिर क्यों है गंगा पवित्र


हिन्दुओं ने कर्मकांड के नाम पर गंगा माता को अधमरा कर दिया है। यदि भविष्य में गंगा लुप्त होती है तो इसका सबसे बड़ा दोष उन लोगों को लगेगा जो गंगा में अस्थि विसर्जन करते हैं, कचरा डालते हैं, दीपक छोड़ते हैं और शहरों और फैक्ट्रियों का गंदा पानी उसी में डालते हैं। गंगा की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपए पानी में बहा दिए गए लेकिन गंगा जस की तस है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि गंगा के पानी में बैक्टीरिया को खाने वाले बैक्टीरियोफ़ाज वायरस होते हैं। ये वायरस बैक्टीरिया की तादाद बढ़ते ही सक्रिय होते हैं और बैक्टीरिया को मारने के बाद फिर छिप जाते हैं। शायद इसीलिए हमारे ऋषियों ने गंगा को पवित्र नदी माना होगा। इसीलिए इस नदी का जल कभी सड़ता नहीं है।
वेद, पुराण, रामायण, महाभारत सब धार्मिक ग्रंथों में गंगा की महिमा का वर्णन है। करीब सवा सौ साल पहले आगरा में तैनात ब्रिटिश डॉक्टर एमई हॉकिन ने वैज्ञानिक परीक्षण से सिद्ध किया था कि हैजे का बैक्टीरिया गंगा के पानी में डालने पर कुछ ही देर में मर गया।दिलचस्प ये है कि इस समय भी वैज्ञानिक पाते हैं कि गंगा में बैक्टीरिया को मारने की क्षमता है। लखनऊ के नेशनल बॉटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनबीआरआई) के निदेशक डॉक्टर चंद्रशेखर नौटियाल ने एक अनुसंधान में प्रमाणित किया है कि गंगा के पानी में बीमारी पैदा करने वाले ई कोलाई बैक्टीरिया को मारने की क्षमता बरकरार है।
प्राकृतिक गुणों से भरपूर औषधीय जल
 गंगा जल की वैज्ञानिक खोजों ने साफ कर दिया है कि गंगा गोमुख से निकलकर मैदानों में आने तक अनेक प्राकृतिक स्थानों, वनस्पतियों से होकर प्रवाहित होती है। इसलिए गंगा जल में औषधीय गुण पाए जाते हैं जो व्यक्ति को शक्ति प्रदान करते हैं। यह जल सभी तरह के रोग काटने की दवा भी है।

काल भैरव की प्रतिमा के मदिरापान करने का रहस्य

  
करती काल भैरव की प्रतिमा 
क्या मूर्ति मदिरापान कर सकती...आप कहेंगे नहीं, कतई नहीं। भला मूर्ति कैसे मदिरापान कर सकती है। मूर्ति तो बेजान होती है। बेजान चीजों को भूख-प्यास का अहसास नहीं होता, इसलिए वह कुछ खाती-पीती भी नहीं है। लेकिन उज्जैन के काल भैरव के मंदिर में ऐसा नहीं होता। वाम मार्गी संप्रदाय के इस मंदिर में काल भैरव की मूर्ति को न सिर्फ मदिरा चढ़ाई जाती है, बल्कि बाबा भी मदिरापान करते हैं । 
आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हमने इसी तथ्य को खंगालने की कोशिश की। अपनी इस कोशिश के लिए हमने सबसे पहले रुख किया उज्जैन का...महाकाल के इस नगर को मंदिरों का नगर कहा जाता है। लेकिन हमारी मंजिल थी, एक विशेष मंदिर- काल भैरव मंदिर। यह मंदिर महाकाल से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर है। कुछ ही समय बाद हम मंदिर के मुख्य द्वार पर थे। 
मंदिर के बाहर सजी दुकानों पर हमें फूल, प्रसाद, श्रीफल के साथ-साथ वाइन की छोटी-छोटी बोतलें भी सजी नजर आईं। इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, जान पाते, उससे पहले ही हमारे सामने कुछ श्रद्धालुओं ने प्रसाद के साथ-साथ मदिरा की बोतलें भी खरीदीं। जब हमने दुकानदार रवि वर्मा से इस बारे में बातचीत की तो उन्होंने बताया कि बाबा के दर पर आने वाला हर भक्त उनको मदिरा (देशी मदिरा) जरूर चढ़ाता है। बाबा के मुंह से मदिरा का कटोरा लगाने के बाद मदिरा धीरे-धीरे गायब हो जाती है। 
रवि से जानकारी लेने के बाद हम मंदिर के अंदर गए...
मंदिर में भक्तों का तांता लगा हुआ था। हर भक्त के हाथ में प्रसाद की टोकरी थी। इस टोकरी में फूल और श्रीफल के साथ-साथ मदिरा की एक छोटी बोतल भी जरूर नजर आ जाती थी...हम मंदिर के गर्भ गृह में एक तरफ खड़े हो गए और देखने लगे कि बाबा कैसे मदिरा का पान करते हैं।अंदर का दृश्य बेहद निराला था। भैरव बाबा की प्रतिमा के पास बैठे पुजारी गोपाल महाराज कुछ मंत्र बुदबुदा रहे थे। इतने में ही एक भक्त ने प्रसाद और मदिरा का चढ़ावा चढ़ाया। पंडित जी ने मदिरा को एक छोटी प्लेट में निकाला और बाबा की मूरत के मुंह से लगा दिया... और यह क्या...भोग लगाने के बाद प्लेट में मदिरा की एक बूंद भी नहीं बची।
जरूर देखें मदिरापान करते हुए बाबा की चमत्कारिक प्रतिमा को...
यह सिलसिला लगातार चलता रहा...एक-के-बाद-एक भक्त आते गए और बाबा की मूर्ति मदिरापान करती रही। सब कुछ हमारी आंखों के सामने घट रहा था। हम काफी देर तक यहीं खड़े रहे। मदिरा पिलाने का सिलसिला भी लगातार जारी था। पंडित जी भैरव बाबा को लगातार प्रसाद चढ़ाते जा रहे थे...लेकिन कहीं भी मदिरा की एक बूंद भी नजर नहीं आ रही थी।हमने राजेश चतुर्वेदी नामक एक भक्त से इस बाबत चर्चा की। राजेश ने बताया 'वे उज्जैन के रहने वाले हैं और हर रविवार काल भैरव को मदिरा का भोग लगाने जरूर आते हैं। राजेश बताते हैं, पहले-पहल वे भी यह जानने की कोशिश करते थे कि मदिरा आखिर जाती कहां हैं, लेकिन अब उन्हें पक्का विश्वास है कि मदिरा का भोग भगवान काल भैरव ही लगाते हैं।'
  तांत्रिक मंदिर : 
 काल भैरव का यह मंदिर लगभग छह हजार साल पुराना माना जाता है। यह एक वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर है। वाम मार्ग के मंदिरों में मांस, मदिरा, बलि, मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। प्राचीन समय में यहां सिर्फ तांत्रिकों को ही आने की अनुमति थी। वे ही यहां तांत्रिक क्रियाएं करते थे और कुछ विशेष अवसरों पर काल भैरव को मदिरा का भोग भी चढ़ाया जाता था। कालान्तर में ये मंदिर आम लोगों के लिए खोल दिया गया, लेकिन बाबा ने भोग स्वीकारना यूं ही जारी रखा। 
  अब यहां जितने भी दर्शनार्थी आते हैं, बाबा को भोग जरूर लगाते हैं। मंदिर के पुजारी गोपाल महाराज बताते हैं कि यहां विशिष्ट मंत्रों के द्वारा बाबा को अभिमंत्रित कर उन्हें मदिरा का पान कराया जाता है, जिसे वे बहुत खुशी के साथ स्वीकार भी करते हैं और अपने भक्तों की मुराद पूरी करते हैं।
  काल भैरव के मदिरापान के पीछे क्या राज है, इसे लेकर लंबी-चौड़ी बहस हो चुकी है। पीढ़ियों से इस मंदिर की सेवा करने वाले राजुल महाराज बताते हैं, उनके दादा के जमाने में एक अंग्रेज अधिकारी ने मंदिर की खासी जांच करवाई थी। लेकिन कुछ भी उसके हाथ नहीं लगा...उसने प्रतिमा के आसपास की जगह की खुदाई भी करवाई, लेकिन नतीजा सिफर। उसके बाद वे भी काल भैरव के भक्त बन गए। उनके बाद से ही यहां देसी मदिरा को वाइन उच्चारित किया जाने लगा, जो आज तक जारी है।मंदिर में काफी देर तक बैठने और आसपास की जगहों का मुआयना करने के बाद और तमाम जानकार लोगों से बातें करने के बाद हमें भी पूरा यकीन हो गया कि जहां आस्था होती है, वहां शक की कोई गुंजाइश नहीं होती।
कब से शुरू हुआ सिलसिला
काल भैरव को मदिरा पिलाने का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। यह कब, कैसे और क्यों शुरू हुआ, यह कोई नहीं जानता। यहां आने वाले लोगों और पंडितों का कहना है कि वे बचपन से भैरव बाबा को भोग लगाते आ रहे हैं, जिसे वे खुशी-खुशी ग्रहण भी करते हैं। उनके बाप-दादा भी उन्हें यही बाताते हैं कि यह एक तांत्रिक मंदिर था, जहां बलि चढ़ाने के बाद बलि के मांस के साथ-साथ भैरव बाबा को मदिरा भी चढ़ाई जाती थी। अब बलि तो बंद हो गई है, लेकिन मदिरा चढ़ाने का सिलसिला वैसे ही जारी है। इस मंदिर की महत्ता को प्रशासन की भी मंजूरी मिली हुई है। खास अवसरों पर प्रशासन की ओर से भी बाबा को मदिरा चढ़ाई जाती है।

अनूठा मंदिर! जहां मर्द पहनते हैं जनाने कपड़े...

धर्म को लेकर हमारे देश में जहां तरह-तरह के प्रतबिंध लगाए गए हैं। देश में बहुत से मंदिर ऐसे हैं जिनमें महिलाओं का प्रवेश करने पर रोक होती है। ये मंदिर देश भर में इस तरह के लिए जाना जाता है कि यहां प्रवेश करने और पूजा करने के इच्छुक पुरुषों को बकायदा महिलाओं की ड्रेस में आना पड़ता है।
इस मंदिर में उन्हें पूजा करने के लिए महिलाओं, किन्नरों पर कोई रोक नहीं है, लेकिन पुरुष अगर इस मंदिर में पूजा अर्चना करना चाहता है तो उसे महिलाओं की तरह पूरा सोलह श्रृंगार करना पड़ता है। यह खास मंदिर के कोल्लम जिले में ‌हैं जहां पर श्री में हर साल चाम्याविलक्कू त्यौहार मनाया जाता है।
इस त्योहार में हर साल हजारों की संख्या में पुरुष श्रद्घालु आते हैं। उनके तैयार होने के लिए मंदिर में अलग से मेकअप रूम बनाया जाता है। पुरुष महिलाओं की तरह न केवल साड़ी पहनते है, बल्कि जूलरी, मेकअप और बालों में गजरा भी लगाते है। इस उत्सव में शामिल होने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं है।
यही नहीं ट्रांसजेंडर भी इस मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में देवी की मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी। अपनी खास परंपरा के लिए दुनियाभर में मशहूर इस मंदिर के ऊपर कोई छत नहीं हैं। इस राज्य का यह ऐसा एकमात्र मंदिर है जिसके गर्भगृह के ऊपर छत या कलश नहीं हैं।
ऐसी मान्यता है कि कुछ चरवाहों ने महिलाओं के कपड़े पहनकर पत्‍थर पर फूल चढ़ाए थे, जिसके बाद उस पत्‍थर से दिव्य शक्ति निकलने लगी। इसके बाद इसे मंदिर का रूप दिया गया। एक मान्यता यह भी है कि कुछ लोग पत्‍थर पर नारियल फोड़ रहे थे और इसी दौरान पत्‍थर से खून निकलने लग गया जिसके बाद से यहां देवी की पूजा होने लगी।