गुरुवार, 18 नवंबर 2010

आने वाला वक्त

सवेरे-सवेरे पांच बजे मेरी आंख खुली। लेकिन नींद पूरी नहीं होने की वजह से नींद अभी भी बोझिल थी। मेरी आंख दुबारा लग गई। लोग कहते हैं कि सुबह-सुबह आया स्वप्न सच होता है। आंख लगते ही एक स्वप्न मेरे दिमाग में स्पष्ट होकर घूमने लगा।

एक कौवा महानगर की सडक के किनारे फुटपाथ पर बैठा कांव कांव कर रहा है। आज पहली बार एक कौए की भाषा मेरी समझ में आई। उसकी कांव-कांव में बडा दर्द है। वह जोर-जोर से चिल्ला रहा है, मुझे पानी दो! कोई मुझे पानी दो!! मैं दूर-दूर तक घूम आया, कहीं पानी नही मिला है। मैंने उसे कहा, तुम यहां फुटपाथ पर क्यों बैठे हो? किसी ऊंचे भवन पर बैठकर पानी देखो। कौवा बोला, ऊंचे भवनों पर बैठकर तो बहुत चिल्ला लिया। अब सोचता हूं कि यहां बैठे को कोई जल दे दे। मैंने कहा, इनमें से तुम्हें कोई जल नहीं देगा। मनुष्य जाति बडी स्वार्थी हो गई है। ये लोग अपने काम के पीछे पागल हो गए हैं कि खुद पानी पीने की फुर्सत मुश्किल से निकाल पाते हैं, तुम्हें क्या पिलायेंगे। इनसे आस मत करो। जाओ उडकर खुद पानी ढूंढो। परिश्रम करो, कहीं ना कहीं जरूर मिल जायेगा। परिश्रम का फल हमेशा मीठा होता है। वह कहने लगा, कब से परिश्रम ही तो कर रहा हूं। पानी की तलाश में उडते-उडते मेरे प्राण सूख चुके हैं। सोचा था आज कहीं दूर की उडान भरूं, और दूर की उडान के चक्कर में उडता-उडता इस महानगर में निकल आया। अब इसमें भटक गया हूं। इन मकानों के जंगल के बीच से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा। और ना ही कहीं पानी है। मैंने कहा, तुम्हारे लिए यहां पानी नहीं है। पानी तो लोगों के मकानों के अंदर बंद है। मगर फिर भी कोशिश करो, कहीं न कहीं थोडा बहुत पानी जरूर मिल जायेगा। कौवा बोला, तुम्हारे मकान में भी तो पानी होगा। तुम मुझे पानी क्यों नहीं देते? मैंने सोचा, हां मैं भी तो इसे पानी दे सकता हूं। लेकिन पता नहीं क्यों मैं खुद को उसकी प्यास बुझाने में असमर्थ पाता हूं। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। और फिर मेरे कहेनुसार वह कौवा वहां से उड चला।
थोडी दूर उडकर वह एक मकान की छत पर जाकर बैठ गया। उससे उडा नहीं जा रहा। मालूम नहीं कैसे मैं भी वहीं पहुंच गया। कौवा फिर कुछ दूर उडकर दूसरे मकान की छत पर बैठ गया। उसकी सांस फूली हुई है। उसका शरीर शिथिल पडता जा रहा है। उसमें चलने की भी हिम्मत नहीं है। पानी की तलाश में घूम-घूमकर थकान के कारण उसने अपनी प्यास और ज्यादा बढा ली है। उस मकान की छत से उसे एक गंदा नाला दिखाई दिया। उस नाले का पानी उस कौए के रंग से भी ज्यादा काला है। शहर के कारखानों के जहरीले रसायन भी उसी नाले से होकर आते हैं। उसकी बदबू दूर तक महसूस की जा सकती है, लेकिन फिर भी उस कौए की प्यास की तडपन उसे उस गंदे नाले की तरफ खींच ले गई। उसने उस नाले से एक चोंच भरी, मगर फिर उस गंदे पानी को वापस उलट दिया। वह सडा हुआ पानी उसके गले नहीं उतरा। मुझे उस तडपते कौए को देखकर बडा तरस आ रहा है। उसकी स्थिति बडी दयनीय है। लेकिन मेरी समझ में ये बात नहीं आ रही कि मैं इसे पानी देने में खुद को असमर्थ क्यों पाता हूं।
वह कौवा धीरे-धीरे अपने पंजों से जमीन पर कुछ दूर चला और एक दीवार की छांह में जाकर लेट गया। सूरज की चिलचिलाती धूप में वह दीवार भी उसे जलती हुई प्रतीत हो रही है। लगभग पंद्रह मिनट तक उसने आराम किया। आराम के कारण उसकी थकान को मामूली आराम जरूर मिला, मगर उसका गला लगातार सूखता जा रहा है। उसे आराम की नहीं थोडे से जल की जरूरत है। वह अपनी पूरी ताकत लगाकर फिर से कुछ दूरी तक उडा और एक दीवार पर बैठ गया। वहां उसने देखा कुछ दूरी पर एक सत्संग हो रहा है। वो कौवा गुरु का ज्ञान सुन रहे भक्तजनों से कुछ दूर ही जमीन पर बैठकर कांव-कांव करने लगा। हालांकि उसमें बोलने की ताकत नहीं है। लेकिन फिर भी उसकी प्यास उसे जोर-जोर से बोलने पर मजबूर कर रही है। कोई भी उसकी भाषा नहीं समझ पा रहा, मगर मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही है। - पानी दो, मुझे दो घूंट पानी दो। मैं प्यास के मारे मरा जा रहा हूं। क्यों इस गुरु के चक्कर में अपना जीवन व्यर्थ कर रहे हो। मुझे पानी दे दो, तुम्हें देवता जैसा स्थान मिलेगा। मेरी प्यास बुझाओ, प्यास से मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। मुझे पानी दो, पीने के लिए दो घूंट पानी दो। कौवा प्यासे हृदय से गिडगिडा रहा है।
सभी को उसकी कांव-कांव ही सुनाई देती है। तभी उनमें से एक व्यक्ति बोला, -अरे भगाओ यार इस कौए को, ये कुछ भी सुनने नहीं देता। इतना आनंद आ रहा था, इसने सारे पे पानी फेर दिया। भगाओ इसको। तभी उनमें से एक व्यक्ति उठा और हाथ हिलाते हुए कौए की तरफ बढने लगा, जाता है कि नहीं यहां से। कौए ने दो पंख मारे और उस आदमी के जाने के बाद दुबारा कांव-कांव करने लगा, अरे दुष्टों दो घूंट पानी दे दो। प्यासे की प्यास बुझाओ, बडा सुख मिलेगा। तभी गुरु जी ने सभी को ध्यान में लीन होने के लिए कहा। सभी ध्यान में लीन हो गए। अब कौए की कांव-कांव की आवाज पहले से तेज सुनाई दे रही है। वही आदमी दुबारा उठकर आया और उसने जोर से कौए की तरफ एक पत्थर फेंका। बडी मुश्किल से उस पत्थर के प्रहार से कौए ने अपना बचाव किया और जैसे-तैसे उडा और कुछ दूर जाकर बैठ गया। उसका गला अधिक बोलने की वजह से हद से ज्यादा सूख चुका है। उसकी आंखें पथराई जा रही हैं। जमीन पर खडा होना भी उसके लिए मुश्किल है। मगर उसकी प्यास उससे उडान भरवा रही है। वो अभी भी चिल्ला रहा है। कुछ देर बाद अपनी पूरी शक्ति लगाकर पानी के लिए फिर उडा। मगर इस बार उसके शरीर ने उसका साथ नहीं दिया। दो चार पंख फडफडाकर वह कौवा बेहोश होकर सडक पर जा गिरा। एक तेज रफ्तार से आती हुई कार उसके ऊपर से निकल गई और उसके खून के छीटे मेरे चेहरे पर आ गिरे। एक झटके के साथ मेरी आंख खुल गई। इस प्रकार उस कौए की प्यास बुझी।
मेरा दिल बहुत दुखी हुआ। उस कौए की वही आवाज मुझे पानी पिलाओ अभी भी मेरे कानों में गूंज रही है। लोग कहते हैं कि सुबह-सुबह आया स्वप्न भविष्य में होने वाली घटनाओं की सच्चाई को बयां करता है। अब मैं अपने बिस्तर पर बैठा सोच रहा हूं, शायद आने वाला वक्त पशु-पक्षियों के लिए ऐसा ही हो। जब इंसान को खुद के लिए पानी की कमी महसूस होगी, तो वो पशु-पक्षियों को पानी क्यों देगा। पशु-पक्षी ऐसे ही प्यास से तडपते-तडपते मर जायेंगे। अगर उन्हें कहीं जल मिलेगा भी तो उन्हें इतना गन्दा जल नसीब होगा जो इंसान की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले कारखानों और फसलों में गिरने वाले रसायनों के कारण जहरीला हो चुका होगा। उस अकेले कौए की हालत ऐसी नहीं होगी। सभी पशु पक्षियों की यही हालत होगी और इसका जिम्मेदार होगा इंसान, केवल इंसान।

कुशल प्रबंधक

नीरज ने शनिवार के मेटिनी शो की टिकटें अपनी पत्नी के हाथ में रखी ही थीं कि मोबाइल की घंटी बज उठी। उधर से चाचाजी की मृत्यु का दुखद समाचार मिला। चाचाजी का चौथा भी शनिवार को ही तीन बजे था। दोनों का समय तो एक ही है।
अब तो फिल्म देखने जा नहीं सकते? पत्नी के स्वर में चाचाजी की मृत्यु से अधिक फिल्म न जा पाने का दर्द व निराशा स्पष्ट थी। वह कई दिनों से इस फिल्म को देखने का इंतजार जो कर रही थी।
नीरज भी अजीब असमंजस में पडा बस इतना ही कह पाया हां अब कैसे जा सकते हैं? शनिवार को तीन बजे पति पत्नी चाचाजी के घर पहुंच गये। अभी उन्हें बैठे हुए दस मिनट ही हुए थे कि नीरज ने चाची को कान में कहा चाची दरअसल मेरे एक दोस्त के पिताजी का चौथा भी आज ही तीन बजे है।
हमने सोचा दोनों जगह हो लेंगे। इसलिये हमें जरा जल्दी जाना होगा रास्ते में पत्नी ने हैरानी से पूछा अब ये चौथा किसका निकल आया? अरे जल्दी करो, सिनेमा हाल यहां से दस मिनट की दूरी पर है। हम लोग टाइम से पहुंच जायेंगे।
नीरज ने स्कूटर तेज करते हुये कहा। दस मिनट बाद दोनों हाल के अंदर थे। पत्नी अपने योग्य पति की कुशल प्रबंध क्षमता पर मुग्ध थी।

उन्मुक्तता
कॉलेज में प्रवेश करते ही उसे लगा, कि अब वह उन्मुक्त वातावरण में स्वच्छंद परिन्दे की भांति विचरण कर सकेगा, साथ ही उसे माध्यमिक स्तर के स्कूल की कैद से छुटकारा मिल चुका है, हां अनुशासन के डंडे से वह भयाक्रान्त रहता था।
मगर सायंकाल में जैसे ही उसकी नजर सांध्य दैनिक के मुख्य समाचार पर पडी, तो उसके पैरों तले की धरती खिसक गई। समाचार शीर्षक था- महाविद्यालय में रैगिंग का कहर, दो छात्र गंभीर रूप से घायल। वह विचारमग्न था- क्या उन्मुक्तता यही है? अब उन्मुक्त वातावरण ही उसके भीतर भय उत्पन्न कर रहा था।

भागवत: १२० : लक्ष्मी को पाना है तो परिश्रमी बने

पिछले अंक में हमने पढ़ा कि समुद्र मंथन के दौरान जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने पी लिया। रात को शिवजी की तबीयत खराब हो गई। गरमी चढ़ी तो शिवजी ने पार्वतजी से कहा पार्वती कुछ बेचैनी सी हो रही है। पार्वती ने बोला सब थे तब बोलना था अब रात को किसको बुलाऊंगी? एक काम करो मेरे ऊपर धतूरा चढ़ा दो, शंकरजी ने कहा- भांग का लेपन कर दो और मेरा जलाभिषेक कर दो, मैं शांत हो जाऊंगा। पार्वती ने वैसे ही किया। यही वजह है कि आज भी धतूरे, भांग एवं शीतल जल से शंकरजी की पूजा की जाती है।

याद रखिए कि जब मस्तिष्क का मंथन करेंगे तो सबसे पहले विष ही निकलेगा। विषपान की आदत डालिए, नीलकंठ बनिए। समुद्र मंथन के दौरान आठवें नंबर पर निकली लक्ष्मीजी। जैसे ही लक्ष्मीजी निकलीं तो देवता और दैत्य चौंक गए। सबके सब देखने लग गए लक्ष्मी आई हैं। सबकी इच्छा थी कि हमें मिल जाए। लक्ष्मीजी से कहा गया आपको स्वतंत्रता है आप इनमें से जिसे चाहें वरण कर लें। लक्ष्मी चलीं किसको वरण करूं। सबसे पहले उन्होंने निगाह डाली तो साधु-संत बैठे हुए थे वो खड़े हुए। हाथ जोड़कर बोले हमारे पास आ जाओ। लक्ष्मी बोलीं- देखो तुम हो तो भले लोग, लेकिन तुमको सात्विक अहंकार होता है कि हम दुनिया से थोड़े ऊपर उठे हैं, भगवान के अधिक निकट हैं तो तुम्हारे पास तो नहीं आऊंगी। अहंकारी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं हैं।
साधु-संतों को छोड़कर आगे चली तो ब्रह्माजी नजर आ गए उन्होंने कहा-बाबा! आप तो बाप बराबर हो और मैं आपकी बेटी हूं। आगे चली गईं। देवता खड़े हो गए, इंद्र के नेतृत्व में हमारी हो जाओ, उन्होंने कहा-तुम्हारी तो नहीं होऊंगी। बोले क्यों? तुम देवता बनते हो पुण्य से और पुण्य से कभी लक्ष्मी नहीं मिला करती। लक्ष्मी की एक ही पसंद है पुरुषार्थ और परिश्रम।

12 राशियों का कैसा है स्वरूप?

ज्योतिष शास्त्र में 12 राशियां बताई गई हैं। इन्हीं राशियों पर सभी का भूत-भविष्य और वर्तमान निर्भर करता है। इन राशियों का स्वरूप अलग-अलग होता है। व्यक्ति की राशि के आधार पर ही उसके स्वभाव का आंकलन किया जाता है।
किसी राशि का कैसा है स्वरूप?

मेष: मेष राशि भेड़ का समान होती है।
वृष: इस राशि में बैल का चित्र दिखाई देता है।
मिथुन: इस राशि में नारी व पुरुष का युग्म, नारी के हाथ में वीणा और पुरुष के हाथ में धारण किए हुए चिन्ह होते हैं।
कर्क: इसका स्वरूप केकड़े के समान होता है।
सिंह: इस राशि में सिंह की आकृति दिखाई देती है।
कन्या: इस राशि के स्वरूप में एक लड़की नौका में बैठी हुई दिखाई देती है। जिसके हाथ में धान व अग्नि होती है।
तुला: एक पुरुष तराजू हाथ में लिए दिखाई देता है।
वृश्चिक: इसका रूप बिच्छू के समान रहता है।
धनु: इस राशि का स्वरूप में हाथ में धनुष लिए एक पुरुष दिखाई देता है। साथ ही घोड़ा भी दिखाई देता है।
मकर: इसका मृग यानि हिरण के समान मुख वाला स्वरूप होता है।
कुंभ: इसका स्वरूप में कंधे पर कलश लिए एक पुरुष दिखाई देता है।
मीन: इस राशि में दो मछलियां एक के मुख पर दूसरे की पूंछ लगकर गोल बनी हुई है।

शिव के सिर पर चंद्र क्यों?


शिव, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, महाकाल आदि असंख्य नामों से पूजे जाते हैं भोलेभंडारी। इनका एक नाम शशिधर भी है। शिवजी अपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है इसी वजह से इन्हें शशिधर के नाम से भी जाना जाता है। भोलेनाथ ने मस्तक पर चंद्र को क्यों धारण कर रखा है?
इस संबंध में शिव पुराण में उल्लेख है कि जब देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया गया, तब 14 रत्नों के मंथन से प्रकट हुए। इस मंथन में सबसे विष निकला। विष इतना भयंकर था कि इसका प्रभाव पूरी सृष्टि पर फैलता जा रहा था परंतु इसे रोक पाना किसी भी देवी-देवता या असुर के बस में नहीं था। इस समय सृष्टि को बचाने के उद्देश्य से शिव ने वह अति जहरीला विष पी लिया। इसके बाद शिवजी का शरीर विष प्रभाव से अत्यधिक गर्म होने लगा। शिवजी के शरीर को शीतलता मिले इस वजह से उन्होंने चंद्र को धारण किया।
चंद्र को धारण कर क्या संदेश देते हैं शिव?
शिवजी को अति क्रोधित स्वभाव का बताया गया है। कहते हैं कि जब शिवजी अति क्रोधित होते हैं तो उनका तीसरा नेत्र खुल जाता हैं तो पूरी सृष्टि पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही विषपान के बाद शिवजी का शरीर और अधिक गर्म हो गया जिसे शीतल करने के लिए उन्होंने चंद्र आदि को धारण किया। चंद्र को धारण करके शिवजी यही संदेश देते हैं कि आपका मन हमेशा शांत रहना चाहिए। आपका स्वभाव चाहे जितना क्रोधित हो परंतु आपका मन हमेशा ही चंद्र की तरह ठंडक देने वाला रहना चाहिए। जिस तरह चांद सूर्य से उष्मा लेकर भी हमें शीतलता ही प्रदान करता है उसी तरह हमें भी हमारा स्वभाव बनाना चाहिए।

बुधवार, 17 नवंबर 2010

भागवत: ११९ इसलिए भगवान शंकर कहलाते हैं नीलकंठ


भागवत में आगे समुद्रमंथन की कथा आ रही है। एक बार ऐसा हुआ कि दैत्यों ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। देवता परेशान होकर भगवान के पास गए। भगवान ने कहा -ऐसा करो कि समुद्र को मथो। जब उसे मथोगे तो उसमें से अमृत निकलेगा और वो अमृत तुम पी लेना तो तुम अमर हो जाओगे उसके बाद लड़ते रहना दैत्यों से। पर इसमें दैत्यों की भी जरूरत पड़ेगी। दैत्यों के पास जाकर प्रस्ताव रखा। दैत्यराज बलि को भी प्रस्ताव ठीक लगा।
मंदराचल पर्वत की मथनी बनाई वासुकीनाग की रस्सी बनाई और चले सब मथने के लिए। जैसे ही मंथना आरंभ किया और 14 रत्न निकलना शुरू हुए तो सबसे पहले निकला कालकूट नाम का विष। सब देवता और दैत्य भागे कि इसका क्या करेंगे, त्राहि-त्राहि मच गई, देवताओं ने भगवान विष्णु से कहा-ये आपने क्या कर दिया। आपने तो कहा था कि मथेंगे तो अमृत निकलेगा, अमृत का तो पता नहीं ये तो विष निकल आया। भगवान ने कहा अमृत पाने के लिए विषपान करना पड़ता है। अमृत यदि आप जीवन में पाना चाहें, चरम पाना चाहें तो कुछ न कुछ प्रतिकूलता से गुजरना पड़ेगा, संघर्ष करना पड़ेगा।
सब देवता शंकरजी के पास पहुंचे। देवताओं ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि मंथन में विष निकल आया है। आप पान कर लें इसका। भगवान शंकर ने अपने चुल्लू में विष लिया और जैसे ही चुल्लू में लेकर विष पीना आरंभ किया तो उन्होंने विचार किया कि बाहर निकला तो दुनिया परेशान और भीतर गया तो मेरा स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा अत: उसको कण्ठ में रोक लिया, तब से वह नीलकंठ कहलाए।

सेहतमंद बच्चे का वरदान देती हैं देवी

मां भगवती दुर्गा अनेक रूपों में भारतभर में विराजित हैं। मां दुर्गा का एक रूप मां कैला देवी के नाम से प्रसिद्ध है।मां लक्ष्मी और माँ चामुण्डा यहां एक साथ विराजमान हैं। राजस्थान के करौली जिले में स्थित हैं जो जयपुर से लगभग 150 किलोमीटर दूरी पर है। पुराने समय में इसे कल्याणपुरी के नाम से जाना जाता था। करौली से 25 किलोमीटर दूर कालीसिल नदी के किनारे स्थित त्रिकुट पहाड़ पर मां भगवती को कैलादेवी के रूप में जाना जाता है।
कथा :एक समय भगोरा नाम का भक्त पर्वत पर स्थित केदार नाम की गुफा में मां शक्ति की उपासना करने लगा वर्षों की तपस्या के बाद मां भगवती ने भक्त को दर्शन देकर कहा कि वह स्वयं इस स्थान पर कैलादेवी के नाम से विराजमान होंगी। मंदिर के पीछे कालीसिल नाम की एक बड़ी नदी है। अपने काले पानी की वजह से यह विशेष रूप से जानी जाती है। मंदिर के सामने एक हनुमान मंदिर है जो लंगुरिया के नाम से विख्यात है। यहां का मुख्य आकर्षण दोनों नवरात्रि (चैत्र और शारदीय) में लगने वाला मेला है जहां लाखों भक्त हर साल माँ की असीम कृपा प्राप्त करते हैं। यहां आने वाले भक्त विशेष रूप से अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना लेकर आते हैं। चैत्र नवरात्रि में लगने वाला मेला सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र है।
कैसे पहुंचें - वायू मार्ग से कैलादेवी जाने के लिए जयपुर-आगरा-ग्वालियर एयरपोर्ट से बस और टैक्सी मिल जाती है। ट्रेन से कैलादेवी जाने के लिए सबसे नजदीकी स्टेशन गंगापुर सिटी है। गंगापुर सिटी एक बड़ा स्टेशन है जो रेलवे लाइन के हर मुख्यालय से जुड़ा है।