शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

कौए और उल्लू

बहुत समय पहले की बात है। एक वन में एक विशाल बरगद का पेड़ कौओं की राजधानी था। हजारों कौए उस पर वास करते थे। उसी पेड़ पर कौओं का राजा मेघवर्ण भी रहता था।बरगद के पेड़ के पास ही एक पहाड़ी थी, जिसमें असंख्य गुफाएं थीं। उन गुफाओं में उल्लू निवास करते थे, उनका राजा अरिमर्दन था। अरिमर्दन बहुत पराक्रमी राजा था। कौओं को तो उसने उल्लुओं का दुश्मन नंबर एक घोषित कर रखा था। उसे कौओं से इतनी नफरत थी कि किसी कौए को मारे बिना वह भोजन नहीं करता था। जब बहुत अधिक कौए मारे जाने लगे तो उनके राजा मेघवर्ण को बहुत चिंता हुई। उसने कौओं की एक सभा इस समस्या पर विचार करने के लिए बुलाई। मेघवर्ण बोला, 'मेरे प्यारे कौओ, आपको तो पता ही है कि उल्लुओं के आक्रमणों के कारण हमारा जीवन असुरक्षित हो गया है। हमारा शत्रु शक्तिशाली है और अहंकारी भी। हम पर रात को हमले किए जाते हैं। हम रात को देख नहीं पाते। हम दिन में जवाबी हमला नहीं कर पाते, क्योंकि वे गुफाओं के अंधेरों में सुरक्षित बैठे रहते हैं।' फिर मेघवर्ण ने सयाने और बुद्धिमान कौओं से अपने सुझाव देने के लिए कहा।
एक डरपोक कौआ बोला, 'हमें उल्लुओं से समझौता कर लेना चाहिए। वह जो शर्तें रखें, हम स्वीकार करें। अपने से ताकतवर दुश्मन से पिटते रहने में क्या तुक है?' बहुत-से कौओं ने कांव-कांव करके विरोध प्रकट किया। एक गर्म दिमाग का कौआ चीखा, 'हमें उन दुष्टों से बात नहीं करनी चाहिए। सब उठो और उन पर आक्रमण कर दो।' एक निराशावादी कौआ बोला, 'शत्रु बलवान हैं। हमें यह स्थान छोड़कर चले जाना चाहिए।' सयाने कौए ने सलाह दी, 'अपना घर छोड़ना ठीक नहीं होगा। हम यहां से गए तो बिल्कुल ही टूट जाएंगे। हमे यहीं रहकर और पक्षियों से सहायता लेनी चाहिए।' कौओं में सबसे चतुर व बुद्धिमान स्थिरजीवी नामक कौआ था, जो चुपचाप बैठा सबकी दलीलें सुन रहा था। राजा मेघवर्ण उसकी ओर मुड़ा, 'महाशय, आप चुप हैं। मैं आपकी राय जानना चाहता हूं।' स्थिरजीवी बोला, 'महाराज, शत्रु अधिक शक्तिशाली हो तो छलनीति से काम लेना चाहिए।' 'कैसी छलनीति? जरा साफ-साफ बताइए, स्थिरजीवी।' राजा ने कहा। स्थिरजीवी बोला, 'आप मुझे भला-बुरा कहिए और मुझ पर जानलेवा हमला कीजिए।’ मेघवर्ण चौंका, 'यह आप क्या कह रहे हैं स्थिरजीवी?' स्थिरजीवी राजा मेघवर्ण वाली डाली पर जाकर कान में बोला, 'छलनीति के लिए हमें यह नाटक करना पड़ेगा। हमारे आसपास के पेड़ों पर उल्लू जासूस हमारी इस सभा की सारी कार्यवाही देख रहे हैं। उन्हें दिखाकर हमें फूट और झगड़े का नाटक करना होगा। इसके बाद आप सारे कौओं को लेकर ॠष्यमूक पर्वत पर जाकर मेरी प्रतीक्षा करें। मैं उल्लुओं के दल में शामिल होकर उनके विनाश का सामान जुटाऊंगा। घर का भेदी बनकर उनकी लंका ढाऊंगा।'
फिर नाटक शुरू हुआ। स्थिरजीवी चिल्लाकर बोला, 'मैं जैसा कहता हूं, वैसा कर राजा के बच्चे। क्यों हमें मरवाने पर तुला है?' मेघवर्ण चीख उठा, 'गद्दार, राजा से ऐसी बदतमीजी से बोलने की तेरी हिम्मत कैसे हुई?' कई कौए एक साथ चिल्ला उठे, 'इस गद्दार को मार दो।' राजा मेघवर्ण ने अपने पंख से स्थिरजीवी को जोरदार झापड़ मारकर टहनी से गिरा दिया और घोषणा की, 'मैं गद्दार स्थिरजीवी को कौआ समाज से निकाल रहा हूं। अब से कोई कौआ इस नीच से कोई संबध नहीं रखेगा।' आसपास के पेड़ों पर छिपे बैठे उल्लू जासूसों की आंखें चमक उठीं। उल्लुओं के राजा को जासूसों ने सूचना दी कि कौओं में फूट पड़ गई है। मारपीट और गाली-गलौच हो रही हैं। इतना सुनते ही उल्लुओं के सेनापति ने राजा से कहा, 'महाराज, यही मौका है कौओं पर आक्रमण करने का। इस समय हम उन्हें आसानी से हरा देंगे।' उल्लुओं के राजा अरिमर्दन को सेनापति की बता सही लगी। उसने तुरंत आक्रमण का आदेश दे दिया। बस, फिर क्या था हजारों उल्लुओं की सेना बरगद के पेड़ पर आक्रमण करने चल दी, परंतु वहां एक भी कौआ नहीं मिला। मिलता भी कैसे? योजना के अनुसार मेघवर्ण सारे कौओं को लेकर ॠष्यमूक पर्वत की ओर कूच कर गया था। पेड़ खाली पाकर उल्लुओं के राजा ने थूका, 'कौए हमारा सामना करने की बजाए भाग गए। ऐसे कायरों पर हजार थू।' सारे उल्लू ‘हू-हू’ की आवाज निकालकर अपनी जीत की घोषणा करने लगे। नीचे झाड़ियों में गिरा पड़ा स्थिरजीवी कौआ यह सब देख रहा था। स्थिरजीवी ने कांव-कांव की आवाज निकाली। उसे देखकर जासूस उल्लू बोला, 'अरे, यह तो वही कौआ है, जिसे इनका राजा धक्का देकर गिरा रहा था और अपमानित कर रहा था।' उल्लुओं का राजा भी आया। उसने पूछा, 'तुम्हारी यह दुर्दशा कैसे हुई?' स्थिरजीवी बोला 'मैं राजा मेघवर्ण का नीतिमंत्री था। मैंने उनको नेक सलाह दी कि उल्लुओं का नेतॄत्व इस समय एक पराक्रमी राजा कर रहे हैं। हमें उल्लुओं की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए। मेरी बात सुनकर मेघवर्ण क्रोधित हो गया और मुझे फटकार कर कौओं की जाति से बाहर कर दिया। मुझे अपनी शरण में ले लीजिए।' उल्लुओं का राजा अरिमर्दन सोच में पड़ गया। उसके सयाने नीति सलाहकार ने कान में कहा, 'राजन, शत्रु की बात का विश्वास नहीं करना चाहिए। यह हमारा शत्रु है। इसे मार दो।' एक चापलूस मंत्री बोला, 'नहीं महाराज! इस कौए को अपने साथ मिलाने में बड़ा लाभ रहेगा। यह कौओं के घर के भेद हमें बताएगा।' राजा को भी स्थिरजीवी को अपने साथ मिलाने में लाभ नजर आया और उल्लू स्थिरजीवी कौए को अपने साथ ले गए। वहां अरिमर्दन ने उल्लू सेवकों से कहा, 'स्थिरजीवी को गुफा के शाही मेहमान कक्ष में ठहराओ। इन्हें कोई कष्ट नहीं होना चाहिए।' स्थिरजीवी हाथ जोड़कर बोला, 'महाराज, आपने मुझे शरण दी, यही बहुत है। मुझे अपनी शाही गुफा के बाहर एक पत्थर पर सेवक की तरह ही रहने दीजिए। वहां बैठकर आपके गुण गाते रहने की ही मेरी इच्छा है।' इस प्रकार स्थिरजीवी शाही गुफा के बाहर डेरा जमाकर बैठ गया। गुफा में नीति सलाहकार ने राजा से फिर से कहा, 'महाराज! शत्रु पर विश्वास मत करो। उसे अपने घर में स्थान देना तो आत्महत्या करने समान है।' अरिमर्दन ने उसे क्रोध से देखा, 'तुम मुझे ज्यादा नीति समझाने की कोशिश मत करो। चाहो तो तुम यहां से जा सकते हो।' नीति सलाहकार उल्लू अपने दो-तीन मित्रों के साथ वहां से सदा के लिए यह कहता हुआ, 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि।' कुछ दिनों बाद स्थिरजीवी लकड़ियां लाकर गुफा के द्वार के पास रखने लगा, 'सरकार, सर्दियां आने वाली हैं। मैं लकड़ियों की झोपड़ी बनाना चाहता हूं ताकि ठंड से बचाव हो।’ धीरे-धीरे लकड़ियों का काफी ढेर जमा हो गया। एक दिन जब सारे उल्लू सो रहे थे तो स्थिरजीवी वहां से उड़कर सीधे ॠष्यमूक पर्वत पर पहुंचा, जहां मेघवर्ण और कौओं सहित उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। स्थिरजीवी ने कहा, 'अब आप सब निकट के जंगल से जहां आग लगी है, एक-एक जलती लकड़ी चोंच में उठाकर मेरे पीछे आइए।' कौओं की सेना चोंच में जलती लकड़ियां पकड़ स्थिरजीवी के साथ उल्लुओं की गुफाओं में आ पहुंची। स्थिरजीवी द्वारा ढेर लगाई लकड़ियों में आग लगा दी गई। सभी उल्लू जलने या दम घुटने से मर गए। राजा मेघवर्ण ने स्थिरजीवी को 'कौआ रत्न' की उपाधि दी। सीखः शत्रु को अपने घर में पनाह देना अपने ही विनाश का सामान जुटाना है।

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

ब्रह्म मुहूर्त में जागने से मिलती है लक्ष्मी और बुद्धि

हमें रोज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर का त्याग कर देना चाहिए। ब्रह्म का मतलब परम तत्व या परमात्मा। मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात प्रात: 4 से 5.30 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है। हमारी दिनचर्या सुबह उठने से आरंभ होती है। इसलिए सुबह जल्दी उठना दिनचर्या का सबसे पहला और महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी कारण हमारी संस्कृति में सुबह उठने का समय भी तय किया गया है, वह है ब्रह्म मुहूर्त। इस समय जागने से सुंदरता, लक्ष्मी और बुद्धि मिलती है। ब्रह्म मुहूर्त में उठना हमारे जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोड़ने की जरूरत है।
शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है- वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति। ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥ - भाव प्रकाश सार-93 अर्थात- ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता है। अच्छे स्वास्थ्य का रहस्य हमारे धर्मग्रंथों में ब्रह्म मुहूर्त में उठने का सबसे बड़ा लाभ अच्छा स्वास्थ्य बताया गया है। क्या है इसका रहस्य? दरअसल सुबह चार बजे से साढ़े पांच बजे तक वायुमंडल में यानी हमारे चारों ओर आक्सीजन अधिक होती है। वैज्ञानिक खोजों से पता चला है कि इस समय आक्सीजन 41 प्रतिशत, करीब 55 प्रतिशत नाइट्रोजन और 4 प्रतिशत कार्बन डाईआक्साइड गैस रहती है। सूर्योदय के बाद वायुमंडल में आक्सीजन कम और कार्बन डाईआक्साइड बढ़ती है। आक्सीजन हमारे जीवन का आधार है। शास्त्रों में इसे प्राणवायु कहा गया है। ज्यादा आक्सीजन मिलने से हमारा शरीर स्वस्थ रहता है। ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। मुर्गे बांग देने लगते हैं। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। यह प्रतीक है उठने, जागने का। प्रकृति हमें संदेश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिए।

इस पांडव की दूसरी पत्नी थीं द्रौपदी

पहली पत्नी से था एक पुत्र भी स्वयंवर जीतने के बाद माता कुंती की आज्ञा से पांचों पांडवों ने द्रौपदी से विवाह किया। द्रौपदी पांच में चार पांडवों की पहली पत्नी थी, जबकि एक पांडव की दूसरी पत्नी थी। इस विवाह से पूर्व भीम का विवाह हिडिम्बा नामक राक्षसी के साथ हो चुका था। भीम और हिडिम्बा का एक पुत्र भी था घटोत्कच्छ।
दुर्योधन और मामा शकुनि ने षड़यंत्र रचकर सभी पांडवों को मारने के लिए लाक्षागृह का निर्माण किया था। लाक्षागृह से बचने के बाद सभी पांडव माता कुंती के साथ छिपकर एक जंगल में रहने लगे थे। उस जंगल में हिडिम्ब नामक राक्षस का राज का था। यह राक्षस मानवों का मारकर खा जाता था। भीम ने हिडिम्ब राक्षस का वध किया और उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया। इसके बाद उनके पुत्र घटोत्कच्छ का जन्म हुआ। इस प्रसंग के बाद ही द्रौपदी का विवाह पांचों पांडवों के साथ हुआ था। द्रौपदी पूर्व जन्म में थी अविवाहित शास्त्रों के अनुसार द्रौपदी पूर्व में अविवाहित थी। पति पाने की कामना से द्रौपदी ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। शिवजी प्रसन्न हुए और उन्होंने द्रौपदी से वर मांगने को कहा, तब द्रौपदी से पांच बार में वर मांगा। शिवजी ने तथास्तु कहा और वे अंर्तध्यान हो गए। इसके बाद द्रौपदी के अगले जन्म में शिवजी के वरदान स्वरूप पांच पांडवों पति के रूप में प्राप्त हुए।

बुधवार, 16 जुलाई 2014

स्वामी विवेकानंद की परीक्षा

(युवाओं के प्रेरणाश्रोत स्वामी विवेकानंद) ----------------------------- अपेक्षा शर्मा
बात उस समय की है जब विवेकानंद शिकागो धर्मसभा में भारतीय संस्कृति पर बोलने के लिए आमंत्रित किये गये थे। शिकागो जाने से पहले विवेकानन्द स्वामी रामकृष्ण जी पत्नी मां शारदा के पास आशीर्वाद लेने पहुंचे। मां ने उन्हें वापस भेजते हुआ कहा, कल आना। पहले मैं तुम्हारी पात्रता देखूंगी। उसके बाद ही मैं तुम्हें आशीर्वाद दूंगी। दूसरे दिन विवेकानंद आए तो उन्होंने कहा, अच्छा आशीर्वाद लेने आया है। पर पहले मुझे वह चाकू तो पकड़ा। मुझे सब्जी काटनी है, फिर देती हूं तुझे आशीर्वाद। गुरूमाता की आज्ञा मानते हुए जैसे विवेकानन्द जी ने पास पड़ा चाकू गुरू मां को दिया मां का चेहरा प्रसन्नता से खिल गया। उन्होंने कहा जाओ नरेंद्र मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ रहेगा। स्वामी विवेकानंद जी आश्चर्य में पड़ गए। वे यह सोच कर आए थे कि मां उनकी योग्यता जांचने के लिए कोई परीक्षा लेगी लेकिन वहां तो वैसा कुछ भी नही हुआ। विवेकानंद जी के आश्चर्य को देखकर माता शारदा ने कहा कि प्रायः जब किसी व्यक्ति से चाकू मांगा जाता है तो वह चाकू का मुठ अपनी हथेली में थाम देता है और चाकू की तेज धार वाला हिस्सा दूसरे को दे देता है। इससे पता चलता है कि उस व्यक्ति को दूसरे की तकलीफ और सुविधा की परवाह नहीं। लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया। यही तो साधू का मन होता है जो सारी विपदा खुद झेलकर भी दूसरों कसे सुख देता है। इसी से पता चलता है कि तुम शिकागो जाने योग्य हो। ०००००००००००००००००००००००

बुधवार, 9 जुलाई 2014

धरती फट रही है!!!

बहुत समय पहले की बात है किसी जंगल में एक गधा बरगद के पेड़ के नीचे लेटकर आराम कर रहा था। लेटे-लेटे उसके मन में बुरे खयाल आने लगे, उसने सोचा कि यदि धरती फट गई तो मेरा क्या होगा? अभी उसने ऐसा सोचा ही था कि उसे एक जोर के धमाके की आवाज आई। वह भयभीत हो उठा और चीखने लगा- भागो-भागो धरती फट रही है, अपनी जान बचाओ... और ऐसा कहते हुए वह पागलों की तरह एक दिशा में भागने लगा। उसे इस कदर भागता देखते हुए एक अन्य गधे ने उससे पूछा कि अरे क्या हुआ भाई, तुम इस तरह बदहवास भागे क्यों जा रहे हो? अरे तुम भी भागो… अपनी जान बचाओ, धरती फट रही है..., ऐसा चीखते हुए वह भागता रहा। यह सुनकर दूसरा गधा भी डर गया और उसके साथ भागने लगा। अब तो वह दोनों एकसाथ चिल्ला रहे थे- भागो-भागो धरती फट रही है… भागो-भागो…। देखते-देखते सैकड़ों गधे इस बात को दोहराते हुए उसी दिशा में भागने लगे। गधों को इस तरह भागता देख अन्य जानवर भी डर गए। धरती फटने की खबर जंगल में लगी आग की तरह फैलने लगी और जल्द ही सबको पता चल गया कि धरती फट रही है। चारों तरफ जानवरों की चीख-पुकार मच गई। सांप, बिच्छू, सियार, लोमड़, हाथी, घोड़े... सभी उस झुंड में शामिल हो भागने लगे। जंगल में फैले इस हो-हल्ले को सुन अपनी गुफा में विश्राम कर रहा जंगल का राजा शेर बाहर निकला। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ कि सारे जानवर एक ही दिशा में भागे जा रहे हैं। वह उछलकर सबके सामने आया और गूंजती हुई दहाड़ के साथ बोला कि ये क्या पागलपन है? कहां भागे जा रहे हो तुम सब? महाराज, धरती फट रही है, आप भी अपनी जान बचाइए। झुंड में आगे खड़ा बंदर बोला। किसने कहा यह सब? शेर ने प्रश्न किया। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे, फिर बंदर बोला कि मुझे तो ये बात चीते ने बताई थी। चीते ने कहा कि मैंने तो यह पक्षियों से सुना था और ऐसा करते-करते पता चला कि यह बात सबसे पहले गधे ने बताई थी। गधे को महाराज के सामने बुलाया गया। तुम्हें कैसे पता चला कि धरती फट रही है? शेर ने गुस्से से पूछा। ...मैंने अपने कानों से धरती के फटने की आवाज सुनी महाराज, गधे ने डरते हुए उत्तर दिया। ठीक है चलो, मुझे उस जगह ले चलो और दिखाओ कि धरती फट रही है, ऐसा कहते हुए शेर गधे को उस तरफ ढकेलता हुआ ले जाने लगा। बाकी जानवर भी उनके पीछे हो लिए और डर-डरकर उस ओर बढ़ने लगे। बरगद के पास पहुंचकर गधा बोला कि हुजूर, मैं यहीं सो रहा था कि तभी जोर से धरती फटने की आवाज आई, मैंने खुद उड़ती हुई धूल देखी और भागने लगा। शेर ने आस-पास जाकर देखा और सारा मामला समझ गया। उसने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि यह गधा महामूर्ख है। दरअसल, पास ही नारियल का एक ऊंचा पेड़ है और तेज हवा चलने से उस पर लगा एक बड़ा-सा नारियल नीचे पत्थर पर गिर पड़ा। पत्थर सरकने से आस-पास धूल उड़ने लगी और ये गधा न जाने कैसे इसे धरती फटने की बात समझ बैठा। शेर ने बोलना जारी रखा कि भाइयों, यह तो गधा है, पर क्या आपके पास भी अपना दिमाग नहीं है। जाइए, अपने घर जाइए और आइंदा से किसी अफवाह पर यकीन करने से पहले दस बार सोचिएगा। सीख- किसी की भी बात पर यकीन करने से पहले अपना दिमाग का उपयोग जरूर करना चाहिए और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी अफवास पर भरोसा करने से पहले उस मामले की जांच अवश्य कर लेनी चाहिए।

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

'पत्थरों' पर सिर पटकती यमुना

सिसकते, आंसू बहाते ही सही, लेकिन यमुना बहना चाहती है। उजाड़-वीरान खादरों में बेफिक्री से बहती यमुना मैया अपने 'बेटों' के बीच आते ही सहम जाती है। सीवर, गंदगी, नाले, कूड़ा-करकट से आजिज यमुना के लिए अब तो अपनी धार में भी रोड़े हैं। उसके घाटों पर कंक्रीट के जंगल बसते चले गए। कालिंदी अवैध इमारतों की नींव पर सिर पटकते रोए जा रही है। हाईकोर्ट व नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ये आंसू पोंछना भी चाहते हैं, लेकिन जिम्मेदार अफसर कुछ करने की बजाय 'नोटिस' नाम के कागज से मुंह छिपाए बैठे हैं। मामला मथुरा का हो या ताजनगरी की कहानी, यमुना की हालत कहीं बदलती नजर नहीं आती। पावन यमुना की तरह ही पावन मथुरा-वृंदावन की भूमि पर भू-माफिया आश्रम व इमारतें बनाकर यमुना की तलहटी कब्जाने में लगे हैं, तो यमुना के लिए वैसी ही हिकारत मुहब्बत की नगरी आगरा में महसूस होती है। पिछले करीब एक दशक से अवैध निर्माणों की बाढ़ सी आई हुई है। आगरा विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन, नगर निगम व सिंचाई विभाग की मिलीभगत से कुछ बिल्डर लगातार यमुना की तलहटी, एहतमाली भूमि व डूब क्षेत्र पर कब्जा किए जा रहे हैं। आगरा शहर में खास तौर पर दयालबाग क्षेत्र से यमुना की तलहटी पर कब्जों की शुरुआत होती है। यहां बिल्डरों के बड़े-बड़े आवासीय प्रोजेक्ट हैं। इसी तरह जगनपुर, मनोहरपुर, बल्केश्वर, जीवनी मंडी तक कतार से दर्जनों अवैध निर्माण यमुना की तलहटी में हो गए। इनमें बड़े रसूखदार बिल्डरों के प्रोजेक्ट को तो खुद सिंचाई विभाग ने अनापत्ति प्रमाण पत्र दिए व आगरा विकास प्राधिकरण ने नक्शे पास कर दिए। वहीं, दर्जनों कॉलोनियों तो बिल्कुल अवैध बन गईं। मुख्य सचिव के आदेश पचा गए अफसर 16 मार्च 2010 को तत्कालीन मुख्य सचिव ने आदेश जारी किए थे कि यमुना की तलहटी और डूब क्षेत्र में जितने भी अवैध निर्माण हैं, उन्हें चिन्हित किया जाए। सभी संबंधित विभाग उन पर कार्रवाई करे। पुलिस उन निर्माणकर्ताओं पर कार्रवाई करे। साथ ही, सुनिश्चित किया जाए कि यमुना के प्रतिबंधित क्षेत्र में कोई भी नक्शा पास न किया जाए। उसे हरित पट्टिका के रूप में विकसित किया जाए। इसके बाद भी किसी भी विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की। एनजीटी के आदेश पर निर्माण चिन्हित, कार्रवाई शून्य: जुलाई 2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आदेश जारी किए कि यमुना डूब क्षेत्र में जितने भी निर्माण हैं, उन्हें चिन्हित कर कार्रवाई की जाए। इसके बाद आगरा विकास प्राधिकरण ने हरीपर्वत वार्ड प्रथम में पोइया से बल्केश्वर तक 34, हरीपर्वत वार्ड द्वितीय में पोइया से रुनकता तक 11 व छत्ता वार्ड में 12 निर्माण चिन्हित किए। सभी के चालान काट कर एनजीटी को जानकारी भेज दी गई, लेकिन कार्रवाई किसी भी निर्माण पर अब तक नहीं की गई। मुनाफाखोरी में अपने ही नियम दफन: इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश है कि यमुना के 500 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण नहीं होना चाहिए। वहीं, एडीए का खुद का नियम कहता है कि 200 मीटर के दायरे में कोई निर्माण अनुमन्य नहीं होगा। इसके बावजूद धड़ल्ले से यमुना की तलहटी पर नक्शे पास किए जा रहे हैं। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट मॉनीटरिंग कमेटी के सदस्य डीके जोशी व जिला प्रशासन के संयुक्त दौरे के बाद खुद प्रशासन ने रिपोर्ट में यमुना की तलहटी पर अवैध निर्माणों की रिपोर्ट दी थी। उसके बाद एडीए ने नोटिस जारी किए, लेकिन अब मामला फिर ठंडे बस्ते में पड़ा है।
'शहर में पहले तालाबों पर कब्जे किए गए। अब इस शहर के अफसर कुछ बिल्डरों के साथ मिल कर यमुना की जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं। हाईकोर्ट और एनजीटी के आदेशों का उल्लंघन कर यमुना की तलहटी कब्जा रहे हैं। ये कितने भी प्रभावशाली लोग हों, इन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में सभी को खड़ा किया जाएगा।'

आवाज में छुपा है महिलाओं को लुभाने का राज!

एक नए शोध के मुताबिक, महिलाएं ऐसे मर्दों की ओर नहीं देखतीं जो तन्हा या रहस्यमयी बनकर गुपचुप बैठे रहते हैं। महिलाएं ऐसे मर्दों को महत्व देती हैं, जिनका स्वभाव तो शांत हो, लेकिन वे छोटे और कम शब्दों में विनम्रता के साथ अपनी बातें कह देते हों।कनाडा की युनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया की मॉली बबेल ने बताया कि जो पुरुष छोटे-छोटे शब्दों का प्रयोग करते हैं और कम बोलते हैं, वे ज्यादा आकर्षक पुरुषों के रूप में देखे जाते हैं, क्योंकि वे अधिक मर्दाना लगते हैं और अगर आपकी आवाज धीमी या मृदुल है तो मानो आप चारों खाने चित कर देने वाले हैं।