बच्चों की मासिक पत्रिका भोपाल से प्रकाशित , सम्पादक -अरुण बंछोर, उपसंपादक -ओमप्रकाश बंछोर
मंगलवार, 12 अगस्त 2014
प्याज़ से निकले आत्मनिर्भरता के आंसू
मैंने जब-जब आत्मनिर्भर होने की कोशिश की, कोई न कोई ट्रैजेडी हो ही जाती है। पिछले महीने मैं अपने गांव गया था, रास्ते में किसी जेबकतरे ने मुझे आत्मनिर्भर होने से रोक दिया। घर पहुंचकर पता चला कि मैं बगैर फोन के हूं। इस कलियुग में बगैर बीवी के जिया जा सकता है, बगैर सेलफोन के नहीं। नई सरकार देश को आत्मनिर्भर बनाने में लगी हुई है। यह प्रयास सनातन काल से चल रहा है। जो भी पार्टी सत्ता में आती है, देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है, पर बदकिस्मती देखिए कि कोई सरकार मंहगाई और भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाती है, तो कोई 'अच्छे दिन' में प्याज़ के आंसू रोने लगती है। नतीजा आत्मनिर्भरता की इस दौड़ में नेता आगे निकल जाता है, देश पीछे छूट जाता है।
दो दशक में सियासत में भी सब्ज़ी मंडी का बोलबाला रहा। पिछले पचास साल से देश को शिक्षा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास चल रहा है। कुकुरमुत्तों की तरह स्कूल उग आए। शिक्षा मंडी लग गई, नौजवानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शिक्षित होना अनिवार्य बता कर सरकार और शिक्षा मंत्री कोमा में चले जाते हैं। अब अभिभावक अपनी औलाद को लेकर इस मंडी में खड़ा है। सरकारी कॉलेज की कट ऑफ लिस्ट में कहीं नाम नहीं और प्राइवेट शिक्षा मंडी में 'एडमिशन' खरीदने की औकात नहीं। जाएं तो जाएं कहां! मन मारकर युवा टैलंट 'हुक्का पार्लर में' आत्मनिर्भर होने लगता है।
पिछली सरकार साठ साल से देश को आत्मनिर्भर बनाने में लगी रही। घोटालों के चक्रवात में जनता गोल-गोल घूमती रही। क्लर्क से लेकर काउन्सलर तक आत्मनिर्भर होते रहे -देश का फिर नंबर नहीं आया। बीजेपी सरकार को और जल्दी है। उनके एक नेता तो 'कुंवारों' को भी आत्मनिर्भर बनाने का वादा कर रहे हैं। आज जनता 'अच्छे दिन' की चपेट में है। महंगाई की सूनामी फिर आहट दे रही है। प्याज़ का प्रेत उठ खड़ा हुआ है। खाद्य मंत्री कह रहे हैं-'देश पूरी तरह (अन्न के मामले में) आत्मनिर्भर हैं-। मंत्री जी! अन्न के बारे में आत्मनिर्भर होने पर बधाई, पर लगे हाथ यह तो बता दो कि उन्हें सुरक्षित रखने के बारे में कब तक आत्मनिर्भर हो जाएंगे? आए दिन खुले आसमान के नीचे लाखों टन अनाज सड़ जाता है। अब मुझे पूरा यकीन है कि देश महंगाई के मामले में 'आत्मनिर्भर' हो चुका है। महंगाई एक शाश्वत सत्य है। इसके पीछे सरकार का तो बिल्कुल हाथ नहीं है। जब-जब जांच हुई जनता ही कुसूरवार पाई गई। पिछली सरकार ने जांच के बाद पाया था कि महंगाई के पीछे जनता का 'खानपान जिम्मेदार है। (जनता चटोरी हो गई या फिर ज्यादा खाने लगी है ) अब नई सरकार ने भी मंहगाई के लिए जनता के खानपान को जिम्मेदार ठहराया है। उम्र के पचास साल पूरे करने के बाद भी मैं अक्ल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया। एक से एक 'मंगनी लाल' आलू बेचते आए और देखते ही देखते अरबपति हो गए। हम तो-कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे। लाइफ में जितनी बार आत्मनिर्भर होने की कोशिश की, घर की थाली का कद छोटा होता गया।
कल चौधरी मुझसे पूछ बैठा- 'उरे कू सुण भारती! तू आत्मनिर्भर हुआ कि नहीं?'
'पिछले महीने किसी जेबकतरे ने मेरा सेलफोन निकाल लिया। तबसे बड़ा कन्फ्यूज्ड हूं।'
'अरे, मैं तो तब तक आत्मनिर्भर होने की सोच भी नहीं सकता, जिब तक तू कुंडली में बैठो है।'
'आज अचानक तुम्हें आत्मनिर्भर होने की क्या सूझी?'
'कल टीवी पर खबर सुनी, तब मन्ने पतो लग्या-अक-मैं आत्मनिर्भर हो रहा हूं। उतै खबर में एक आत्मनिर्भर नेता नू कह रहो-अक-इस प्रक्षेपण के बाद देश घना आत्मनिर्भर हो गयो-।'
'फिलहाल तो महंगाई की बौछार में जनता का कंबल और भारी हो गया है। सूखी हलक और पथरायी आंखों से जनता कभी प्याज़ की बुलंदी देखती है तो कभी प्रक्षेपित सेटेलाइट्स की। ऐसे कालाहारी में तुझे आत्मनिर्भर होने की पड़ी है?' चौधरी मुझे घूर रहा था।
सोमवार, 11 अगस्त 2014
जीवन में जरूरी है यह जानना
दिन और तिथि से जानें कब क्या न खाएं
शास्त्रों में खाद्य पदार्थों के सेवन संबंधी कुछ नियम दिए गए हैं। आइए जानें कि दिन और तिथि के अनुसार क्या खाना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है-
सूर्यास्त के बाद तिल की कोई भी वस्तु का प्रयोग नहीं करनी चाहिए।
अमावस्या, रविवार और पूनम को तिल का तेल हानिकारक होता है।
रविवार को तुलसी, अदरक, लाल मिर्च और लाल सब्जी नहीं खाना चाहिए।
रविवार, शुक्रवार और षष्ठी को आंवला नहीं खाना चाहिए।
तृतीया तिथि को परवल नहीं खाना चाहिए (तृतीया को परवल खाने से शत्रुओं की वृद्धि होती है)।
चतुर्थी को मूली नहीं खाना चाहिए (चतुर्थी को मूली खाने से धन-नाश होता है)।
अष्टमी को नारियल नहीं खाना चाहिए (अष्टमी नारियल खाने से बुद्धि कमजोर होगी, रात को नारियल नहीं खाना चाहिए)
त्रयोदशी को बैगन नहीं खाना चाहिए (त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र नाश या पुत्र से दुख मिलता है)
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कालसर्प दोष को दूर करने के अचूक उपाय
12 प्रकार के होते हैं कालसर्प दोष
कालसर्प दोष को लेकर लोगों में काफी भय और आशंका-कुशंकाएं रहती हैं, लेकिन कुछ आसान और अचूक उपायों से इसके असर को कम किया जा सकता है। शोध से पता चलता है कि जिनकी भी कुंडली में यह दोष पाया गया है, उसका जीवन या तो रंक जैसे गुजरता है या फिर राजा जैसे।
राहु का अधिदेवता काल है तथा केतु का अधिदेवता सर्प है। इन दोनों ग्रहों के बीच कुंडली में एक तरफ सभी ग्रह हों तो कालसर्प दोष कहते हैं। राहु-केतु हमेशा वक्री चलते हैं तथा सूर्य चंद्रमार्गी। ज्योतिषी शास्त्रों के अनुसार कालसर्प दोष 12 प्रकार के बताए गए हैं।
1. अनंत, 2. कुलिक, 3. वासुकि, 4. शंखपाल, 5. पद्म, 6. महापद्म, 7. तक्षक, 8. कर्कोटक, 9. शंखनाद, 10. घातक, 11. विषाक्त, 12. शेषनाग। कुंडली में 12 तरह के कालसर्प दोष होने के साथ ही राहु की दशा, अंतरदशा में अस्त-नीच या शत्रु राशि में बैठे ग्रह मारकेश या वे ग्रह जो वक्री हों, उनके चलते जातक को कष्टों का सामना करना पड़ता है। इस योग के चलते जातक असाधारण तरक्की भी करता है, लेकिन उसका पतन भी एकाएक ही होता है। किसी कुंडली के जानकार व्यक्ति से ही कालसर्प दोष का निवारण कराया जाना चाहिए। कुछ सरल उपायों से भी व्यक्ति अपने दुख तथा समस्याओं में कमी कर सकता है। 1. राहु तथा केतु के मंत्रों का जाप करें या करवाएं- राहु मंत्र : ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: केतु मंत्र : ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:। 2. सर्प मंत्र या नाग गायत्री के जाप करें या करवाएं। सर्प मंत्र- ॐ नागदेवताय नम: नाग गायत्री मंत्र- ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात् 3. ऐसे शिवलिंग (शिव मंदिर में) जहां ॐ शिवजी पर नाग न हो, प्रतिष्ठा करवाकर नाग चढ़ाएं। 4. श्रीमद् भागवत और श्री हरिवंश पुराण का पाठ करवाते रहें। 5. दुर्गा पाठ करें या करवाएं। 6. भैरव उपासना करें। 7. श्री महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से राहु-केतु का असर खत्म होगा। 8. राहु-केतु के असर को खत्म करने के लिए रामबाण है- पाशुपतास्त्र का प्रयोग। 9. पितृ शांति का उपाय करें। 10. घर में फिटकरी, समुद्री नमक तथा देशी गाय का गौमूत्र मिलाकर रोज पोंछा लगाएं तथा गुग्गल की धूप दें। 11. नागपंचमी को सपेरे से नाग लेकर जंगल में छुड़वाएं। 12. घर में बड़ों का आशीर्वाद लें तथा किसी का दिल न दुखाएं और न अपमान करें।
1. अनंत, 2. कुलिक, 3. वासुकि, 4. शंखपाल, 5. पद्म, 6. महापद्म, 7. तक्षक, 8. कर्कोटक, 9. शंखनाद, 10. घातक, 11. विषाक्त, 12. शेषनाग। कुंडली में 12 तरह के कालसर्प दोष होने के साथ ही राहु की दशा, अंतरदशा में अस्त-नीच या शत्रु राशि में बैठे ग्रह मारकेश या वे ग्रह जो वक्री हों, उनके चलते जातक को कष्टों का सामना करना पड़ता है। इस योग के चलते जातक असाधारण तरक्की भी करता है, लेकिन उसका पतन भी एकाएक ही होता है। किसी कुंडली के जानकार व्यक्ति से ही कालसर्प दोष का निवारण कराया जाना चाहिए। कुछ सरल उपायों से भी व्यक्ति अपने दुख तथा समस्याओं में कमी कर सकता है। 1. राहु तथा केतु के मंत्रों का जाप करें या करवाएं- राहु मंत्र : ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: केतु मंत्र : ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:। 2. सर्प मंत्र या नाग गायत्री के जाप करें या करवाएं। सर्प मंत्र- ॐ नागदेवताय नम: नाग गायत्री मंत्र- ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात् 3. ऐसे शिवलिंग (शिव मंदिर में) जहां ॐ शिवजी पर नाग न हो, प्रतिष्ठा करवाकर नाग चढ़ाएं। 4. श्रीमद् भागवत और श्री हरिवंश पुराण का पाठ करवाते रहें। 5. दुर्गा पाठ करें या करवाएं। 6. भैरव उपासना करें। 7. श्री महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से राहु-केतु का असर खत्म होगा। 8. राहु-केतु के असर को खत्म करने के लिए रामबाण है- पाशुपतास्त्र का प्रयोग। 9. पितृ शांति का उपाय करें। 10. घर में फिटकरी, समुद्री नमक तथा देशी गाय का गौमूत्र मिलाकर रोज पोंछा लगाएं तथा गुग्गल की धूप दें। 11. नागपंचमी को सपेरे से नाग लेकर जंगल में छुड़वाएं। 12. घर में बड़ों का आशीर्वाद लें तथा किसी का दिल न दुखाएं और न अपमान करें।
जीवन में श्रीकृष्ण का गुणगान जरूरी
(हेमलता यादव ,जयपुर)|
जन्म-जन्मांतरों का सुकृत पुण्य जब उदय होता है, तभी हमारे जीवन में भगवान के मंगलमय लीला चरित्र के गुणगान का सौभाग्य मिलता है। हमारे जीवन का वही क्षण कृतार्थ है, जिसमें उत्तम श्लोक भगवान श्री राधा-कृष्ण के गुणों का गान होता है। जीवन की सार्थकता श्री राधा-कृष्ण लीला श्रवण में है। श्री राधा-कृष्ण नाम का संकीर्तन, कथा श्रवण, श्री राधा-कृष्ण के गुणों का गान दर्शन ही हमारे जीवन का परम महोत्सव है। परंतु दुर्भाग्य से यह महोत्सव हमारे जीवन में संपन्न नहीं होता। अन्य विविध प्रकार के उत्सव मनाने का हमें अनुभव है। बड़ा उल्लास होता है उत्सवों में। कितना प्रकाश, कितना शोर, कितनी मेहमानी मेजबानी होती है। परंतु इन सारे उत्सवों की रात गुजर जाने के बाद सुबह का सूरज हमारी जिंदगी में कुछ अंधेरी रेखाएं और खींच जाता है कभी ऐसा उत्सव हमारी जिंदगी में नहीं आया है जिसके पीछे हमें कोई आनंद, उल्लास मिला हो। दिखावे में प्रदर्शन में हम पार्टियां करते हैं, अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर देते हैं और जब मांगने वाले द्वार पर खड़े होते हैं तो हम चीखते-चिल्लाते तनाव से भर जाते हैं। एक के बाद एक हमारा उत्सव चलता है। परंतु उल्लास हमसे छिन जाता है। जो शांति जो चेतना, जो प्रकाश हमारे जीवन में मिला था हम अपने ही अज्ञान के कारण उससे वंचित हो जाते हैं। भगवान की कथा नाम संकीर्तन में ही वह शक्ति है कि शोक का समुद्र भी हो तो सूख जाता है। जीवन परम आनंद तथा शांति को उपलब्ध हो जाता है। समस्याएं और संकट तो जीवन में आते ही हैं। पुत्र है तो कभी बिछुड़ सकता है। तरुण रूठ सकता है विमुख हो सकता है, बूढ़ी आंखों के सामने। भाई-बहन का विछोह हो सकता है। संसार में शोक के कारण तो पैदा होंगे ही, क्योंकि उसके साथ हमारा प्रारब्ध जुड़ा हुआ है। जब तक शरीर है, शरीर से बने हुए संबंध हैं, कहीं संयोग होगा तो कहीं वियोग होगा। कहीं हर्ष होगा तो कहीं विषाद होगा। दोनों से हमें जो परे कर दे ऐसा जो नित्य नवनवायमान परम महोत्सव है- 'तदेव शाश्वन्मनसो महोत्सवम्' अर्थात् वही हमारे मन का शाश्वत महोत्सव है। शरीर का उत्सव नहीं है, विवाह का उत्सव नहीं है, जन्मदिन का उत्सव नहीं है, वह तो शाश्वत महोत्सव है हमारे मन का जो शोक सागर का भी शोषण करने में समर्थ है। जिसने अपने को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया है, उसके जीवन में कौन-सा शोक आ सकता है, कौन-सी आपत्तियां-विपत्तियां आ सकती हैं। और यदि आई भी हैं तो प्रभु चरणों में समर्पित कर देना है कि प्रभु यह सब तुम्हारी ही लीला है। तुम जानो तुम्हारा काम जाने। फिर हम हैं कहां बीच में। अगर हम बीच में आ जाते हैं तो सहना पड़ेगा, झेलना पड़ेगा।हमारा वस्तुतः हम बीच में आ ही जाते हैं, क्योंकि समर्पण नहीं है अपने प्रियतम प्रभु के प्रति हमारे जीवन में। समर्पण क्यों नहीं है? क्योंकि विश्वास नहीं हैं। जरा-सी संकट की घड़ी आई नहीं कि भागने लगे इधर से उधर। परीक्षा की घड़ी आती है तो विश्वास हमारा टूट जाता है। श्रद्धा समर्पण भरे हृदय से शुद्ध भाव से श्री राधा-कृष्ण के श्रीचरणों में हमारा समर्पण हो जाए तो जीवन सार्थक हो जाए।
जन्म-जन्मांतरों का सुकृत पुण्य जब उदय होता है, तभी हमारे जीवन में भगवान के मंगलमय लीला चरित्र के गुणगान का सौभाग्य मिलता है। हमारे जीवन का वही क्षण कृतार्थ है, जिसमें उत्तम श्लोक भगवान श्री राधा-कृष्ण के गुणों का गान होता है। जीवन की सार्थकता श्री राधा-कृष्ण लीला श्रवण में है। श्री राधा-कृष्ण नाम का संकीर्तन, कथा श्रवण, श्री राधा-कृष्ण के गुणों का गान दर्शन ही हमारे जीवन का परम महोत्सव है। परंतु दुर्भाग्य से यह महोत्सव हमारे जीवन में संपन्न नहीं होता। अन्य विविध प्रकार के उत्सव मनाने का हमें अनुभव है। बड़ा उल्लास होता है उत्सवों में। कितना प्रकाश, कितना शोर, कितनी मेहमानी मेजबानी होती है। परंतु इन सारे उत्सवों की रात गुजर जाने के बाद सुबह का सूरज हमारी जिंदगी में कुछ अंधेरी रेखाएं और खींच जाता है कभी ऐसा उत्सव हमारी जिंदगी में नहीं आया है जिसके पीछे हमें कोई आनंद, उल्लास मिला हो। दिखावे में प्रदर्शन में हम पार्टियां करते हैं, अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर देते हैं और जब मांगने वाले द्वार पर खड़े होते हैं तो हम चीखते-चिल्लाते तनाव से भर जाते हैं। एक के बाद एक हमारा उत्सव चलता है। परंतु उल्लास हमसे छिन जाता है। जो शांति जो चेतना, जो प्रकाश हमारे जीवन में मिला था हम अपने ही अज्ञान के कारण उससे वंचित हो जाते हैं। भगवान की कथा नाम संकीर्तन में ही वह शक्ति है कि शोक का समुद्र भी हो तो सूख जाता है। जीवन परम आनंद तथा शांति को उपलब्ध हो जाता है। समस्याएं और संकट तो जीवन में आते ही हैं। पुत्र है तो कभी बिछुड़ सकता है। तरुण रूठ सकता है विमुख हो सकता है, बूढ़ी आंखों के सामने। भाई-बहन का विछोह हो सकता है। संसार में शोक के कारण तो पैदा होंगे ही, क्योंकि उसके साथ हमारा प्रारब्ध जुड़ा हुआ है। जब तक शरीर है, शरीर से बने हुए संबंध हैं, कहीं संयोग होगा तो कहीं वियोग होगा। कहीं हर्ष होगा तो कहीं विषाद होगा। दोनों से हमें जो परे कर दे ऐसा जो नित्य नवनवायमान परम महोत्सव है- 'तदेव शाश्वन्मनसो महोत्सवम्' अर्थात् वही हमारे मन का शाश्वत महोत्सव है। शरीर का उत्सव नहीं है, विवाह का उत्सव नहीं है, जन्मदिन का उत्सव नहीं है, वह तो शाश्वत महोत्सव है हमारे मन का जो शोक सागर का भी शोषण करने में समर्थ है। जिसने अपने को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया है, उसके जीवन में कौन-सा शोक आ सकता है, कौन-सी आपत्तियां-विपत्तियां आ सकती हैं। और यदि आई भी हैं तो प्रभु चरणों में समर्पित कर देना है कि प्रभु यह सब तुम्हारी ही लीला है। तुम जानो तुम्हारा काम जाने। फिर हम हैं कहां बीच में। अगर हम बीच में आ जाते हैं तो सहना पड़ेगा, झेलना पड़ेगा।हमारा वस्तुतः हम बीच में आ ही जाते हैं, क्योंकि समर्पण नहीं है अपने प्रियतम प्रभु के प्रति हमारे जीवन में। समर्पण क्यों नहीं है? क्योंकि विश्वास नहीं हैं। जरा-सी संकट की घड़ी आई नहीं कि भागने लगे इधर से उधर। परीक्षा की घड़ी आती है तो विश्वास हमारा टूट जाता है। श्रद्धा समर्पण भरे हृदय से शुद्ध भाव से श्री राधा-कृष्ण के श्रीचरणों में हमारा समर्पण हो जाए तो जीवन सार्थक हो जाए।
भारत में बहती हैं देश-प्रेम की गंगा!
० इस धरती ने अनेक शूरवीरों को जन्मा
मां तुझे सलाम! अमर शायर इकबाल के उक्त कथन में पूर्ण सच्चाई है हमारा देश भारत सचमुच संसार का शिरोमणि देश है। यह केवल एशिया का ही दिव्य भाल नहीं है, विश्व का मुकुट है। भारत प्रकृति का पालक है। छः ऋतुएं यहां मुस्कराती हुई गुजर जाती हैं। सिंधु, गंगा, यमुना, कृष्णा, काबेरी, नर्मदा सरिताएं अपने अमृत जल से इस धरती को सींचती हैं। तभी तो यहां की उर्वरा भूमि अनाज उगलती है। भारत की स्वर्ण भूमि विदेशियों के लिए सदा ही आकर्षक का केंद्र रही है। सिकंदर बार, कोलंबस, वास्कोडिगामा आदि की यात्राएं इसी तथ्य को सिद्ध करती हैं। मानव की तो विसात ही क्या देवता और भगवान तक इस भूमि पर जन्म लेने के लिए ललचाते रहे हैं। राम, कृष्ण, गौतम, गुरु नानक जैसे अवतारी पुरुष भारत में ही जन्मे थे। मां ने अपनी कोख से अनेक शूरवीरों को जन्म दिया। धर्मवीर युधिष्ठिर, दानवीर कर्ण, युद्धवीर अर्जुन, दयावीर महावीर सब भारत भूमि की ही तो उपज थे।भारत ही वह देश है जिसमें ज्ञान और विज्ञान की रश्मियां सबसे पहले विकीर्ण हुई थीं। नालंदा और तक्षशिला के खड्डहर आज भी इसी बात के साक्षी हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा का लुप्त वैभव प्राचीन भारतीय संस्कृति का ही शंख फूंक रहा है। भारत अनेक धर्मों, सम्प्रदायों, मत मतान्तरों और जातियों का देश रहा है। अनेक धर्मों की त्रिवेणी यहीं हैं अनेक जातियों का संगम इस देश में हुआ है। हिंदू, मुस्लिम, जैन, ईसाई और पारसी सब सुखपूर्वक यहां निवास करते हैं। देश-प्रेम की पावन गंगा भारत में बहती है। हमारा देश विदेशियों के द्वारा पद्दलित हुआ दो सौ वर्ष तक हम अंग्रेजों के गुलाम रहे। इस अद्योगति से हमें देश के रत्न बाल गंगाधर तिलक, पंजाब केसर लाला लाजपतराय, शहीद भगत सिंह, त्यागमूर्ति चन्द्रशेखर आजाद, वीर सुभाष, नेहरू, लौह हृदय श्री लालबहादुर शास्त्री आदि देश भक्तों ने उबारा। इन लोगों ने परतंत्र भारत की बेड़ियां काटीं। 15 अगस्त 1947 के दिन देश स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने के बाद भारत के राष्ट्रीय गौरव को नेहरू जी ने दिन प्रतिदिन बढ़ाया। पुराने तीर्थों की जगह नए तीर्थों ने ले ली। आज भारत शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, प्रौद्योगिक विकास आदि सभी क्षेत्रों में प्रगति पथ पर है। भारत की इस अद्भुत संस्कृति, गौरवमय गाथा, उज्ज्वल भविष्य, प्रकृति शिरोमणि को देखते हुए प्रत्येक भारतीय के दिल से केवल एक ही आवाज निकलती है- 'मां तुझे सलाम।
मां तुझे सलाम! अमर शायर इकबाल के उक्त कथन में पूर्ण सच्चाई है हमारा देश भारत सचमुच संसार का शिरोमणि देश है। यह केवल एशिया का ही दिव्य भाल नहीं है, विश्व का मुकुट है। भारत प्रकृति का पालक है। छः ऋतुएं यहां मुस्कराती हुई गुजर जाती हैं। सिंधु, गंगा, यमुना, कृष्णा, काबेरी, नर्मदा सरिताएं अपने अमृत जल से इस धरती को सींचती हैं। तभी तो यहां की उर्वरा भूमि अनाज उगलती है। भारत की स्वर्ण भूमि विदेशियों के लिए सदा ही आकर्षक का केंद्र रही है। सिकंदर बार, कोलंबस, वास्कोडिगामा आदि की यात्राएं इसी तथ्य को सिद्ध करती हैं। मानव की तो विसात ही क्या देवता और भगवान तक इस भूमि पर जन्म लेने के लिए ललचाते रहे हैं। राम, कृष्ण, गौतम, गुरु नानक जैसे अवतारी पुरुष भारत में ही जन्मे थे। मां ने अपनी कोख से अनेक शूरवीरों को जन्म दिया। धर्मवीर युधिष्ठिर, दानवीर कर्ण, युद्धवीर अर्जुन, दयावीर महावीर सब भारत भूमि की ही तो उपज थे।भारत ही वह देश है जिसमें ज्ञान और विज्ञान की रश्मियां सबसे पहले विकीर्ण हुई थीं। नालंदा और तक्षशिला के खड्डहर आज भी इसी बात के साक्षी हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा का लुप्त वैभव प्राचीन भारतीय संस्कृति का ही शंख फूंक रहा है। भारत अनेक धर्मों, सम्प्रदायों, मत मतान्तरों और जातियों का देश रहा है। अनेक धर्मों की त्रिवेणी यहीं हैं अनेक जातियों का संगम इस देश में हुआ है। हिंदू, मुस्लिम, जैन, ईसाई और पारसी सब सुखपूर्वक यहां निवास करते हैं। देश-प्रेम की पावन गंगा भारत में बहती है। हमारा देश विदेशियों के द्वारा पद्दलित हुआ दो सौ वर्ष तक हम अंग्रेजों के गुलाम रहे। इस अद्योगति से हमें देश के रत्न बाल गंगाधर तिलक, पंजाब केसर लाला लाजपतराय, शहीद भगत सिंह, त्यागमूर्ति चन्द्रशेखर आजाद, वीर सुभाष, नेहरू, लौह हृदय श्री लालबहादुर शास्त्री आदि देश भक्तों ने उबारा। इन लोगों ने परतंत्र भारत की बेड़ियां काटीं। 15 अगस्त 1947 के दिन देश स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने के बाद भारत के राष्ट्रीय गौरव को नेहरू जी ने दिन प्रतिदिन बढ़ाया। पुराने तीर्थों की जगह नए तीर्थों ने ले ली। आज भारत शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, प्रौद्योगिक विकास आदि सभी क्षेत्रों में प्रगति पथ पर है। भारत की इस अद्भुत संस्कृति, गौरवमय गाथा, उज्ज्वल भविष्य, प्रकृति शिरोमणि को देखते हुए प्रत्येक भारतीय के दिल से केवल एक ही आवाज निकलती है- 'मां तुझे सलाम।
ब्रजभूमि : जहां कृष्ण ने की अनेक लीलाएं...
(अरुण कुमार बंछोर)
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भगवान् श्रीकृष्ण धन्य हैं, उनकी लीलाएं धन्य हैं और इसी प्रकार वह भूमि भी धन्य है, जहां वह त्रिभुवनपति मानस रूप में अवतरित हुए और ब्रजभूमि जहां उन्होंने वे परम पुनीत अनुपम अलौकिक लीलाएं कीं।हिंदुस्थान में अनेक तीर्थ स्थान हैं, सबका महात्म्य है, भगवान् के और-और भी जन्मस्थान हैं पर यहां की बात ही कुछ निराली है। यहां के नगर-ग्राम, मठ-मंदिर, वन-उपवन, लता-कुंज आदि की अनुपम शोभा भिन्न-भिन्न ऋतुओं में भिन्न-भिन्न प्रकार से देखने को मिलती है।अपनी जन्मभूमि से सभी को प्रेम होता है फिर वह चाहे खुला खंडहर हो और चाह सुरम्य स्थान, वह जन्मस्थान है, यह विचार ही उसके प्रति होने के लिए पर्याप्त है।इसी से सब प्रकार से सुंदर द्वारका में वास करते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण जब ब्रज का स्मरण करते थे, तब उनकी कुछ विचित्र ही दशा हो जाती थी।
जब ब्रज भूमि के वियोग से स्वयं ब्रज के अधीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण का ही यह हाल हो जाता है, तब फिर उस पुण्यभूमि की रही-सही नैसर्गिक छटा के दर्शन के लिए, उस छटा के लिए जिसकी एक झांकी उस पुनीत युग का, उस जगद् गुरु का, उसकी लौकिक रूप में की गई अलौकिक लीलाओं का अद्भुत प्रकार से स्मरण कराती, अनुभव का आनंद देती और मलिन मन-मंदिर को सर्वथा स्वच्छ करने में सहायता प्रदान करती है, भावुक भक्त तरसा करते हैं। इसमें आश्चर्य ही क्या है? नैसर्गिक शोभा न भी होती, प्राचीन लीलाचिह्न भी न मिलते होते तो भी केवल साक्षात् परब्रह्म का यहां विग्रह होने के नाते ही यह स्थान आज हमारे लिए तीर्थ था, यह भूमि हमारे लिए तीर्थ थी, जहां की पावन रज को ब्रह्मज्ञ उद्धव ने अपने मस्तक पर धारण किया था। वह ब्रजवासी भी दर्शनीय थे, जिनके पूर्वजों के भाग्य की साराहना करते-करते भक्त सूरदास के शब्दों में बड़े-बड़े देवता आकर उनकी जूठन खाते थे, क्योंकि उनके बीच में भगवान अवतरित हुए थे। व्रज-वासी-पटतर कोउ नाहिं। ब्रह्म सनक सिव ध्यान न पावत, इनकी जूठनि लै लै खाहिं॥ हलधर कह्यौ, छाक जेंवत संग, मीठो लगत सराहत जाहिं। 'सूरदास' प्रभु जो विश्वम्भर, सो ग्वालनके कौर अघाहिं॥ तब फिर यहां तो अनन्त दर्शनीय स्थान हैं, अनन्त सुंदर मठ-मंदिर, वन-उपवन, सर-सरोवर हैं, जो अपनी शोभा के लिए दर्शनीय हैं और पावनता के लिए भी दर्शनीय हैं। सबके साथ अपना-अपना इतिहास है। यद्यपि मुसलमानों के आक्रमण पर आक्रमण होने से ब्रज की सम्पदा नष्टप्राय हो गई है। कई प्रसिद्ध स्थानों का चिह्न तक मिट गया है, मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी हैं, तथापि धर्मप्राण जनों की चेष्टा से कुछ स्थानों की रक्षा तथा जीर्णोद्धार होने से वहां की जो आज शोभा है, वह भी दर्शनीय ही है।
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भगवान् श्रीकृष्ण धन्य हैं, उनकी लीलाएं धन्य हैं और इसी प्रकार वह भूमि भी धन्य है, जहां वह त्रिभुवनपति मानस रूप में अवतरित हुए और ब्रजभूमि जहां उन्होंने वे परम पुनीत अनुपम अलौकिक लीलाएं कीं।हिंदुस्थान में अनेक तीर्थ स्थान हैं, सबका महात्म्य है, भगवान् के और-और भी जन्मस्थान हैं पर यहां की बात ही कुछ निराली है। यहां के नगर-ग्राम, मठ-मंदिर, वन-उपवन, लता-कुंज आदि की अनुपम शोभा भिन्न-भिन्न ऋतुओं में भिन्न-भिन्न प्रकार से देखने को मिलती है।अपनी जन्मभूमि से सभी को प्रेम होता है फिर वह चाहे खुला खंडहर हो और चाह सुरम्य स्थान, वह जन्मस्थान है, यह विचार ही उसके प्रति होने के लिए पर्याप्त है।इसी से सब प्रकार से सुंदर द्वारका में वास करते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण जब ब्रज का स्मरण करते थे, तब उनकी कुछ विचित्र ही दशा हो जाती थी।
जब ब्रज भूमि के वियोग से स्वयं ब्रज के अधीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण का ही यह हाल हो जाता है, तब फिर उस पुण्यभूमि की रही-सही नैसर्गिक छटा के दर्शन के लिए, उस छटा के लिए जिसकी एक झांकी उस पुनीत युग का, उस जगद् गुरु का, उसकी लौकिक रूप में की गई अलौकिक लीलाओं का अद्भुत प्रकार से स्मरण कराती, अनुभव का आनंद देती और मलिन मन-मंदिर को सर्वथा स्वच्छ करने में सहायता प्रदान करती है, भावुक भक्त तरसा करते हैं। इसमें आश्चर्य ही क्या है? नैसर्गिक शोभा न भी होती, प्राचीन लीलाचिह्न भी न मिलते होते तो भी केवल साक्षात् परब्रह्म का यहां विग्रह होने के नाते ही यह स्थान आज हमारे लिए तीर्थ था, यह भूमि हमारे लिए तीर्थ थी, जहां की पावन रज को ब्रह्मज्ञ उद्धव ने अपने मस्तक पर धारण किया था। वह ब्रजवासी भी दर्शनीय थे, जिनके पूर्वजों के भाग्य की साराहना करते-करते भक्त सूरदास के शब्दों में बड़े-बड़े देवता आकर उनकी जूठन खाते थे, क्योंकि उनके बीच में भगवान अवतरित हुए थे। व्रज-वासी-पटतर कोउ नाहिं। ब्रह्म सनक सिव ध्यान न पावत, इनकी जूठनि लै लै खाहिं॥ हलधर कह्यौ, छाक जेंवत संग, मीठो लगत सराहत जाहिं। 'सूरदास' प्रभु जो विश्वम्भर, सो ग्वालनके कौर अघाहिं॥ तब फिर यहां तो अनन्त दर्शनीय स्थान हैं, अनन्त सुंदर मठ-मंदिर, वन-उपवन, सर-सरोवर हैं, जो अपनी शोभा के लिए दर्शनीय हैं और पावनता के लिए भी दर्शनीय हैं। सबके साथ अपना-अपना इतिहास है। यद्यपि मुसलमानों के आक्रमण पर आक्रमण होने से ब्रज की सम्पदा नष्टप्राय हो गई है। कई प्रसिद्ध स्थानों का चिह्न तक मिट गया है, मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी हैं, तथापि धर्मप्राण जनों की चेष्टा से कुछ स्थानों की रक्षा तथा जीर्णोद्धार होने से वहां की जो आज शोभा है, वह भी दर्शनीय ही है।
विचित्र किन्तु सत्य
यहां पक्षी करते हैं सामूहिक आत्महत्या...
असम में जतिंगा नामक एक ऐसा गांव है, जहां की कछार नामक घाटी की तलहटी में कूदकर हजारों पक्षी एक साथ एक खास मौसम में आत्महत्या कर लेते हैं। इसका क्या रहस्य है? वैज्ञानिक इस पर अभी तक कोई खुलासा नहीं कर पाए हैं। यह गांव पक्षियों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं के कारण दुनियाभर में सुर्खियों में बना हुआ है।
जापान के माउंट फूजी तलहटी में आवकिगोहारा का घने जंगल में जिस तरह से लोग आत्महत्या करने आते हैं ठीक उसी तरह जतिंगा में पक्षी आत्महत्या करने जाते हैं। आदमी आत्महत्या अकेले ही करता है और उसके आत्महत्या करने के कारण समझ में आते हैं। लेकिन यहां मामला जरा अलग है, कोई अकेला पक्षी आत्महत्या नहीं करता बल्कि सामूहिक रूप से सभी आत्महत्या कर लेते हैं। आखिर ऐसी कौन-सी शक्ति उनको इसके लिए प्रेरित करती है या ऐसा कौन-सा दुख है, जो सभी को एकसाथ आत्महत्या करने पर मजबूर कर देता है।हालांकि वैज्ञानिक कुछ ठोस बात कह पाने की स्थिति में नहीं हैं। फिर भी कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसा जतिंगा घाटी की विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण होता है, तो कुछ राज्य में होने वाली वर्षा को इससे जोड़कर देखते हैं।वैज्ञानिकों का कहना है कि मरने वाले पक्षियों में अधिकतर पानी के आसपास रहने वाली जातियां हैं। इससे इस बात को बल मिलता है कि इसका संबंध राज्य में होने वाली वर्षा और बाढ़ से है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि शोध से यह पता चला है कि जिस साल पक्षियों ने ज्यादा जान दी उस साल राज्य में अधिक मेघ बरसे और बाढ़ का प्रकोप भी अधिक रहा। उदाहरण के लिए वर्ष 1988 में सबसे अधिक पक्षी मरे थे और उस साल राज्य में वर्षा और बाढ़ का प्रकोप अधिक था।ये घटनाएं सितंबर से नवंबर के बीच अंधेरी रात में घटती हैं, जब नम और कोहरे-भरे मौसम में हवाएं दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बहने लगती हैं। रात के अंधेरे में पक्षी रोशनी के आस-पास उड़ने लगते हैं। इस समय वे मदहोशी जैसी अवस्था में होते हैं जिसके कारण ये आसपास की चीजों से टकराकर मर जाते हैं। इस मौके का यहां के लोग भी खूब फायदा उठाते हैं। ऐसा देखा गया है कि पक्षी शाम 7 से रात 10 बजे के बीच ऐसा व्यवहार ज्यादा करते हैं। अगर इस दौरान हल्की बारिश हो रही हो तो ये पक्षी और ज्यादा उत्तेजित हो जाते हैं। भारत सरकार : भारत सरकार ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सेन गुप्ता को नियुक्त किया था। डॉ. गुप्ता ने यहां लंबे समय तक अध्ययन करने के बाद कहा कि पक्षियों के इस असामान्य व्यवहार के पीछे मौसम और चुम्बकीय शक्तियों का हाथ है।उन्होंने बताया कि वर्षा के मौसम में जब कोहरा छाया हो और हवा चल रही हो, तब शाम के समय जतिंगा घाटी की चुम्बकीय स्थिति में तेजी से बदलाव आ जाता है। इस परिवर्तन के कारण ही पक्षी असामान्य व्यवहार करते हैं और वे रोशनी की ओर आकर्षित होते हैं। अपने शोध के बाद उन्होंने यह सलाह दी कि ऐसे समय में रोशनी जलाने से बचा जाए।उनके इस सलाह पर अमल करने से यहां होने वाली पक्षियों की मौत में 40 फीसदी की कमी आई है।जतिंगा में 44 जातियों की स्थानीय चिड़ियाएं आत्महत्या करती हैं। इनमें टाइगर बिट्टर्न, ब्लैक बिट्टर्न, लिटिल इहरेट, पॉन्ड हेरॉन, इंडियन पिट्टा और किंगफिशर जाति की चिड़ियाएं अधिक शामिल होती हैं।
वैज्ञानिक कहते हैं कि शोध से यह पता चला है कि जिस साल पक्षियों ने ज्यादा जान दी उस साल राज्य में अधिक मेघ बरसे और बाढ़ का प्रकोप भी अधिक रहा। उदाहरण के लिए वर्ष 1988 में सबसे अधिक पक्षी मरे थे और उस साल राज्य में वर्षा और बाढ़ का प्रकोप अधिक था।ये घटनाएं सितंबर से नवंबर के बीच अंधेरी रात में घटती हैं, जब नम और कोहरे-भरे मौसम में हवाएं दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बहने लगती हैं। रात के अंधेरे में पक्षी रोशनी के आस-पास उड़ने लगते हैं। इस समय वे मदहोशी जैसी अवस्था में होते हैं जिसके कारण ये आसपास की चीजों से टकराकर मर जाते हैं। इस मौके का यहां के लोग भी खूब फायदा उठाते हैं। ऐसा देखा गया है कि पक्षी शाम 7 से रात 10 बजे के बीच ऐसा व्यवहार ज्यादा करते हैं। अगर इस दौरान हल्की बारिश हो रही हो तो ये पक्षी और ज्यादा उत्तेजित हो जाते हैं। भारत सरकार : भारत सरकार ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सेन गुप्ता को नियुक्त किया था। डॉ. गुप्ता ने यहां लंबे समय तक अध्ययन करने के बाद कहा कि पक्षियों के इस असामान्य व्यवहार के पीछे मौसम और चुम्बकीय शक्तियों का हाथ है।उन्होंने बताया कि वर्षा के मौसम में जब कोहरा छाया हो और हवा चल रही हो, तब शाम के समय जतिंगा घाटी की चुम्बकीय स्थिति में तेजी से बदलाव आ जाता है। इस परिवर्तन के कारण ही पक्षी असामान्य व्यवहार करते हैं और वे रोशनी की ओर आकर्षित होते हैं। अपने शोध के बाद उन्होंने यह सलाह दी कि ऐसे समय में रोशनी जलाने से बचा जाए।उनके इस सलाह पर अमल करने से यहां होने वाली पक्षियों की मौत में 40 फीसदी की कमी आई है।जतिंगा में 44 जातियों की स्थानीय चिड़ियाएं आत्महत्या करती हैं। इनमें टाइगर बिट्टर्न, ब्लैक बिट्टर्न, लिटिल इहरेट, पॉन्ड हेरॉन, इंडियन पिट्टा और किंगफिशर जाति की चिड़ियाएं अधिक शामिल होती हैं।
शनिवार, 9 अगस्त 2014
गजराज व मूषकराज
प्राचीनकाल में एक नदी के किनारे बसा नगर व्यापार का केन्द्र था। फिर आए उस नगर के बुरे दिन, जब एक वर्ष भारी वर्षा हुई। नदी ने अपना रास्ता बदल दिया।लोगों के लिए पीने का पानी न रहा और देखते ही देखते नगर वीरान हो गया अब वह जगह केवल चूहों के लायक रह गई। चारों ओर चूहे ही चूहे नजर आने लगे। चूहों का पूरा साम्राज्य ही स्थापित हो गया। चूहों के उस साम्राज्य का राजा बना मूषकराज चूहा। चूहों का भाग्य देखो, उनके बसने के बाद नगर के बाहर जमीन से एक पानी का स्त्रोत फूट पड़ा और वह एक बड़ा जलाशय बन गया।
नगर से कुछ ही दूर एक घना जंगल था। जंगल में अनगिनत हाथी रहते थे। उनका राजा गजराज नामक एक विशाल हाथी था। उस जंगल क्षेत्र में भयानक सूखा पड़ा। जीव-जन्तु पानी की तलाश में इधर-उधर मारे-मारे फिरने लगे। भारी-भरकम शरीर वाले हाथियों की तो दुर्दशा हो गई।
हाथियों के बच्चे प्यास से व्याकुल होकर चिल्लाने व दम तोड़ने लगे। गजराज खुद सूखे की समस्या से चिंतित था और हाथियों का कष्ट जानता था। एक दिन गजराज की मित्र चील ने आकर खबर दी कि खंडहर बने नगर के दूसरी ओर एक जलाशय है। गजराज ने सबको तुरंत उस जलाशय की ओर चलने का आदेश दिया। सैकड़ों हाथी प्यास बुझाने डोलते हुए चल पड़े। जलाशय तक पहुंचने के लिए उन्हें खंडहर बने नगर के बीच से गुजरना पड़ा। हाथियों के हजारों पैर चूहों को रौंदते हुए निकल गए। हजारों चूहे मारे गए। खंडहर नगर की सड़कें चूहों के खून-मांस के कीचड़ से लथपथ हो गईं। मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। हाथियों का दल फिर उसी रास्ते से लौटा। हाथी रोज उसी मार्ग से पानी पीने जाने लगे। काफी सोचने-विचारने के बाद मूषकराज के मंत्रियों ने कहा, 'महाराज, आपको ही जाकर गजराज से बात करनी चाहिए। वह दयालु हाथी है।' मूषकराज हाथियों के वन में गया। एक बडे पेड़ के नीचे गजराज खड़ा था। मूषकराज उसके सामने के बड़े पत्थर के ऊपर चढ़ा और गजराज को नमस्कार करके बोला, 'गजराज को मूषकराज का नमस्कार। हे महान हाथी, मैं एक निवेदन करना चाहता हूं।' आवाज गजराज के कानों तक नहीं पहुंच रही थी। दयालु गजराज उसकी बात सुनने के लिए नीचे बैठ गया और अपना एक कान पत्थर पर चढ़े मूषकराज के निकट ले जाकर बोला, 'नन्हे मियां, आप कुछ कह रहे थे। कृपया फिर से कहिए।' मूषकराज बोला, 'हे गजराज, मुझे चूहा कहते हैं। हम बड़ी संख्या में खंडहर बनी नगरी में रहते हैं। मैं उनका मूषकराज हूं। आपके हाथी रोज जलाशय तक जाने के लिए नगर के बीच से गुजरते हैं। हर बार उनके पैरों तले कुचले जाकर हजारों चूहे मरते हैं। यह मूषक संहार बंद न हुआ तो हम नष्ट हो जाएंगे।' गजराज ने दुखभरे स्वर में कहा, 'मूषकराज, आपकी बात सुन मुझे बहुत शोक हुआ। हमें ज्ञान ही नहीं था कि हम इतना अनर्थ कर रहे हैं। हम नया रास्ता ढूंढ लेंगे।' मूषकराज कृतज्ञता भरे स्वर में बोला, 'गजराज, आपने मुझ जैसे छोटे जीव की बात ध्यान से सुनी। आपका धन्यवाद। गजराज, कभी हमारी जरूरत पड़े तो याद जरूर कीजिएगा।' गजराज ने सोचा कि यह नन्हा जीव हमारे किसी काम क्या आएगा। सो, उसने केवल मुस्कराकर मूषकराज को विदा किया। कुछ दिन बाद पड़ोसी देश के राजा ने सेना को मजबूत बनाने के लिए उसमें हाथी शामिल करने का निर्णय लिया। राजा के लोग हाथी पकड़ने आए। जंगल में आकर वे चुपचाप कई प्रकार के जाल बिछाकर चले जाते थे। सैकड़ों हाथी पकड़ लिए गए। एक रात हाथियों के पकड़े जाने से चिंतित गजराज जंगल में घूम रहे थे कि उनका पैर सूखी पत्तियों के नीचे छल से दबाकर रखे रस्सी के फंदे में फंस जाता है। जैसे ही गजराज ने पैर आगे बढ़ाया रस्सा कस गया। रस्से का दूसरा सिरा एक पेड़ के मोटे तने से मजबूती से बंधा था। गजराज चिंघाड़ने लगा। उसने अपने सेवकों को पुकारा, लेकिन कोई नहीं आया। कौन फंदे में फंसे हाथी के निकट आएगा? एक युवा जंगली भैंसा गजराज का बहुत आदर करता था। जब वह भैंसा छोटा था तो एक बार वह एक गड्ढे में जा गिरा था। उसकी चिल्लाहट सुनकर गजराज ने उसकी जान बचाई थी। चिंघाड़ सुनकर वह दौडा और फंदे में फंसे गजराज के पास पहुंचा। गजराज की हालत देख उसे बहुत धक्का लगा। वह चीखा, 'यह कैसा अन्याय है? गजराज, बताइए क्या करूं? मैं आपको छुड़ाने के लिए अपनी जान भी दे सकता हूं।' गजराज बोले, 'बेटा, तुम बस दौड़कर खंडहर नगरी जाओ और चूहों के राजा मूषकराज को सारा हाल बताना। उससे कहना कि मेरी सारी आस टूट चुकी है। भैंसा अपनी पूरी शक्ति से दौड़ा-दौड़ा मूषकराज के पास गया और सारी बात बताई। मूषकराज तुरंत अपने बीस-तीस सैनिकों के साथ भैंसे की पीठ पर बैठा और वो शीघ्र ही गजराज के पास पहुंचे। चूहे भैंसे की पीठ पर से कूदकर फंदे की रस्सी कुतरने लगे। कुछ ही देर में फंदे की रस्सी कट गई व गजराज आजाद हो गए। सीखः आपसी प्रेम और सद्भाव हमेशा एक-दूसरे के कष्टों को हर लेते हैं।
हाथियों के बच्चे प्यास से व्याकुल होकर चिल्लाने व दम तोड़ने लगे। गजराज खुद सूखे की समस्या से चिंतित था और हाथियों का कष्ट जानता था। एक दिन गजराज की मित्र चील ने आकर खबर दी कि खंडहर बने नगर के दूसरी ओर एक जलाशय है। गजराज ने सबको तुरंत उस जलाशय की ओर चलने का आदेश दिया। सैकड़ों हाथी प्यास बुझाने डोलते हुए चल पड़े। जलाशय तक पहुंचने के लिए उन्हें खंडहर बने नगर के बीच से गुजरना पड़ा। हाथियों के हजारों पैर चूहों को रौंदते हुए निकल गए। हजारों चूहे मारे गए। खंडहर नगर की सड़कें चूहों के खून-मांस के कीचड़ से लथपथ हो गईं। मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। हाथियों का दल फिर उसी रास्ते से लौटा। हाथी रोज उसी मार्ग से पानी पीने जाने लगे। काफी सोचने-विचारने के बाद मूषकराज के मंत्रियों ने कहा, 'महाराज, आपको ही जाकर गजराज से बात करनी चाहिए। वह दयालु हाथी है।' मूषकराज हाथियों के वन में गया। एक बडे पेड़ के नीचे गजराज खड़ा था। मूषकराज उसके सामने के बड़े पत्थर के ऊपर चढ़ा और गजराज को नमस्कार करके बोला, 'गजराज को मूषकराज का नमस्कार। हे महान हाथी, मैं एक निवेदन करना चाहता हूं।' आवाज गजराज के कानों तक नहीं पहुंच रही थी। दयालु गजराज उसकी बात सुनने के लिए नीचे बैठ गया और अपना एक कान पत्थर पर चढ़े मूषकराज के निकट ले जाकर बोला, 'नन्हे मियां, आप कुछ कह रहे थे। कृपया फिर से कहिए।' मूषकराज बोला, 'हे गजराज, मुझे चूहा कहते हैं। हम बड़ी संख्या में खंडहर बनी नगरी में रहते हैं। मैं उनका मूषकराज हूं। आपके हाथी रोज जलाशय तक जाने के लिए नगर के बीच से गुजरते हैं। हर बार उनके पैरों तले कुचले जाकर हजारों चूहे मरते हैं। यह मूषक संहार बंद न हुआ तो हम नष्ट हो जाएंगे।' गजराज ने दुखभरे स्वर में कहा, 'मूषकराज, आपकी बात सुन मुझे बहुत शोक हुआ। हमें ज्ञान ही नहीं था कि हम इतना अनर्थ कर रहे हैं। हम नया रास्ता ढूंढ लेंगे।' मूषकराज कृतज्ञता भरे स्वर में बोला, 'गजराज, आपने मुझ जैसे छोटे जीव की बात ध्यान से सुनी। आपका धन्यवाद। गजराज, कभी हमारी जरूरत पड़े तो याद जरूर कीजिएगा।' गजराज ने सोचा कि यह नन्हा जीव हमारे किसी काम क्या आएगा। सो, उसने केवल मुस्कराकर मूषकराज को विदा किया। कुछ दिन बाद पड़ोसी देश के राजा ने सेना को मजबूत बनाने के लिए उसमें हाथी शामिल करने का निर्णय लिया। राजा के लोग हाथी पकड़ने आए। जंगल में आकर वे चुपचाप कई प्रकार के जाल बिछाकर चले जाते थे। सैकड़ों हाथी पकड़ लिए गए। एक रात हाथियों के पकड़े जाने से चिंतित गजराज जंगल में घूम रहे थे कि उनका पैर सूखी पत्तियों के नीचे छल से दबाकर रखे रस्सी के फंदे में फंस जाता है। जैसे ही गजराज ने पैर आगे बढ़ाया रस्सा कस गया। रस्से का दूसरा सिरा एक पेड़ के मोटे तने से मजबूती से बंधा था। गजराज चिंघाड़ने लगा। उसने अपने सेवकों को पुकारा, लेकिन कोई नहीं आया। कौन फंदे में फंसे हाथी के निकट आएगा? एक युवा जंगली भैंसा गजराज का बहुत आदर करता था। जब वह भैंसा छोटा था तो एक बार वह एक गड्ढे में जा गिरा था। उसकी चिल्लाहट सुनकर गजराज ने उसकी जान बचाई थी। चिंघाड़ सुनकर वह दौडा और फंदे में फंसे गजराज के पास पहुंचा। गजराज की हालत देख उसे बहुत धक्का लगा। वह चीखा, 'यह कैसा अन्याय है? गजराज, बताइए क्या करूं? मैं आपको छुड़ाने के लिए अपनी जान भी दे सकता हूं।' गजराज बोले, 'बेटा, तुम बस दौड़कर खंडहर नगरी जाओ और चूहों के राजा मूषकराज को सारा हाल बताना। उससे कहना कि मेरी सारी आस टूट चुकी है। भैंसा अपनी पूरी शक्ति से दौड़ा-दौड़ा मूषकराज के पास गया और सारी बात बताई। मूषकराज तुरंत अपने बीस-तीस सैनिकों के साथ भैंसे की पीठ पर बैठा और वो शीघ्र ही गजराज के पास पहुंचे। चूहे भैंसे की पीठ पर से कूदकर फंदे की रस्सी कुतरने लगे। कुछ ही देर में फंदे की रस्सी कट गई व गजराज आजाद हो गए। सीखः आपसी प्रेम और सद्भाव हमेशा एक-दूसरे के कष्टों को हर लेते हैं।
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