मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

समाजसेवा ही उनके जीवन का ध्येय है और लक्ष्य भी


- अरुण कुमार बंछोर (रायपुर)
smita pande.jpgछात्र जीवन से ही राजनीति में उतरी राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय परिषद की अध्यक्ष स्मिता पांडे का कहना है कि समाजसेवा करना ही उनके जीवन का ध्येय है और लक्ष्य भी। उन्होंने वार्ड क्रमांक 50 से भाजपा टिकट के लिए अपना दावा किया है। वे कहती है कि अगर वे पार्षद बनी तो वार्ड के विकास में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी। महिला उत्थान और जागरूकता के लिए काम कर रही स्मिता किआज भी महिलायें प्रताड़ित होने न्याय के लिए आगे नहीं आती है। उनसे सभी पहलुओं पर बेबाक से बात की। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के संपादित अंश 

प्र० आपने राजनीति को ही अपना कॅरियर क्यों चुना?
उ० बचपन से ही मुझे राजनीति से लगाव रहा है। छात्रजीवन से ही मैंने राजनीति शुरू कर दी थी। छात्र नेता के रूप में मैंने विद्यार्थियों के लिए कई लड़ाई लड़ी थी। सबको न्याय मिले यही मेरा मकसद होता था।
प्र० एकाध कोई संघर्षजो छात्रों के लिए की हो?
उ० कई है पर श्वेता हत्याकांड के खिलाफ जो हमने संषर्ष छेड़ा थाउसे आज भी याद किया जाता है। छोटी सी छात्रा के साथ अमानवीय हरकत के बाद जब उनकी ह्त्या कर दी गयी थी तब मैंने एकआंदोलन खड़ा किया था। जिससे सरकार भी परेशान हो गयी थी। 4000 लड़कियों को जुलूस के रूप में ले जाकर प्रशासन की नींद हराम कर दी थी।
प्र० समाजसेवा को ही अपना लक्ष्य क्यों तय किया?
उ० बचपन से ही मुझे समाजसेवा करने की ललक थी इसलिए इसे ही मैंने अपना लिया।
प्र० कोई तो आपके आदर्श होंगेजिन्हे देखकर आप आगे बढ़ रही है?
उ० मेरे दादा-दादी हैजिनसे मैंने समाजसेवा करना सीखा है। दादा दामोदर देशपांडे और दादी उषा देशपांडे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे चरखा से सूत कातते थे और कपड़ा भी बनाते थे। वो मेरे आदर्श हैं और प्रेरणाश्रोत भी।
प्र० आपने भाजपा से पार्षद के लिए टिकट माँगी हैआपका मुद्दा क्या होगा?
उ० साफ़-सफाईपेयजल और राशनिंग मेरा मुख्य मुद्दा होगा। पंकज विक्रम वार्ड जहां से मेरा वास्ता है वहां बुनियादी समस्याएं बहुत अधिक है। मई उन सबका निराकरण चाहती हूँ। पार्षद बनी तो अपने वार्ड का कायाकल्प कर दूंगी ये मेरा वादा है।
प्र० राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय के लिए आप क्या करती है?
उ० लोग अपनी समस्या लेकर आते है तो हम उन्हें न्याय दिलाने की पूरी कोशिश करते है। जेल,सरकारी दफ्तरया सार्वजनिक स्थानो में भी नज़र रखते है,  साथ अन्याय ना हो। 
प्र० महिलाये आज पहले की अपेक्षा ज्यादा प्रताड़ित हो रही हैक्या आपके पास ऐसा कोई प्रकरण आता है?
उ० आता तो है पर आज भी महिलाओं में जागरूकता की कमी है। महिलाये अपने परिवार के खिलाफ प्रताड़ना की शिकायत करती है तो केस वापस भी ले लेती हैऐसे में हम कुछ नहीं कर पाते। महिलायें जल्दी दबाव में आ जाती हैं। 
प्र० इसके लिए आगे आप क्या करना चाहेंगी?
उ० मैं महिला उत्थान के लिये काम करना चाहती हूँ। उनमे जागरूकता पैदा करना बहुत ही जरूरी है महिला यौन उत्पीड़न के खिलाफ मैं सतत संघर्ष करती रहूंगी। लोगो से मैं कहना चाहूंगी कि ऐसा कोई मामला दिखे तो परिषद को जरूर सूचित करे ताकि हम उन्हें न्याय दिला सकें। 
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 अरुण कुमार बंछोर
(वरिष्ठ पत्रकाररायपुर)

माँ ने जीवन चक्र के चाक पर मुझे शब्दों का कुम्हार बनाया - रश्मि प्रभा

ज के दौर में रश्मि प्रभा बहुत बड़ा नाम है। वे किसी परिचय के मोहताज नहीं है। rashmi prabha.jpgदेश के तमाम बड़े कवि उनके आदर्श और मार्गदर्शक है। उनकी माँ ही उनकी प्रेरणा है। वे कहती है कि कुम्हार जिस तरह निरंतर चाक पर मिटटी को आकार देता हैउस तरह मेरी माँ ने सोचने को धूलकण ही सहीदिया और लीक से हटकर एक पहचान दी। उनकी हर सम्भव कोशिश होती है कि व्यक्ति,स्थानसमयस्थिति को अलग अलग ढंग से प्रस्तुत करें,लोगों को सोचने पर विवश करें। उनका कहना है कि पारिवारिक पृष्ठभूमि और इस नाम ने जीवन चक्र के चाक पर मुझे शब्दों का कुम्हार बनाया और निरंतर लिखने के लिए कई उतार-चढ़ाव दिए। यूँ सच पूछिये तो एक नाम से बढ़कर जीवन अनुभव होता है एक ही नाम तो कितनों के होते हैं नाम की सार्थकता सकारात्मक जीवन के मनोबल से होती है हवाओं का रूख जो बदले सार्थक परिणाम के लिए असली परिचय वही होता है। उनसे सभी पहलुओं पर बेबाक बात की। प्रस्तुत है बातचीत के अंश -

प्र. आपको इस क्षेत्र में रूचि कैसे हुई ?
उ. साहित्यिक माहौल तो बचपन से था - सौभाग्य कि प्रकृति के सौन्दर्य कवि सुमित्रानंदन पन्त ने मुझे 'रश्मिनाम दिया - पारिवारिक पृष्ठभूमि और इस नाम ने जीवन चक्र के चाक पर मुझे शब्दों का कुम्हार बनाया और निरंतर लिखने के लिए कई उतार-चढ़ाव दिए।
जि़न्दगी की धरती बंजर हो या उपजाऊ सामयिक शब्द बीज पनपते रहते हैंमिटटी से अद्भुत रिश्ता था तो रूचि बढ़ती गई।

प्र. आपके प्रेरणाश्रोत और आदर्श कौन है?
उ. कोई एक नाम लिख दूँ तो नाइंसाफी होगीक्योंकि हिंदी साहित्य के कई कवि लेखक ऐसे हैं - जिन्होंने मेरे परिवार से परे मेरे भीतर एक दिव्य ज्योति की प्राणप्रतिष्ठा की - सुमित्रानंदन पन्त,हरिवंश राय बच्चनरामधारी सिंह दिनकरजयशंकर प्रसादमैत्रेयी देवीशिवानीशिवाजी सामंत,आशापूर्णा देवीप्रेमचंदशरतचंद्र ..... आदर्शों की कमी नहीं - जिसमें मेरी माँ स्व. सरस्वती प्रसाद हैं।
कुम्हार जिस तरह निरंतर चाक पर मिट्टी को आकार देता हैउस तरह मेरी माँ ने सोचने को धूलकण ही सहीदिया और लीक से हटकर एक पहचान दी।

प्र. आपकी उपलब्धि क्या-क्या है?
उ. पहली उपलब्धि काबुलीवाले की 'मिन्नीहोनाजिस नाम से मुझे सबने पुकारामेरी दूसरी उपलब्धि पंत की 'रश्मिहोनाइस नाम ने मुझे एक उद्देश्य दिया कि मैं इस नाम का हमेशा मान रखूँ ! इससे परे हमें जानना होगा कि हम उपलब्धि कहते किसे हैं ! 4, 5 काव्य-संग्रहकुछ पुरस्कार .... मेरे ख्याल से किताबेंपुरस्कार - इन सबसे ऊपर की उपलब्धि है भीड़ में एक पहचान। और यह उपलब्धि मुझे मिली हैख़ुशी होती है जब कोई मुझसे अपनी किताब की भूमिका लिखने को कहता है.उनकी ज़ुबान पर मेरा नाम मेरी उपलब्धि है।

प्र. आप परिवार के बीच साहित्य के लिए समय कैसे निकल पाते है?
उ. परिवार यानि मेरे बच्चेशब्द - मेरे बच्चेमकसदउद्देश्य इन्हें इनका मुकाम देना तो इनके लिए मेरे पास समय होता ही होता है।

प्र. क्या आपको अपने परिवार से सहयोग या प्रोत्साहन मिलता है?
उ. जैसा कि मैंने आरम्भ में ही कहा कि परिवार में बचपन सेएक साहित्यिक वातावरण थामिटटी की सोंधी खुशबू सा आदान-प्रदान हमारी बातचीत में थामेरे बच्चे भी इससे अछूते नहीं रहेउनकी मोबाइल पर मेरे गीत का होनाउसे सुनना मेरे लिए बहुत बड़ा प्रोत्साहन है।

प्र. गीतों से आपका क्या तात्पर्य है? आपके गीत कहीं ज्?
उ. मेरे गीतों को धुन में ढाला ऋषि कम्पोजर नेस्वर कुहू गुप्ता और श्रीराम इमानी ने दिए ज् अल्बम बनाने की ख्वाहिश थीपूरी नहीं हुई है पर नि:संदेहविश्वास हैवो सुबह कभी तो आएगी ...

प्र. भविष्य की क्या योजना है या कोई तमन्ना है?
उ. जीवन का कोई एक पहलु ही नहीं होताउसे देखने काहर व्यक्ति का अपना नजरिया होता हैज् मेरी हर सम्भव कोशिश होती है कि व्यक्तिस्थानसमयस्थिति को अलग अलग ढंग से प्रस्तुत करूँ,लोगों को सोचने पर विवश करूँ ज् वर्तमानभविष्य की यही ख्वाहिश है

प्र. सबसे सुखद क्षण कौन सा है?
उ. हर वह क्षण जिसमें मेरे बच्चों के चेहरे खिलखिलाते हैं और मुझे सुकून भरे शब्द दे जाते हैं

प्र. ऐसा कोई समय आया हो जब आपको बहुत निराशा मिली हो?
उ. निराशा जब भी होती हैव्यक्तिगत होती है - लेखन से जुडी हो या जि़न्दगी सेपर बहुत निराशा के पल में एक अदृश्य ताकत मुझमें शक्ति का संचार करती रहीइसलिए एक वक़्त के बाद मैंने उसे भुलाने की कोशिश की।

रश्मि प्रभा
संक्षिप्त परिचय
काव्य-संग्रह                             :  शब्दों का रिश्ता (2010)अनुत्तरित (2011)महाभिनिष्क्रमण से निर्वाण तक (2012)खुद की तलाश (2012), चैतन्य (2013)
संपादन                                      :  अनमोल संचयन (2010)अनुगूँज (2011)परिक्रमा (2011)एक साँस मेरी (2012)खामोशखामोशी और हम (2012)बालार्क (2013) , एक थी तरु (2014)वटवृक्ष (साहित्यिक त्रैमासिक एवं दैनिक वेब पत्रिका - 2011 से 2012)
ऑडियो-वीडियो संग्रह          :  कुछ उनके नाम (अमृता प्रीतम-इमरोज के नाम)
सम्मान                                     :  परिकल्पना ब्लॉगोत्सव द्वारा वर्ष 2010 की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री का सम्मान'द संडे इंडियन’ पत्रिका द्वारा तैयार हिंदी की 111 लेखिकाओं की सूची में शामिल नामपरिकल्पना ब्लॉगर दशक सम्मान -2003-2012, शमशेर जन्मशती काव्य-सम्मान – 2011, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कविता प्रतियोगिता 2013 भौगोलिक क्षेत्र 5भारत - प्रथम स्थान प्राप्तभोजपुरी फीचर फिल्म साई मोरे बाबा की कहानीकारगीतकार

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अरुण कुमार बंछोर

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

मौका मिला तो हिन्दी फिल्मे भी करूंगी : श्वेता

 छत्तीसगढ़ी फिल्मो को बढ़ावा नहीं मिला




रायपुर।  मन में लगन और दृढ़ इच्छा हो तो कोई भी काम असंभव नहीं होता। टीवी देख- देखकर मैंने भी फिल्मो में काम करने की सोची थी और आज सबके सामने हूँ। यह कहना है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मो में माँ और भाभी की भूमिका निभाने वाली श्वेता शर्मा  का। अपनी असल जिंदगी में भी भारी उतार चढ़ाव देखने वाली श्वेता कहती है कि सरकार का सहयोग मिले तो छत्तीसगढ़ी फिल्मो के भी दिन बाहर जाएंगे। छत्तीसगढ़ में भी अच्छी अच्छी जगहें हैं जहां फिल्मो की शूटिंग की जा सकती है। श्वेता से हमने हर पहलूओं पर बेबाक बात की है। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश।
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एक मुलाक़ात - अरुण कुमार बंछोर 
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0 आपने फिल्मो में आने की कैसे सोची?
00 टीवी प्रोग्राम देखकर। मुझे भी लगा की फिल्मो में काम करना चाहिए। जब तीवफी देखती थी तो मुझे लगता था कि ऐसा रोल तो मै भी कर सकती हूँ।
0 क्या आपने इसके लिए कोई ट्रेनिंग ली है ?
00 बिलकुल नहीं ली है। बचपन से ही डांस करती रही हूँ। जब 5 साल की थी तब से मना में इच्छा थी कि में भी अपनी कला का प्रदर्शन करूँ।
0  बिना प्रशिक्षण के यह कैसे संभव हो पाया ?
00 मन में लगन और दृढ़ इच्छा हो तो कोई भी काम असंभव नहीं होता। टीवी देख- देखकर मैंने भी फिल्मो में काम करने की सोची थी और आज सबके सामने हूँ।
0 आपने अभी तक कितने फिल्मे की है? और कैसा अनुभव रहा है?
00 मैंने अभी तक 9 छत्तीसगढ़ी फिल्मे की है और अभी एक भोजपुरी फिल्मे कर रही हूँ। और अच्छा मौका मिले तो और अच्छा काम करूंगी।
0 छत्तीसगढ़ी फिल्मो में आप माँ और भाभी का ही रोल करती हैं, क्या कभी मन में नहीं आया की और भी अच्छा रोल करूँ ?
00 मै अपनी भूमिका से संतुष्ट हूँ। सभी बड़े कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला है। और छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री में मैं खुश हूँ।
0 ऐसा कोई ख़ास भूमिका बताईये जिसमे आपको ज्यादा अच्छा लगा हो?
00 फिल्म गोहार रामराज में मै मंत्री जी की पत्नी की भूमिका में हूँ और फिल्म मोहनी में ठकुराइन बनी हूँ वो मुझे बहुत अच्छा लगा। मोहनी में तो मैंने खूब दबंगई की है और आखिऱी में अपने ही भाई को गोली मार देती हूँ।

0 छत्तीसगढ़ी फिल्मे ज्यादा क्यों नहीं ताकीजों में टिक पाती ?
00 कई कारण है कहानी अच्छी हो,फूहड़पन ना हो, तो फिल्मे चलेंगी। कई फिल्मे सुपर-डुपर रही हैं। फिर सरकार का सहयोग भी तो नही मिल पाता । यहां इतने अच्छे लोकेशन होने के बाद भी फिल्मो की शूटिंग नहीं होती। फिल्म टेटकूराम की शूटिंग बाहर हुई है।
0 क्या अपने बच्चों को भी फिल्मो में लाएंगी ?
00 नहीं ये बच्चे ही फैसला करेंगे ,की उन्हें आगे चलकर क्या करना है।

0 असल जिंदगी में आपने बहुत  है तो क्या ऐसी कोई फिल्म में भी काम की है?
00 हाँ फिल्म चुभन है जिसमे मैंने लीड रोल की है। उसमे एक महिला पर होने वाली अत्याछार का बखूबी से चित्रण किया गया है। मेरा काफी शोषण होता है और मै दो बार बिकती हूँ । वो एक अच्छे फिल्म बनी है, करना मुझे बहुत अच्छा लगा है। 

जल्द ही टीवी सीरियल में नजऱ आएगी छत्तीसगढ़ की सुमन चौधरी

अपने कामो से लोगो का दिल जीतना चाहती हूँ

रायपुर। छत्तीसगढ़ी फिल्मो की अभिनेत्री सुमन चौधरी जल्द ही टीवी सीरियलों में नजऱ आ सकती है। दो धारावाहिकों के लिए उन्हें प्रस्ताव मिला है। वे कहती है कि अपने कामों से वे लोगो के दिलों में जगह बनाना चाहती है। लोगो का प्यार ही उनकी पूंजी है। सुमन एल्बम से काम शुरू कर छत्तीसगढ़ी फिल्मो में आई थी और अब सीरियल की तरफ रुखा करना चाहती है। उनसे हमने हर पहलूओं पर बात की है। पेश है बातचीत के संपादित अंश।

संक्षिप्त परिचय
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नाम             - सुमन चौधरी
काम            - अभिनेत्री
कॅरियर          - एल्बम से फिल्म
उपलब्धी        - छत्तीसगढ़ी फिल्मे तीन
                - एल्बम 20 से अधिक
                - टेलीफिल्मे  5
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0 आपको एक्टिंग का शौक कब से है ?
00 बचपन से है, टीवी देखकर मेरे मन में एक्टिंग करने की इच्छा जाएगी और मै आज आप सबके सामने हूँ।
0 मौका कैसे मिला और आपके प्रेरणाश्रोत कौन है ?
00 कोरियोग्राफर मनोज दीप ने मुझे फिल्मो में मौका दिया, लेकिन मेरे आदर्श मेरे माता-पिता ही है। मनोज जी का ऑफर फिल्मो के लिए मिला तो मै मान गयी।
0 आप फिल्मो में अपनी भूमिका से संतुष्ट है?
00 मैं अपनी भूमिका में पूरी तरह डूबकर काम करती हूँ। भूमिका निभाते समय जीवंत अभिनय करती हूँ ,ताकि अपनी भूमिका के साथ न्याय कर सकूँ।
0 कोई ऐसा अवसर आया हो ,जब आप बहुत उत्साहित हुई हो?
00 हाँ फिल्मो में वापस आकर मै बहुत रोमांचित हुई हूँ। उससे मेरा हौसला और बढ़ा है।
0 ऐसा कोई क्षण जब निराशा मिली हो?
00  हाँ मैंने कुछ समय के लिए फिल्म लाईन से दूर हो गयी थी तब मुझे बहुत निराशा हुई थी।
0 अभी आपके पास क्या -क्या फिल्मे हैं?
00 अभी मेरे पास बहुत से ऑफर है लेकिन मैं सोच समझकर फिल्मे करना चाहती हूँ।
0 फिल्मो में जो भूमिका निभातीे है तो क्या उसे अपने वास्तविक जिंदगी में भी अपनाती है?
00 हाँ जरूर ! कोशिश करती हूँ पर अंतर है। फिल्मो में जो रोल मिलता है वही करना होता है। वास्तविक जिंदगी में अपने हिसाब से जीते हैं।
0 आपकी तमन्ना क्या है?
00 मेरी एक ही तमन्ना है कि मैं अपने कामों से लोगो का दिल जीतना चाहती हूँ और अपने तथा अपने माँ -बाप का नाम रोशन करना चाहती हूँ। 

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

मैंने कब कहा?

बिन्नी के फाइनल एग्जाम खत्म हो गए हैं। इन दिनों वह सुबह मम्मी के बिना जगाए ही जाग जाता है। फिर फटाफट ब्रश करता है और तैयार होकर अपने दादाजी के साथ पार्क चला जाता है। उसके फुर्तीलेपन से मम्मी खुश हैं।
इस साल बिन्नी क्लास 6 में जाएगा। वह नई क्लास में जाने की बात सोचकर काफी खुश है। उसका मन उत्साह से भरा हुआ है। वह दादाजी के साथ रास्ते में चला जा रहा है और सोच रहा है कि आने वाले दिनों में उसे मम्मी के साथ मिलकर कितने काम करने हैं। अपने कबर्ड और अलमारी साफ करनी हैं। पुरानी किताबों और कॉपियों को वहां से हटाना है। नई-नई किताबें, कॉपियां, बोतल, लंच बॉक्स, बैग और ड्रेस खरीदनी हैं। यह सब सोचकर उसका मन रोमांच से भर जाता है।  
वह मन-ही-मन प्लान करता है कि इस साल वो मम्मी से जिद करके सब कुछ अपने पसंदीदा ब्लू कलर का ही खरीदेगा। वह सोचता है, ‘कितना अच्छा लगेगा। बैग, पेंसिल बॉक्स, बोतल, लंच बॉक्स सबके सब नीले रंग के। जैसा नीला आसमान। कितना प्यारा लगता है! एकदम साफ-साफ, उसे देखकर मन को बहुत शांति मिलती है।’
बिन्नी इन्हीं ख्यालों में गुमसुम सा बिना कुछ बोले चला जा रहा था। तभी दादाजी ने कहा, ‘बिन्नी! आज तो हम बहुत जल्दी पार्क पहुंच गए।’
उसने जवाब दिया, ‘जी हां!’
इसके बाद पार्क में दादाजी अपने दोस्तों के साथ बातचीत करते हुए टहलने लगे। इधर बिन्नी अपने दोस्तों के साथ खेलने में मगन हो गया। उसे अपना प्यारा दोस्त आतिफ जो मिल गया था। बिन्नी ने आतिफ से कहा, ‘आतिफ, आज मेरे घर चलो।’
पहले तो आतिफ ने थोड़ा ना-नुकुर किया, फिर तैयार हो गया। दादाजी के साथ दोनों दोस्त घर पहुंचे। बिन्नी के घर पहुंचते ही आतिफ ने अपनी मम्मी को फोन करके बताया कि वह बिन्नी के घर आया हुआ है। दो घंटे खेलकर वापस घर लौट आएगा।
मिसेज वर्मा यानी बिन्नी की मम्मी दोनों दोस्तों को गरमागरम आलू का परांठा नाश्ते में देती हैं। दोनों खुश होकर खाते हैं। तभी बिन्नी की मम्मी ने आतिफ से पूछा, ‘आतिफ, तुम्हारा छोटा भाई कैसा है? लगता है, तुम्हें तो उसके साथ खेलने से फुर्सत ही नहीं मिलती है। तभी इतने दिनों बाद आए हो।’
आतिफ कहता है, ‘आंटी, मेरा तो कोई छोटा भाई है ही नहीं।’
मिसेज वर्मा आतिफ के जवाब को सुनकर चुप हो जाती हैं। वह बिन्नी की तरफ देखकर मुस्कराती हैं। कहती हैं, ‘अरे, मुझसे भूल हो गई। शायद, बिन्नी ने किसी और के बारे में बताया होगा।’
थोड़ी देर बाद आतिफ के पापा आते हैं और उसे लेकर चले जाते हैं और बिन्नी अपना मन पसंदीदा टीवी चैनल देखने में व्यस्त हो जाता है। पर उसकी मम्मी बिन्नी की फिजूल की बातें बनाने की हरकत से परेशान हो सोच में पड़ जाती हैं। उन्हें याद आता है कि अभी न्यू ईयर पर बिन्नी ने ट्यूशन वाली मैडम से कहा था कि वह केक लेकर आएगा। फिर पड़ोस की मिसेज शर्मा से उसने कहा कि इस बार समर वेकेशन में बिन्नी अपनी फैमिली के साथ काठमांडू जाएगा। वगैरह-वगैरह।
इसी ऊहापोह में वो बिन्नी के कमरे में जाती हैं और बोलती हैं, ‘बेटा, आज आतिफ ने मुझे गलत समझा होगा। अगर यह बात वह अपने मम्मी-पापा को बताएगा तो उसके पेरेंट्स शायद बुरा मान जाएं, हमसे नाराज हो जाएं। आतिफ तुमसे बात करना बंद कर दे। तुम्हारे साथ खेलना बंद कर दे, क्योंकि तुम मनगढंत और झूठी बातें किसी के बारे में बोल जाते हो।’
आज तो मम्मी और आतिफ की बातें सुनकर बिन्नी मन-ही-मन डर गया था। आज उसे अपनी गलत आदत समझ में आ गई थी। उसने तय किया कि आज के बाद वह इस तरह की बातें कभी किसी के बारे में नहीं कहेगा, जिससे कि किसी को शर्मिदा होना पड़े। वह धीरे से मम्मी के पास आकर कहता है, ‘सॉरी मम्मी। अब ऐसा नहीं करूंगा।’

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

फ्रीज में ना रखे गूंथा हुआ आटा

क्योकि वह आमंत्रित करता है भूतों को !!

गूंथे हुए आटे को उसी तरह पिण्ड के बराबर माना जाता है जो पिण्ड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किए जाते हैं। किसी भी घर में जब गूंथा हुआ आटा फ्रीज में रखने की परम्परा बन जाती है तब वे भूत-और पितर इस पिण्ड का भक्षण करने के लिए घर में आने शुरू हो जाते हैं जो पिण्ड पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे भूत और पितर फ्रीज में रखे इस पिण्ड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते रहते हैं। जिन परिवारों में भी इस प्रकार की परम्परा बनी हुई है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा पसर जाता है। इस बासी और भूत भोजन का सेवन करने वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना
पडता है। आप अपने इष्ट मित्रों, परिजनों व पडोसियों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें उनकी जीवनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे किसी न किसी उलझन से घिरे रहते हैं।
आटा गूंथने में लगने वाले सिर्फ दो-चार मिनट बचाने के लिए की जाने वाली यह क्रिया किसी भी दृष्टि से सही नहीं मानी जा सकती। पुराने जमाने से बुजुर्ग यही राय देते रहे हैं कि गूंथा हुआ आटा रात को नहीं रहना चाहिए। उस जमाने में फ्रीज का कोई अस्तित्व नहीं था फिर भी बुजुर्गों को इसके पीछे रहस्यों की
पूरी जानकारी थी। यों भी बासी भोजन का सेवन शरीर के लिए हानिकारक है ही। भोजन केवल शरीर को ही नहीं,अपितु मन-मस्तिष्क को भी गहरे तक प्रभावित करता है। दूषित अन्न-जल का सेवन न सिर्फ आफ शरीर-मन को बल्कि आपकी संतति तक में असर डालता है। ऋषि-मुनियों ने दीर्घ जीवन के जो सूत्र बताये हैं उनमें ताजे भोजन पर विशेष जोर दिया है। ताजे भोजन से शरीर निरोगी होने के साथ-साथ तरोताजा रहता है और बीमारियों को पनपने से रोकता है। लेकिन जब से फ्रीज का चलन बढा है तब से घर-घर में बासी भोजन का प्रयोग भी तेजी से बढा है। यही कारण है कि परिवार और समाज में तामसिकता का बोलबाला है।
ताजा भोजन ताजे विचारों और स्फूर्ति का आवाहन करता है जबकि बासी भोजन से क्रोध, आलस्य और उन्माद का ग्राफ तेजी से बढने लगा है। शास्त्रों में कहा गया है कि बासी भोजन भूत भोजन होता है और इसे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में नैराश्य,रोगों और उद्विग्नताओं से घिरा रहता है। हम देखते हैं कि प्रायःतर गृहिणियां मात्र दो से पांच मिनट का समय बचाने के लिए रात को गूंथा हुआ आटा लोई बनाकर फ्रीज में रख देती हैं और अगले दो से पांच दिनों तक
इसका प्रयोग होता है। आइये आज से ही संकल्प लें कि आयन्दा यह स्थिति सामने नहीं आए। तभी आप और आपकी संतति स्वस्थ और प्रसन्न रह सकती है और औरों को भी खुश रखने लायक व्यक्तित्व का निर्माण कर सकती है।

बुधवार, 5 नवंबर 2014

बहुत आदर्श है द्रौपदी

शास्त्रों में हैं कुछ ऐसी बातें जो कम ही लोग जानते हैं

महाभारत के अनुसार द्रौपदी राजा द्रुपद की बेटी और पांडवों की पत्नी थी। कौरवों द्वारा आयोजित किए गए जुए के खेल में द्रौपदी को दांव पर लगाया गया। पांडव दांव हार गए और उसके बाद दुशासन ने उसे भरी सभा में अपमानित किया। द्रौपदी के चरित्र के ये वो पहलू हैं, जिनके बारे में अधिकांश लोग जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि द्रौपदी का किरदार बहुत आदर्श है और उससे बहुत कुछ सीखा जाता है तो आइए जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ बेहद रोचक कथाएं ......

गर्भ से नहीं हुआ था द्रौपदी का जन्म

महाभारत ग्रंथ के अनुसार एक बार राजा द्रुपद पांडवों से पराजित होने के कारण परेशान थे। जब से द्रोणाचार्य के कारण युद्ध में उनकी हार हुई, उन्हें एक पल भी चैन नहीं था। राजा द्रुपद चिंता के कारण कमजोर हो गए। वे द्रोणाचार्य को मारने वाले पुत्र की चाह में एक आश्रम से दूसरे आश्रम भटकने लगे। ऐसे ही भटकते हुए वे एक बार कल्माषी नाम के नगर में पहुंचे। उस नगर में ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले और स्नातक ब्राह्मण रहते थे। वहीं, उन्हें दो ब्राह्मण याज और उपयाज मिले। उन्होंने पहले छोटे भाई उपयाज से अपने लिए पुत्र प्राप्ति हवन करने के लिए प्रार्थना की। फिर उपयाज के कहने पर उन्होंने याज से प्रार्थना की। उसके बाद याज ने राजा द्रुपद के यहां पुत्र प्राप्ति के लिए हवन करवाया।
उस अग्रिकुंड से एक दिव्य कुमार प्रकट हुआ। वह कुमार अग्रिकुंड से निकलते ही गर्जना करने लगा। वह रथ पर बैठकर इधर-उधर घूमने लगा। उसी वेदी यानी हवनकुंड से कुमारी पांचाली का भी जन्म हुआ। पांचाली यानी राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी कमल की पंखुड़ी के जैसी आंखों वाली, नीले-नीले घुंघराले बालों व कोमल होंठो वाली थी। उसका रंग सांवला था। ऐसा लगता था मानों कोई देवांगना मनुष्य शरीर धारण करके सामने आ गई हो। इसके बाद ब्राह्मणों ने दिव्य कुमार व कुमारी का नामकरण किया। उन्होंने कहा यह कुमार असहिष्णु और बलवान व रूपवान होने के साथ ही कवच कुंडल धारण किए हुए है। इन पर अग्रि का प्रभाव दिखाई देता है। इसलिए इनका नाम धृष्टद्युम्र होगा। यह कुमारी कृष्ण वर्ण की हैं इनका नाम कृष्णा होगा।

द्रौपदी को क्यों मिले पांच पति

द्रौपदी पूर्व जन्म में एक बड़े ऋषि की गुणवान कन्या थी। वह रूपवती, गुणवती और सदाचारिणी थी, लेकिन पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण किसी ने उसे पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया। इससे दुखी होकर वह तपस्या करने लगी। उसकी उग्र तपस्या के कारण भगवान शिव प्रसन्न हए और उन्होंने द्रौपदी से कहा तू मनचाहा वरदान मांग ले। इस पर द्रौपदी इतनी प्रसन्न हो गई कि उसने बार-बार कहा मैं सर्वगुणयुक्त पति चाहती हूं। भगवान शंकर ने कहा तूने मनचाहा पति पाने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की है। इसलिए तुझे दुसरे जन्म में एक नहीं पांच पति मिलेंगे। तब द्रौपदी ने कहा मैं तो आपकी कृपा से एक ही पति चाहती हूं। इस पर शिवजी ने कहा मेरा वरदान व्यर्थ नहीं जा सकता है। इसलिए तुझे पांच पति ही प्राप्त होंगे।

द्रौपदी का किरदार क्यों है महत्वपूर्ण
महाभारत के अनुसार द्रौपदी सुंदर होने के साथ ही बहुत बुद्धिमान स्त्री रही होगी। जब भी पांडव कमजोर पड़े या उन्हें कोई निर्णय लेने में संकोच हुआ। द्रौपदी ने हमेशा एक पत्नी का कर्तव्य निभाया। वो ये बखूबी जानती थी कि उसे कब कितना और कहां बोलना है।

द्रौपदी ने नहीं कहा अंधे का पुत्र अंधा
महाभारत के सभापर्व में मिले वर्णन के अनुसार इंद्रप्रस्थ में आकर राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें हस्तिनापुर से दुर्योधन अपने बंधु-बांधवों सहित उपस्थित हुआ। इस यज्ञ में दूर-दूर देशों के राजा महाराजा भी आए हुए थे। यहां पर दुर्योधन को महल के निरीक्षण के समय तब उपहास का पात्र बनना पड़ा। एक दिन की बात है राजा दुर्योधन उस सभा भवन में भ्रमण करता हुआ स्फटिक मणिमय स्थल पर जा पहुंचा। वहां जल की आशंका से उसने अपने वस्त्र ऊपर उठा लिए। उसके बाद वह सभा में दूसरी ओर चक्कर लगाने लगा और एक स्थान पर वह गिर पड़ा। इससे वह मन ही मन बहुत लज्जित हुआ। फिर स्फटिक मणि के समान स्वच्छ जल से भरी सुशोभित बावली को स्थल मानकर वह वस्त्रों सहित जल में गिर पड़ा। इस दृश्य को देखकर भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव इस पर हंसने लगे। दुर्योधन उपहास नही सह सका। महाभारत के सभापर्व में इस घटना का इतना ही उल्लेख है। इस ग्रंथ में ये कहीं वर्णित नहीं है कि महारानी द्रौपदी राजा दुर्योधन को कहीं मिलीं और उन्होंने उनका उपहास किया।

अपनी इन विशेषताओं के कारण थी पतियों की प्रिय

एक पत्नी को किस तरह अपने पत्नी धर्म का पालन करना चाहिए। इसका द्रौपदी से अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता है। महाभारत में एक दृश्य है जहां सत्यभामा द्रौपदी से मिलने आई हैं और दोनों आपस में बातचीत कर रही हैं।
सत्यभामा ने द्रौपदी से पूछा कि सखी मैं देखती हूं कि तुम्हारे पति पांडव तुम्हारे वश में रहते हैं। वे सभी तुम्हारे अधीन है। सो आप ये रहस्य मुझे भी बताएं कि आपके पांच बलशाली पांडव पति आपका इतना सम्मान क्यों करते हैं। तब द्रौपदी बोली सत्यभामा तुम मेरी सखी हो इसलिए मैं तुम्हे बिल्कुल सच बताती हूं।
मैं अहंकार और क्रोध से दूर रहती हूं। मैं अपने मन पर काबू रखकर केवल पति की खुशी देखते हुए उनकी सेवा करती हूं। असभ्यता से खड़ी नहीं होती। उनसे कड़वी बातें नहीं कहती हूं। बुरी जगह पर नहीं बैठती, बुरे आचरण को अपने पास भी नहीं फटकने देती। उनके हर संकेत का अनुसरण करती हूं। चाहे कैसा भी पुरुष हो मेरा मन पांडवों के अलावा किसी पुरुष पर आकर्षित नहीं होता है। पतियों के भोजन किए बिना मैं भोजन नहीं करती हूं।
उनके नहाए बिना मैं नहीं नहाती। जब-जब पति घर आते हैं तो मैं खड़ी होकर आसन और जल देकर उनका सत्कार करती हूं। मैं बातचीत में किसी का तिरस्कार नहीं करती। समय पर भोजन बनाती हूं और सभी को प्रेम से खिलाती हूं। मेरे पति जिस चीज को नहीं खाते, नहीं पीते, सेवन नहीं करते हैं उनसे मैं भी दूर रहती हूं। मेरी सास ने मुझे जो भी धर्म बताएं हैं, मैं उनका पालन करती हूं। विपरित समय में अपने पति का हर संभव सहयोग करती हूं।

रिश्ता कोई भी हो करें पूरा विश्वास

कहते हैं किसी भी रिश्ते की बुनियाद विश्वास होता है। द्रौपदी का चित्रण हमें महाभारत में एक ऐसी पत्नी के  रूप में मिलता है। जो हर परिस्थिति में अपने पति पांडवों पर आंख मूंद कर विश्वास करती है। फिर चाहे पति द्वारा दांव पर लगाया जाना हो या जयद्रथ द्वारा अपहरण या कीचक का बुरी नजर डालना। द्रौपदी ने कभी अपना विश्वास नहीं डगमगाने दिया। एक बार की बात है पांडव द्रौपदी को आश्रम में अकेला छोड़कर धौम्य ऋषि के आश्रम चले गए थे। उस समय सिंधु देश का राजा जयद्रथ विवाह की इच्छा से शाल्व देश जा रहा था। जयद्रथ और उसकी सेना उस समय धौम्य ऋषि के आश्रम के पास से गुजरे।
जयद्रथ की नजऱ आश्रम के बाहर अकेली खड़ी द्रौपदी पर पड़ गई। वह उस पर मोहित हो गया। उसने द्रौपदी के पास जाकर पूछा हे सुंदरी तुम कौन हो? तुम्हारा पति कौन है या तुम कोई दिव्य कन्या हो। जब द्रौपदी ने अपना परिचय दिया और कहा कि मैं महाराज द्रुपद की पुत्री कृष्णा हूं और मेरे पति पांडव हैं। यह सुुनकर जयद्रथ बोला कि उन पांडवों के पास कुछ भी नहीं हैं।
वे अब वनवासी हो गए हैं। तुम मुझ से विवाह कर लो और महलों का सुख भोगो। द्रौपदी ने उसे धित्कारा और कहा वीर होकर ओछी बात करते हो तुम्हे लज्जा नहीं आती। अरे दुष्ट तू मेरे पति पांडवों को नहीं जानता वे तेरी सेना को आसानी से परास्त कर देंगे। यह सुनकर जयद्रथ बोला मेरे पास इतना सेना बल है कि मैं पाण्डवों को धूल चटा दूंगा।
अब तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं या तो सीधी तरह से रथ में बैठ जाओ या पांडवों के हार जाने पर मेरे सामने गिड़गिड़ाने को तैयार हो जाओ। द्रौपदी ने कहा मेरा बल मेरी शक्ति महान है। मुझे अपने ऊपर विश्वास है तुम्हारे जोर-जबरदस्ती करने पर भी मैं तुम्हारे सामने नहीं गिड़गिड़ाऊंगी। एक रथ पर एक साथ बैठकर श्रीकृष्ण और अर्जुन आएंगे। जब भीम तेरी तरफ गदा लेकर दौडग़े। जब नकुल और सहदेव तुझ पर टूट पड़ेंगे। तब तुझे पश्चाताप होगा। यह सुनते ही जयद्रथ द्रौपदी को घसीटने लगा।द्रौपदी ने उससे कहा मेरे कुरुवंशी पति शीघ्र ही मुझसे मिलेंगे और तुझे परास्त करेंगे।
जब पांडव फिर से आश्रम पहुंचे तो दासी ने उन्हें बताया कि जयद्रथ ने द्रौपदी का अपहरण कर लिया। यह सुनकर पांचों पांडव द्रौपदी की खोज में निकल पड़े। जब उन्होंने द्रौपदी को जयद्रथ के रथ पर बैठे देखा तो वे आग बबूला हो गए। उन्होंने जयद्रथ और उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया। सारी सेना डरकर भाग गई। अपनी सेना का यह हाल देखकर जयद्रथ ने द्रौपदी को रथ से उतारा और भाग गया।
(sabhar -bhaskar.com )