बुधवार, 4 नवंबर 2015

फिल्मों की आउट सोर्सिंग करनी होगी- प्रकाश अवस्थी

मया 2 से काफी उम्मीदें हैं,  छत्तीसगढ़ी फिल्मों की पायरेसी नहीं 
- अरुण कुमार बंछोर
छत्तीसगढ़ फिल्मों के सुपेर स्टार प्रकाश अवस्थी का कहना है कि थियेटर में प्रदर्शन के अलावा और किन- किन तरीकों से आय हो सकती है इस विषय पर विचार कर उसके आय के संसाधन बढ़ाने होंगे। उन्हें अपनी आने वाली फिल्म मया 2 से काफी उम्मीदें हैं। वे कहतें हैं कि ये अच्छी बात है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों की पायरेसी नहीं हो रही है। जबकि हिन्दी फिल्मों की पायरेटेड सीडी एक हफ्ते बाद बाजार में उपलब्ध हो जाती है। लेकिन क्षेत्र छोटा होने की वजह से वीडियो राइट्स से ज्यादा आमदनी भी नहीं होती है। इस क्षेत्र में और कारपोरेट कंपनियां आयेंगी तब हो सकता है कि प्रतिस्पर्धा में कुछ हो। मया, टूरा रिक्शा वाला, टूरा अनाड़ी तभो खिलाड़ी,दू लफाडू जैसी सुपर हिट फिल्मों में हीरो से सुपर स्टार बने प्रकाश अवस्थी इन दिनों पहली छत्तीसगढ़ी सीक्वल फिल्म मया टू का निर्माण कर रिलीज की तैयारी में जुटे है। वे इस फिल्म के निर्देशक भी हैं। छत्तीसगढ़ी के अलावा बंगला फिल्म,भोजपुरी और हिन्दी फिल्म अग्निशिक्षा में कार्य किया हैं। श्री अवस्थी से हमने हर पहलूओं पर बात की है। प्रस्तुत है बातचीत के अंश।
0 मया 2 आपकी दिवाली ने आ रही है उसमे दर्शकों के लिए ऐसा क्या है ?
00 मया टू में पारिवारिक स्टोरी के अलावा कामेडी के तड़के के साथ मसाला मूवी से लोगों को मनोरंजन होगा यह उम्मीद है।यह दो भाईयों की कहानी वाली एक बेहतरीन फिल्म है।
0 मया 2 में आपकी भूमिका क्या है?
00 मया 2 में मैं मुख्य भूमिका में हूँ। यह एक पारिवारिक कहानी है। दो भाई है जिसके प्यार और टकराव को लेकर बनाया गया है।
0 छत्तीसगढ़ी फिल्मो के अलावा भोजपुरी और उडिय़ा फिल्मो की भी यहां शूटिंग होने लगी है। वहां के कलाकार भी यहां की फिल्मो में काम कर रहे है। क्या यहां कलाकारों की कमी है?
00  छत्तीसगढ़ी सिनेमा में शौकिया तौर पर फिल्म बनाने वाले लोग बड़ी संख्या में आ रहे है। कई भाषाओं में क्षेत्रीय फिल्म निर्माण से छत्तीसगढ़ी फिल्मों की आउट सोर्सिंग हुई है भोजपुरी, और उडिय़ा से नया बाजार मिला है इसी तरह और भी तरीके ईजाद करने से इंडस्ट्रीज के सभी लोगों का भला होगा। यहां कलाकारों की कतई कमी नहीं है।
0 आपने भोजपुरी और बंगाली फिल्मे भी की है तो उस ओर रुझान कैसे हुआ?
00 श्रेय जी की फिल्म चिंगारी के जरिये मैं फिल्मो में आया था। उन्होंने मेरा काम कई फिल्मो में देखा था उन्होंने ऑफर दिया और मैंने काम शुरू कर दिया । मैंने चिंगारी की शूटिंग ख़त्म ही किया था तभी केडी ने मुझे टिपटॉप लैला अंगूठा छाप छैला के लिए ऑफर दिया। इस तरह भोजपुरी फिल्मो में एंट्री हुई।
0 छत्तीसगढ़ी फिल्मो के आपको सुपरस्टार मना जाता है , क्या यही मुकाम आप वहां भी बना पाएंगे?
00 दोनों ही जगहों का माहौल अलग अलग है। मन में दृढ़ इच्छा हो तो सब संभव है। मैंने बहुत कोशिश की है। सतीश जैन जी मेरे डायरेक्टर होते तो शायद मैं भी सुपर स्टार बन जाता।
0 आप किस तरह का रोल करना पसंद करते है?
00 मुझे सभी तरह का लीड रोल पसंद है। नेचुरल रोल ही करना चाहूँगा।
0 आगे की क्या योजना है.कौन सी फिल्म बनाएंगे?
00 आगे भी फिल्म बनाता रहूँगा। निर्देशन तो मैंने मजबूरी म किया है। मैं चाहता हूँ की और डायरेक्टर आये और फिल्म बनाये।
 0 सरकार से छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री को कैसी मदद की अपेक्षा करते हैं ?
00 छत्तीसगढ़ फिल्मों को थियेटरों की कमी से जूझना पड़ रहा है अगर सरकार सहूलियत दे और कारपोरेट सेक्टर प्रदेश में सौ-डेढ़ सौ नए सिनेमाघर बना दे तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों का रंग ही बदल जायेगा। उद्योगों की तरह रियायती दर में जमीन और उस पर कामर्शियल काम्प्लेक्स के निर्माण की अनुमति से नहीं कंपनियां सिनेमाघरों के निर्माण के लिए आकर्षित हो सकती है।

सोमवार, 2 नवंबर 2015

एक ऐसा गाँव जहां 75 हजार से भी ज्यादा नीम पेड़ है

देश में सर्वाधिक नीम पेड़ों वाले टॉप 5 गाँवों में शामिल है गाँव सलोनी 
सन स्टार स्पेशल - अरुण कुमार बंछोर
रायपुर। छत्तीसगढ़ में एक ऐसा गाँव है जहां आप जिधर भी जाओ सिर्फ नीम के ही पेड़ नजऱ आएंगे। इस गाँव को नीम गाँव भी कहा जाता है। सबसे मजेदार और गंभीर बात यह है कि इस गाँव के लोग कभी बड़े बीमारी से ग्रसित नहीं होते हैं। क्योंकि नीम को भारत में 'गांव का दवाखानाÓ कहा जाता है।

नीम में इतने गुण हैं कि ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है। यहाँ तक कि यह अपने औषधीय गुणों की वजह से आयुर्वेदिक मेडिसिन में पिछले चार हजार सालों से भी ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है। नीम को संस्कृत में 'अरिष्टÓ भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, 'श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला।Óजी हाँ हम बात कर रहे है धमतरी जिले के गाँव सलोनी की ,जो देश में सर्वाधिक नीम पेड़ों वाले टॉप 5 गाँवों में शामिल है। लगभग 450 घरों वाले गाँव में 75 हजार से अधिक नीम पेड़ है। इसका श्रेय जाता है सरपंच वामन साहू को जिन्होंने हर तरफ नीम पेड़ का ही वृक्षारोपण कराया। सलोनी को हराभरा गाँव का भी दर्जा प्राप्त है। सन 2009 में तात्कालीन वन मंत्री विक्रम उसेंडी इस गाँव को देखकर हतप्रभ रह गए थे । मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह भी इस गाँव की सराहना कर चुके है।

छत्तीसगढ़ के सिहावा नगरी ब्लाक का गांव सलोनी में आप जहां भी जाएंगे नीम पेड़ ही आपका स्वागत करेगा। सड़क के दोनों और नीम पेड़ सुन्दरता का एक मिसाल है। गाँव की खाली जमीन पर एक दो नहीं बल्कि कई वृक्षारोपण है,जिसमे नीम का ही पेड़ है। नीम पेड़ के साथ साथ कहीं कही पर फलदार और औषधीय पौधे लगाए गए हैं। ये इस बात का प्रतीक है कि गाँव के ;लोग पर्यावरण के प्रति कितने जागरूक है। हमने सरपंच वामन साहू के साथ पूरे वृक्षारोपण का अवलोकन किया। उन्होंने बताया कि अपने 25 साल के राजनीतिक जीवन में उन्होंने सिफर पेड़ों से ही प्यार किया है। गाँव में पहले कुछ भी नहीं था। जब सड़कें बनी तब वन विभागों के अफसरों से आग्रह कर सड़क के दोनों किनारे पर नीम पेड़ का रोपण कराया। खुद उसकी देखभाल की। पहले अफसर कहते थे यहां पेड़ नहीं जी पाएंगे आज वही अफसर इस गाँव की तारीफ़ करते नहीं थकते हैं। क्योकि इस गाँव की जमीन पथरीली है जिसमे पेड़ पौधे कम ही जि़ंदा रह पाते है। ओर गाँव वालों की मेहनत और पर्यावरण के प्रति प्यार ने गाँव को हरा भरा बना दिया है।
नीम पेड़ ही क्यों ,फलदार पौधे क्यों नहीं लगाए। इसके जवाब में सरपंच साहू का कहना है कि नीम के अर्क में मधुमेह यानी डायबिटिज, बैक्टिरिया और वायरस से लडऩे के गुण पाए जाते हैं। नीम के तने, जड़, छाल और कच्चे फलों में शक्ति-वर्धक और मियादी रोगों से लडऩे का गुण भी पाया जाता है। इसकी छाल खासतौर पर मलेरिया और त्वचा संबंधी रोगों में बहुत उपयोगी होती है। वे कहते हैं कि आने वाले समय में पत्ते,नीम के फल हमारे गाँव के लिए अर्थ का जरिया बनेगा। सोच अच्छी है क्योकि नीम के पत्ते भारत से बाहर 34 देशों को निर्यात किए जाते हैं। इसके पत्तों में मौजूद बैक्टीरिया से लडऩे वाले गुण मुंहासे, छाले, खाज-खुजली, एक्जिमा वगैरह को दूर करने में मदद करते हैं। इसका अर्क मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, हर्पीस, एलर्जी, अल्सर, हिपेटाइटिस (पीलिया) वगैरह के इलाज में भी मदद करता है। नीम के बारे में उपलब्ध प्राचीन ग्रंथों में इसके फल, बीज, तेल, पत्तों, जड़ और छिलके में बीमारियों से लडऩे के कई फायदेमंद गुण बताए गए हैं।

 आजकल हमारी जिन्दगी में देसी नुस्खो का कोई खास स्थान तो नहीं है क्योंकि अमूमन सभी लोग अंग्रेजी दवाओं पर अधिक से अधिक निर्भर है शायद इसलिए कि वो जल्दी असर करती है 7 मेरा मानना है कि शायद ऐसा नहीं है आप अगर गौर से देखें तो हमारे आस पास पर्यावरण ने हमे बहुत से औषधियुक्त पौधे दिए है
जिनके इस्तेमाल से हम कुछ छोटी मोटी परेशानियो को बड़ी आसानी से दूर कर सकते है और नीम भी उनमे से एक है 7 साथ ही कुछ गंभीर बीमारीओं में भी समय के साथ उचित मार्गदर्शन में अगर हम औषधि युक्त पौधों का सेवन करते है तो उनसे निजात पाई जा सकती है 7
वामन साहू सरपंच सलोनी


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

'परिवर्तन मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि : डॉ. अजय सहाय

स्थानीय कलाकारों को लेकर सुखद अनुभव हुआ है 
नायक ,खलनायक ,लेखक ,निर्देशक साहित्यकार, कवि, रंगकर्मी, पटकथा जैसे अनेक कला किसी एक व्यक्ति में हो ऐसे बिरले ही होते है और यह सब कला है डॉ अजय मोहन सहाय में। छत्तीसगढ़ी फिल्मो का वे एक आधार स्तम्भ है। उन्होंने एक नहीं कई भाषाओं की फिल्मो में अभिनय कर सबके सामने एक चुनौती पेश की है। पांच भाषाओं में अभिनय करना भी एक रिकार्ड है। जितने अच्छे वे मधुमेह व् हृदयरोग विशेषज्ञ है उतने ही बेहतर कलाकार है। डॉ सहाय को कला विरासत में मिली है। माँ से कला मिली है तो पिता से शिक्षा। छालीवुड में डॉ सहाय एक ऐसे नायक खलनायक लेखक ,निर्देशक है जिन्होंने फिल्म उद्योग पर हर भूमिका में एकछत्र राज कर रहे हैं और अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। उनके स्वाभाविक अभिनय और प्रतिभा की
पराकाष्ठा ही थी कि लोगों के बीच वे काफी लोकप्रिय हैं।
 उन्होंने जितने भी फिल्मों में रोल किया उसे देखकर ऐसा लगता है कि उनके द्वारा अभिनीत पात्रों का किरदार केवल वे ही निभा सकते थे। उनकी अभिनीत भूमिकाओं की यह विशेषता रही है कि उन्होंने जितनी भी फिल्मों मे अभिनय किया उनमें हर पात्र को एक अलग अंदाज में दर्शकों के सामने पेश किया। रूपहले पर्दे पर डॉ सहाय ने जितने रोल किए उनमें वह हर बार नए तरीके से संवाद बोलते नजर आए। अभिनय करते समय वे उस रोल में पूरी तरह डूब जाते हैं। परिवर्तन धारावाहिक में स्थानीय कलाकारों को लेना वे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धी मानते है। समय की कदर नहीं करने वालों से डॉ सहाय काफी निराश होते हैं। वे कहते है कि जूनून से अच्छी फिल्म नहीं बनती। कहानी, संवाद,  निर्देशन, सब कुछ फिल्मो में होनी चाहिए। पैसों से ज्यादा समय की कीमत होती है। डॉ सहाय से हमने हर पहलूओं पर बेबाक बात की है। पेश है बातचीत के संपादित अंश।
आपको फिल्मो में रुचि कैसे हुई
बचपन से ही रुचि रही है। स्कूलों में ड्रामा, नौटंकी देखकर मैंने भी इस क्षेत्र में कदम बढ़ाया। ढेरों पुरूस्कार जीते। और आज सबके सामने हूँ।
कला से लगाव का कारण क्या है
कला मुझे विरासत में मिली है। माँ अच्छी गायिका रही है और पिता स्वर्गीय आनंद मोहन सहाय से शिक्षा मिली है। साफ है मुझमे कला कूट कूट कर भरा हुआ है।
आप अपनी भूमिका में जान कैसे डालते है
मैं अपनी भूमिका को जीवंत बनाकर निभाता हूँ। नायक हो या खलनायक हर भूमिका में मैंने पूरी तरह से डूबकर किया है। मेरी कोशिश रहती है की मेरी हर कला को दर्शक पसंद करें।
अब तक की भूमिका में आपको सबसे बड़ी चूनौती कौन सी लगी?
विलेन की भूमिका निभाना शुरू में मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती रही है। बाप बड़े ना भैया सबसे बड़े रुपैया में जब मुझे विलेन की भूमिका मिली तो वो मेरे लिए एक कड़ी परीक्षा थी और मैंने स्वीकारा। उसमे सब कुछ था घृणा से प्रेम तक। मैंने पूरी तन्मयता से अभिनय किया। मुझे खुशी है लोगो ने बेहद पसंद किया।
आगे क्या विलेन की भूमिका ही निभाते रहेंगे। 
नहीं वो तो एक पड़ाव है ,आगे मंजिल तो बहुत है।
आपने कई प्रकार का अभिनय किया है। पहले  नायक थे फिर खलनायक की भूमिका  नजर आये। आपका पसंदीदा रोल
हर कला मुझे पसंद है। चाहे नायक हो या खलनायक। लेखन हो या निर्देशन। समय के साथ साथ सब अच्छा है। मैं हर भूमिका को पसंद करता हूँ।
कभी आपको इस क्षेत्र में निराशा हुई है
हुई है , समय की कदर नहीं करने वालों से मुझे घोर निराशा होती है। मुझे काम का नशा है और लोग जहां भी बुलाते है मै समय पर पंहुच जाता हूँ। और जब दिन भर बैठे होते है और सीन नहीं होता है तो बहुत ही दुख होता है । क्योकि मैं मधुमेह और हृदयरोग विशेषज्ञ हूँ। अपना कीमती समय छोड़कर जब लोकेशन पर जाता हूँ और डायरेक्टर समय की कीमत नहीं जानता तो निराशा होती है।
और आप बहुत उत्साहित कब महसूस किये हैं
विलेन की भूमिका में अपने आप को देखकर मैं बहुत ही रोमांचित हुआ था। जब अपना काम देखा तो मुझे लगा की विलेन की ही भूमिका करना चाहिए।
छत्तीसगढ़ी फिल्मे थियेटरों में क्यों नहीं टिक पाती
पैसे और जूनून से अच्छी फिल्मे नहीं बनती। कहानी अच्छी हो ,फिल्मांकन अच्छा हो, निर्देशन अच्छा हो तो फिल्मे जरूर चलेंगी। फिल्म नहीं चलने के लिए आप दर्शकों को दोष नहीं दे सकते। थियेटर नहीं है यह कहना गलत ,है अच्छी फिल्मे दे ,जनता जानती है सब कुछ। चंदा लेकर फिल्म बनाने वाले कभी सफल नहीं हो सकते।
रील लाइफ और रियल लाइफ में आप क्या अंतर पाते हैं?
रिफ्लेक्ट होता है। कही ना कही परछाई आ ही जाती है।
आपकी कोई ऐसी तमन्ना हो जो आप पूरा होते हुए देखना चाहते हैं?
एक बार अच्छी फिल्म बनाना चाहता हूँ। उसमे सभी लोकल कलाकार होंगे। यही तमन्ना है । फिल्म चली तो आगे भी बनाता रहूंगा। स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करने की ख्वाहिश है।

मरीजों का इलाज सबसे बड़ी चुनौती होती है : डॉ अजय सहाय

0 विदेशों में शिविर लगाकर करते हैं इलाज , मिलता है प्यार
0 हर रोज नया इतिहास बनता है सहाय सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल में
0 इलाज को व्यवसाय बनाये जाने से मरीज-डाकटर का रिश्ता कमजोर हुआ
0 झोला छाप डाकटरों पर होना चाहिए कार्रवाई

सक्षिप्त परिचय
नाम       -अजय मोहन सहाय
पेशा         मधुमेह ,ह्रदय रोग विशेषज्ञ
संस्थान    सहाय सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल
योग्यता    एमबीबीएस , एमडी सहित 18 डिगी
अवार्ड       शैक्षणिक साहित्य , डाक्टर में 50 से अधिक अवार्ड
            सीबी राय अवार्ड सीएम के हाथों
            हेल्थ केयर एक्सीलेंस अवार्ड
            दाऊ महासिंह चंद्राकर सम्मान

मरीजों का इलाज सबसे बड़ी चुनौती होती है। डाकटरों को भगवान का दूत माना जाता है जो मरीजों के इलाज में अपना सब कुछ झोंक देता है। मरीज ठीक होकर हँसते हुए जाते है अगर मरीज की मौत हो जाए तो परिजनों का व्यवहार बदल जाता इससे काफी दुख होता है ,क्योकि डाक्टर अपना धर्म निभाता है। यह कहना है सहाय सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल के संचालक एवं मधुमेह ,हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ अजय मोहन सहाय का। वे
कहते है कि इलाज को व्यवसाय बनाये जाने से मरीज-डाकटर का रिश्ता कमजोर हुआ है। डॉ सहाय जितने अच्छे विशेषज्ञ है उतने ही अच्छे समाजसेवक भी है। गरीब मरीजों को भी ठीक कर दुआ बटोरते है। पैसा उनके लिए मायने नहीं रखता, सेवा को डॉ सहाय कर्म मानते हैं। सहाय सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल में हर रोज नया इतिहास बनता है। देश विदेश से मरीज आते है और हँसते हुए घर को लौटते हैं। पाकिस्तान में शिविर लगाकर इलाज करने वाले डॉ सहाय कहते हैं कि सुनने और देखने में फर्क होता है। पाकिस्तान के लोगो से उन्हें बहुत प्यार मिला और भाईचारा भी देखने को मिला। डॉ सहाय से हमने हर पहलूओं पर बेबाक बात की।
0 डाकटरों को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है। मौजूदा परिवेश में डाकटर इसे कितना साकार कर पाते हैं ?
00 डाकटर मरीजों के इलाज में अपना सब कुछ झोंक देता है। मेरे लिए मरीजों का प्यार और भगवान का आशीर्वाद सच्ची दौलत है। मरीज अच्छा होकर हँसते हुए घर लौटे यही हम चाहतें है ,पैसा कोई मायने नहीं रखता।
0 कभी- कभी मरीजों के परिजनों के बिना वजह गुस्से का शिकार भी होना पड़ता?
00 हाँ , यह तो सहना पड़ता है। मरीज इलाज के लिए आता है और जब केस ज्यादा बिगड़ा हुआ होता है । चाह कर भी डाकटर उन्हें नहीं बचा पातेतो मरीज की मौत के बाद परिजनों का व्यवहार अचानक बदल जाता है। तब बहुत दुख होता है। हम अपना सेवा धर्म पूरी ईमानदारी से निभाते हैं । मौत शाश्वत सत्य है। एक चूक से बददुआ मिलाने लगती है जो तीर की तरह चुभती है।
0 क्या आप इस बात से सहमत है कि अस्पताल अब व्यवसाय का रूप ले लिया है?
00 डाक्टर तो भगवान का दूत होता है। आजकल डाक्टर सेवा देने वाले हो गए हैं और मरीज उपभोक्ता। यही कारण है कि डाक्टर और मरीज का रिश्ता कमजोर हो गया है। झोला छाप डाक्टरों के कारण यह स्थिति बनी है।
0 झोला छाप डाक्टरों पर शिकायतों के बाद कार्रवाई क्यों नहीं होती?
00 सरकार का मापदंड अलग अलग है। अच्छे और रजिस्टर्ड डाक्टरों पर जऱा सी चूक में कार्रवाई हो जाती है और सरकार झोला छाप डाकटरों पर कोई कार्रवाई नहीं करती क्योकि उनके खिलाफ कोई सबूत बही होता फिर वो रजिस्टर्ड भी नहीं होते। करोडो रुपया फूंककर डाक्टर बनने वाले पर तो सरकार की नजऱ हमेशा दुनिया भर के क़ानून लाड दिए गए है। उपभोक्ता फोरम भी जुर्माना ठोकने में पीछे नहीं होता।
0 मुख्यमंत्री बीमा योजना अस्पताल और मरीजों के लिए कितना कारगर है?
00 योजना सही है पर क्रियान्वयन गलत है। जागरूकता की कमी है। प्रक्रिया इत्तनी जटिल है कि अस्पताल को नुकसान उठाना पड़ता है। मरीज तो पूरा इलाज कराने के बाद कार्ड बता देते है पर उन्हें प्रक्रिया के बारे में पता नहीं होता है। कार्ड ना लो तो दुष्प्रचार करते हैं।
0 आपके अस्पताल में गरीबों के लिए क्या क्या सुविधाएं हैं?
00 गरीबों के लिए हमारे यहां कोई केश काउंटर नहीं है, उनके इलाज में हम देर नहीं करते। हमारी मंशा है कि गरीब मरीज ठीक होकर हँसते हुए घर जाए। उनकी दुआ ही मेरे लिए सबसे बड़ी दौलत है।
0 आप विदेशो में भी शिविर लगाकर मधुमेह की इलाज करते है। उसके बारे में बताएं?
00 हाँ मैंने नेपाल में भूकम्प पीडि़तों के लिए काम किया है। पाकिस्तान में 12 जगहों पर शिविर लगाकर इलाज किया। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में 6 गरीब बच्चों का सफल इलाज किया है। काफी दुआ मिला।
0 पाकिस्तान के लोगो के मन में भारत के प्रति कैसा रवैया देखने को मिला?
00 देखने और सुनने में बहुत ही अंतर है। पाकिस्तान के लोगो के मन में भाई चारा है। सुनाने के विपरीत दिलों से भारत के लोगो से अलग नहीं है। बहुत ही यादगार पल रहा है पाकिस्तान का शिविर।
0 गाँवों में कोई डाकटर जाना नहीं चाहते इसके कारण क्या  है?
00 सरकार की व्यवस्था ठीक नहीं है। बिना साधन के डाकटर वहां कैसे जाकर अपना काम करेंगे। तनखा भी कम है और असुविधाएं नहीं है। पढ़े लिखे डाक्टरों पर बंदिश बहुत है लेकिन उनकी सुविधाओं की किसी को चिंता नहीं है।

मौत के मुंह से वापस लाया 
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ग्राम बेलहरी की 21 वर्षीय उमा कुर्रे को सहाय सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल से ना केवल जीवनदान मिली बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे भी सकुशल है। उमा को गंभीर अवस्था में जब अस्पताल लाया गया तब उसके तमाम अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। सारे डाक्टर जवाब दे चुके थे। सबके मना करने के बाद भी अ डॉ सहाय ने इलाज किया और उमा हँसते हुए घर के लिए विदा हुई और अस्पताल को दे गयी ढेर सारी दुआएं।

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राज्योत्सव में अपमानित होने से दुखी है भानुमति

० कलाकारों का सम्मान करे सरकार 
रायपुर। राष्ट्रीय सम्मान से नवाजी जा चुकी छत्तीसगढ़ की लोकगायिका भानुमति कोसरे राज्योत्सव २०१४ में अपमानित होने से दुखी है। उनका कहना है कि सरकार के नुमाईंदे राज्य के कलाकारों का सम्मान करना सीखे क्योकि वे सम्मान के ही भूखे होते है। दूरदर्शन रायपुर,भोपाल के लिए लोकगीत गए चुकी भानुमति बताती है कि परिवार वालों के विरोध के बाद भी वे इस क्षेत्र में  बनाई है। १५ छत्तीसगढ़ी फ़िल्में, कई एल्बम और स्टेज शो कर चुकी भानुमति लोकगायिका के लिए राष्ट्रीय एवार्ड से सम्मानित हो चुकी है। उनसे हमने हर पहलूओं पर बात की है पेश है बातचीत के संपादित अंश। 
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संक्षिप्त परिचय 
० नाम -   भानुमति कोसरे  
० कला-    लोकगायिका, फिल्म अभिनेत्री 
० चर्चित फिल्म - कारी,ऐसे होते प्रीत, पठौनी के चक्कर 
                           भुला जहां देबे, सजना मोर 
० आगामी फिल्म - छलिया, मया २ , सिधवा सजन 
० अवार्ड -  लोकगीत का राष्ट्रीय अवार्ड 
               बाबा साहेब आम्बेडकर कलाश्री , 
                केरल साहब आम्बेडकर कलाश्री 
० उपलब्द्धी - १५ छत्तीसगढ़ी फिल्मे, विज्ञापन , दूरदर्शन में काम 
पता -       भिलाईनगर , जिला -दुर्ग 

० आपको गाने का और अभिनय का शौक कैसे हुआ?
०० बचपन से ही मुझे गाने का शौक था। मै पंडवानी देख देखकर मुझे भी इच्छा हुई और मै गायिकाओं की कापी करने लगी। 
० परिवार का कितना सहयोग मिला?
०० कभी नही मिला। जब मै गाने की नक़ल करती थी तब मेरी दादी डांटती थी, बोलती थी - नाचबीन बनबे का। 
० फिर कैसे आ गयी इस क्षेत्र में , परिजनों ने रोका नहीं?
० ० सबसे पहले सोनहा बिहान के लिए गाना गई थी तब मुझे काफी विरोध का सामना करना पड़ा था। लेकिन मैंने कदम पीछे नहीं हटाई और आगे बढ़ती चली गयी। 
० आप अपना प्रेरणाश्रोत और आदर्श किसे मानती है?
०० मेरी माँ तीरथ बाई मेरी प्रेरणाश्रोत रही है वे रेडियो के लिए गाती थी जब मै क्लास दो में थी तब से रेडियो सुनटी रही हूँ। 
० कितने फिल्मो में अकाम कर चुकी है और कौन सा फिल्म आपको अच्छी लगी?
०० मैंने १५ फिल्मो में काम की है और मया की डोरी मेरी सबसे अच्छी फिल्म उसमे मैंने विलेन की भूमिका की है। 
० कभी आपको निराशा महसूस हुई है/
०० हाँ! एक बार एक भावनात्मक डायलॉग बोलते समय मुझे काफी निराशा हुई थी। मुझे अकेली होने का एहसास हुई थी। बहुत पीड़ा हुई अपने पति की याद में मै रो पडी थी। 
० कभी उत्साह का कोई क्षण आया हो?
०० फिल्म छलिया में एक लड़की की  समय मै बहुत ही उत्साहित हुई थी। 
० छत्तीसगढ़ी फिल्मो में आपको कौन से कलाकार पसंद है?
०० प्रदीप शर्मा! उनके साथ काम करके मुझे बहुत ही अच्छा लगा था और सीखने को भी मिला था। उस फिल्म में वह मेरे पति की भूमिका में थे। 

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

यूँ ही आ गयी एक्टिंग में, डांस मेरा शौक है

मेरी आशिकी तुमसे ही की नायिका राधिका मैदान से ख़ास चर्चा 
- अरुण कुमार बंछोर
"मेरी आशिकी तुमसे ही की " नायिका राधिका मैदान कहती है कि एक्टिंग में तो मैं यूँ ही आ गयी। मेरा शौक तो डांस है और मैं डांसर ही बनाना चाहती थी। इसके लिए मैंने काफी तैयारी भी की थी। एक प्रश्न के उत्तर में राधिका हंसती हुई कहती है कि एकता कपूर के सीरियल में तो कई कई शादी होना तो सामान्य बात हैं, हो सकता है इतनी मुझे भी करनी पड़े। टीवी धारावाहिक की नायिका राधिका मैदान अपने निजी प्रवास पर रायपुर आई तो हमने उनसे कई पहलूओं पर बेवाक बात की।
0 आपको एक्टिंग का शौक कैसे हुआ?
00 एक्टिंग में तो मैं यूँ ही आ गयी। मैं एक्टिंग में नहीं आना चाहती थीं। पर अब धारावाहिक में काम करना अच्छा लग रहा है।
0 फिर किस क्षेत्र में कॅरियर बनाना चाह रही थी?
00 डांसिंग में ! डांस मेरा शौक भी है और पसंदीदा चाह भी। डांस की ट्रेनिंग लेने यूएस जाने का प्लान भी कर ली थी। लेकिन जाने से पहले सीरियल मिल गई , तो नहीं जा पाई।
0 कभी-कभी एक्टिंग में आपको आलोचना भी सहनी पड़ती होगी ?
00 हाँ जरूर ! जो जितना सफल होते है उतने ही उनके ज्यादा दुश्मन होते है।
0 आपको सीरियल कैसे मिला ?
00 आर्टिस्ट सलेक्शन क्रू के कुछ मेंबर्स ने फेसबुक पर मेरा फोटो देखा और सीरियल के ऑडिशन के लिए बुलाया।फिर मैंने आडिशन दिया। किरदार के चेहरे पर जो मासूमियत चाहिए थी, वह सलेक्शन टीम को मेरे चेहरे में नजर आई और मुझे रोल दे दिया गया।
0 आपने झलक दिखला जा में भी हिस्सा लिया था?
00 बहुत अच्छा अनुभव रहा। मुझे काफी कुछ सीखने को मिला। जल्दी बाहर होने का भी मुझे ज्यादा दुख नहीं हुआ। आगे और कोशिश करूंगी।
0  इस क्षेत्र  में कभी निराशा हुई है ?
00 कभी नहीं! मैं कभी निराश नहीं होती।
0  और कभी ऐसा क्षण हो आया हो जब आप बहुत ज्यादा उत्साहित हुई हो?
00 हमेशा उत्साहित रहती हूँ। क्योकि मेरे परिवार मेरे साथ है।
0 आपको इसके लिए परिवार से कितना सहयोग मिलता है?
00 पूरा सहयोग मिलता है। एक लड़की होने के बाद भी मेरे माता-पिता ने मुझे कभी बंधन में नहीं रखा। यहां भी खूब मेहनत कर रही हूं। कभी-कभी तो पापा कहते हैं, ज्यादा शूटिंग करती हो, इतना काम करने की क्या जरूरत है। अगर अभी भी लगता है, तो वापस आ जाओ। मैं कॉलेज लाइफ मिस करती हूं, लेकिन मुझे कॅरियर बनाना है तो सब ठीक है।
0 ऐसा आपका कोई सपना जो आप पूरा होते हुए देखना चाहती हों?
00 अब और कोई तमन्ना नहीं है बस एक्टिंग में ही आगे जाना चाहती हूँ। पहले सोचती थी डांसिंग स्टार बनूंगी पर मौका मिला तो एक्टिंग में आ गई।अब इसी को कॅरियर बनाउंगी।


मंगलवार, 29 सितंबर 2015

आशिक आवारा में मेरा किरदार कुछ हटकर है : निरहुआ

भोजपुरी फिल्मों के स्टार दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' इन दिनों अपनी आनेवाली फिल्म 'आशिक़ आवारा' में व्यस्त हैं। उनकी फिल्मो में वो सब कुछ होती है जो दर्शको को चाहिए। फिल्म बनाने के पहले वे इस पर गहन अध्ययन करते है। पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश:
0 आशिक़ आवारा' के बारे में कुछ बताइये?
00 आशिक़ आवारा की शूटिंग अभी शुरू की गई है। फिल्म एक अलग कांसेप्ट पर बन रही है। इसमें मेरा किरदार मेरी अब तक की सभी फिल्मों से काफी अलग है।
0 आपका किरदार किस तरह का है?
00 मुझे अब तक दर्शकों ने साधारण किरदारों में देखा है। कभी गांव के सीधे-सादे लड़के के रूप में तो कभी गरीब लड़के की रूप में,  लेकिन इस फिल्म में मैं बिजऩेस आइकॉन बना हूं जो अपने काम को लेकर काफी गंभीर रहता है।
0 इस फिल्म में आप फिर एक बार आम्रपाली के साथ हैं। क्या आप मानते हैं कि आपकी जोड़ी हिट है? 
00 फिल्मों को मिले रिस्पांस और दर्शकों की प्रतिक्रिया को देखकर तो यही लगता है। दर्शक भी मुझे कई बार कहते हैं कि मेरी जोड़ी आम्रपाली के साथ उन्हें बहुत अच्छी लगती है।
 0 'आशिक़ आवारा' के निर्देशक सतीश जैन के बारे में क्या कहेंगे?
00 सतीश जैन ने 'आशिक़ आवारा ' से पहले 'निरहुआ हिंदुस्तानी', 'निरहुआ रिक्सावाला 2' बनाई है। 'आशिक़ आवारा' की कहानी इतनी अनोखी है कि मैंने फौरन हां कह दी।
0 आपकी आनेवाली फिल्मे कौन-कौन सी है?
00 आशिक़ आवारा' की शूटिंग पूरी करने के बाद 'मोकामा जीरो किलोमीटर' की शूटिंग करनेवाला हूँ। उसके बाद 5-6 फिल्में हैं जिसके बारें में जल्दी ही आप सबको पता चल जाएगा।