रविवार, 3 जून 2018

किससे हुआ था राधारानी का विवाह!

राधा और कृष्ण को प्रेम का दूसरा रूप माना जाता है।  उनका प्रेम इतना पवित्र था कि आज भी लोगबाग उनके प्रेम की मिसालें देते हैं। हम सभी इस सत्य से भली भांति परिचित हैं कि राधा कृष्ण की प्रेमिका थी, लेकिन ये भी सत्य है कि श्रीकृष्ण का विवाह राधा से नहीं हुआ।  ऐसे में ये बात महत्वपूर्ण है कि आखिर कौन था राधा का पति?आज तक कोई भी इस संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं दे पाया है। आइए आज आपको बताते हैं  कि कब कैसे और कहां हुई थी राधा जी की शादी और क्या वो वास्तविकता में श्री कृष्ण की प्रेमिका थीं?भारतीय पुराणों के मुताबिक राधा मां लक्ष्मी का अवतार थीं और भगवान कृष्ण विष्णु भगवान के अवतार थे। मां लक्ष्मी ने एक बार ये बात कही थी कि विष्णु के अलावा वो किसी और की जीवनसंगिनी नहीं बन सकतीं। गर्ग संहिता के मुताबिक़ भगवान कृष्ण और राधा की शादी स्वयं परमपिता ब्रम्हा ने करवाई थी। अक्सर ही नंद बाबा बाल गोपाल को भंडीर ग्राम ले जाते थे कि अचानक एक दिन जब वो भांडीर जा रहे थे तो चुंधियाती रोशनी के साथ बहुत तेज़ का तूफ़ान आया। इतनी रोशनी कि नंद बाबा अपनी आंखें भी नहीं खोल पा रहे थे उसी समय उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई दिव्य शक्ति उनके आसपास है।  ऐसी मान्यता है कि वो शक्ति साक्षात राधारानी ही थीं। बताया जाता है राधारानी के प्रकट होते ही कृष्ण भी किशोर रूप में आ गए और ठीक उसी समय भंडीर के जंगल में परमपिता ब्रम्हा ने ललिता और विशाखा के सामने उनका विवाह संपन्न कराया। जैसे ही शादी संपन्न हुई वातावरण पूर्ववत हो गया। और ब्रह्मा जी समेत राधा, ललिता, विशाखा  अंतर्ध्यान हो गए और कृष्ण ने भी बाल गोपाल का रूप ले लिया।
राधारानी की शादी: 
इसके इतर एक कहानी और है जिसके अनुसार राधारानी का विवाह भगवान कृष्ण से ना हो कर अभिमन्यु से हुआ था। एक पौराणिक किवदंती के मुताबिक, जावत गांव में जतिला नाम की एक गोपी थी उसका पुत्र था अभिमन्यु। योगमाया के प्रभाव से राधारानी का विवाह जतिला के पुत्र अभिमन्यु से हुआ था। 
योगमाया की शक्तियों के कारण अभिमन्यु कभी राधा को स्पर्श तक न कर पाया। इसके अलवा अभिमन्यु बहुत शर्मीला और व्यस्त भी था, वो कभी अपने संकोच से बाहर ही नहीं आ पाया। तो इस सन्दर्भ में कोई भी ऐसी जानकारी नहीं है जिसे प्रमाणिक माना जा सके लेकिन वो कृष्ण की प्रेमिका थीं इस सत्य से सभी वाकिफ हैं। 

राधा और रुक्मिणी में से लक्ष्मी कौन ?

चराचर जगत में रुक्मिणी और राधा का संबंध श्रीकृष्ण से है। संसार रुक्मिणी जी को श्रीकृष्ण की पत्नी और राधा जी को श्रीकृष्ण की प्रेमिका के रूप में मानता है। आम जगत में रुक्मिणी और राधा की यही पहचान है परंतु क्या कभी आपके मन में यह प्रशन उठा है की राधा और रुक्मिणी में से कौन लक्ष्मी का अवतरण था ? इस लेख के माध्यम से हम शास्त्रों के अनुसार इस तथ्य से आप सभी पाठकों को रूबरू करवाते हैं। 

शास्त्रों में लक्ष्मी जी के रहस्य को इस प्रकार उजागर किया है कि लक्ष्मी जी क्षीरसागर में अपने पति श्री विष्णु के साथ रहती हैं एवं अपने अवतरण स्वरुप में राधा के रूप में कृष्ण के साथ गोलोक में रहती हैं। महाभारत में लक्ष्मी के ‘विष्णुपत्नी लक्ष्मी’ एवं ‘राज्यलक्ष्मी’ ऐसे दो प्रकार बताए गए हैं। इनमें से लक्ष्मी हमेशा विष्णु के पास रहती हैं एवं राज्यलक्ष्मी पराक्रमी राजाओं के साथ विचरण करती हैं।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार विष्णु के दक्षिणांग से लक्ष्मी का, एवं वामांग से लक्ष्मी के ही अन्य एक अवतार राधा का जन्म हुआ था। ब्रह्मवैवर्त पुराण में निर्दिष्ट लक्ष्मी के अवतार एवं उनके प्रकट होने के स्थान इस प्रकार है 

1.महालक्ष्मी जो वैकुंठ में निवास करती हैं। 

2. स्वर्गलक्ष्मी जो स्वर्ग में निवास करती हैं। 

3. राधा जी गोलोक में निवास करती हैं।

4. राजलक्ष्मी (सीता) जी पाताल और भूलोक में निवास करती हैं। 

5. गृहलक्ष्मी जो गृह में निवास करती हैं। 

6. सुरभि (रुक्मणी) जो गोलोक में निवास करती हैं।

7. दक्षिणा जो यज्ञ में निवास करती हैं।

8. शोभा जो हर वस्तु में निवास करती हैं।

लक्ष्मी रहस्य का रूपकात्मक दिग्दर्शन करने वाली अनेकानेक वृतांत और कथाएं महाभारत जैसे शास्त्रों में वर्णित हैं। जिनमें से एक वृतांत है "लक्ष्मी-रुक्मिणी संवाद"  महाभारत के एक प्रसंग में लक्ष्मी के रहस्य से संबंधित एक प्रशन युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा था, जिसका जवाब देते समय भीष्म ने लक्ष्मी एवं रुक्मिणी के दरम्यान हुए एक संवाद की जानकारी युधिष्ठिर को दी। महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार, लक्ष्मी ने रुक्मिणी से कहा था, की मेरा निवास तुममे (रुक्मिणी) और और राधा में समानता से है तथा गोकुल कि गाएं एवं गोबर में भी मेरा निवास है। श्रीकृष्ण के तत्व दर्शन अनुसार रुक्मिणी को देह और राधा को आत्मा माना गया है। श्रीकृष्ण का रुक्मिणी से दैहिक और राधा से आत्मिक संबंध माना गया है। रुक्मिणी और राधा का दर्शन बहुत गहरा है। इसे सम्पूर्ण सृष्टि के दर्शन से जोड़कर देखें तो सम्पूर्ण जगत की तीन अवस्थाएं हैं।

 1. स्थूल; 2. सूक्ष्म; 3. कारण

स्थूल जो दिखाई देता है जिसे हम अपने नेत्रों से देख सकते हैं और हाथों से छू सकते हैं वह कृष्ण-दर्शन में रुक्मणी कहलाती हैं। सूक्ष्म जो दिखाई नहीं देता और जिसे हम न नेत्रों से देख सकते हैं न ही स्पर्श कर सकते हैं, उसे केवल महसूस किया जा सकता है वही राधा है और जो इन स्थूल और सूक्ष्म अवस्थाओं का कारण है वह हैं श्रीकृष्ण और यही कृष्ण इस मूल सृष्टि का चराचर हैं। अब दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो स्थूल देह और सूक्ष्म आत्मा है। स्थूल में सूक्ष्म समा सकता है परंतु सूक्ष्म में स्थूल नहीं। स्थूल प्रकृति और सूक्ष्म योगमाया है और सूक्ष्म आधार शक्ति भी है लेकिन कारण की स्थापना और पहचान राधा होकर ही की जा सकती है।


राधा- कृष्णा विरह


देवी रूक्मिणी का जन्म अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में हुआ था और श्री कृष्ण का जन्म भी कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को हुआ था व देवी राधा वह भी अष्टमी तिथि को अवतरित हुई थी. राधा जी के जन्म में और देवी रूक्मिणी के जन्म में एक अन्तर यह है कि देवी रूक्मिणी का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधा जी का शुक्ल पक्ष में. राधा जी को नारद जी के श्राप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रूक्मिणी से कृष्ण जी की शादी हुई. राधा और रूक्मिणी यूं तो दो हैं परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी के ही अंश हैं.रामचरित मानस के बालकाण्ड में जैसा कि तुलसी दास जी ने लिखा है कि नारद जी को यह अभिमान हो गया था कि उन्होंने काम पर विजय प्राप्त कर लिया है. नारद जी की परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया से एक नगर का निर्माण किया. उस नगर के राजा ने अपनी रूपवती पुत्री के लिए स्वयंवर का आयोजन किया. स्वयंर में नारद मुनि भी पहुचे और कामदेव के वाणों से घायल होकर राजकुमारी को देखकर मोहित हो गये.राजकुमारी से विवाह की इच्छा लेकर वह भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे निवेदन करने लगे कि प्रभु मुझे आप अपना सुन्दर रूप प्रदान करें क्योंकि मुझे राजकुमारी से प्रेम हो गया है और मैं उससे विवाह की इच्छा रखता हूं. नारद जी के वचनों को सुनकर भगवान मुस्कुराए और कहा तुम्हें विष्णु रूप देता हूं. जब नारद विष्णु रूप लेकर स्वयंवर में पहुंचे तब उस राजकुमारी ने विष्णु जी के गले में वर माला डाल दी. नारद जी वहां से दु:खी होकर चले आ रहे थे. मार्ग में उन्हें एक जलाशय दिखा जिसमें उन्होंने चेहरा देखा तो समझ गये कि विष्णु भगवान ने उनके साथ छल किया है और उन्हें वानर रूप दिया है.नारद क्रोधित होकर वैकुण्ड पहुंचे और भगवान को बहुत भला बुरा कहा और उन्हें पत्नी का वियोग का वियोग सहना होगा यह श्राप दिया. नारद जी के इस श्राप की वजह से रामावतार में भगवान रामचन्द्र जी को सीता का वियोग सहना पड़ा था और कृष्णावतार में देवी राधा का.वास्तव में देवी राधा और रूक्मिणी एक ही हैं अत: रूक्मिणी अष्टमी का महत्व वही है जो राधाष्टमी का. जो इनकी उपासना करता है उन्हें देवी लक्ष्मी की उपासना का फल प्राप्त होता है. श्री कृष्ण ने देवी रूक्मिणी के प्रेम और पतिव्रत को देखते हुए उन्हें वरदान दिया कि जो व्यक्ति पूरे वर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन आपका व्रत और पूजन करेगा और पौष मास की कृष्ण अष्टमी को व्रत कर के उसका उद्यापन यानी समापन करेगा उसे कभी धनाभाव का सामना नहीं करना होगा. जो आपका भक्त होगा उसे देवी लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होगी.

भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधा की पुजा क्यो ?

कहते हैं कि राधा और कृष्ण के प्रेम की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी। कृष्ण नंदगांव में रहते थे और राधा बरसाने में। नंदगांव और बरसाने से मथुरा लगभग 42-45 किलोमीटर दूर है। अब सवाल यह उठता है कि जब 11 वर्ष की अवस्था में श्रीकृष्ण मथुरा चले गए थे, तो इतनी लघु अवस्था में गोपियों के साथ प्रेम या रास की कल्पना कैसे की जा सकती है? उल्लेखनीय है कि महाभारत या भागवत पुराण में 'राधा' के नाम का जरा भी उल्लेख नहीं मिलता है। फिर यह राधा नाम की महिला भगवान कृष्ण के जीवन में कैसे आ गई या कहीं यह मध्यकाल के कवियों की कल्पना तो नहीं?
यह सच है कि कृष्ण से जुड़े ग्रंथों में राधा का नाम नहीं है। सुखदेवजी ने भी भागवत में राधा का नाम नहीं लिया।यदि भगवान कृष्ण के जीवन में राधा का जरा भी महत्व था, तो क्यों नहीं राधा का नाम कृष्ण से जुड़े ग्रंथों में मिलता है?
मध्यकाल या भक्तिकाल में राधा और कृष्ण की प्रेमकथा को विस्तार मिला। अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया गया और कृष्ण के योद्धा चरित्र का नाश कर दिया गया। राधा-कृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ-संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की। निम्बार्क, चैतन्य, बल्लभ, राधावल्लभ, स्वामी हरिदास का सखी- ये संप्रदाय राधा-कृष्ण भक्ति के 5 स्तंभ बनकर खड़े हैं। निम्बार्क का जन्म 1250 ईस्वी में हुआ। इसका मतलब कृष्ण की भक्ति के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई। उसके पूर्व यह प्रचलन में नहीं थी?

  • पांचों संप्रदायों में सबसे प्राचीन निम्बार्क और राधावल्लभ दो संप्रदाय हैं। दक्षिण के आचार्य निम्बार्कजी ने सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया।राधावल्भ संप्रदाय के लोग कहते हैं कि राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक श्रीकृष्ण वंशी अवतार कहे जाने वाले और वृंदावन के प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने वाले रसिकाचार्य हित हरिवंशजी महाप्रभु के संप्रदाय की प्रवर्तक आचार्य राधा हैं।

इन दोनों संप्रदायों में राधाष्टमी के उत्सव का विशेष महत्व है। निम्बार्क व राधावल्लभ संप्रदाय का प्रमुख गढ़ वृंदावन है। निम्बार्क संप्रदाय के विद्वान व वृंदावन शोध संस्थान से जुड़े छीपी गली निवासी वृंदावन बिहारी कहते हैं कि कृष्ण सर्वोच्च प्रेमी थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वैष्णवाचार्यों ने भी अपने-अपने तरीकों से उनकी आराधना की है।
निम्बार्क संप्रदाय कहता है कि श्याम और श्यामा का एक ही स्वरूप हैं। भगवान कृष्णने अपनी लीलाओं के लिए स्वयं से राधा का प्राकट्य किया और दो शरीर धारण कर लिए। लेकिन यह तो भक्तिभाव में कही गई बाते हैं, इनमें तथ्य कहां है? इतिहास अलौकिक बातों से नहीं बनता। ऐसी बातें करने वालों को झूठा माना जाता है और ऐसे ही लोग तो धर्म की प्रतिष्ठा गिराते हैं। आखिर सच क्या है?
बरसाना और नंदगांव :राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। वृषभानु वैश्य थे। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्णकी मित्र थीं और उसका विवाह रापाण, रायाण अथवा अयनघोष नामक व्यक्ति के साथ हुआ था। उस जमाने में स्त्री का विवाह किशोर अवस्था में ही कर दिया जाता था। बरसाना और नंदगाव के बीच 4 मील का फासला है।
महाभारत के सभी प्रमुख पात्र भीष्म, द्रोण, व्यास, कर्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर आदि श्रीकृष्ण के महान-चरित्र की प्रशंसा करते थे। उस काल में भी परस्त्री से अवैध संबंध रखना दुराचार माना जाता था। यदि श्रीकृष्ण का भी राधा नामक किसी औरत से संबंध हुआ होता तो श्रीकृष्ण पर भी अंगुली उठाई जाती?
कहते हैं कि राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया था। ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड के 5वें अध्याय में श्लोक 25, 26 के अनुसार राधा को कृष्ण की पुत्री सिद्ध किया गया है। राधा का पति रायाण गोलोक में श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप था। अतः गोलोक के रिश्ते से राधा श्रीकृष्ण की पुत्रवधू हुई। माना जाता है कि गोकुल में रायाण रहते थे।
ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय 48 के अनुसार राधा कृष्णकी पत्नी (विवाहिता) थीं, जिनका विवाह ब्रह्मा ने करवाया। इसी पुराण के प्रकृति खंड अध्याय 49 श्लोक 35, 36, 37, 40, 47 के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की मामी थीं, क्योंकि उनका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायाण के साथ हुआ था।
'राधा' ये नाम श्रीमदभागवत् पुराण मेँ ढुंडने पर भी नहीँ मिलता तो फिर ये 'राधा' हैँ कौन,
गिता प्रेस गोरखपुर का श्रीमदभागवत, लेकिन उसके 980 पन्नो मे से कीसी भी पन्ने पर 'राधा' ये नाम लिखा हीँ नहीँ हैँ,
 फिर भी सारी दुनिया ने उस सच्चिदानंद परमेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को भुल कर राधे राधे कहती नहीँ थकती, और इधर भगवान गिता मे कहते हैँ 
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! तू मुझमें मन लगानेवाला हो, मेरा ही भक्त बन, मेरा ही पूजन करने वाला हो और मुझको ही प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है ॥65॥
फिर राधे राधे रटने से बिहारी कैसे आ सकते हैँ और राधा का पुजन करने वालो को श्रीकृष्ण कसै प्राप्त हो सकते हैँ और भगवान तो प्रतिज्ञा लेकर बताते हैँ की मेरा ही पुजन कर और मुझको ही प्रणाम कर,


शुक्रवार, 11 मई 2018

माँ का कर्ज नहीं चुका सकते लेकिन आभार जरूर प्रकट कर सकते हैं

मदर्स डे पर विशेष 
अन्तर्राष्ट्रीय मातृत्व दिवस सम्पूर्ण मातृ-शक्ति को समर्पित एक महत्वपूर्ण दिवस है, जिसे मदर्स डे, मातृ दिवस या माताओं का दिन चाहे जिस नाम से पुकारें यह दिन सबके मन में विशेष स्थान लिये हुए है। पूरी जिंदगी भी समर्पित कर दी जाए तो मां के ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता है। संतान के लालन-पालन के लिए हर दुख का सामना बिना किसी शिकायत के करने वाली मां के साथ बिताये दिन सभी के मन में आजीवन सुखद व मधुर स्मृति के रूप में सुरक्षित रहते हैं। भारतीय संस्कृति में मां के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा रही है, लेकिन आज आधुनिक दौर में जिस तरह से मदर्स डे मनाया जा रहा है, उसका इतिहास भारत में बहुत पुराना नहीं है। इसके बावजूद दो-तीन दशक से भी कम समय में भारत में मदर्स डे काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
अलौकिक शब्द है माँ

मातृ दिवस-समाज में माताओं के प्रभाव व सम्मान का उत्सव है। मां शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। मां के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्दों में नहीं होती। मां नाम है संवेदना, भावना और अहसास का। मां के आगे सभी रिश्ते बौने पड़ जाते हैं। मातृत्व की छाया में मां न केवल अपने बच्चों को सहेजती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसका सहारा बन जाती है। समाज में मां के ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिन्होंने अकेले ही अपने बच्चों की जिम्मेदारी निभाई। मातृ दिवस सभी माताओं का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। एक बच्चे की परवरिश करने में माताओं द्वारा सहन की जाने वालीं कठिनाइयों के लिये आभार व्यक्त करने के लिये यह दिन मनाया जाता है। कवि रॉबर्ट ब्राउनिंग ने मातृत्व को परिभाषित करते हुए कहा है- सभी प्रकार के प्रेम का आदि उद्गम स्थल मातृत्व है और प्रेम के सभी रूप इसी मातृत्व में समाहित हो जाते हैं। प्रेम एक मधुर, गहन, अपूर्व अनुभूति है, पर शिशु के प्रति मां का प्रेम एक स्वर्गीय अनुभूति है।
‘मां!’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘मां’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘मां’ की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। जिन्होंने आपको और आपके परिवार को आदर्श संस्कार दिए। उनके दिए गए संस्कार ही मेरी दृष्टि में आपकी मूल थाती है। जो हर मां की मूल पहचान होती है।
 माँ से ही मिलता है संस्कार
हर संतान अपनी मां से ही संस्कार पाता है। लेकिन मेरी दृष्टि में संस्कार के साथ-साथ शक्ति भी मां ही देती है। इसलिए हमारे देश में मां को शक्ति का रूप माना गया है और वेदों में मां को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। श्रीमद् भगवद् पुराण में उल्लेख मिलता है कि माता की सेवा से मिला आशीष सात जन्मों के कष्टों व पापों को दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है।
 माँ के बारे में महान लोगों का कथन
प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने मां की महिमा को उजागर करते हुए कहा है कि जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी मां के चेहरे पर एक सन्तोषजनक मुस्कान थी। एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं। अब्राहम लिंकन का मां के बारे में मार्मिक कथन है कि जो भी मैं हूँ, या होने की उम्मीद है, मैं उसके लिए अपने प्यारी माँ का कर्जदार हूँ। किसी औलाद के लिए ‘माँ’ शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से ही नहीं होता बल्कि उसके लिए माँ शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लिए उसका संसार होता है।
 मुसीबत में माँ ही क्यों याद आती है?
क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में माँ ही क्यों याद आती है क्योंकि वो माँ ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्मे होते हैं। बचपन में हमारा रातों का जागना, जिस वजह से कई रातों तक माँ सो भी नहीं पाती थी। वह गिले में सोती और हमें सूखे में सुलाती। जितना माँ ने हमारे लिए किया है उतना कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। जाहिर है माँ के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी, कई सदियां भी कम है।
‘मां’-इस लघु शब्द में प्रेम की विराटता/समग्रता निहित है। अणु-परमाणुओं को संघटित करके अनगिनत नक्षत्रों, लोक-लोकान्तरों, देव-दनुज-मनुज तथा कोटि-कोटि जीव प्रजातियों को मां ने ही जन्म दिया है। मां के अंदर प्रेम की पराकाष्ठा है या यूं कहें कि मां ही प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम की यह चरमता केवल माताओं में ही नहीं, वरन् सभी मादा जीवों में देखने को मिलती है। अपने बच्चों के लिए भोजन न मिलने पर हवासिल (पेलिकन) नाम की जल-पक्षिनी अपना पेट चीर कर अपने बच्चों को अपना रक्त-मांस खिला-पिला देती है।
माँ के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?
कितनी दयनीय बात है कि देश ने स्त्री की शक्ति के रूप में अवधारणा दी, जिसने पुराणों के पृष्ठों में देवताओं को 4 या 8 हाथ दिये किन्तु देवियों को 108 हाथ दिये, उसी ने स्त्रियों को पुरुषों से नीचा स्थान दिया और उन्हें वेद पढ़ने के अधिकार से वंचित कर दिया और सबसे शोचनीय बात यह है कि उन्हें चारदिवारी में बंद कर दिया।’’ ‘मां’ को देवी सम्मान दिलाना वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता में से एक है। मां प्राण है, मां शक्ति है, मां ऊर्जा है, मां प्रेम, करुणा और ममता का पर्याय है। मां केवल जन्मदात्री ही नहीं जीवन निर्मात्री भी है। मां धरती पर जीवन के विकास का आधार है। मां ने ही अपने हाथों से इस दुनिया का ताना-बाना बुना है। सभ्यता के विकास क्रम में आदिमकाल से लेकर आधुनिककाल तक इंसानों के आकार-प्रकार में, रहन-सहन में, सोच-विचार, मस्तिष्क में लगातार बदलाव हुए। लेकिन मातृत्व के भाव में बदलाव नहीं आया। उस आदिमयुग में भी मां, मां ही थी। तब भी वह अपने बच्चों को जन्म देकर उनका पालन-पोषण करती थीं। उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा करना सिखाती थी। आज के इस आधुनिक युग में भी मां वैसी ही है। मां नहीं बदली। विक्टर ह्यूगो ने मां की महिमा इन शब्दों में व्यक्त की है कि एक मां की गोद कोमलता से बनी रहती है और बच्चे उसमें आराम से सोते हैं।
 धरती की विधाता है माँ
मां को धरती पर विधाता की प्रतिनिधि कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सच तो यह है कि मां विधाता से कहीं कम नहीं है। क्योंकि मां ने ही इस दुनिया को सिरजा और पाला-पोशा है। कण-कण में व्याप्त परमात्मा किसी को नजर आये न आए मां हर किसी को हर जगह नजर आती है। कहीं अण्डे सेती, तो कहीं अपने शावक को, छोने को, बछड़े को, बच्चे को दुलारती हुई नजर आती है। मां एक भाव है मातृत्व का, प्रेम और वात्सल्य का, त्याग का और यही भाव उसे विधाता बनाता है।
मां विधाता की रची इस दुनिया को फिर से, अपने ढंग से रचने वाली विधाता है। मां सपने बुनती है और यह दुनिया उसी के सपनों को जीती है और भोगती है। मां जीना सिखाती है। पहली किलकारी से लेकर आखिरी सांस तक मां अपनी संतान का साथ नहीं छोड़ती। मां पास रहे या न रहे मां का प्यार दुलार, मां के दिये संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं। मां ही अपनी संतानों के भविष्य का निर्माण करती हैं। इसीलिए मां को प्रथम गुरु कहा गया है। स्टीव वंडर ने सही कहा है कि मेरी माँ मेरी सबसे बड़ी अध्यापक थी, करुणा, प्रेम, निर्भयता की एक शिक्षक। अगर प्यार एक फूल के जितना मीठा है, तो मेरी माँ प्यार का मीठा फूल है।
कन्याभ्रूणों की हत्या नृशंस
प्रथम गुरु के रूप में अपनी संतानों के भविष्य निर्माण में मां की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मां कभी लोरियों में, कभी झिड़कियों में, कभी प्यार से तो कभी दुलार से बालमन में भावी जीवन के बीज बोती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मातृत्व के भाव पर नारी मन के किसी दूसरे भाव का असर न आए। जैसाकि आज कन्याभ्रूणों की हत्या का जो सिलसिला बढ़ रहा है, वह नारी-शोषण का आधुनिक वैज्ञानिक रूप है तथा उसके लिए मातृत्व ही जिम्मेदार है। महान् जैन आचार्य एवं अणुव्रत आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य तुलसी की मातृ शक्ति को भारतीय संस्कृति से परिचित कराती हुई निम्न प्रेरणादायिनी पंक्तिया पठनीय ही नहीं, मननीय भी हैं- ‘‘भारतीय मां की ममता का एक रूप तो वह था, जब वह अपने विकलांग, विक्षिप्त और बीमार बच्चे का आखिरी सांस तक पालन करती थी। परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा की गई उसकी उपेक्षा से मां पूरी तरह से आहत हो जाती थी। वही भारतीय मां अपने अजन्मे, अबोल शिशु को अपनी सहमति से समाप्त करा देती है। क्यों? इसलिए नहीं कि वह विकलांग है, विक्षिप्त है, बीमार है पर इसलिए कि वह एक लड़की है। क्या उसकी ममता का स्रोत सूख गया है? कन्याभ्रूणों की बढ़ती हुई हत्या एक ओर मनुष्य को नृशंस करार दे रही है, तो दूसरी ओर स्त्रियों की संख्या में भारी कमी मानविकी पर्यावरण में भारी असंतुलन उत्पन्न कर रही है।’’ अन्तर्राष्ट्रीय मातृ-दिवस को मनाते हुए मातृ-महिमा पर छा रहे ऐसे अनेक धुंधलों को मिटाना जरूरी है, तभी इस दिवस की सार्थकता है।
- अरुण बंछोर 

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

भारत के ये 30 मंदिर सुनाते हैं आस्था और वैभव की दास्तां

कहा जाता है कि भारत की भूमि विद्वानों की भूमि है, जिसके पीछे भारत का गौरवशाली इतिहास गवाह रहा है. चिकित्सा से ले कर विज्ञान के क्षेत्र में आगे होने के बावजूद यह देश कई मायनों में बाकी देशों से हटकर है जिसमें आस्था भी एक अहम भूमिका निभाती है, जो इस देश को इतनी विविधता होने के बावजूद एक धागे में बांधे रखता है.इस आस्था को बनाये रखने में यहां मौजूद मंदिरों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता. चलिए आज हम आपको भारत के ऐसे ही 30 मंदिरों की सैर पर ले चलते हैं जो लोगों की आस्था का केंद्र तो है ही, इसी के साथ-साथ भारत के गौरवशाली इतिहास को भी समेटे हुए है.  - अरुण बंछोर

1. बद्रीनाथ मंदिर
उत्तराखंड का चमोली डिस्ट्रिक्ट, अलकनंदा नदी का किनारा भगवान बद्रीनाथ के घर के नाम से भी जाता है. बद्रीनाथ मंदिर हिन्दू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक है. इसके अलावा बद्रीनाथ में भी एक छोटा चार धाम है जिसमे भगवन विष्णु के एक सौ आठ मंदिर हैं जो भगवन विष्णु को समर्पित हैं.
भगवान विष्णु की यात्रा करने वाले लोगों का यहां तांता लगा रहता है पर यहां पर की जाने वाली यात्रा केवल अप्रैल से ले कर सितम्बर तक ही रहती है. इस मंदिर से सम्बंधित दो खास फेस्टिवल हैं जो इसकी खासियत को और बढ़ाते हैं. माता मूर्ति का मेला: भगवान बद्रीनाथ की पूजा शुरू हो कर यह मेला सितम्बर तक चलता है जब तक कि मंदिर के कपाट बंद नहीं हो जाते.बद्री-केदार फेस्टिवल: आठ दिनों तक चलने वाला यह मेला बद्रीनाथ और केदारनाथ दोनों जगहों पर जून के महीने में मनाया जाता है.

2. सूर्य मंदिर, कोणार्क
ओड़िसा की पूरी डिस्ट्रिक्ट के पास है कोणार्क जो मंदिर के रूप में वास्तुकला का अद्भुत नमूना है. यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है. रथ के आकार में बने इस मंदिर में बारह पहिये हैं जिसे सात घोड़े खींचते हुए महसूस होते है.रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इस मंदिर की खूबसूरती के बारे में कहा था की "यहां पत्थरों की भाषा इंसानों की भाषा को मात देती नज़र आती है".

3. बृहदीस्वरा मंदिर
बृहदीस्वरा मंदिर, को पेरुवुडइयर कोविल, राजराजेस्वरम भी कहा जाता है जिसे ग्याहरवीं सदी में चोल साम्राजय के राजा चोल ने बनवाया था. भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है. यह मंदिर ग्रेनाइट की विशाल चट्टानों को काटकर वास्तु शास्त्र के हिसाब से बनाया गया है. इसमें एक खासियत यह है कि दोपहर बारह बजे इस मंदिर की परछाई जमीन पर नहीं पड़ती.

4. सोमनाथ मंदिर
गीता, स्कंदपुराण और शिवपुराण जैसी प्राचीन किताबों में भी सोमनाथ मंदिर का जिक्र मिलता है. सोम का मतलब है चन्द्रमा और सोमनाथ का मतलब, चन्द्रमा की रक्षा करने वाला. एक कहानी के अनुसार सोम नाम का एक व्यक्ति अपने पिता के श्राप की वजह से काफी बीमार हो गया था. तब भगवान शिव ने उसे बीमारी से छुटकारा दिलाया था, जिसके बाद शिव के सम्मान में सोम ने यह मंदिर बनवाया.
यह मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है जो शौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र में है. ऐसी मान्यता है कि यह वही क्षेत्र है जहां कृष्ण अपना शरीर त्यागा था.
यह मंदिर अरब सागर के किनारे बना हुआ है और साउथ पोल और इसके बीच कोई जमीन नहीं है.

5.केदारनाथ मंदिर
हिमालय की गोद, गढ़वाल क्षेत्र में भगवान शिव के अलोकिक मंदिरों में से एक केदारनाथ मंदिर स्थित है. एक कहानी के अनुसार इसका निर्माण पांडवों ने युद्ध में कौरवों की मृत्यु के प्राश्चित के लिए बनवाया था. आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने इसको दोबारा restored करवाया. यह उत्तराखंड के छोटे चार धामों में से एक है जिसके लिए यहां आने वालों को 14 किलोमीटर के पहाड़ी रास्तों पर से गुजरना पड़ता है.
यह मंदिर ठन्डे ग्लेशियर और ऊंची चोटियों से घिरा हुआ है जिनकी ऊंचाई लगभग 3,583 मीटर तक है. सर्दियों के दौरान यह मंदिर बंद कर दिया जाता है. सर्दी अधिक पड़ने की सूरत में भगवन शिव को उखीमठ ले जाया जाता है और पांच-छह महीने वहीं उनकी पूजा की जाती है.

6.सांची स्तूप
सांची, मध्य-प्रदेश के रायसेन डिस्ट्रिक्ट का एक सा गांव है जो कि बौद्धिक व ऐतिहसिक इमारतों का घर है जो यहां तीसरी ईसा पूर्व और बारवीं सदी के दौरान बनाये गए थे. इन सबमें सबसे प्रमुख है सांची स्तूप जहां महात्मा बुद्ध के अवशेष संभाल कर रखे गये हैं.इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक द्वारा कराया गया था. इसके चार दरवाजे हैं जो प्रेम, श्रद्धा, शांति और विश्वास को दर्शाते हैं. UNESCOc द्वारा सांची स्तूप को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दिया चुका है.

7.रामनाथस्वामी (रामेश्वरम) मंदिर
ये मंदिर तमिलनाडु के पास एक छोटे से द्वीप के समीप है जिसे रामेश्वरम के नाम से जाना जाता है. यह हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार उनके चार पवित्र धामों में से एक है.एक मान्यता के अनुसार जब भगवान राम, रावण को हरा कर आये थे तो पश्चाताप के लिए उन्होंने शिव की पूजा करने की योजना बनाई क्योंकि उनके हाथों से एक ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी थी. शिव की पूजा के लिए उन्होंने हनुमान को कैलाश भेजा जिससे वह उनके लिंग रूप को वहां ला सकें. पर जब तक हनुमान वापिस लौटते तब तक सीता माता रेत का एक लिंग बना चुकी थी. हनुमान द्वारा लाए गए लिंग को विश्वलिंग खा गया जबकि सीता द्वारा बनाये गए लिंग को रामलिंग कहा गया. भगवान राम के आदेश से आज भी रामलिंग से पहले विश्वलिंग की पूजा की जाती है.

8.वैष्णो देवी मंदिर
जम्मू कश्मीर के कटरा से 12 किलोमीटर त्रिकुट की पहाड़ियों पर जमीन से 5200 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है वह पवित्र गुफा जहां माता वैष्णो देवी के दर्शन होते है.आज वहां वैष्णो देवी तीन पत्थरों के रूप में रहती है जिसे पिंडी कहा जाता है. हर साल लाखों लोग माता से आशीर्वाद लेने यहां आते हैं ऐसी मान्यता है कि माता अपने यहां आने वाले लोगों को खुद decide करती हैं और कोई भी व्यक्ति उन्ही की इच्छा से उन तक पहुंच पाता है.

9.सिद्धिविनायक मंदिर
मुंबई के प्रभा देवी में स्थित है सिद्धिविनायक मंदिर जिसे अठारवीं सदी में बनाया गया था. ऐसा माना जाता है कि किसी भी काम को शुरू करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है इसलिए उन्हें विघ्नहर्ता भी कहा जाता है.वैसे तो इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, पर मंगलवार के दिन खासतौर पर यहां भीड़ रहती है.

10.गंगोत्री मंदिर
उत्तराखंड के उत्तरकाशी के गंगोत्री को गंगा का उद्भव स्थल माना जाता है. जब भागीरथ गंगा को स्वर्ग से लेकर आये थे तो यहीं पर भगवान शिव ने उन्हें जटाओं में बांधकर जमीन पर उतारा था. अठांरवीं सदी में बना यह मंदिर सफ़ेद ग्रेनाइट से बना हुआ है.

11.गोल्डन टेम्पल, अमृतसर
गोल्डन टेम्पल को हरमंदिर साहिब के नाम से भी जाना जाता है. यह सिखों के पवित्र स्थानों में से एक है. इस गुरुद्वारे के चार दरवाजे है जो कि यह दर्शाते है कि इस मंदिर के दरवाजे सभी के लिए खुले हुए हैं, चाहे वह किसी धर्म को मानने वाला हो, किसी भी सम्प्रदाय का हो. यह मंदिर यूनिवर्सल भाईचारे का अद्भुत नमूना है. गुरु ग्रन्थ साहिब को सबसे पहले इसी मंदिर में रखा गया था.

12.काशी विश्वनाथ मंदिर, बनारस
काशी विश्वनाथ मंदिर, पवित्र एवं प्राचीन शहर बनारस में स्थित है. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है. विश्वनाथ का मतलब होता है विश्व का स्वामी. यह इस मंदिर की खासियत ही थी जो यहां गुरु नानक से लेकर तुलसीदास, विवेकानंद और आदि शंकराचार्य जैसे लोगों को खुद तक खींच लाई. ऐसा मानना है कि इस मंदिर को देखने मात्र से मोक्ष के सारे दरवाजे खुल जाते हैं.

13.जगन्नाथ मंदिर
बारवीं सदी में बना यह मंदिर उड़ीसा के पुरी में बना हुआ है जिस कारण इसे जगन्नाथ पुरी के नाम से भी जाना जाता है. यह मंदिर भगवान कृष्णा के साथ-साथ उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा को समर्पित है. इस मंदिर में गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है.

14.यमुनोत्री टेम्पल
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में उन्नीसवीं सदी का बना यह मंदिर कई बार प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हो चुका है. गंगा के बाद यमुना को भी काफी पवित्रता कि दृष्टि से देखा जाता है.जमीन से 3291 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां यमुना देवी कि पूजा की जाती है. मंदिर के दरवाजे अक्षय त्रित्या से लेकर दिवाली तक श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते है

15.मिनाक्षी टेम्पल, मदुरई
मदुरई का मीनाक्षी मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध है बल्कि यह कला के दीवानों के लिए भी किसी जन्नत से कम नहीं है. यह मंदिर देवी पार्वती और उनके पति शिव को समर्पित है.मंदिर के बीचों बीच एक सुनहरा कमल रुपी तालाब है. मंदिर में करीब 985 पिल्लर हैं, हर पिल्लर को अलग अलग कला कृतियों द्वारा उकेरा गया है. इस मंदिर का नाम विश्व के सात अजूबों के लिए भी भेजा जा चुका है.

16.अमरनाथ केव टेम्पल
जम्मू कश्मीर की बर्फीली पहाड़ियों में ज़मीन से 3888 मीटर ऊपर 5000 साल पुरानी गुफ़ा मौजूद है, जहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 5 दिनों में 40 मील की चढ़ाई करनी पड़ती है.यह क्षेत्र साल भर बर्फ़ से ढका रहता है, यहां कि यात्रा केवल गर्मियों के दौरान ही की जाती है.उस समय भी यह क्षेत्र काफ़ी हद तक बर्फ़ से ढका हुआ रहता है.

17.लिंगराज मंदिर
मंदिरों के शहर उड़ीसा में एक और मंदिर है जो बड़ा होने के साथ-साथ अपने साथ इतिहास को भी समेटे हुए है. यह मंदिर श्रद्धालुओं के साथ साथ इतिहासकारों को भी अपनी तरफ आकर्षित करता है जिसकी वजह यहां कि एतिहासिक इमारते है.वैसे तो यह मंदिर शिव को समर्पित है पर यहां शिव के साथ साथ भगवान विष्णु कि भी पूजा कि जाती है, जिस कारण यह हरिहर के नाम से भी जाना जाता है.

18.तिरुपति बालाजी
आन्ध्र प्रदेश की तिरुमाला पहाडियों में बसा है तिरुमाला वेंकटेश्वारा मंदिर जिसे तिरुपति बालाजी के नाम से जाना जाता है, भगवान विष्णु को समर्पित है. यह मंदिर भारत में मौजूद सबसे अमीर मंदिरों में शुमार है. यहां पर प्रसाद के रूप में मिलने वाला लड्डू अपने स्वाद के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है.यहां पर मन्नत पूरी हो जाने पर लोग अपने बालों का चढ़ावा चढ़ाते हैं, जिससे यहां लगभग लाखों डॉलरों की कमाई होती है.

19.कांचीपुरम मंदिर
कांचीपुरम, साड़ियों के अलावा एक और चीज़ के लिए पहचाना जाता है. वो है यहां पर मौजूद हजारों मंदिर, जिसकी वजह से इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है.

20.खजुराहो टेम्पल
इस मंदिर की खासियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि UNESCO द्वारा इसे वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया गया है.यहां पर 10 वीं और 12 वीं सदी के कई मंदिर मौजूद है जो जैन और हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं, जिनकी नक्काशी किसी को भी अपनी तरफ़ खींचने की क्षमता रखती है.

21.विरूपक्षा टेम्पल
7 वीं सदी में हम्पी में बना यह मंदिर आज भी अपने पूजा पाठ के लिए जाना जाता है. इसे unesco द्वारा राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जा चुका है.
यह मंदिर धार्मिक दृष्टि के अलावा पर्यटन कि दृष्टि से भी काफी महत्व रखता है.

22.अक्षरधाम मंदिर
यमुना का किनारा जहां एक ओर दिल्ली को दो भागों में बांटता है, वहीं अक्षरधाम मंदिर आस्था के जरिये दिल्ली के दोनों किनारों को आपस में जोड़ता है.
अक्षरधाम मंदिर, वास्तुशास्त्र और पंचशास्त्र के नियमों को ध्यान में रख कर बनाया गया है. इसका मुख्य गुम्बद मंदिर से करीब 11 फीट ऊंचा है.इस मंदिर को बनाने में राजस्थानी गुलाबी पत्थरों का उपयोग किया गया है.यहां पर होने वाला लाइट और म्यूजिक शो मंदिर कि सुन्दरता में चार चांद लगा देता है

23.श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर
पुरानी दिल्ली अपने आप में कई तह्ज़ीबों और संस्कृतियों को खुद में समेटे हुए है इन्हीं संस्कृतियों में से एक है श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर, जिसे मुग़ल शासक शांहजहां के समय में बनाया गया था.यह मंदिर होने के साथ साथ पक्षियों के लिए एक चैरिटेबल हॉस्पिटल भी चलाता है, जहां असहाय पक्षियों का ईलाज किया जाता है.

24.गोमतेश्वर मंदिर
10 वीं सदी में कर्णाटक के श्रवानाबेलागोला में बना यह मंदिर भगवान बाहुबली को समर्पित है जिन्हें गोमतेश्वर के नाम से भी जाना जाता है. यह मंदिर जैन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी महत्व रखता है.इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हर 12 साल बाद यहां महामस्तक अभिषेक किया जाता है, जो जैनियों के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है.

25.रणकपुर मंदिर
उदयपुर और जोधपुर के बीच पाली डिस्ट्रिक्ट में गांव रणकपुर में यह मंदिर स्थित है जिसे जैन धर्म के 5 पवित्र स्थलों में शुमार किया जाता है.यह पूरा मंदिर हल्के सफ़ेद रंग के मार्बल से बना हुआ है. जिसमें 1400 नक्काशी किये हुए पिलर लगे हुए हैं. यह मंदिर केवल प्राक्रतिक रौशनी का ही इस्तेमाल करता है, जिससे आध्यात्म में मदद मिलती है.

26.साईं बाबा मंदिर, शिर्डी
मुंबई से 296 किलोमीटर दूर शिर्डी में साईं बाबा कि समाधी पर यह मंदिर बना हुआ है. हर साल लगभग 25000 श्रद्धालु यहां बाबा के दर्शन के लिए आते है. राम नवमी, दशहरा और गुरु पूर्णिमा के दिन यहां खासतौर पर मेला लगता है.

27.श्री पद्मनाभस्वामी टेम्पल
केरला के तिरुवनंतपुरम में श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर स्थित है जो कि भगवान विष्णु को समर्पित है. यहां केवल हिन्दू ही प्रवेश कर सकते है. इस मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को सिर्फ धोती, जबकि औरतों को साड़ी पहनना जरुरी होता है.

28.द्वारकाधीश मंदिर
जैसा कि इस मंदिर के नाम से प्रतीत होता है, यह द्वारका में है और भगवान कृष्ण को समर्पित है. इसको जगत मंदिर भी कहा जाता है. यहां के प्रवेश द्वार को स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार भी कहते है.

29.लक्ष्मी नारायण मंदिर
दिल्ली में इस मंदिर को बल्दो दास बिरला ने बनवाया था जबकि इसका उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था जो कि हर जाति वर्ग के लिए खुला था.
वैसे तो यह मंदिर लक्ष्मी और नारायण को समर्पित है पर मंदिर में इनके अलावा शिव, गणेश व अन्य भगवानों की मूर्तियां भी है.

30.इस्कॉन मंदिर
इस्कॉन मंदिर को कृष्ण बलराम मंदिर भी कहा जाता है जिसे 1975 में वृन्दावन में इस्कॉन समूह द्वारा बनवाया गया था. इस्कॉन मंदिर अपनी पवित्रता और सफाई के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है.इसके अंदर कृष्ण, राधा और बलराम कि पूजा की जाती है.

सोमवार, 4 जुलाई 2016

पर्यटकों की पहली पसंद है भारतीय शहर

भारत के टॉप 10 ऐतिहासिक स्थल, जहाँ लगता है पर्यटकों का मेला
भारत दुनिया भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां की संस्कृति पूरी दुनिया में मशहूर है। पर्यटक यहां शांति की खोज के लिए भी आते हैं। यहां पर्यटन के लिए बहुत सुंदर स्थल हैं। गौरतलब है कि भारत तेज़ी से विदेशी पर्यटकों के लिए पसंदीदा स्थल के रूप में उभर रहा है। हर साल यहां दुनिया के कोने कोने से पर्यटक आते हैं और यहां की सुंदरता और विविधता का आनंद लेते हैं। कभी त्यौहार, तो कभी किसी समारोह में आने वाले विदेशी पर्यटक यहां के रंग में रंग जाते हैं। भारत के लोगों का अपनापन भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। आज हम आपको भारत के कुछ चुनिंदा ऐतिहासिक स्थलों के बारे में बता रहे हैं। यहां फैमिली या पार्टनर के साथ भी आया जा सकता है।आइए हम आपको भारत के 10 खूबसूरत शहरों का भ्रमण कराते हैं|                      - अरुण बंछोर    
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हवा महल, जयपुर
गुलाबी नगरी जयपुर की आलीशान इमारत ‘हवामहल’ राजस्थान के प्रतीक के रूप में दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इस इमारत में 365 खिड़कियां और झरोखे बने हैं। इसका निर्माण 1799 में जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। राजस्थानी और फारसी स्थापत्य शैलियों के मिले-जुले रूप में बनी यह इमारत जयपुर के ‘बड़ी चौपड़’ चौराहे से चांदी की टकसाल जाने वाले रास्ते पर स्थित है। हवामहल के आनंदपोल और चांदपोल नाम के दो द्वार हैं। आनंदपोल पर बनी गणेश प्रतिमा के कारण इसे गणेश पोल भी कहते हैं। गुलाबी नगरी का यह गुलाबी गौरव अपनी अद्भुत बनावट के कारण ही आज विश्वविख्यात है।

चारमीनार, हैदराबाद
हैदराबाद शहर की पहचान बन चुका चारमीनार इस्लामिक वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। चारमीनार 1591 में शहर के अंदंर प्लेग की समाप्ति की खुशी में मुहम्मद कुली कुतुबशाह द्वारा बनवाई गई वास्तुकला का एक नमूना है। शहर की पहचान मानी जाने वाली चारमीनार चार मीनारों से मिलकर बनी एक चौकोर प्रभावशाली इमारत है। इसके मेहराब में हर शाम रोशनी की जाती है, जो एक अविस्मरणीय दृश्य बन जाता है। हैदराबाद हवाई जहाज, रेल, बस और टैक्सी से पहुंचा जा सकता है। चारमीनार हैदराबाद रेलवे स्टेशन से लगभग सात किलो मीटर की दूरी पर है। यह बस स्टेशन से पांच किलो मीटर की दूरी पर है। निजी परिवहन से भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

सांची स्तूप
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और विदिशा के बीच बसा सांची स्तूप दुनियाभर के सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने यह सांची स्तूप बनवाया था। यह स्तूप शांति,आस्था, साहस और प्रेम का प्रतीक है।सम्राट अशोक ने इस स्तूप का निर्माण बौद्ध धर्म की शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए करवाया था। लंबे समय तक गुमनामी के अंधेरे में रहने वाला सांची स्तूप अब न सिर्फ दुनियाभर में मशहूर हो चुका है,बल्कि अपने ऐतिहासिक महत्व के कारण यूनेस्को के विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल है। सांची के लिए हवाई जहाज, रेल, बस आदि के द्वारा आराम से प्रस्थान किया जा सकता है।

फतेहपुर सीकरी
आगरा जिले का छोटा सा शहर फतेहपुर सीकरी आज भी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है। मुगल बादशाह अकबर ने इस शहर को बसाया था। इस शहर में मुगल सभ्यता,कला और संस्कृति की झलक मिलती है।एक दशक से भी ज़्यादा समय तक फतेहपुर सीकरी मुगलों की राजधानी था।
यहां की सबसे ऊंची इमारत बुलंद दरवाज़ा है और इसकी ऊंचाई 280 फुट है। इसे अकबर ने 1602 ई. में गुजरात विजय के स्मारक के रूप में बनवाया था। इसके अलावा जामा मस्जिद,शेख सलीम चिश्ती की समाधि,दिवान-ए-आम,दिवान-ए-खास,पंचमहल, बीरबल का महल आदि यहां की मुख्य इमारते हैं। फतेहपुर सीकरी जाने के लिए आगरा नज़दीकी एयरपोर्ट है। यहां से फतेहपूर की दूरी 40 किमी है। यहां नजदीकी रेलवे स्टेशन फतेहपुर सीकरी है।

मैसूर पैलेस
महाराजा पैलेस, राजमहल मैसूर के कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ का है। इससे पहले का राजमहल चन्दन की लकड़ियों से बना था।एक दुर्घटना में इस राजमहल की बहुत क्षति हुई जिसके बाद यह दूसरा महल बनवाया गया।मैसूर पैलेस दविड़, पूर्वी और रोमन स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है। नफासत से घिसे सलेटी पत्थरों से बना यह महल गुलाबी रंग के पत्थरों के गुंबदों से सजा है।महल में एक बड़ा सा दुर्ग है जिसके गुंबद सोने के पत्थरों से सजे हैं। ये सूरज की रोशनी में खूब जगमगाते हैं।दूसरे महलों की तरह यहां भी राजाओं के लिए दीवान-ए-खास और आम लोगों के लिए दीवान-ए-आम है। यहां बहुत से कक्ष हैं जिनमें चित्र और राजसी हथियार रखे गए हैं। राजसी पोशाकें, आभूषण, तुन (महोगनी) की लकड़ी की बारीक नक्काशी वाले बड़े-बड़े दरवाज़ें और छतों में लगे झाड़-फानूस महल की शोभा में चार चांद लगाते हैं। यह महल सुबह 10 से शाम के 4.30 बजे तक खुला रहता है। शाम के समय रोशनी में नहाए मैसूर पैलेस की शोभा देखते ही बनती है। यह महल अब म्यूज़ियम में तब्दील हो चुका है।

लाल किला, दिल्ली
लाल किले की नींव शाहजहां के शासन काल में पड़ी थी। इसे पूरा होने में 9 साल का समय लगा। अधिकांश इस्लामिक इमारतों की तरह यह किला भी अष्टभुजाकार है। उत्तर में यह किला सलीमगढ़ किले से जुड़ा हुआ है। लाहौरी गेट के अलावा यहां प्रवेश का दूसरा द्वार हाथीपोल है। इसके बारे में माना जाता है कि यहां पर राजा और उनके मेहमान हाथी से उतरते थे।लाल किले के अन्य प्रमुख आकर्षण हैं मुमताज महल, रंग महल, खास महल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, हमाम और शाह बुर्ज। यह किला भारत की शान है। इसी किले पर स्वतंत्रता दिवस के दिन भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और भाषण देते हैं। 1562-1572 के बीच बना यह मकबरा आज दिल्ली के प्रमुख पर्यटक स्थलों में एक है। इसके फारसी वास्तुकार मिरक मिर्जा गियायुथ की छाप इस इमारत पर साफ देखी जा सकती है। यह मकबरा यमुना नदी के किनारे संत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास स्थित है। यूनेस्को ने इसे विश्वश धरोहर का दर्जा दिया है।

पुराना किला, दिल्ली 
इस किले का निर्माण सूर वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी ने 16वीं सदी में करवाया था। 1539-40 में शेरशाह सूरी ने मुगल बादशाह हुमायूं को हराकर दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया। 1545 में उनकी मृत्यु के बाद हुमायूं ने पुन: दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया था। शेरशाह सूरी द्वारा बनवाई गई लाल पत्थरों की इमारत शेर मंडल में हुमायूं ने अपना पुस्तकालय बनाया। यह किला केवल देशी-विदेशी पर्यटकों को ही आकर्षित नहीं करता बल्कि इतिहासकारों को भी लुभाता है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व विभाग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस स्थान पर पुराना किला बना है उस स्थान पर इंद्रप्रस्थ बसा हुआ था। इंद्रप्रस्थ को पुराणों में महाभारत काल का नगर माना जाता है। इसमें प्रवेश करने के तीन दरवाजे हैं- हुमायूं दरवाजा, तलकी दरवाजा और बड़ा दरवाजा।वर्तमान में यहां एक बोट क्लब है जहां नौकायन का आनंद लिया जा सकता है। पास ही चिड़ियाघर भी है।

आमेर महल, जयपुर 
जयपुर के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में शुमार है आमेर का शानदार महल। अरावली की मध्यम ऊंचाई पर स्थित आमेर महल का निर्माण सोलहवीं सदी में किया गया था। इस शानदार महल को देखते हुए उस समय की उत्कृष्ट मुगल और राजपूत निर्माण शैली का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस भव्य महल की तुलना दुनिया के शानदार महलों से की जाती है। आमेर महल में विशाल जलेब चौक, शिला माता मंदिर, दीवाने आम, गणेश पोल, शीश महल, सुख मंदिर, मुगल गार्डन, रानियों के महल आदि सब देखने लायक हैं। शीश महल में कांच की नक्काशी का जादू ऐसा है कि मुगले आजम से लेकर जोधा अकबर तक दर्जनों बॉलीवुड फिल्मों में अपनी धाक जमा चुका है। हाल ही आमेर महल से जयगढ़ जाने के लिए एक पुरानी टनल को पर्यटकों के लिए खोला गया है।जयगढ़ किले पर रखी जयबाण तोप एशिया की विशाल तोपों में से एक है।

जलमहल, जयपुर 
जलमहल पानी पर तैरते खूबसूरत शिकारे की तरह लगने वाला एक शानदार ऐतिहासिक स्थल है।  जयपुर शहर से लगभग 8 किमी उत्तर में आमेर रोड पर जलमहल स्थित है। मानसागर झील के बीच स्थित इस महल की खूबसूरती बेमिसाल है। इसका निर्माण आमेर में लगातार पानी की कमी के चलते कराया गया था। जयपुर के राजा महाराजा यहां अवकाश मनाने के लिए आते थे। वर्तमान में यह पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। जलमहल तक पहुंचने के लिए शहर से सिटी बस उपलब्ध हैं। इसके अलावा निजी वाहन या टैक्सी से भी यहां पहुंचा जा सकता है। जलमहल के अंदर पहुंचने के लिए नौकाओं की व्यवस्था है।

जैसलमेर का किला
राजस्थान में थार की मरूभूमि के हृदय स्थल पर चस्पा जैसलमेर एक ऐसा रेतीला परिवेश है, जहां सुनहरे सपनों की फसलें खूब फलती-फूलती हैं। यह क्षेत्र मरूभूमि पर सुनहरी मरीचिका के समान है जहां एक बार जाने के बाद पर्यटक बार-बार जाने का मोह नहीं छोड़ पाते। जैसलमेर के दर्शनीय स्थलों में यहां का प्राचीनतम किला सबसे खास है। यह किला नगर के सामान्य भू-स्तर से लगभग 100 मीटर ऊपर स्थित है। यहां स्थापित समाधियों की छतों में बारीक नक्काशी देखने लायक है। यही नहीं, यहां पूर्व सम्राटों की नक्काशीदार घुड़सवार मूर्तियों का जादू भी सिर चढ़कर बोलता है। कब जाएं: जैसलमेर जाने का सबसे सही समय अक्टूबर से मार्च होता है। हर साल जनवरी-फरवरी में जैसलमेर में रेगिस्तान उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान ऊंट की दौड़, लोक संगीत और नृत्य और पपेट शो आयोजित किए जाते हैं।