शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

भारत के ये 30 मंदिर सुनाते हैं आस्था और वैभव की दास्तां

कहा जाता है कि भारत की भूमि विद्वानों की भूमि है, जिसके पीछे भारत का गौरवशाली इतिहास गवाह रहा है. चिकित्सा से ले कर विज्ञान के क्षेत्र में आगे होने के बावजूद यह देश कई मायनों में बाकी देशों से हटकर है जिसमें आस्था भी एक अहम भूमिका निभाती है, जो इस देश को इतनी विविधता होने के बावजूद एक धागे में बांधे रखता है.इस आस्था को बनाये रखने में यहां मौजूद मंदिरों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता. चलिए आज हम आपको भारत के ऐसे ही 30 मंदिरों की सैर पर ले चलते हैं जो लोगों की आस्था का केंद्र तो है ही, इसी के साथ-साथ भारत के गौरवशाली इतिहास को भी समेटे हुए है.  - अरुण बंछोर

1. बद्रीनाथ मंदिर
उत्तराखंड का चमोली डिस्ट्रिक्ट, अलकनंदा नदी का किनारा भगवान बद्रीनाथ के घर के नाम से भी जाता है. बद्रीनाथ मंदिर हिन्दू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक है. इसके अलावा बद्रीनाथ में भी एक छोटा चार धाम है जिसमे भगवन विष्णु के एक सौ आठ मंदिर हैं जो भगवन विष्णु को समर्पित हैं.
भगवान विष्णु की यात्रा करने वाले लोगों का यहां तांता लगा रहता है पर यहां पर की जाने वाली यात्रा केवल अप्रैल से ले कर सितम्बर तक ही रहती है. इस मंदिर से सम्बंधित दो खास फेस्टिवल हैं जो इसकी खासियत को और बढ़ाते हैं. माता मूर्ति का मेला: भगवान बद्रीनाथ की पूजा शुरू हो कर यह मेला सितम्बर तक चलता है जब तक कि मंदिर के कपाट बंद नहीं हो जाते.बद्री-केदार फेस्टिवल: आठ दिनों तक चलने वाला यह मेला बद्रीनाथ और केदारनाथ दोनों जगहों पर जून के महीने में मनाया जाता है.

2. सूर्य मंदिर, कोणार्क
ओड़िसा की पूरी डिस्ट्रिक्ट के पास है कोणार्क जो मंदिर के रूप में वास्तुकला का अद्भुत नमूना है. यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है. रथ के आकार में बने इस मंदिर में बारह पहिये हैं जिसे सात घोड़े खींचते हुए महसूस होते है.रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इस मंदिर की खूबसूरती के बारे में कहा था की "यहां पत्थरों की भाषा इंसानों की भाषा को मात देती नज़र आती है".

3. बृहदीस्वरा मंदिर
बृहदीस्वरा मंदिर, को पेरुवुडइयर कोविल, राजराजेस्वरम भी कहा जाता है जिसे ग्याहरवीं सदी में चोल साम्राजय के राजा चोल ने बनवाया था. भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है. यह मंदिर ग्रेनाइट की विशाल चट्टानों को काटकर वास्तु शास्त्र के हिसाब से बनाया गया है. इसमें एक खासियत यह है कि दोपहर बारह बजे इस मंदिर की परछाई जमीन पर नहीं पड़ती.

4. सोमनाथ मंदिर
गीता, स्कंदपुराण और शिवपुराण जैसी प्राचीन किताबों में भी सोमनाथ मंदिर का जिक्र मिलता है. सोम का मतलब है चन्द्रमा और सोमनाथ का मतलब, चन्द्रमा की रक्षा करने वाला. एक कहानी के अनुसार सोम नाम का एक व्यक्ति अपने पिता के श्राप की वजह से काफी बीमार हो गया था. तब भगवान शिव ने उसे बीमारी से छुटकारा दिलाया था, जिसके बाद शिव के सम्मान में सोम ने यह मंदिर बनवाया.
यह मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है जो शौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र में है. ऐसी मान्यता है कि यह वही क्षेत्र है जहां कृष्ण अपना शरीर त्यागा था.
यह मंदिर अरब सागर के किनारे बना हुआ है और साउथ पोल और इसके बीच कोई जमीन नहीं है.

5.केदारनाथ मंदिर
हिमालय की गोद, गढ़वाल क्षेत्र में भगवान शिव के अलोकिक मंदिरों में से एक केदारनाथ मंदिर स्थित है. एक कहानी के अनुसार इसका निर्माण पांडवों ने युद्ध में कौरवों की मृत्यु के प्राश्चित के लिए बनवाया था. आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने इसको दोबारा restored करवाया. यह उत्तराखंड के छोटे चार धामों में से एक है जिसके लिए यहां आने वालों को 14 किलोमीटर के पहाड़ी रास्तों पर से गुजरना पड़ता है.
यह मंदिर ठन्डे ग्लेशियर और ऊंची चोटियों से घिरा हुआ है जिनकी ऊंचाई लगभग 3,583 मीटर तक है. सर्दियों के दौरान यह मंदिर बंद कर दिया जाता है. सर्दी अधिक पड़ने की सूरत में भगवन शिव को उखीमठ ले जाया जाता है और पांच-छह महीने वहीं उनकी पूजा की जाती है.

6.सांची स्तूप
सांची, मध्य-प्रदेश के रायसेन डिस्ट्रिक्ट का एक सा गांव है जो कि बौद्धिक व ऐतिहसिक इमारतों का घर है जो यहां तीसरी ईसा पूर्व और बारवीं सदी के दौरान बनाये गए थे. इन सबमें सबसे प्रमुख है सांची स्तूप जहां महात्मा बुद्ध के अवशेष संभाल कर रखे गये हैं.इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक द्वारा कराया गया था. इसके चार दरवाजे हैं जो प्रेम, श्रद्धा, शांति और विश्वास को दर्शाते हैं. UNESCOc द्वारा सांची स्तूप को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दिया चुका है.

7.रामनाथस्वामी (रामेश्वरम) मंदिर
ये मंदिर तमिलनाडु के पास एक छोटे से द्वीप के समीप है जिसे रामेश्वरम के नाम से जाना जाता है. यह हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार उनके चार पवित्र धामों में से एक है.एक मान्यता के अनुसार जब भगवान राम, रावण को हरा कर आये थे तो पश्चाताप के लिए उन्होंने शिव की पूजा करने की योजना बनाई क्योंकि उनके हाथों से एक ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी थी. शिव की पूजा के लिए उन्होंने हनुमान को कैलाश भेजा जिससे वह उनके लिंग रूप को वहां ला सकें. पर जब तक हनुमान वापिस लौटते तब तक सीता माता रेत का एक लिंग बना चुकी थी. हनुमान द्वारा लाए गए लिंग को विश्वलिंग खा गया जबकि सीता द्वारा बनाये गए लिंग को रामलिंग कहा गया. भगवान राम के आदेश से आज भी रामलिंग से पहले विश्वलिंग की पूजा की जाती है.

8.वैष्णो देवी मंदिर
जम्मू कश्मीर के कटरा से 12 किलोमीटर त्रिकुट की पहाड़ियों पर जमीन से 5200 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है वह पवित्र गुफा जहां माता वैष्णो देवी के दर्शन होते है.आज वहां वैष्णो देवी तीन पत्थरों के रूप में रहती है जिसे पिंडी कहा जाता है. हर साल लाखों लोग माता से आशीर्वाद लेने यहां आते हैं ऐसी मान्यता है कि माता अपने यहां आने वाले लोगों को खुद decide करती हैं और कोई भी व्यक्ति उन्ही की इच्छा से उन तक पहुंच पाता है.

9.सिद्धिविनायक मंदिर
मुंबई के प्रभा देवी में स्थित है सिद्धिविनायक मंदिर जिसे अठारवीं सदी में बनाया गया था. ऐसा माना जाता है कि किसी भी काम को शुरू करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है इसलिए उन्हें विघ्नहर्ता भी कहा जाता है.वैसे तो इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, पर मंगलवार के दिन खासतौर पर यहां भीड़ रहती है.

10.गंगोत्री मंदिर
उत्तराखंड के उत्तरकाशी के गंगोत्री को गंगा का उद्भव स्थल माना जाता है. जब भागीरथ गंगा को स्वर्ग से लेकर आये थे तो यहीं पर भगवान शिव ने उन्हें जटाओं में बांधकर जमीन पर उतारा था. अठांरवीं सदी में बना यह मंदिर सफ़ेद ग्रेनाइट से बना हुआ है.

11.गोल्डन टेम्पल, अमृतसर
गोल्डन टेम्पल को हरमंदिर साहिब के नाम से भी जाना जाता है. यह सिखों के पवित्र स्थानों में से एक है. इस गुरुद्वारे के चार दरवाजे है जो कि यह दर्शाते है कि इस मंदिर के दरवाजे सभी के लिए खुले हुए हैं, चाहे वह किसी धर्म को मानने वाला हो, किसी भी सम्प्रदाय का हो. यह मंदिर यूनिवर्सल भाईचारे का अद्भुत नमूना है. गुरु ग्रन्थ साहिब को सबसे पहले इसी मंदिर में रखा गया था.

12.काशी विश्वनाथ मंदिर, बनारस
काशी विश्वनाथ मंदिर, पवित्र एवं प्राचीन शहर बनारस में स्थित है. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है. विश्वनाथ का मतलब होता है विश्व का स्वामी. यह इस मंदिर की खासियत ही थी जो यहां गुरु नानक से लेकर तुलसीदास, विवेकानंद और आदि शंकराचार्य जैसे लोगों को खुद तक खींच लाई. ऐसा मानना है कि इस मंदिर को देखने मात्र से मोक्ष के सारे दरवाजे खुल जाते हैं.

13.जगन्नाथ मंदिर
बारवीं सदी में बना यह मंदिर उड़ीसा के पुरी में बना हुआ है जिस कारण इसे जगन्नाथ पुरी के नाम से भी जाना जाता है. यह मंदिर भगवान कृष्णा के साथ-साथ उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा को समर्पित है. इस मंदिर में गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है.

14.यमुनोत्री टेम्पल
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में उन्नीसवीं सदी का बना यह मंदिर कई बार प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हो चुका है. गंगा के बाद यमुना को भी काफी पवित्रता कि दृष्टि से देखा जाता है.जमीन से 3291 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां यमुना देवी कि पूजा की जाती है. मंदिर के दरवाजे अक्षय त्रित्या से लेकर दिवाली तक श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते है

15.मिनाक्षी टेम्पल, मदुरई
मदुरई का मीनाक्षी मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध है बल्कि यह कला के दीवानों के लिए भी किसी जन्नत से कम नहीं है. यह मंदिर देवी पार्वती और उनके पति शिव को समर्पित है.मंदिर के बीचों बीच एक सुनहरा कमल रुपी तालाब है. मंदिर में करीब 985 पिल्लर हैं, हर पिल्लर को अलग अलग कला कृतियों द्वारा उकेरा गया है. इस मंदिर का नाम विश्व के सात अजूबों के लिए भी भेजा जा चुका है.

16.अमरनाथ केव टेम्पल
जम्मू कश्मीर की बर्फीली पहाड़ियों में ज़मीन से 3888 मीटर ऊपर 5000 साल पुरानी गुफ़ा मौजूद है, जहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 5 दिनों में 40 मील की चढ़ाई करनी पड़ती है.यह क्षेत्र साल भर बर्फ़ से ढका रहता है, यहां कि यात्रा केवल गर्मियों के दौरान ही की जाती है.उस समय भी यह क्षेत्र काफ़ी हद तक बर्फ़ से ढका हुआ रहता है.

17.लिंगराज मंदिर
मंदिरों के शहर उड़ीसा में एक और मंदिर है जो बड़ा होने के साथ-साथ अपने साथ इतिहास को भी समेटे हुए है. यह मंदिर श्रद्धालुओं के साथ साथ इतिहासकारों को भी अपनी तरफ आकर्षित करता है जिसकी वजह यहां कि एतिहासिक इमारते है.वैसे तो यह मंदिर शिव को समर्पित है पर यहां शिव के साथ साथ भगवान विष्णु कि भी पूजा कि जाती है, जिस कारण यह हरिहर के नाम से भी जाना जाता है.

18.तिरुपति बालाजी
आन्ध्र प्रदेश की तिरुमाला पहाडियों में बसा है तिरुमाला वेंकटेश्वारा मंदिर जिसे तिरुपति बालाजी के नाम से जाना जाता है, भगवान विष्णु को समर्पित है. यह मंदिर भारत में मौजूद सबसे अमीर मंदिरों में शुमार है. यहां पर प्रसाद के रूप में मिलने वाला लड्डू अपने स्वाद के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है.यहां पर मन्नत पूरी हो जाने पर लोग अपने बालों का चढ़ावा चढ़ाते हैं, जिससे यहां लगभग लाखों डॉलरों की कमाई होती है.

19.कांचीपुरम मंदिर
कांचीपुरम, साड़ियों के अलावा एक और चीज़ के लिए पहचाना जाता है. वो है यहां पर मौजूद हजारों मंदिर, जिसकी वजह से इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है.

20.खजुराहो टेम्पल
इस मंदिर की खासियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि UNESCO द्वारा इसे वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया गया है.यहां पर 10 वीं और 12 वीं सदी के कई मंदिर मौजूद है जो जैन और हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं, जिनकी नक्काशी किसी को भी अपनी तरफ़ खींचने की क्षमता रखती है.

21.विरूपक्षा टेम्पल
7 वीं सदी में हम्पी में बना यह मंदिर आज भी अपने पूजा पाठ के लिए जाना जाता है. इसे unesco द्वारा राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जा चुका है.
यह मंदिर धार्मिक दृष्टि के अलावा पर्यटन कि दृष्टि से भी काफी महत्व रखता है.

22.अक्षरधाम मंदिर
यमुना का किनारा जहां एक ओर दिल्ली को दो भागों में बांटता है, वहीं अक्षरधाम मंदिर आस्था के जरिये दिल्ली के दोनों किनारों को आपस में जोड़ता है.
अक्षरधाम मंदिर, वास्तुशास्त्र और पंचशास्त्र के नियमों को ध्यान में रख कर बनाया गया है. इसका मुख्य गुम्बद मंदिर से करीब 11 फीट ऊंचा है.इस मंदिर को बनाने में राजस्थानी गुलाबी पत्थरों का उपयोग किया गया है.यहां पर होने वाला लाइट और म्यूजिक शो मंदिर कि सुन्दरता में चार चांद लगा देता है

23.श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर
पुरानी दिल्ली अपने आप में कई तह्ज़ीबों और संस्कृतियों को खुद में समेटे हुए है इन्हीं संस्कृतियों में से एक है श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर, जिसे मुग़ल शासक शांहजहां के समय में बनाया गया था.यह मंदिर होने के साथ साथ पक्षियों के लिए एक चैरिटेबल हॉस्पिटल भी चलाता है, जहां असहाय पक्षियों का ईलाज किया जाता है.

24.गोमतेश्वर मंदिर
10 वीं सदी में कर्णाटक के श्रवानाबेलागोला में बना यह मंदिर भगवान बाहुबली को समर्पित है जिन्हें गोमतेश्वर के नाम से भी जाना जाता है. यह मंदिर जैन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी महत्व रखता है.इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हर 12 साल बाद यहां महामस्तक अभिषेक किया जाता है, जो जैनियों के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है.

25.रणकपुर मंदिर
उदयपुर और जोधपुर के बीच पाली डिस्ट्रिक्ट में गांव रणकपुर में यह मंदिर स्थित है जिसे जैन धर्म के 5 पवित्र स्थलों में शुमार किया जाता है.यह पूरा मंदिर हल्के सफ़ेद रंग के मार्बल से बना हुआ है. जिसमें 1400 नक्काशी किये हुए पिलर लगे हुए हैं. यह मंदिर केवल प्राक्रतिक रौशनी का ही इस्तेमाल करता है, जिससे आध्यात्म में मदद मिलती है.

26.साईं बाबा मंदिर, शिर्डी
मुंबई से 296 किलोमीटर दूर शिर्डी में साईं बाबा कि समाधी पर यह मंदिर बना हुआ है. हर साल लगभग 25000 श्रद्धालु यहां बाबा के दर्शन के लिए आते है. राम नवमी, दशहरा और गुरु पूर्णिमा के दिन यहां खासतौर पर मेला लगता है.

27.श्री पद्मनाभस्वामी टेम्पल
केरला के तिरुवनंतपुरम में श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर स्थित है जो कि भगवान विष्णु को समर्पित है. यहां केवल हिन्दू ही प्रवेश कर सकते है. इस मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को सिर्फ धोती, जबकि औरतों को साड़ी पहनना जरुरी होता है.

28.द्वारकाधीश मंदिर
जैसा कि इस मंदिर के नाम से प्रतीत होता है, यह द्वारका में है और भगवान कृष्ण को समर्पित है. इसको जगत मंदिर भी कहा जाता है. यहां के प्रवेश द्वार को स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार भी कहते है.

29.लक्ष्मी नारायण मंदिर
दिल्ली में इस मंदिर को बल्दो दास बिरला ने बनवाया था जबकि इसका उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था जो कि हर जाति वर्ग के लिए खुला था.
वैसे तो यह मंदिर लक्ष्मी और नारायण को समर्पित है पर मंदिर में इनके अलावा शिव, गणेश व अन्य भगवानों की मूर्तियां भी है.

30.इस्कॉन मंदिर
इस्कॉन मंदिर को कृष्ण बलराम मंदिर भी कहा जाता है जिसे 1975 में वृन्दावन में इस्कॉन समूह द्वारा बनवाया गया था. इस्कॉन मंदिर अपनी पवित्रता और सफाई के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है.इसके अंदर कृष्ण, राधा और बलराम कि पूजा की जाती है.

सोमवार, 4 जुलाई 2016


पर्यटकों की पहली पसंद है भारतीय शहर

भारत के टॉप 10 ऐतिहासिक स्थल, जहाँ लगता है पर्यटकों का मेला
भारत दुनिया भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां की संस्कृति पूरी दुनिया में मशहूर है। पर्यटक यहां शांति की खोज के लिए भी आते हैं। यहां पर्यटन के लिए बहुत सुंदर स्थल हैं। गौरतलब है कि भारत तेज़ी से विदेशी पर्यटकों के लिए पसंदीदा स्थल के रूप में उभर रहा है। हर साल यहां दुनिया के कोने कोने से पर्यटक आते हैं और यहां की सुंदरता और विविधता का आनंद लेते हैं। कभी त्यौहार, तो कभी किसी समारोह में आने वाले विदेशी पर्यटक यहां के रंग में रंग जाते हैं। भारत के लोगों का अपनापन भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। आज हम आपको भारत के कुछ चुनिंदा ऐतिहासिक स्थलों के बारे में बता रहे हैं। यहां फैमिली या पार्टनर के साथ भी आया जा सकता है।आइए हम आपको भारत के 10 खूबसूरत शहरों का भ्रमण कराते हैं|                      - अरुण बंछोर    
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हवा महल, जयपुर
गुलाबी नगरी जयपुर की आलीशान इमारत ‘हवामहल’ राजस्थान के प्रतीक के रूप में दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इस इमारत में 365 खिड़कियां और झरोखे बने हैं। इसका निर्माण 1799 में जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। राजस्थानी और फारसी स्थापत्य शैलियों के मिले-जुले रूप में बनी यह इमारत जयपुर के ‘बड़ी चौपड़’ चौराहे से चांदी की टकसाल जाने वाले रास्ते पर स्थित है। हवामहल के आनंदपोल और चांदपोल नाम के दो द्वार हैं। आनंदपोल पर बनी गणेश प्रतिमा के कारण इसे गणेश पोल भी कहते हैं। गुलाबी नगरी का यह गुलाबी गौरव अपनी अद्भुत बनावट के कारण ही आज विश्वविख्यात है।

चारमीनार, हैदराबाद
हैदराबाद शहर की पहचान बन चुका चारमीनार इस्लामिक वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। चारमीनार 1591 में शहर के अंदंर प्लेग की समाप्ति की खुशी में मुहम्मद कुली कुतुबशाह द्वारा बनवाई गई वास्तुकला का एक नमूना है। शहर की पहचान मानी जाने वाली चारमीनार चार मीनारों से मिलकर बनी एक चौकोर प्रभावशाली इमारत है। इसके मेहराब में हर शाम रोशनी की जाती है, जो एक अविस्मरणीय दृश्य बन जाता है। हैदराबाद हवाई जहाज, रेल, बस और टैक्सी से पहुंचा जा सकता है। चारमीनार हैदराबाद रेलवे स्टेशन से लगभग सात किलो मीटर की दूरी पर है। यह बस स्टेशन से पांच किलो मीटर की दूरी पर है। निजी परिवहन से भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

सांची स्तूप
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और विदिशा के बीच बसा सांची स्तूप दुनियाभर के सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने यह सांची स्तूप बनवाया था। यह स्तूप शांति,आस्था, साहस और प्रेम का प्रतीक है।सम्राट अशोक ने इस स्तूप का निर्माण बौद्ध धर्म की शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए करवाया था। लंबे समय तक गुमनामी के अंधेरे में रहने वाला सांची स्तूप अब न सिर्फ दुनियाभर में मशहूर हो चुका है,बल्कि अपने ऐतिहासिक महत्व के कारण यूनेस्को के विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल है। सांची के लिए हवाई जहाज, रेल, बस आदि के द्वारा आराम से प्रस्थान किया जा सकता है।

फतेहपुर सीकरी
आगरा जिले का छोटा सा शहर फतेहपुर सीकरी आज भी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है। मुगल बादशाह अकबर ने इस शहर को बसाया था। इस शहर में मुगल सभ्यता,कला और संस्कृति की झलक मिलती है।एक दशक से भी ज़्यादा समय तक फतेहपुर सीकरी मुगलों की राजधानी था।
यहां की सबसे ऊंची इमारत बुलंद दरवाज़ा है और इसकी ऊंचाई 280 फुट है। इसे अकबर ने 1602 ई. में गुजरात विजय के स्मारक के रूप में बनवाया था। इसके अलावा जामा मस्जिद,शेख सलीम चिश्ती की समाधि,दिवान-ए-आम,दिवान-ए-खास,पंचमहल, बीरबल का महल आदि यहां की मुख्य इमारते हैं। फतेहपुर सीकरी जाने के लिए आगरा नज़दीकी एयरपोर्ट है। यहां से फतेहपूर की दूरी 40 किमी है। यहां नजदीकी रेलवे स्टेशन फतेहपुर सीकरी है।

मैसूर पैलेस
महाराजा पैलेस, राजमहल मैसूर के कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ का है। इससे पहले का राजमहल चन्दन की लकड़ियों से बना था।एक दुर्घटना में इस राजमहल की बहुत क्षति हुई जिसके बाद यह दूसरा महल बनवाया गया।मैसूर पैलेस दविड़, पूर्वी और रोमन स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है। नफासत से घिसे सलेटी पत्थरों से बना यह महल गुलाबी रंग के पत्थरों के गुंबदों से सजा है।महल में एक बड़ा सा दुर्ग है जिसके गुंबद सोने के पत्थरों से सजे हैं। ये सूरज की रोशनी में खूब जगमगाते हैं।दूसरे महलों की तरह यहां भी राजाओं के लिए दीवान-ए-खास और आम लोगों के लिए दीवान-ए-आम है। यहां बहुत से कक्ष हैं जिनमें चित्र और राजसी हथियार रखे गए हैं। राजसी पोशाकें, आभूषण, तुन (महोगनी) की लकड़ी की बारीक नक्काशी वाले बड़े-बड़े दरवाज़ें और छतों में लगे झाड़-फानूस महल की शोभा में चार चांद लगाते हैं। यह महल सुबह 10 से शाम के 4.30 बजे तक खुला रहता है। शाम के समय रोशनी में नहाए मैसूर पैलेस की शोभा देखते ही बनती है। यह महल अब म्यूज़ियम में तब्दील हो चुका है।

लाल किला, दिल्ली
लाल किले की नींव शाहजहां के शासन काल में पड़ी थी। इसे पूरा होने में 9 साल का समय लगा। अधिकांश इस्लामिक इमारतों की तरह यह किला भी अष्टभुजाकार है। उत्तर में यह किला सलीमगढ़ किले से जुड़ा हुआ है। लाहौरी गेट के अलावा यहां प्रवेश का दूसरा द्वार हाथीपोल है। इसके बारे में माना जाता है कि यहां पर राजा और उनके मेहमान हाथी से उतरते थे।लाल किले के अन्य प्रमुख आकर्षण हैं मुमताज महल, रंग महल, खास महल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, हमाम और शाह बुर्ज। यह किला भारत की शान है। इसी किले पर स्वतंत्रता दिवस के दिन भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और भाषण देते हैं। 1562-1572 के बीच बना यह मकबरा आज दिल्ली के प्रमुख पर्यटक स्थलों में एक है। इसके फारसी वास्तुकार मिरक मिर्जा गियायुथ की छाप इस इमारत पर साफ देखी जा सकती है। यह मकबरा यमुना नदी के किनारे संत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास स्थित है। यूनेस्को ने इसे विश्वश धरोहर का दर्जा दिया है।

पुराना किला, दिल्ली 
इस किले का निर्माण सूर वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी ने 16वीं सदी में करवाया था। 1539-40 में शेरशाह सूरी ने मुगल बादशाह हुमायूं को हराकर दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया। 1545 में उनकी मृत्यु के बाद हुमायूं ने पुन: दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया था। शेरशाह सूरी द्वारा बनवाई गई लाल पत्थरों की इमारत शेर मंडल में हुमायूं ने अपना पुस्तकालय बनाया। यह किला केवल देशी-विदेशी पर्यटकों को ही आकर्षित नहीं करता बल्कि इतिहासकारों को भी लुभाता है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व विभाग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस स्थान पर पुराना किला बना है उस स्थान पर इंद्रप्रस्थ बसा हुआ था। इंद्रप्रस्थ को पुराणों में महाभारत काल का नगर माना जाता है। इसमें प्रवेश करने के तीन दरवाजे हैं- हुमायूं दरवाजा, तलकी दरवाजा और बड़ा दरवाजा।वर्तमान में यहां एक बोट क्लब है जहां नौकायन का आनंद लिया जा सकता है। पास ही चिड़ियाघर भी है।

आमेर महल, जयपुर 
जयपुर के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में शुमार है आमेर का शानदार महल। अरावली की मध्यम ऊंचाई पर स्थित आमेर महल का निर्माण सोलहवीं सदी में किया गया था। इस शानदार महल को देखते हुए उस समय की उत्कृष्ट मुगल और राजपूत निर्माण शैली का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस भव्य महल की तुलना दुनिया के शानदार महलों से की जाती है। आमेर महल में विशाल जलेब चौक, शिला माता मंदिर, दीवाने आम, गणेश पोल, शीश महल, सुख मंदिर, मुगल गार्डन, रानियों के महल आदि सब देखने लायक हैं। शीश महल में कांच की नक्काशी का जादू ऐसा है कि मुगले आजम से लेकर जोधा अकबर तक दर्जनों बॉलीवुड फिल्मों में अपनी धाक जमा चुका है। हाल ही आमेर महल से जयगढ़ जाने के लिए एक पुरानी टनल को पर्यटकों के लिए खोला गया है।जयगढ़ किले पर रखी जयबाण तोप एशिया की विशाल तोपों में से एक है।

जलमहल, जयपुर 
जलमहल पानी पर तैरते खूबसूरत शिकारे की तरह लगने वाला एक शानदार ऐतिहासिक स्थल है।  जयपुर शहर से लगभग 8 किमी उत्तर में आमेर रोड पर जलमहल स्थित है। मानसागर झील के बीच स्थित इस महल की खूबसूरती बेमिसाल है। इसका निर्माण आमेर में लगातार पानी की कमी के चलते कराया गया था। जयपुर के राजा महाराजा यहां अवकाश मनाने के लिए आते थे। वर्तमान में यह पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। जलमहल तक पहुंचने के लिए शहर से सिटी बस उपलब्ध हैं। इसके अलावा निजी वाहन या टैक्सी से भी यहां पहुंचा जा सकता है। जलमहल के अंदर पहुंचने के लिए नौकाओं की व्यवस्था है।

जैसलमेर का किला
राजस्थान में थार की मरूभूमि के हृदय स्थल पर चस्पा जैसलमेर एक ऐसा रेतीला परिवेश है, जहां सुनहरे सपनों की फसलें खूब फलती-फूलती हैं। यह क्षेत्र मरूभूमि पर सुनहरी मरीचिका के समान है जहां एक बार जाने के बाद पर्यटक बार-बार जाने का मोह नहीं छोड़ पाते। जैसलमेर के दर्शनीय स्थलों में यहां का प्राचीनतम किला सबसे खास है। यह किला नगर के सामान्य भू-स्तर से लगभग 100 मीटर ऊपर स्थित है। यहां स्थापित समाधियों की छतों में बारीक नक्काशी देखने लायक है। यही नहीं, यहां पूर्व सम्राटों की नक्काशीदार घुड़सवार मूर्तियों का जादू भी सिर चढ़कर बोलता है। कब जाएं: जैसलमेर जाने का सबसे सही समय अक्टूबर से मार्च होता है। हर साल जनवरी-फरवरी में जैसलमेर में रेगिस्तान उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान ऊंट की दौड़, लोक संगीत और नृत्य और पपेट शो आयोजित किए जाते हैं।

मंगलवार, 7 जून 2016

महिलाओं के लिए रोल मॉडल है हर्षा

अंतर - राष्ट्रीय कराटे खिलाड़ी और प्रशिक्षक है 
 दस हजार बच्चों को कर चुकी है प्रशिक्षित 
एक मुलाक़ात - अरुण बंछोर 
मन में दृढ़ इच्छा और लगन हो तो कोइ भी काम असम्भव नहीं होता। जो मन में ठान ले उसे पूरा करके ही रहता है। यह कर दिखाया है हर्षा साहू ने। कुश्ती चैंपियन कमलनारायण साहू और एथलेटिक्स राजेश्वरी साहू की बेटी हर्षा आज महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल है। वे राज्य से पहली अंतर्राष्ट्रीय कराटे खिलाड़ी है और यहां नन्हे मुंहे बच्चों को कराटे में प्रशिक्षित करने में जूटी हुई है। शहीद राजीव पांडे पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हर्षा की दिली तमन्ना है कि  उनके द्वारा प्रशिक्षित बच्चे भी यह अवार्ड हासिल करें। हर्षा अब तक दस हजार बच्चों को कराटे का प्रशिक्षण दे चुकी है। कई बच्चे नेशनल मेडलिस्ट भी बन गए हैं। हर्षा दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल के दफ्तर आई तो हमने उनसे हर पहलुओं पर बात की।
० कराटे के प्रति आपका रुझान कैसे हुआ ?
०० पापा को देखकर मुझे भी कुछ बनने की ललक थी। पापा कुश्ती के खिलाड़ी थे तो मैंने कराटे को चुना। माँ एथलेटिक्स है तो उनका मुझे सहयोग मिला और मै आज आपके सामने हूँ।
० आपने बहुत सारे एवार्ड और मैडल जीते ,यह कैसे संभव हुआ?
०० मन में दृढ़ इच्छा और लगन हो तो कोइ भी काम असम्भव नहीं होता। मैंने ठान ली थी कि मुझे बेस्ट कराटे चैम्पियन बनना है तो बनना है और मैंने अपनी मेहनत से इसे साबित भी किया।
० आप कब से इस क्षेत्र में है और क्यों?
०० सन 2001 में मैंने कराटे के क्षेत्र में हूँ। आत्मरक्षा के लिए यह सबसे कारगर है और एक अच्छा खेल भी। इसके कई फायदे भी है। इस दौरान मैंने कई अवार्ड और पुरूस्कार हासिल किया जिसमे सबसे बड़ा पुरूस्कार है शहीद राजीव पांडे पुरूस्कार।
० आपके प्रेरणाश्रोत और आदर्श कौन है?
०० मेरे माता पिता ही मेरे प्रेरणाश्रोत है और मेरे गुरु अजय साहू मेरे आदर्श हैं।
० अब आप बच्चों को कराटे का प्रशिक्षण दे रही है, कितने बच्चों को सीखा चुकी हैं?
०० करीब दस हजार बच्चों को मैं यह प्रशिक्षण दे चुकी हूँ। मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे नेशनल तक जा चुके हैं। कई अवार्ड और पदक जीत चुके हैं। ये मेरी उप्लब्द्धी है। उन्हें पुरूस्कार लेते हुए देखतीं हूँ तो मुझे गर्व होता है।
० आपसे प्रशिक्षण लेने वालों में लडकियां कितनी है?
०० अधिकतर लडकियां ही होती है जिन्हे हम आत्मरक्षा के गुण बतातें हैं। कराटे के प्रति लडकियों में बहुत उत्साह है। यह अच्छा संकेत भी है कि लड़कियां जागरूक हो रही हैं।
० आपकी कोइ ख्वाहिश है जो पूरा होते हुए आप देखना चाहती हैं?
०० हाँ मै अपने द्वारा प्रशिक्षित बच्चों को शहीद राजीव पाण्डे पुरूस्कार लेते हुए देखना चाहती हूँ। यही मेरा सपना है और उद्देश्य भी।
० कभी आप इस फिल्ड में निराश भी हुई हैं ?
०० हाँ जब मेरा नेशनल स्पर्धा के लिए चयन हुआ था और मै  पैसों के अभाव में नहीं जा पाई थी तब मुझे बहुत दुःख हुआ था और निराश भी। 

शनिवार, 16 जनवरी 2016

छत्तीसगढ के भीष्म पितामह मोहन

छत्तीसगढ़ी फिल्मों के भीष्म पितामह एवं गुलशन कुमार के नाम से मशहूर मोहनचंद सुंदरानी आज किसी परिचय के मोहताज नहीं है। छत्तीसगढ़ के कलाकारों को खोज-खोजकर तराशना और आगे बढ़ाना उनके जीवन का मकसद है। वे कहते हैं कि छोटे-छोटे कलाकारों को आगे बढ़ाने में उन्हें एक सुखद अनुभूति का एहसास होता है। आज भी वे गांव-गांव, गली-गली में कलाकारों की तलाश में भटकते रहते हैं। उन्हें मंच देते है उनका उत्साह बढ़ाते है। इसी कड़ी में मोहन सुंदरानी ने 2006, 10 अगस्त से 2008 दिसम्बर तक लगभग 6000 गांवों से अधिक गांवों में लोक कलाकार रथयात्रा का आयोजन कर भ्रमण किया। सुंदरानी हमेशा गरीब व जरुरत मंद लोक कलाकारों की समय-समय पर आर्थिक मदद करने में भी कभी संकोच नहीं करते। वहीं पर्यावरण संरक्षण के लिए चिंतित भी नजर आते है। इसी तारतम्य में मोहन सुंदरानी ने राज्य में हरियाली को बढ़ावा देने और प्रदूषण मुक्ति के लिए प्रदेश भर में 1 लाख से अधिक वृक्षारोपण किये हैं। ऐसी कोई जगह नहीं है जहां सेवा की जरूरत हो और वे न पहुंचे। ''हो जिनका हौसला बुलंद, भला कौन रोक सकता है उनको बुलंदियों से कुछ इन्हीं पंक्तियों के साथ छत्तीसगढ़ के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने वाले श्री सुंदरानी जो अपने धर्म, कर्म और सेवा के बलबूतों पर प्रेरणा के उदाहरण बन गये हैं। जो बिना रूके, बिना थके लगातार अपने कदम अनवरत रूप से गांव-गांव, शहर-शहर और गली-गली में बढ़ा रहे हैं। चाहे लोक कला का क्षेत्र हो, फिल्म हो, सार्वजनिक समारोह हो, कोई सामाजिक गतिविधियां हो, किसी कलाकार की सहायता हो, किसी गिरते हुए को उठाना हो, किसी प्रतिभा सम्पन्न कलाकार को मंच देना हो या फिर वर्तमान की सबसे बड़ी समस्या कन्या भ्रूण हत्या के विरूद्ध बेटी बटाओ अभियान हो। हर जगह पूरी तन्मता और कर्तव्य निष्ठता के साथ दृढ़ता पूर्वक बढ़ते नजर आते हैं। पर्यावरण की पीड़ा तो मानो उनके रग-रग में है। जो माटी की समस्या से जुड़कर माटी का सोंधी महक को सहसूस करता हो भला कौन ऐसे व्यक्तित्व के बार में जानना नहीं चाहेगा। 
कला के पुरोधा है
मोहन सुंदरानी ने, उन्होंने सिर्फ नाचा गम्मत को उठाने का काम किया बल्कि  उसमें अभिनय भी किया। नाचा गम्मत के साथ-साथ फिल्मों व रंग मंचों में भी अभिनय किया। मोहन सुंदरानी ने सदैव कला और आस्था से पूरी निष्पक्षता के साथ गीत-संगीत भजनों का निर्माण भी किया है। इसी कड़ी में उन्होंने 200 से अधिक सतनाम समाज के गुरूघासी दास बाबा के जीवन पर कथाएं, पंथी गीत भजनों के ऑडियों कैसेट का निर्माण किया है। जिसमें सतनाम समाज के कलाकारों को प्रोत्साहन व मंच मिला है। वहीं साहू समाज की पूज्यनीय संत माता कर्मा व राजीम माता के ऑडियो कैसेट का निर्माण कर इन भक्ति गीतों को जन-जन तक पहुंचाया है। 500 वर्ष पुरानी छत्तीसगढ़ी की लोक कथा लोरिक चंदा का निर्माण कर पारम्परिक बिहाव गीत जो रितिरिवाजों पर आधारित है उनको वीडियो सीडी के माध्यम से जारी कर जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। आदिवासी क्षेत्रों के लिए गौरा-गौरी, सुवा डंडा गीतों को वीडियों सीडी के रूप में निर्माण कर इन पारम्परिक कलाओं का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।
बाल कलाकारों को आगे बढ़ाया
मोहन सुंदरानी ने कई वर्षों से बाल कलाकारों को प्रोत्साहन देने, उनके अभिनय एवं कला पर आधारित धार्मिक, लोक संस्कृति व देश भक्ति वीडियो सीडी का प्रसारण मंचन प्रदेश व देश कोने-कोने में कर रहे हैं जो वास्तव में बाल कलाकारों की कला और प्रतिभा के विकास में सुनहरा कदम है।
बेबी श्रेया मिश्रा उम्र 18 वर्ष-जय हिन्द देश भक्ति गीत। बेबी शैली बिड़वईकर-वन्दे मातरम। बेबी स्तुति तिवारी- राम बनवास हिन्दी धार्मिक, राजा हरिश्चन्द्र हिन्दी धार्मिक। बेबी दिव्यांशी शुक्ला-मेरी लाज रखो मां कोराड़ी हिन्दी, मेरी लाज रखो मां महामाया हिन्दी, मां बम्लेश्वरी चालिसा हिन्दी, मेरी लाज रखो मां शारदा हिन्दी। बेबी ज्योति चंचल- भरत मिलाप छत्तीसगढ़ी, राम जन्म छत्तीसगढ़ी बेबी हेमलता साहू-नारी धरम छत्तीसगढ़ी, दानवीर राजा हरिश्चन्द्र छत्तीसगढ़ी। बेबी रिंकल सुंदरानी- गणेश मंत्र हिन्दी, गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र हिन्दी संस्कृत। मास्चर चंदन व्यास- मेरा दोस्त गणेश हिन्दी। बेबी गुरप्रीत कौन- मुठा भर लाई छत्तीसगढ़ी देवी गीत। बेबी दीप्ति बघेल- सीता राम जी का लिफाका बुंदेलखण्डी। बेबी स्वर्णा दिवाकर- ओ मेरी मईया छत्तीसगढ़ी देवी गीत, ओ मेरे सीया राम छत्तीसगढ़ी रामायण, घट घट म बसे सतनाम (पूज्यनीय गुरूघासीदास बाबा), 18 दिसम्बर महान (पूज्यनीय गुरूघासीदास बाबा), सुवा गौरा गौरी महिमा (छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति पर आधारित), मुसवा के सवारी छत्तीसगढ़ी धार्मिक इत्यादि...
कला पथ का ऐसा पथिक और कहां-  
मोहन सुंदरानी इतने जिज्ञासु और दृष्टा हैं कि वो लगातार कुछ न कुछ खोजने में लगे रहते हैं। कुछ खास बात और भी है और वो बातें छत्तीसगढ़ की पुरानी लोकगाथा लोरिक चंदा व छत्तीसगढ़ी में रामायण प्रसंगों को सीडी के माध्यम से प्रसारित करने की है। छत्तीसगढ़ी भाषा में फिल्में जय मां बम्लेश्वरी, लेडग़ा ममा, हमर माई बाप, झन भूलव बहिनी ला, बदला नागीन के, लोरिक चंदा, मया के चिटठी, संग मा जीबो संग मा मरबो, मयारू भौजी, जय महामाया, तोर मया म जादू हे, हीरो नं.-1 व गोलमाल के निर्माण के साथ प्रदेश भर में अन्य निर्माताओं के 80 से अधिक बनी फिल्मों को देश प्रदेश में वीडियो व डीवीडी के माध्यम से प्रचारित प्रसारित किये। मोहन सुंदरानी ने छत्तीसगढ़ के दूरदर्शन केन्द्र से 500 से अधिक प्रायोजित कार्यक्रमों का प्रसारण भी करवाए।
बेटी बचाओ अभियान में भी कूदे- देश- प्रदेश में बेटियों की दूर्दशा देखकर मोहन सुंदरानी ने कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में विगत कई महिनों से लगातार इस अभियान से जुडऩे के लिए शहरों गांव और गलियों में बेटियों की सुरक्षा के लिए बेटी बचाओ अभियान में काफी सक्रिय दिख रहे हैं। इस अभियान में उनके साथ हजारों ग्रामीणों, शहरियों के साथ अनेक बुद्धिजीवी लोग भी कदम से कदम मिला के चल रहें हैं और उनके इस कार्य में तमाम लोक कलाकार भी उनका साथ दे रहे हैं। मोहन सुंदरानी कन्या स्कूलों और कॉलेजो में जाकर कन्याओं को नि:शुल्क कापी वितरण की भी तैयारी कर रहें हैं। इस कार्यक्रम में लगभग 1 लाख कापी का वितरण होना है। मोहन सुंदरानी बेटियों की सुरक्षा हेतु इस बड़े मुहिम से जुड़कर निश्चित रूप से समाज के लिए प्रेरणाश्रोत बन गये हैं।
कलाकारों के लिए उनका योगदान
मनोरंजन के नये साधन आने के बाद गम्मत नाचा की परियां, जोकर अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए जुझ रहे थे। उन्होंने ऐसे लोगों को लगातार मंच दिया, सम्मान दिया। स्व. झुमुकदास बघेल, नाईकदास मानिकपुरी, स्व. बरसन नाचा जोकर, जेठुराम नाचा जोकर, पकला आदि अनेक कलाकारों के कार्यक्रम गांवों में ही करवाये। नाचा गम्मत के 100 से भी अधिक आडियो वीडियो कैसेट बनायें और हमेंशा इस बात की सतर्कता रखी की इन कलाओं के मूल तत्व बरकरार रहे। इन कलाकारों को राज्य में मंच तो दिये ही राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री के सामने भी प्रदर्शन के लिए अवसर सुनिश्चित कराये। उन्होंने बांसगीत, गोड़ी नाच जैसी विधाओं की कलाकारों की तलाश 2006 में शुरू की जो अब तक जारी है।
ऐसे कलाकारों के गांवों और निवास तक पहुंच कर उन्हें आर्थिक और सामाजिक सहायता मुहैया करायी। इसके साथ ही साथ अस्पतालों में भर्ती कलाकारों की भी मदद की। सरगुजिया कर्मा नृत्य, बस्तरीय नृत्य, लेझा कर्मा आदि का प्रचा-प्रसार किया बुढ़ा देव गौरी-गौरा पर आधारित आडियो वीडियो सीडी का निर्माण किया। निषाद समाज में पूज्यनीय केवट राज पर अनेक आडियो वीडियो सीडी का निर्माण किया।
जसगीत की समृद्ध परम्परा जो छत्तीसगढ़ में व्याप्त है इस दिशा में उन्होंने बहुत प्रयास किया। पारम्परिक जस गीत जवांरा, सेवा, सांगा, बाना पर आधारित 1200 से अधिक गीतों तलाश कर उन्हें दुकालीू यादव, दिलीप षडंग़ी, संतोष थापा, अलका चन्द्राकर, स्व. पंचराम मिर्झा, कुलेश्वर ताम्रकार, नीलकमम वैष्णव, रामू यादव, कविता वासनिक जैसे ख्याति लब्ध कलाकारों से गवाया। इन गीतों की सीडी अनेक लोक कलाकारों की आवाजों में प्रदेश के कोने-कोने के साथ-साथ अन्य प्रदेशों में भी पहुंचवाई। उन्होंने लोक वाद्यों जैसे मांदर, झांज, तबला, झुमका, ढोलक बैन्जो, घुंघरू से संगीत के मूल रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जिसे लोग वास्तव में पसंद करते हैं।

सभी एक्टर मेरे आदर्श हैं : अरविन्द

छत्तीसगढ़ी फिल्मो के खलनायक अरविंद गुप्ता का कहना है कि छालीवुड में काम करने वाली सभी एक्टर उनके आदर्श है। क्योकि सबसे मुझे कुछ ना कुछ सीखने को ही मिलता है। मै अपने कामो से पूरी तरह से संतुष्ट हूँ। अरविंद को कभी निराशा नहीं होती । वे कहते है की बाप बड़े ना भैया मेरे लिए मेरे जीवन की सबसे बेहतर फिल्म है। हाव किसी की नक़ल नहीं करना चाहते और अपने बलबूते पर ही आगे बढऩा चाहते हैं। अरविन्द स्कूल में ड्रामा किया करता था और आज फिल्मो के विलेन है। उनसे हमने हर पहलूओं पे बात की। पेश है बातचीत के संपादित अंश।
आपको एक्टिंग के प्रति कैसे दिलचस्पी हुई ?
बचपन से शौक था एक्टिंग करने का। लोगो को देखकर लगा की मुझे भी इस क्षेत्र में कुछ करना चाहिए।
कैसे और कहाँ से आपने एक्टिंग का सफर शुरू किया?
बचपन में मै स्कूल में ड्रामा किया करता था। बाद में मुझे थियेटर का शौक हुआ। ऐसा करते करते मैंने छत्तीसगढ़ी फिल्मो की ऑर कदम बढ़ाया।
फिल्मों में काम करते आपको कितना वक्त हो गया ?
पिछले 15 सैलून से मै इस क्षेत्र में काम कर रहा हूँ। इसके पहले हिन्दी एल्बम में काम किया है जो काफी चर्चित हुई थी।
अब तक की आपकी उपलब्धी क्या है?
मैंने करीब 10 छत्तीसगढ़ी फिल्मो में काम किया है और कुछ एल्बम बनाये है। हिन्दी में बानी एल्बम साईं मेरे सरकार सबसे चर्चित एल्बम है जो पूरे देश में देखे और सुने जाते है। इसमें मैंने एक्टिंग भी की है।
आप छस्तीस्सगढ़ी फिल्मों में अपना आदर्श किसे मानते है?
छालीवुड में काम करने वाली सभी एक्टर उनके आदर्श है। क्योकि सबसे मुझे कुछ ना कुछ सीखने को ही मिलता है।
क्या आप अपने कामों से संतुष्ट हैं? 
हाँ, मैं अपने कामों से पूरी तरह से संतुष्ट हूँ। बाप बड़े ना भैया मेरे लिए मेरे जीवन की सबसे बेहतर फिल्म है।
आप किस कलाकार को फॉलो करते है?
मैं किसी की नक़ल नहीं करना चाहते और अपने बलबूते पर ही आगे बढऩा चाहते हैं। सब मेरे लिए अच्छे है पर मै किसी को भी फॉलो नहीं करता।
आपके प्रेरणाश्रोत कौन है और आपको कब ब्रेक मिला ?
फिल्म निर्माता एजाज वारसी मेरे प्रेरणाश्रोत है। और मुझे बाप बड़े ना भैया फिल्म से ब्रेक मिला है इस फिल्म में मेरे काम की हर तरफ तारीफ़ मिली थी।
आपको कभी निराशा हुई थी ? 
कभी नहीं! मैं सिखाता रहता हूँ और कोशिश करता हूँ की मुझे काम मिलता रहे। काम नहीं मिलने पर भी मै निराश नहीं होता हूँ। 

मॉडलिंग में कॅरियर बनाना चाहती है : ट्वीटी

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बे केसकाल में पली बढ़ी ट्वीटी मरकाम ने अपनी छोटी सी उम्र में एक बढ़ी उपलब्धी हासिल कर ली है। मॉडलिंग की दुनिया में कॅरियर बनाने की इच्छा रखने वाली ट्वीटी कहती है कि बॉलीवड से फिल्मो में ऑफर तो है पर उनका मकसद मॉडलिंग में नाम कमाने की है। अपनी , अपनी राज्य के लिए वे छत्तीसगढ़ी फिल्मो में काम कर सकती है। खूबसूरत ट्वीटी ने मॉडलिंग के लिए किसी से प्रेरणा नहीं ली है और अपने बलबूते ही बुलंदियां छूने लगी है। मिस स्टील सिटी,आईकॉन मिस इंडिया , फैशन वीक ड्रेसअप का खिताब जैसे कई उपलब्धी पा चुकी स्वीटी अब अपनी कॅरियर बनाने आगे चल पडी है।  पेश है बातचीत के संपादित अंश।  
आपने मॉडलिंग का क्षेत्र ही क्यों चुना ?
मुझे बचपन से ही मॉडलिंग का शौक है। मै जब भी टीवी में मॉडलों को देखती हूँ तब तब मै रोमांचित हो उठती हूँ।
आपने मॉडलिंग की ट्रेनिंग ली है या ले रही है?
नहीं मैंने मॉडलिंग की कोई ट्रेनिंग नहीं ली है। खुद से करती हूँ। ये मेरा शौक है जिसे मै प्रोफेशन बनाना चाहती हूँ। लोगो को देखा देखकर ही मई प्रेक्टिस करती हूँ।
क्या आप फिल्मों में भी जाना चाहेंगी ?
हाँ पर अभी मेरा लक्ष्य सिर्फ मॉडलिंग है। अच्छी भूमिका मिली तो मै बाद में फिल्मो में जाना चाहूंगी। लेकिन नाम तो मॉडलिंग में ही कमाना चाहती हूँ।
आप छत्तीसगढ़ से है तो क्या छत्तीसगढ़ी फिल्मो में किस्मत आजमाना चाहेंगी ?
जरूर छत्तीसगढ़ी फिल्मे अवश्य करूंगी पर अभी नहीं। अभी भी मेरे पास फिल्मों का कई ऑफर है ,पर मैंने इस बारे में हाँ नहीं कहा है।
आप अपना प्रेरणाश्रोत किसे मानती है?
कोई नहीं है मै खुद ही इस क्षेत्र में आगे बढ़ रही हूँ। न मैंने किसी से सीखा है और न ही किसी ने मुझे इस क्षेत्र में कदम रखने की प्रेरणा ही दी है।
आपका आदर्श कौन है , जिसे आप फॉलो करती है ?
मेरे आदर्श भी कोई नहीं है, ऐसा कोई है नहीं जिसे मैं फॉलो करूँ । हाँ फिल्मों में मैं रेखा को पसंद करती हूँ।
आपकी कोई तमन्ना है जिसे लेकर आप आगे बढ़ रही है । 
बस एक ही तमन्ना है मॉडलिंग और कुछ भी नहीं। राष्ट्रीय स्टार पर इसी में नाम कमाना चाहती हूँ।
कभी आपको निराशा महसूस हुई है और कभी ऐसा क्षण आया है जब आप बहुत खुश हुई हो?
नहीं मुझे कभी भी निराशा नहीं हुई है। मैंने जो चाहा है वह पाया है। मॉडलिंग में भी मै आगे बाद रही हूँ। मैंने कई अवार्ड जीते है। जब जब मैंने अवार्ड जीते है तब तब मै रोमांचित हुई हूँ। अवार्ड जीतना अपनी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
संक्षिप्त परिचय 
नाम-ट्वीटी मरकाम 
असली नाम-सपना ठाकुर 
जन्म- 2 फरवरी 1994 
गृह नगर-केसकाल छत्तीसगढ़ 
कार्य-मॉडलिंग,  एक्टिंग 
सम्प्रति- सौंदर्य स्पर्धा में कई अवार्ड