रविवार, 27 मई 2012

गुदगुदी

विक्की स्कूल जाते हुए बहुत रो रहा था।
पिता- चुप हो जा, शेर के बच्चे कभी रोते हैं!
विक्की- पापा शेर के बच्चे स्कूल भी नही जाते..?
एक मरीज डॉक्टर के पास गया।
मरीज-डॉक्टर साहब मेरे कान में मटर का पौधा उग आया है।
डॉक्टर- यह तो बड़ी हैरानी की बात है!
मरीज-जी हां डॉक्टर साहब हैरानी की बात तो है ही क्योंकि मैंने तो अपने कान में भिन्डी के बीज डाले थे!!!
  
प्रश्न- बताओ शादी के वक्त दूल्हा घोड़ी के बजाय गधे पर बैठकर क्यों नहीं जाता?
उत्तर- इसलिये कि दुलहन कहीं दो गधों को एक साथ देखकर डर न जाए।
  
रामू- तुमने इतने छोटे-छोटे बाल क्यों कटवाए..?
चंपकलाल- दरअसल नाई के पास 3 रुपये छुट्टे नही थे तो मैंने कहा कि 3 रुपये के और काट दे..!!
  
पत्नी (पति से)- मैं ड्राइवर को नौकरी से निकाल रही हूं क्योंकि आज मैं दूसरी बार मरते-मरते बची हूं।
पति (पत्नी से)- प्लीज डार्लिंग ! उसे एक मौका तो और दो. प्लीज!
         
एक दंपत्ति की शादी को साठ वर्ष हो चुके थे। उनकी आपसी समझ इतनी अच्छी थी कि इन साठ वषरें में उनमें कभी झगड़ा तक नहीं हुआ। वे एक दूजे से कभी कुछ भी छिपाते नहीं थे। हां, पत्‍‌नी के पास उसके मायके से लाया हुआ एक डिब्बा था जो उसने अपने पति के सामने कभी खोला नहीं था। उस डिब्बे में क्या है वह नहीं जानता था। कभी उसने जानने की कोशिश भी की तो पत्‍‌नी ने यह कह कर टाल दिया कि सही समय आने पर बता दूंगी।
आखिर एक दिन बुढि़या बहुत बीमार हो गई और उसके बचने की आशा न रही। उसके पति को तभी खयाल आया कि उस डिब्बे का रहस्य जाना जाये। बुढि़या बताने को राजी हो गई। पति ने जब उस डिब्बे को खोला तो उसमें हाथ से बुने हुये दो रूमाल और 50,000 रूपये निकले। उसने पत्‍‌नी से पूछा, यह सब क्या है। पत्‍‌नी ने बताया कि जब उसकी शादी हुई थी तो उसकी दादी मां ने उससे कहा था कि ससुराल में कभी किसी से झगड़ना नहीं । यदि कभी किसी पर क्त्रोध आये तो अपने हाथ से एक रूमाल बुनना और इस डिब्बे में रखना।
बूढ़े की आंखों में यह सोचकर खुशी के मारे आंसू आ गये कि उसकी पत्‍‌नी को साठ वषरें के लम्बे वैवाहिक जीवन के दौरान सिर्फ दो बार ही क्त्रोध आया था। उसे अपनी पत्‍‌नी पर सचमुच गर्व हुआ।
खुद को संभाल कर उसने रूपयों के बारे में पूछा । इतनी बड़ी रकम तो उसने अपनी पत्‍‌नी को कभी दी ही नहीं थी, फिर ये कहां से आये?
रूपये! वे तो मैंने रूमाल बेच बेच कर इकठ्ठे किये हैं।
पत्‍‌नी ने मासूमियत से जवाब दिया।
  
डॉक्टर- इस दुनिया में डॉक्टरों के दुश्मन बहुत कम हैं।
रोगी- मगर उस दुनिया में बहुत हैं।
  
भगवान जब दुनिया बना रहे थे तो उन्होंने कहा- कि दुनिया के हर कोने में अच्छी बीवी मिलेगी।
लेकिन दुनिया को गोल बना दिया।
  
संता (ज्योतिषी से)- महाराज, बताइए मेरी शादी कब होगी?
ज्योतिषी- कभी नहीं होगी।
संता- क्यों?
ज्योतिषी- कैसे होगी? तुम्हारे भाग्य में तो सुख ही सुख लिखा है!
         
डॉक्टर (रोगी महिला से)- आप बिलकुल मेरी तीसरी पत्‍‌नी की तरह हो !
महिला- आपकी कितनी पत्‍ि‌नयां हैं?
डॉक्टर- दो!

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

"बेटियां हमारी धरोहर"

बेटियों को संस्कारवान बनाएं
आज मां ही बच्चों की शत्रु बन रही है। हमें विकसित देशों की नकल बंद करनी होगी नहीं तो हम भी उनके जैसे ह्यूमन एनिमल बन जाएंगे। सबसे ज्यादा भ्रूण हत्याओं में शिक्षित और शहरी वर्ग के लोग शामिल हैं। इनसे गांव के लोगों का लेना-देना नहीं है। कन्या शब्द छोटा नहीं है। सृष्टि का 50 प्रतिशत हिस्सा इसमें समाया है। एक पुरूष से स्त्री की शक्ति तीन गुना अधिक है, इसलिए कन्या को देवी का दर्जा दिया गया है।
माता-पिता कहते हैं कि वे लड़के-लड़की में भेद नहीं करते। यह किसी भी दृष्टि से समानता नहीं है बल्कि विध्वंस है। समस्या यह है कि हम पीछे की बात नहीं समझते। हमें शरीर दिख रहे हैं कि यह स्त्री है और यह पुरूष। सोचिए कि प्रकृति गर्भ में कैसे तय करती है कि पुरूष कौन होगा और स्त्री कौन? दोनों के अलग-अलग गुण हैं। स्त्री और पुरूष को अलग-अलग रास्तों से गुजरना है।

परंपरा में ऎसी कई चीजें आई जिसे हम अंधविश्वास कहने लगे। मां का यह कर्तव्य है कि वह बेटी को अच्छी स्त्री बनना सिखाए। बच्ची के पास ज्ञान नहीं पहुंचता कि किन गुणों के कारण स्त्री है। नतीजा यह है कि दिनों-दिन तलाक के मामले बढ़ रहे हैं। वह शरीर से तो स्त्री है पर उसके गुण स्त्रयों जैसे नहीं है। वह पुरूष बन रही है और पुरूष तो पुरूष है ही।
आज लड़कियां कॅरियर की लड़ाई में प्रतियोगी हो गई हैं। वे लड़कों की तरह सोचने लगी हैं। पुरूष सूरज है तो महिला चंद्रमा। महिलाओं में धैर्य, प्रेम, निष्ठा, दया जैसे गुण होने चाहिए। चंद्रमा के यही गुण हैं लेकिन समस्या यह है कि लड़कियों का इमोशनल लेवल कम हो रहा है। स्थिति यह है कि आज लड़कियां, स्त्री होने के गुण को नहीं समझ रही हैं क्योंकि उनकी माताएं उन्हें इसकी शिक्षा ही नहीं दे रही हैं।

रविवार, 15 अप्रैल 2012

श्री बजरंग बाण का पाठ


हनुमान को करें प्रसन्न
दोहा :
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

चौपाई :
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥

दोहा :
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

मेघनाद ने चलाया ये बाण तो लक्ष्मणजी बेहोश हो गए...

...नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और अंगद हनुमान कहां हैं? यह सुनकर रीछ वानर सब भाग गए। सब युद्ध की इच्छा भूल गए। सारी सेना बेहाल हो गई। हनुमानजी ने गुस्से में आकर पहाड़ उखाड़ लिया। बड़े ही क्रोध के साथ उस पहाड़ को उन्होंने मेघनाद के ऊपर फेंक दिया। मेघनाद पहाड़ को आते देख आकाश में उड़ गया। मेघनाद रामजी के पास आ गया। उसने उन पर अस्त्र-शस्त्र और हथियार चलाए। रामजी ने उसके सारे अस्त्र व्यर्थ कर दिए

रामजी का ऐसा प्रभाव देखकर मेघनाद को बहुत आश्चर्य हुआ वह अनेकों तरह की लीलाएं करने लगा। वह ऊंचे स्थान पर चढ़कर अंगारे बरसाने लगा। उसकी माया देखकर सारे वानर सोचने लगे कि अब सबका मरण आ गया है। तब रामजी ने एक ही बाण से सारी माया काट डाली। श्रीरामजी से आज्ञा मांगकर वानर आदि हाथों में धनुष बाण लेकर लक्ष्मणजी के साथ आगे बड़े। रामचंद्रजी की जय-जयकार कर सारे वानरों ने राक्षसों पर हमला कर दिया। वानर उनकों घूंसों व लातों से मारते हैं। दांतों से काटते हैं।

लक्ष्मणजी ने एक बाण से रथ तोड़ डाला और सारथि के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। तब मेघनाद को लगा कि उसके प्राण संकट में आ गए। मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाई। वह लक्ष्मणजी की छाती पर लगी। शक्ति के लगने से वे बेहोश हो गए। मेघनाद डर छोड़कर उनके पास गया। मेघनाद के समान सौ करोड़ योद्धा लक्ष्मणजी को उठाने का प्रयास करने लगे। लेकिन वे सभी मिलकर भी लक्ष्मणजी को वहां से न हटा पाए। हनुमान ने उन्हें उठाया और रामजी के पास ले आए। जाम्बवान ने कहा- लंका में सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आने के लिए किसे भेजा जाए।

हनुमान छोटा रूप धरकर गए और सुषेण को उसके घर सहित उठा लाए। सुषेण ने हनुमानजी को ओषधि ले आने को कहा। उधर एक गुप्तचर ने रावण को इस रहस्य की खबर दी। तब रावण कालनेमि के घर आया। रावण ने उसे अपना सारा दुख बताया। कालनेमि ने सारी बात सुनी और उसने कहा तुम्हारे देखते ही देखते उसने सारा नगर जला डाला, उसका रास्ता कौन रोक सकता है। उसने रावण को रामजी की भक्ति करने की सलाह दी। रावण यह सुनकर गुस्से में आ गया। तब कालनेमि ने मन ही मन विचार किया कि इस दुष्ट के हाथों मरने से अच्छा है मैं राम जी के हाथों मरूं। वह मन ही मन ऐसा सोचकर चल दिया। उसने मार्ग में माया रची उसने सुंदर तालाब, मंदिर और बगीचा बनाया। हनुमानजी ने सुंदर आश्रम देखकर सोचा कि मुनि से पूछकर जल पी लूं।