गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

क्यों करते हैं भगवान की आरती?

आरती का अर्थ होता है व्याकुल होकर भगवान को याद करना उनका स्तवन करना, आरती पूजा के अंत में धूप, दीप, कपूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। आरती में एक, तीन, पांच, सात यानि विषम बत्तियों वाला दीपक प्रयोग किया जाता है। आरती चार प्रकार की होती है: - दीप आरती - जल आरती - धूप, कपूर, अगरबत्ती से आरती - पुष्प आरती दीप आरती: दीपक लगाकर आरती का आशय है। हम संसार के लिए प्रकाश की प्रार्थना करते हैं। जल आरती: जल जीवन का प्रतीक है। आशय है हम जीवन रूपी जल से ईश्वर की आरती करते हैं।
धूप, कपूर, अगरबत्ती से आरती: धूप, कपूर और अगरबत्ती सुगंध का प्रतीक है। यह वातावरण को सुगंधित करते हैं तथा हमारे मन को भी प्रसन्न करते हैं। पुष्प आरती: पुष्प सुंदरता और सुगंध का प्रतीक है। अन्य कोई साधन न होने पर पुष्प से आरती की जाती है। आरती एक विज्ञान है। आरती के साथ-साथ ढोल-नगाढ़े, तुरही, शंख, घंटा आदि वाद्य भी बजते हैं। इन वाद्यों की ध्वनि से रोगाणुओं का नाश होता है। वातावरण पवित्र होता है। दीपक और धूप की सुंगध से चारों ओर सुगंध का फैलाव होता है। पर्यावरण सुगंध से भर जाता है। आरती के पश्चात मंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय अरुण जी

    कृपया अपनी बाल पत्रिका की कॉपी भिजवाएं

    नव्‍यवेश नवराही

    दैनिक भास्‍कर पंजाब

    80, राज नगर, कपूरथला रोड

    जालंधर 144021 पंजाब

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  2. अरुण जी,
    बाल पत्रिका की कॉपी भिजवाएं

    नव्‍यवेश नवराही

    दैनिक भास्‍कर पंजाब

    80, राज नगर, कपूरथला रोड

    जालंधर पंजाब

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