मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

गुल्लू और एक सतरंगी


ओमप्रकाश बंछोर
गुल्लू कर्णपुर गाँव के किसान विजयपाल का बेटा है। उसका असली नाम गुलशन है, पर सब उसे प्यार से 'गुल्लू' ही कहते हैं। उसकी उम्र है लगभग बारह साल। उसकी एक छोटी बहन है - राधा। उसकी उम्र आठ साल है। परंतु वह स्कूल नहीं जाती। कारण, उनके गाँव में कोई स्कूल नहीं है। उनकी माँ को मरे आठ साल हो गए। राधा को जन्म देने के बाद माँ चल बसी थी।

गुल्लू की माँ की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पास के गाँव की सविता नामक एक महिला से पुन: विवाह कर लिया। सौतेली माँ घर आई तो गुल्लू खुश था। उसे भरोसा था कि उसे और उसकी छोटी बहन को माँ का प्यार मिल जाएगा।

पर सौतेली माँ बहुत कठोर स्वभाव की थी। शुरू में कुछ दिन तो ठीक रहा, पर बाद में उसने बच्चों को पीटना शुरू कर दिया। बात-बात में भला-बुरा कहती। यद्यपि किसान के सामने वह लाड़-प्यार का नाटक करती, पर उसके खेत में जाते ही वह बच्चों को डाँटना शुरू कर देती।

गुल्लू जब सौतेली माँ की कलह से परेशान हो जाता तो सोचता, पिताजी ने दूसरा विवाह क्यों किया? हम अकेले ही भले थे।' फिर स्वयं ही तर्क करता, 'पिताजी घर सँभालें या खेतों में काम करें! खेतों में काम नहीं करेंगे तो परिवार भूखों मर जाएगा। फिर राधा को कौन सँभालता?'

शाम को किसान खेतों से लौटता तो सबसे पहले बच्चों के पास आता। उनसे दिनभर की बातें पूछता। बच्चों को उदास देख कई बार किसान का मन भर आता। लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था। एक-दो बार उसने सविता को प्यार से समझाया। कहा, 'बच्चे भगवान का रूप होते हैं। इन बेचारों की माँ नहीं है। तुम इन्हें माँ का प्यार दो।'

उन दिनों राधा तो इतनी छोटी थी कि उसने अपनी असली माँ की शक्ल भी ज्ञात नहीं। वह तो सौतेली माँ को ही असली माँ समझती थी। जैसे-जैसे वह थोड़ी बड़ी हुई, उसे इस बात पर हैरानी होती कि अन्य बच्चों की तरह उसकी माँ उसे गोद में लेकर लाड़-प्यार क्यों नहीं करती?

उधर गुल्लू की आँखों से माँ की तस्वीर हटती ही नहीं थी। यद्यपि चार साल की आयु बड़ी नहीं होती। माँ की मृत्यु के समय वह इतना ही बड़ा था। पर माँ तो माँ होती है, उसका चित्र भला कोई कैसे भुला सकता है?

दिन बीतते गए, पर सविता के स्वभाव में परिवर्तन नहीं आया। किसान के प्यार या डाँट-फटकार का उस पर कोई असर नहीं हुआ। वह अपने लिए बढ़िया पकवान बना लेती, पर किसान और उसके बच्चों को रुखा-सूखा खाने को देती थी।

राधा रोती तो गुल्लू को बहुत दुख होता, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता था। अपनी बहन को गोद में लेने की कोशिश करता, पर उसके बाजू इतने बड़े नहीं थे कि वह राधा का भार उठा पाते।

थोड़ा बड़ा हुआ तो गुल्लू किसान के साथ खेतों में जाने लगा। किसान गुल्लू को पढ़ाना चाहता था। वह नहीं चाहता था कि गुलशन भी उसी की तरह गरीबी में दिन गुजारे। उसकी इच्छा थी, गुल्लू पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने।

गाँव में तो स्कूल था नहीं। किसान ने उसे पास के कस्बे के स्कूल में भर्ती करा दिया। गाँव के और बच्चे भी इसी स्कूल में जाते थे। गुल्लू सुबह जल्दी उठकर उनके साथ पैदा स्कूल जाता।

उनके खेत रास्ते में थे। स्कूल से छुट्‍टी होने के बाद वापसी में वह खेतों में पिताजी के पास चला जाता। वहीं होमवर्क निबटा लेता और कुछ देर पिता के काम में हाथ भी बँटा देता।

एक दिन स्कूल की छुट्‍टी देर से हुई। उस दिन गुल्लू स्कूल से सीधा घर चला गया। घर पहुँचा तो राधा को रोते पाया। पूछा, 'क्यों रो रही हो?'
राधा बोली, 'मौसी ने मारा।'
'क्यों?' गुल्लू ने पूछा।

राधा ने कहा, 'मौसी ने पानी माँगा था। मैं देने लगी तो हाथ से गिलास छूट गया और पानी फर्श पर बिखर गया। इस पर मौसी बहुत नाराज हुई और मुझे मारा।'

'पर तुम छोटी भी तो हो। तुम्हारे हाथ इतने बड़े कहाँ कि हर चीज को अच्छी तरह सँभाल सकें?'

राधा रोए जा रही थी। गुल्लू उदास हो गया। उसे अपनी माँ की बहुत याद आई। बहन के साथ-साथ उसकी आँखें नम हो गई थीं।

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