गुरुवार, 15 जुलाई 2010

सारे विश्व की सर्वोत्तम रचना, महाभारत


भारतीय संस्कृति एवं हिंदू धर्म का विश्व को प्रदान किया गया अनुपम उपहार है गीता। सारे विश्व में निर्विवाद रूप से गीता नामक ग्रंथ को सर्वोत्तम कृति माना जाता है। एकमात्र गीता में ही समस्त धर्मों एवं मानव जीवन का सार समाया हुआ है। इतने छोटे आकार में इतना विशाल, व्यापक एवं गंभीर शाश्वत ज्ञान प्रदान करने वाला दूसरा कोई ग्रंथ जग में नहीं है। गीता में संपूर्ण धर्मों एवं संपूर्ण ग्रंथों का निचोड़ समाया हुआ है। गीता से तुलना की जाए तो इसके समक्ष समस्त संसार का ज्ञान तुच्छ है। गीता एक उच्चकोटि का दर्शन शास्त्र है। मानव जीवन के सर्वोत्तम सदुपयोग को बताने वाला गीता जैसा दूसरा कोई ग्रंथ दुनिया में नहीं है। मानव जीवन के समस्त दुखों, अभावों, भयों, आशंकाओं एवं जिज्ञासाओं का संपूर्ण समाधान गीता में समाया हुआ है। आज जीवन प्रबंधन, समय प्रबंधन एवं जीवन जीने की कला सीखने के लिए विश्वभर में गीता का सहारा लिया जा रहा है।चाहे किसी भी धर्म अथवा संप्रदाय को मानने वाला व्यक्ति हो, उसे जीवन में एक बार अवश्य गीता को पूरे मनोयोग से अध्ययन करना चाहिए। गीता में निश्चित रूप से मानव जीवन की समस्त समस्याओं का अंतिम व स्थायी समाधान निहित है।

गंगापुत्र भीष्म कौन थे पिछले जन्म में?
गंगापुत्र भीष्म महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक थे। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था अर्थात उनकी इच्छा के बिना यमराज भी उनके प्राण हरने में असमर्थ थे। वे बड़े पराक्रमी तथा भगवान परशुराम के शिष्य थे। भीष्म पिछले जन्म में कौन थे तथा उन्होंने ऐसा कौन सा पाप किया जिनके कारण उन्हें मृत्यु लोक में रहना पड़ा? इसका वर्णन महाभारत के आदिपर्व में मिलता है।

उसके अनुसार-गंगापुत्र भीष्म पिछले जन्म में द्यौ नामक वसु थे। एक बार जब वे अपनी पत्नी के साथ विहार करते-करते मेरु पर्वत पहुंचे तो वहां ऋषि वसिष्ठ के आश्रम पर सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाली नंदिनी गौ को देखकर उन्होंने अपने भाइयों के साथ उसका अपहरण कर लिया। जब ऋषि वसिष्ठ को इस घटना के बारे में पता चला तो उन्होंने द्यौ सहित सभी भाइयों को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। जब द्यौ तथा उनके भाइयों को ऋषि के शाप के बारे में पता लगा तो वे नंदिनी को लेकर ऋषि के पास क्षमायाचना करने पहुंचे। ऋषि वसिष्ठ ने अन्य वसुओं को एक वर्ष में मनुष्य योनि से मुक्ति पाने का कहा लेकिन द्यौ को अपने कर्मों का फल भुगतने के लिए लंबे समय तक मृत्यु लोक में रहने का शाप दिया।
द्यौ ने ही भीष्म के रूप में भरत वंश में जन्म लिया तथा लंबे समय तक धरती पर रहते हुए अपने कर्मों का फल भोगा।

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