सोमवार, 20 दिसंबर 2010

कहानी

निंदक और चाटुकार
आदर्श नगर के महाराज आदर्शसेन अपने दरबार में बैठे थे। अनेक विषयों पर मंत्रणा चल रही थी। अचानक आदर्शसेन
को न जाने क्या सूझा कि वह बीच में ही बोल उठे, 'क्या कोई मुझे बताएगा कि सबसे तेज कौन काटता है और सबसे जहरीला विष किसका होता है?' यह सुनकर सभी दरबारी व विद्वान एक-दूसरे की ओर देखने लगे। काफी देर बाद एक विद्वान उठकर बोला, 'महाराज, मेरी नजर में तो सबसे तेज विष सांप का होता है।

उसका काटा पानी भी नहीं मांगता।' राजा इस जवाब से संतुष्ट नहीं दिखे। यह भांप कर एक दरबारी बोला, 'मेरी नजर में तो सबसे तेज ततैया काटता है। उसके काटते ही चीख निकल जाती है।' राजा ने इस पर भी अधिक ध्यान नहीं दिया। तब एक और विद्वान खड़ा हुआ और राजा से बोला, 'हुजूर, मेरी नजर में तो सबसे तेज काटने वाली मधुमक्खी होती है। उसके काटते ही किसी व्यक्ति का शरीर सूज जाता है और वह कई दिनों तक दर्द से बिलबिलाता रहता है। भला उससे तेज विष किसका हो सकता है?'
इस प्रकार सभी व्यक्तियों ने अपने अनुसार एक से बढ़ कर एक जवाब दिए, किंतु राजा किसी के भी जवाब से संतुष्ट नहीं हुए। तभी एक युवा विद्वान ने उठकर कहा, 'महाराज, मेरी नजर में तो सबसे तेज व जहरीले दो ही होते हैं -निंदक और चाटुकार। निंदक के हृदय में निंदा द्वेष रूपी जहर भरा रहता है। वह निंदा करके पीछे से ऐसे काटता है कि मनुष्य तिलमिला उठता है।
चाटुकार अपनी वाणी में मीठा विष भरकर ऐसी चापलूसी करता है कि मनुष्य अपने दुर्गुणों को गुण समझकर अहंकार के नशे मंे चूर हो जाता है। चापलूस की वाणी विवेक को काटकर जड़मूल से नष्ट कर देती है। अनेक ऐसे उदाहरण सामने हैं, जिनमें निंदक व चापलूस ने मनुष्य को इस प्रकार काटा कि वे समूल नष्ट हो गए।' इस जवाब से राजा और सारे विद्वान पूरी तरह संतुष्ट हो गए।
संकलन : रेनू सैनी

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