सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

तप क्या है? (भागवत १८६)

तप- तप का उद्देश्य पूर्व संचित संस्कारों को रोकना और भविष्य के संस्कारों को संचित न होने देना है। तप स्वाध्याय जप तथा सद्ग्रंथों का पठन-पाठन और ईश्वर प्रणिधान तीनों मिलकर भोग कहे जाते हैं। शरीर, इन्द्रियों व मन का संयम तप शारीरिक वाचिक तथा मानसिक तीन प्रकार का होता है।

व्रत, उपवास रखना, भक्ष्य अभक्ष्य का ध्यान रखना, तीर्थाटन करना, गर्मी, सर्दी सहन करना आदि सात्विक श्रेणी के कार्य करना-यथा शक्ति सहन करना। मानसिकता में मान, अपमान में समता। वाचिक रूप में सत्य बोलना, कम बोलना (आवश्यक बोलना) मौन का अर्थ हृदयगत विचार शून्यता कही जा सकती है। यहां इस घटना में अग्रि को तप से जोड़ा गया है। भक्त का तपस्वी होना ही उसका गहना है।
एक बार जब ग्वालबाल खेल कूद में लग गए, तब उनकी गौएं बेरोकटोक चरती हुई बहुत दूर निकल गईं और हरी-हरी घास के लोभ से एक गहन वन में घुस गईं। उनकी बकरियां, गायें और भैंसे एक वन से दूसरे वन में होती हुई आगे बढ़ गईं तथा गर्मी के ताप से व्याकुल हो गईं।
जब श्रीकृष्ण, बलराम आदि ग्वालबालों ने देखा कि हमारे पशुओं का तो कहीं पता ठिकाना नहीं है, तब उन्हें अपने खेल-कूद पर बड़ा पछतावा हुआ और वे बहुत कुछ खोज बीन करने पर भी अपनी गौओं का पता न लगा सके। इस प्रकार भगवान् उन गायों को पुकार ही रहे थे कि उस वन में सब ओर अकस्मात् दावाग्रि लग गई जो वनवासी जीवों का काल ही होती है। इससे सब ओर फैली हुई वह प्रचण्ड अग्नि अपनी भयंकर लपटों से समस्त चराचर जीवों को जलाने करने लगी। जब ग्वालों और गौओं ने देखा कि दावानल चारों ओर से हमारी ही ओर बढ़ता आ रहा है, तब वे अत्यन्त भयभीत हो गए और मृत्यु के भय से डरे हुए जीव जिस प्रकार भगवान् की शरण में आते हैं, वैसे ही वे श्रीकृष्ण और बलरामजी की शरण में आते हैं, वैसे ही वे श्रीकृष्ण और बलरामजी के शरणापन्न होकर उन्हें पुकारते हुए बोले-महावीर श्रीकृष्ण! परम बलशाली बलराम! हम तुम्हारे शरणागत हैं।
देखो, इस समय हम दावानल से जलना नही चाहते हैं। तुम दोनों हमें बचाओ।श्रीकृष्ण ने कहा-डरो मत, तुम अपनी आंखें बंद कर लो। भगवान् की आज्ञा सुनकर उन ग्वालबालों ने कहा बहुत अच्छा और अपनी आंखें मूंद ली। तब योगेष्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने उस भयंकर आग को अपने मुंह से पी लिया और इस प्रकार उन्हें घोर संकट से छुड़ा दिया।

2 टिप्‍पणियां:

  1. यहाँ तक हम समझ पाये है ! तप का सही अर्थ है भीतरसे आत्मवान बनना ! तप का सम्बन्ध आत्मासे है,आत्माकी तरह तप भी अकारण ही है ! जब जीव सुख को सुख,दुःख को दुःख,अपमानको अपमान,सम्मानको सम्मान,जीवनको जीवन,मृत्युको मृत्यु नहीं माने, तब जीव पारदर्शक अर्थात आत्मवान बनता है ! सुख-दुःख,अनुकूल-प्रतिकूल बराबर हो जाये,समता आ जाये तो मानो आप तपस्वी हो गये ! समतत्व ही तप है,और ऐसा जीव ही तपस्वी

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  2. यहाँ तक हम समझ पाये है ! तप का सही अर्थ है भीतरसे आत्मवान बनना ! तप का सम्बन्ध आत्मासे है,आत्माकी तरह तप भी अकारण ही है ! जब जीव सुख को सुख,दुःख को दुःख,अपमानको अपमान,सम्मानको सम्मान,जीवनको जीवन,मृत्युको मृत्यु नहीं माने, तब जीव पारदर्शक अर्थात आत्मवान बनता है ! सुख-दुःख,अनुकूल-प्रतिकूल बराबर हो जाये,समता आ जाये तो मानो आप तपस्वी हो गये ! समतत्व ही तप है,और ऐसा जीव ही तपस्वी

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