अर्जुन वनवास को चल दिए। वे एक दिन गंगा नदी में स्नान करने पहुंचे। गंगा नदी वे स्नान और तर्पण करके हवन करने के लिए बाहर निकलने ही वाले थे कि नागकन्या उलूपी उन पर मोहित हो गई।

उसने कामासक्त होकर अर्जुन को जल के भीतर खींच लिया और अपने भवन में ले गई। अर्जुन ने देखा कि वहां यज्ञ की अग्रि प्रज्वलित हो रही है। उसने उसमें हवन किया और अग्रिदेव को प्रसन्न करके नागकन्या उलूपी से पूछा सुन्दरि तुम कौन हो? तुम ऐसा साहस करके मुझे किस देश लेकर आई होउलूपी ने कहा मैं ऐरावत वंश के नाग की कन्या उलूपी हूं। मैं आपसे प्रेम करती हूं। आपके अतिरिक्त मेरी कोई गति नहीं है। आप मेरी अभिलाषा पूर्ण किजिए। मुझे स्वीकार किजिए। अर्जुन ने कहा आप लोगों ने द्रोपदी के लिए जो मर्यादा बनाई है। उसे मैं जानती हूं। लेकिन इस लोक में उसका लोप नहीं होता। आप मुझे स्वीकार किजिए वरना मैं मर जाऊंगी। अर्जुन ने धर्म समझकर उलूपी की इच्छा पूर्ण की रातभर वही रहे। दूसरे दिन वहां से चले। चलते समय उलूपी ने उन्हे वर दिया कि तुम्हे किसी भी जलचर प्राणी से कभी कोई भय नहीं रहेगा।

उसने कामासक्त होकर अर्जुन को जल के भीतर खींच लिया और अपने भवन में ले गई। अर्जुन ने देखा कि वहां यज्ञ की अग्रि प्रज्वलित हो रही है। उसने उसमें हवन किया और अग्रिदेव को प्रसन्न करके नागकन्या उलूपी से पूछा सुन्दरि तुम कौन हो? तुम ऐसा साहस करके मुझे किस देश लेकर आई होउलूपी ने कहा मैं ऐरावत वंश के नाग की कन्या उलूपी हूं। मैं आपसे प्रेम करती हूं। आपके अतिरिक्त मेरी कोई गति नहीं है। आप मेरी अभिलाषा पूर्ण किजिए। मुझे स्वीकार किजिए। अर्जुन ने कहा आप लोगों ने द्रोपदी के लिए जो मर्यादा बनाई है। उसे मैं जानती हूं। लेकिन इस लोक में उसका लोप नहीं होता। आप मुझे स्वीकार किजिए वरना मैं मर जाऊंगी। अर्जुन ने धर्म समझकर उलूपी की इच्छा पूर्ण की रातभर वही रहे। दूसरे दिन वहां से चले। चलते समय उलूपी ने उन्हे वर दिया कि तुम्हे किसी भी जलचर प्राणी से कभी कोई भय नहीं रहेगा।
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