गुरुवार, 17 मार्च 2011

भागवत 212 : कृष्ण को न देखा तो नन्दजी मूर्छित हो गए...

वह कृष्ण के वचन को याद करते हुए कौए से कहने लगी-मेरा कन्हैया यदि आ जाए तो तेरी चोंच मैं सोने से मढ़वाऊंगी, तुझे मिष्ठान्न खिलाऊंगी। हे काग! तू बता, मेरा लला कब आ रहा है।श्रीदामा, मधुमंगल आदि सब ग्वालवाल रास्ते पर बैठे हुए लाला की प्रतीक्षा कर रहे थे कि दूर से एक रथ आता दिखाई दिया। बालकों ने सोचा लाला ही आया होगा। वे दौड़ते हुए रथ के पास पहुंचे।किन्तु रथ में जो बैठा था वह नीचे नहीं उतरा। यदि कन्हैया होता तो कूदकर नीचे आकर गले लग जाता। उद्धवजी, बालकों को देखकर भी रथ में बैठे रहे।
बच्चों से कहने लगे मैं श्रीकृष्ण का सन्देशा लेकर आया हूं, वह आने वाला है। मैं उद्धव हूं।
बालक कहने लगे-उद्धवजी! हम कन्हैया को सुखी करने के लिए उसकी सेवा करते थे, कभी हमने ऐसा तो सोचा ही नहीं था, कि वह ऐसा निष्ठुर हो जाएगा। कन्हैया के बिना यहां सब सूना-सूना लगता है।
वंशीवट, यमुना तट, वृन्दावन सब कुछ सूना और उदास है।बालक उद्धवजी को नन्दबाबा के घर का रास्ता दिखलाते हुए कहने लगे-अच्छा हुआ तुम आ गए। हमें भी कन्हैया को संदेशा भेजना है, किन्तु तुम पहले नन्द-यशोदा के पास जाकर सन्त्वना दो। वे रात-दिन लला की प्रतीक्षा में रोते हैं। हम फिर मिलने आएंगे।नंद-यशोदा-उद्धव- इधर यशोदा कौए से बात कर रही हैं और उधर रथ आंगन मे आ पहुंचा। नन्द-यशोदा ने माना कि कन्हैया ही आया है। दोनों की जान में जान आ गई। दोनों रथ की ओर दौड़ पड़े। दोनों पुकार उठे कन्हैया आया। लाला आया। वे दोनों दौड़ते हुए रथ के पास पहुंचे। किन्तु उसमें कन्हैया नहीं, कोई और ही था। कृष्ण को न देखा तो कृष्ण को पुकारते हुए नन्दजी मूर्छित हो गए।उद्धवजी की तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये लोग कृष्ण का नाम लेकर क्यों रो रहे हैं। यशोदाजी धीरज धरकर एक दासी से कहने लगीं-यह कोई बड़े व्यक्ति लगते हैं
इनका स्वागत करो। नन्दजी को प्रणाम करते हुए उद्धवजी ने कहा-मैं आपके कन्हैया का मित्र हूं और उसका सन्देश लाया हूं।नन्दजी ने भी कुशलमंगल पूछा। उन्होंने सोचा कि कन्हैया स्वयं नहीं आ सका होगा। सो अपने मित्र को भेजा होगा। उद्धवजी आप आए स्वागत है। कंस की मृत्यु के बाद यादव सुखी हुए होंगे।उद्धवजी एक बात सच-सच बतलाना क्या कन्हैया कभी हमको याद करता है? उद्धवजी कन्हैया से कहना कि यह गिरिराज, यह यमुना उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह उसकी गंगी गाय तो वन में घूमती फिरती है। मुझे रोज-रोज उसकी बांसुरी की मधुर तान सुनाई देती रहती है।
उद्धवजी कई बार मुझे लगता है कि वह मेरी गोद में बैठा हुआ खेल रहा है। यमुना में स्नान करने के लिए जाता हूं तो मेरे पीछे-पीछे चला आ रहा है। उद्धवजी मेरा कन्हैया कब लौटेगा ? नन्द पूछ रहे हैं।

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