रविवार, 19 जुलाई 2015

एक्टिंग डांसिंग ही मेरा शौक है : उर्वशी साहू

छत्तीसगढ़ में कलाकारों की भरमार है जरुरत है उन्हें तराशने की
रायपुर। छत्तीसगढ़ में कलाकारों की भरमार है , जरुरत है उन्हें तराशने की। गाँव गाँव ,गली-गली में कलाकार मिलेंगे , उन्हें फिल्मो में मौका मिलना चाहिए। यह कहना है छत्तीसगढ़ी फिल्मो की अभिनेत्री उर्वशी साहू  का। वे कहती है कि अच्छी कहानी हो और अच्छे- अच्छे कलाकार हो तो छत्तीसगढ़ी फिल्मे भी अच्छी चलेंगी। एक्टिंग और डांसिंग उनका शोक है। लगभग 50 - 60 फिल्मो में अपने अभिनय का जादू चला चुकी उर्वशी हिन्दी भोजपुरी फिल्मो में भी अभिनय कर चुकी है। चुनौतीपूर्ण भूमिका उन्हें बहुत पसंद है। अच्छी फिल्मे बनाने और लोक कला मंच के कलाकारों को आगे बढ़ाने की तमन्ना रखती है। उर्वशी साहू से हमने हर पहलूओं पर बेबाक बात की है। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश।
संक्षिप्त परिचय 
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नाम -               - उर्वशी साहू
फिल्म              - 60
टेली फिल्म        -  5
एल्बम               - 12  हिन्दी और भोजपुरी

0 आपको एक्टिंग का शौक कब से है ?
00 मुझे एक्टिंग का शौक बचपन से ही रहा है जब भी मैं कोई फिल्म या सीरयल देखती थी तो उस जगह अपने आप को रखकर सोचती थी। कला खानदानी परम्परा है जिसे मैं आगे बड़ा रही हूँ।
0 मौका कैसे मिला और आपके प्रेरणाश्रोत कौन है ?
00 सबसे पहले मुझे फिल्म डांढ़ में विलेन की भूमिका करने का मौका मिला था। मेरे नाना स्वर्णदास साहू मेरे आदर्श हैं। वे मशहूर नाटक चरणदास चोर के लेखक थे।
0 अभिनय की ओर आपका रुझान कैसे हुआ ?
00 टीवी देख कर अभिनय की ओर मेरा रुझान हूआ।
0 कोई ऐसा अवसर आया हो ,जब आप बहुत उत्साहित हुई हो?
00 जी जब मैंने पहली बार स्टेज शो की और मेरी माँ मेरे लिए घाघरा चुनरी लेकर आई थी तो बहुत ही रोमांचित हुई और मेरा मनोबल उत्साह काफी बढ़ गया।
0 आप फिल्मो में चरित्र अभिनेत्री की भूमिका निभाती है, तो आपको कैसा महसूस होता है?
00 जब मैं कोई अभिनेत्री का भूमिका निभाती हूँ तो मुझे गर्व मेहसूस होता हैं की मैं अपने रोल को बखूबी से कर पा रही हूँ।
0 रील लाइफ और रीयल लाइफ में क्या अंतर है?

00 दोनों अलग अलग चीज है रियल लाइफ को रील लाइफ में नहीं जोड़ सकती । रील लाइफ में मैं एक प्रोफेशनल भूमिका निभाती हूँ और रियल लाइफ चुनौतीभरी होती है।
0 ऐसा कोई क्षण जब निराशा मिली हो?
00 जब छतीसगढ़ फिल्म इन्डस्ट्री में सम्मान नहीं मिलता और  तब मुझे बहुत निराश होती है।
0 छत्तीसगढ़ी फिल्मे थियेटरों में ज्यादा दिन नही चल पाती ,आप क्या कारण मानती है ?
00 छतीसगढ़ी फिल्में इस कारण थियेटर में ज्यादा दिन नहीं चल पाती क्योंकि आज के बच्चे और नोजवान छतीसगढ़ी नहीं समझ पाते और बॉलिवुड फिल्म को ज्यादा महत्व देते हैं । दूसरी तरफ जो गाँव के लोग है वो छतीसगढ़ी फिल्म को बड़े ही चाव से देखते है और महत्व भी देते है अगर हमारे आस पास के गाँव कस्बो में थियेटर की व्यवसथा कराई जाए तो छतीसगढ़ी फिल्म चलेगी भी और आगे भी बढेगी।
0 आपका कोई सपना है जो आप पूरा होते देखना चाहती हैं?
00 मेरा सपना है  कि लोककलाकारो को खूब आगे बढ़ाऊं और अच्छी फिल्म बनाऊँ । मैं अपने इस सपने को पूरा होते देखना चाहती हूँ।

1 टिप्पणी:

  1. अरुण बंछोर जी, क्या आप अपने इस ब्लॉग को बेचना चाहेंगे. मुझे ये अच्छा लगा और इसे खरीदने की इच्छा है. कृपया मेरी ईमेल इ डी पर अपना निर्णय दीजिये - dahiyas.hari@gmail.com

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