बुधवार, 1 जून 2011

जैसे ही राजा ने कहा दश, सांप ने डंस लिया...

जिस समय राजा नल दमयन्ती को सोती छोड़कर आगे बढ़े, उस समय वन में आग लग रही थी। तभी नल को आवाज आई। राजा नल शीघ्र दौड़ो। मुझे बचाओ। नागराज कुंडली बांधकर पड़ा हुआ था। उसने नल से कहा- राजन मैं कर्कोटक नाम का सर्प हूं। मैंने नारद मुनि को धोखा दिया था।
उन्होंने शाप दिया कि जब तक राजा नल तुम्हें न उठावें, तब तक यहीं पड़े रहना। उनके उठाने पर तू शाप से छूट जाएगा। उनके शाप के कारण मैं यहां से एक भी कदम आगे नहीं बढ़ सकता। तुम इस शाप से मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हे हित की बात बताऊंगा और तुम्हारा मित्र बन जाऊंगा। मेरे भार से डरो मत मैं अभी हल्का हो जाता हूं वह अंगूठे के बराबर हो गया।
नल उसे उठाकर दावानल (जंगल की आग) से बाहर ले आए। कर्कोटक ने कहा तुम अभी मुझे जमीन पर मत डालो। कुछ कदम गिनकर चलो। राजा नल ने ज्यों ही पृथ्वी पर दसवां कदम चला और उन्होंने कहा दश (दस) तो ही कर्कोटक ने उन्हें डस लिया। उसका नियम था कि जब कोई बोले दश तभी वह डंसता था।
आश्चर्य चकित नल से उसने कहा महाराज तुम्हे कोई पहचान ना सके इसलिए मैंने डस के तुम्हारा रूप बदल दिया है। कलियुग ने तुम्हे बहुत दुख दिया है। अब मेरे विष से वह तुम्हारे शरीर में बहुत दुखी रहेगा। तुमने मेरी रक्षा की है। अब तुम्हे हिंसक पशु-पक्षी या शत्रु का कोई भय नहीं रहेगा। अब तुम पर किसी भी विष का प्रभाव नहीं होगा और युद्ध में हमेशा तुम्हारी जीत होगी।
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चीटियां भी बता देती हैं बारिश होगी या रुकेगी...

एक वर्ष में तीन मौसम बताए गए हैं सर्दी, गर्मी और बरसात। अभी गर्मी का मौसम समाप्त होने वाला है और बारिश शुरू। बारिश को लेकर हमेशा से ही कई प्रकार की भविष्यवाणियां की जाती रही हैं। ज्योतिष के अनुसार तो बारिश की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि चीटियां भी बारिश की पूर्व सूचना दे देती हैं।

जी हां, यह बात सत्य है कि चीटियां इशारा कर देती हैं बारिश से पूर्व। अक्सर काफी लोगों ने देखा होगा कि बारिश के पूर्व चीटियों के झुंड पेड़ पर चढ़ते-उतरते दिखाई देते हैं। ध्यान से देखने पर मालुम होता है कि चीटियां सफेद रंग के छोटे-छोटे अंडे पेड़ पर ऊपर की ओर ले जा रही हैं। यदि ऐसा दृश्य कभी भी दिखाई देता है तो समझ लेना चाहिए कि बारिश होने वाली है।
इसके अलावा यदि अत्यधिक वर्षा या सामान्य वर्षा के समय चीटियां अपने अंडे पानी में डाल दे तो यह संकेत है बारिश रुकने का। जब चीटियां अपने अंडे पानी में डालने लगे तो समझ लेना चाहिए कि बारिश शीघ्र ही थम जाएगी।
पाठकों के विचार
यदि आप भी बारिश के संबंध इस तरह की कोई रोचक बात जानते हैं तो यहां कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। रोचक जानकारियों को लेख के रूप में प्रकाशित किया जाएगा।
ध्यान रहे कमेंट में प्रयोग की जाने वाली भाषा के लिए पाठक स्वयं जिम्मेदार होंगे। यदि किसी अन्य पाठक को आपकी भाषा आपत्तिजनक, अभद्र या अश्लील लगती है और इस संबंध में कोई कानूनी कार्यवाही की जाती है तो इसकी पूरी जवाबदारी संबंधित पाठक की ही होगी।

इसलिए चलते है दूल्हा-दुल्हन सात कदम साथ-साथ

कहते हैं विवाह एक जन्म का नहीं सात जन्मों का बंधन होता है। सात जन्म के इस रिश्ते को हर जन्म में और मजबूत बनाने के लिए विवाह संस्कार निभाया जाता है। विवाह संस्कार में पाणिग्रहण के समय अनेक परंपराए निभाई जाती हैं। उनमें से एक रस्म है सप्तपदी की। इस रस्म में दूल्हा व दुल्हन एक साथ सात कदम आगे बढ़ाते हैं।

सप्तपदी का महत्व: सभी स्मृतिकारों ने स्वीकार किया है। मनु के अनुसार इसके बिना विवाह पूर्ण नहीं माना जाएगा। इसमें वर और वधू अपना - अपना दाहिना पैर एक - एक पद के साथ आगे बढ़ाते हैं। पहले वर , पीछे कन्या। जिस जगह से सीधा पैर उठाया , उसी जगह बायां पैर रखते जाते हैं। इस प्रकार सात मंत्रों से सप्तपद चलते हैं। मंत्रों के माध्यम से वर वधू को सखी मान कर अन्न , ऊर्जा , धन , पशुओं और सभी ऋतुओं में सुख और सातों लोकों में यश की प्राप्ति की कामना करते हैं। कई मंत्रों में वर विश्व के पोषक विष्णु की सहायता से धनधान्य और सुख की प्राप्ति की कामना करता है। इस तरह हमारे यहां वर-वधु को इस रस्म के माध्यम से जन्मों का साथी ही नहीं दोस्त भी बना दिए जाते हैं।

कोई पुरुष बारात में नहीं गया तो समझो आ गई उसकी शामत

शादी यानी रस्मों के साथ ही नाच-गाना मस्ती, धूम। शादी की रस्मों में भरपूर मजाक मस्ती होती है। बड़े ही उत्साह और उमंग के साथ निभाई जाती हैं। हमारे देश में ऐसी कई लोक परंपराएं हैं जिनके बारे में सुनकर आश्चर्य तो होता है। साथ ही मन में जिज्ञासा और हास्य का भाव उत्पन्न होते हैं। डोमकच या टूटया भी एक तरह की क्षेत्रिय परंपरा है। इसे राजस्थान में टूटया और बिहार में डोमकच कहा जाता है।
डोमकच की रस्म में स्त्री-पुरुषों के संबंध को कलात्मकता के साथ दर्शाया जाता है। इस रस्म में औरतें किसी तरह की कोई शर्म नहीं करती। यहां बस औरतें होती है और होती हैं उनकी उन्मुक्तता। यहां वे खुलकर सांसें लेती हैं, हंसती हैं। गाती हैं मजाक करती हैं। वह भी बगैर पुरुषों की अनुमति के। डोमकच या टूटया औरतों का मनोरंजन तो करती ही हैं साथ ही उनकी कुंठा को बाहर निकालकर उनमें नया उत्साह व उमंग भर देती है।
इसके माध्यम से हर पुरानी पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को दांपत्य जीवन जीने का तरीका बताती है। जबकि, इसका व्यावहारिक पक्ष यह है कि बारात में घर के सभी पुरुषों के चले जाने के बाद घर की सुरक्षा के लिए औरतों द्वारा मनोरंजन का कार्यक्रम तो यह होता ही है साथ ही युवतियों को शादी के बाद कैसा जीवन जीना है इस बारे में भी बताया जाता है। इस रस्म में एक महिला स्त्री और दूसरी पुरुष बनती है। इसमें महिलाओं को इतनी स्वतंत्रता रहती है कि बारात नहीं जाने वाले पुरुषों के साथ ये इतना मजाक करती हैं कि वे भाग खड़े होते हैं।
गांव में कई पुरुष बारात नहीं गया हो तो उसकी शामत आ जाती है।
कभी-कभी इसकी अति भी हो जाती है, जिसके गलत परिणाम निकल आते हैं। दरअसल इसका एक कारण यह भी है कि वर पक्ष के यहां रात्रि में शयन करना अच्छा नहीं माना शुभ नहीं माना जाता है। इस रस्म में गांव भर से अनाज व नकद भी इकट्ठा किया जाता है जिसका प्रसाद बनाया जाता है। यही प्रसाद दुल्हन के आने के बाद बांटा जाता है। इस तरह यह परंपरा पति-पत्नी के बीच मधुर संबंध बनाए रखने के साथ ही समाज से ऊंच-नीच के भाव को भी खत्म करने का संदेश देती है।

भागवत 268

छल को छल से नहीं जीता जा सकता
कर्ण जैसा योग्य और ज्ञानी लेकिन उलझा हुआ था दुर्योधन में। सब लोग बैठे हैं, तैयारी की। घोषणा की गई, द्रौपदी आई। सबसे कहा पराक्रम दिखाएं। कोई नहीं दिखा पाया। जैसे ही कर्ण खड़ा हुआ सभी जानते थे कि कर्ण निशाना लगा देगा। यह बिल्कुल तय था।
द्रौपदी ने एकदम से घोषणा की कि इनको रोकिए यह इस स्वंयवर के योग्य नहीं हैं। मैं इनको अनुमति नहीं देती और नहीं मैं इनको वरूंगी क्योंकि यह सूत पुत्र है, क्षत्रिय नहीं हैं। कर्ण बड़ा अपमानित हुआ। कर्ण को लगा यह तो मेरा सीधा-सीधा अपमान है। बैठ गया। दुर्योधन तमतमा गया और फिर बारी आई एक ब्राह्मण की। ब्राह्मण युवक गठीला, अर्जुन।
पाण्डव वेष बदलकर स्वयंवर में आए थे क्योंकि कौरव पहचान लेंगे तो फिर आक्रमण करेंगे, छिपते फिर रहे थे। मां डरी हुई थी कि बेटा तुम में से एक चला जाएगा। तो अपना प्रकाशन मत करो। इनको यही समझने दो कि हम मर गए। बाद में हम नीति बनाएंगे, यह तो छल पर उतर आए हैं। एक बात याद रखिए छल का कोई इलाज नहीं है। छल का इलाज छल है तो आप भी छली हो जाएंगे। छल का इलाज सिर्फ भगवान हैं। छल को छल से नहीं जीता जा सकता और प्रयास भी मत करिएगा।

दुनियादारी के साथ एक काम ये भी जरूर करें...

पं. विजयशंकर मेहता
संसारभर के काम करते हुए एक इरादा और रखें कि हम ईश्वर को प्यारे लगने वाले काम भी करते रहें। कबीर कह गए हैं- 'तेरा जन एकाध है कोई' करोड़ों-करोड़ों लोग हैं दुनिया में। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च हैं। कई लोग पूजा-अर्चना कर रहे हैं, लेकिन परमात्मा यदि सवाल पूछे तो कुछ ही लोगों के लिए यह जवाब आएगा कि 'तेरा जन एकाध है कोई'। उस मालिक का कोई एक हो पाएगा और वह वो होगा जो उस चयन के दायित्व को पूरा कर सकेगा, जिसके लिए मालिक ने उसे चुना है। दुनिया का मार्ग बड़ा कांटों से भरा हुआ है।
बहुत प्रलोभन है मार्ग में। जगह-जगह रुकने की संभावना है। एक-एक कदम उठाना श्रम मांगता है। भक्ति ऐसे ही दुर्गम मार्ग पर चलकर की जा सकती है। जो भक्ति सही स्वरूप में कर जाएगा वह निजी और सांसारिक दोनों जीवन में सफल हो जाएगा। भीड़ में सिर्फ एक चेहरा होना तो बहुत आसान है, लेकिन भीड़ का सामना करना बहुत मुश्किल काम है।
भक्त जब सेवा करता है तो उसकी सेवा के अर्थ बदल जाते हैं। जरूरी नहीं है कि सेवा हमेशा धर्म बन जाए। धार्मिक व्यक्ति में सेवा हो सकती है, लेकिन सेवक धार्मिक होगा इसमें थोड़ा अंतर है। जो लोग सेवा करने निकले हैं उनकी जिंदगी में भक्ति आ जाएगी यह बिल्कुल जरूरी नहीं है। हां, लेकिन जिस व्यक्ति के चित्त भक्तिमय है, उसकी जिंदगी में सेवा अवश्य हो सकती है।
जिस व्यक्ति का चित्त शांत हो गया, आनंदित हो गया, भक्ति से परिपूर्ण हो गया, उसकी सारी जिंदगी सेवा बन जाती है। लेकिन अगर कोई यह सोचे कि मैं सेवा करने निकला हूं तो मेरा चित्त आनंदित हो जाएगा और भक्ति से भर जाएगा तो ऐसा जरूरी नहीं है, बल्कि ऐसी सेवा अहंकार को पोषित कर देगी।
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...और अहंकार ने ले ली 60 हजार की जान!!!

कुछ लोगों को अपनी शक्तियों पर बहुत अहंकार होता है। अपनी ताकत के नशे में किसी का सम्मान नहीं करते और सभी का उपहास उड़ाते रहते हैं या अपमान करते हैं। इन लोगों के पतन का कारण इनका अहंकार ही बनता है। इसलिए ध्यान रखें कि यदि आप बलशाली हैं या आपके पास कोई विशेष योग्यता है तो इसका दुरुपयोग न करें तथा किसी अन्य का अपमान न करें। अंहकार का दुष्परिणाम क्या होता यह जानने के लिये आइये चलते हैं एक बेहद रोचक और सच्ची घटना की तरफ...
श्रीराम के पूर्वज सूर्यवंशी राजा सगर की दो पत्नियां थीं केशिनी और सुमति। केशिनी का एक ही पुत्र था जिसका नाम असमंजस था, जबकि सुमति के साठ हजार पुत्र थे। असमंजस बहुत ही दुष्ट था। उसको देखकर सगर के अन्य पुत्र भी दुराचारी हो गए। उन्हें अपने बल पर बहुत ही घमंड था। घमंड में चूर होकर वे किसी का सम्मान नहीं करते थे। एक बार सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। तब इंद्र ने उस यज्ञ के घोड़े को चुराकर पाताल में कपिलमुनि के आश्रम में छुपा दिया। जब अश्व नहीं मिला तो सगर के पुत्रों ने पृथ्वी को खोदना प्रारंभ किया। तब पाताल में उन्हें कपिलमुनि के आश्रम में यज्ञ का घोड़ा दिखाई दिया।
यह देखकर घमण्ड में चूर सगर के सभी पुत्रों ने समाधि में लीन कपिल मुनि को भला-बुरा कहा। सगर पुत्रों की बात सुनकर जैसे ही कपिल मुनि ने आंखें खोली तो आंखों से निकली योगाग्रि से सभी सगर पुत्र वहीं भस्म हो गए।
.....और इस तरह अपनी शक्तियों के घमंड में चूर सभी सगर पुत्र अपनी योग्यताओं और क्षमताओं से लाभ उठाने की बजाय असमय ही मोत को गले लगा बैठे।
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