शनिवार, 21 मई 2011

जब सीताजी ने आंखे खोली तो..

जब सीताजी ने अपनी आंखें खोली और रामजी की ओर देखा। उनकी शोभा देखकर सीताजी देखकर मंत्रमुग्ध हो गई। जब सहेलियों ने सीताजी को परवश देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगी। बड़ी देर हो गई। कल इसी समय फिर आयेंगी, ऐसा कहकर एक सहेली हंसी। सहेली की ऐसी बात सुनकर सीताजी सकुचा गई। उन्हें लगा देर हो गई। यह सोचकर उन्हें डर लगा। वे रामजी की सांवली सूरत को भूलाए नहीं भूल पा रही हैं। उनकी छबि जैसे सीताजी के मस्तिष्क से हटने का नाम ही नहीं ले रही है। उसके बाद सीताजी फिर से भवानीजी के मंदिर गई और उनके चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोली- हे मां पार्वती आपका ना आदि है ना अंत है।
आपके महिमा असीम है। मां आप मेरे मनोरथ को अच्छे से जानती हैं ऐसा कहकर सीताजी ने उनके चरण पकड़ लिए तब गिरिजाजी उन पर प्रसन्न होकर बोली- सीता हमारी बात सुनो तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी। जिसे तुम पति रूप में चाहती हो वही तुम्हे मिलेगा। रामजी ने भी अपने गुरु विश्वामित्र को जाकर सबकुछ बोल दिया क्योंकि उनका स्वभाव सरल है। वे अपने मन में कोई छल नहीं रखते। फिर दोनों भाइयों को विश्वामित्रजी ने आर्शीवाद दिया कि तुम अपने मनोरथ में सफल हो। जानकी जी ने शतानन्दजी को बुलाया और उन्हें तुरंत ही विश्वामित्रजी के पास भेजा। उन्होंने आकर सीताजी की बात सुनाई।
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जूए में राजा नल सबकुछ हार गए तब...

कलयुग दूसरा रूप धारण करके वह पुष्कर बनकर उसकी बात स्वीकार करके वह पुष्कर के पास गया और बोला तुम नल के साथ जुआं खेलो मेरी सहायता करो। जूए में जीतकर निषध राज का राज्य प्राप्त कर लो। पुष्कर उसकी बात स्वीकार करके नल के के पास गया। द्वापर भी पासे का रूप धारण करके उसके साथ चला। जब पुष्कर ने राजा नल को जूआ खेलने का आग्रह किया। तब राजा नल दमयन्ती के सामने अपने भाई की बार - बार की ललकार सह ना सके। उन्होंने पासे खेलने का निश्चय किया।
उस समय नल के शरीर में कलयुग घुसा हुआ था, इसीलिए नल जो कुछ भी जूए में लगाते हार जाते। प्रजा और मंत्रियों ने राजा को रोकना चाहा लेकिन जब वे नहीं माने तो मंत्रियों ने द्वारपाल को रानी दमयंती तक राजा को रोकने का संदेश पहुंचवाया। तब रानी नल दमयन्ती को बोली आपकी पूरी प्रजा आपके दुख के कारण अचेत हुई जा रही है। इतना कहकर दमयंती भी रोने लगी। लेकिन राजा नल कलयुग के प्रभाव में थे।
इसीलिए जो पासे फेंकते वही उनके प्रतिकुल पड़ते। जब दमयंती ने यह सब देखा तो उसने धाय को बुलवाया और उसके द्वारा राजा नल के सारथि वाष्र्णेय को बुलवाया। उन्होंने ने उससे कहा सारथि तुम जानते हो कि महाराज बहुत संकट में है। अब यह बात तुम से छिपी नहीं है। तुम रथ जोड़ लो और मेरे बच्चों को रथ में बैठाकर कुंडिनगर ले जाओ। उसके बाद पुष्कर ने राजा नल का सारा धन ले लिया और बोला तुम्हारे पास दावं पर लगाने के लिए और कुछ है या नहीं। यदि तुम दमयंती को दावं पर लगाने के लायक समझो तो उसे लगा दो।

बुधवार, 18 मई 2011

भागवत २५६

कैसी होनी चाहिए गृहस्थी?
पं. विजयशंकर मेहता
एक बार रानियों के बीच नारदजी रूक्मिणीजी के महल में पहुंचे। वे सोचने लगे- यह कितने आश्चर्य की बात है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने एक ही शरीर से एक ही समय सोलह हजार महलों में अलग-अलग सोलह हजार राजकुमारियों का पाणिग्रहण किया। देवर्षि नारद इस उत्सुकता से प्रेरित होकर भगवान् की लीला देखने के लिए द्वारिका आ पहुंचे। वहां के उपवन और उद्यान खिले हुए रंग-बिरंगे पुष्पों से लदे वृक्षों से परिपूर्ण थे।
यह प्रसंग बहुत महत्वपूर्ण है, जो लोग संसारी जीवन को दूभर मानते हैं उन्हें इससे सीख लेनी चाहिए। गृहस्थी किस तरह से चलाई जाती है भगवान् कृष्ण से सीखा जाए। 16 हजार रानियों के साथ भगवान् खुशी-खुशी रह रहे हैं, किसी की कोई शिकायत नहीं, ना ही कोई झगड़ा। सब प्रसन्न हैं। भगवान सभी को खुष रखे हुए हैं।
उसके राज-पथ (बड़ी-बड़ी सड़कें), गलियां, चौराहे और बाजार बहुत ही सुन्दर-सुन्दर थे। घुड़साल आदि पशुओं के रहने के स्थान, सभा-भवन और देव-मंदिरों के कारण उसका सौंदर्य और भी चमक उठा था। उसकी सड़कों चौक, गली और दरवाजों पर छिड़काव किया गया था। छोटी-छोटी झंडियां और बड़े-बड़े झण्डे जगह-जगह फहरा रहे थे, जिनके कारण रास्तों पर धूप नहीं आ पाती थी। उसी द्वारिका नगरी में भगवान् श्रीकृष्ण का बहुत ही सुन्दर अन्त:पुर था। उस अन्त:पुर (निवास) में भगवान् की रानियों के सोलह हजार से अधिक महल शोभायमान थे, उनमें से एक बड़े भवन में देवर्षि नारदजी ने प्रवेश किया।
देवर्षि नारदजी ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण उस महल की स्वामिनी रुक्मिणीजी के साथ बैठे हुए हैं और वे अपने हाथों भगवान् को सोने की डांडी वाले चंवर से हवा कर रही हैं।भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजी के पलंग से सहसा उठ खड़े हुए। उन्होंने देवर्षि नारद के युगलचरणों में मुकुटयुक्त सिर से प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उन्हें अपने आसन पर बैठाया। शास्त्रोक्त विधि से देवर्र्षि शिरोमणि नारद की पूजा की।भगवान् भी नारद के मन की बात ताड़ गए। उन्होंने नारदजी को बिल्कुल भी भान नहीं होने दिया। पूरा स्वागत सत्कार किया। जैसा कि ब्राह्मण या ऋषि का होना चाहिए।
इसके बाद देवर्षि नारदजी श्रीकृष्ण की योगमाया का रहस्य जानने के लिए उनकी दूसरी पत्नी के महल में गए।
वहां उन्होंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिय और उद्धवजी के साथ चौसर खेल रहे हैं। वहां भी भगवान् ने खड़े होकर उनका स्वागत किया, आसन पर बैठाया और विविध सामग्रियों द्वारा बड़ी भक्ति से उनकी अर्चना-पूजा की। अब नारदजी का सिर चकराने लगा। भगवान के चेहरे पर ऐसा कोई भाव नहीं था कि अभी रुक्मिणी के महल में ही आपसे भेंट हुई। नारदजी भगवान की योगमाया को समझने आए थे। खुद ही माया में उलझ कर रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। अब तो बस एक महल से दूसरे महल में घूमने लगे। भगवान हर जगह अलग-अलग रूप में दिख रहे थे। उस महल में भी देवर्षि नारद ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने नन्हे-नन्हे बच्चों को दुलार रहे हैं। www.bhaskar.com

अगर मौत के भय से होना हो आजाद...

मनुष्य को मनुष्य बनाना एक कला है जिसे भारतीय संस्कृति ने बहुत सुंदर तरीके से सजाया है। जन्म होना और मृत्यु होना इसके बीच का जो जीवन है उसे संवारने की संभावना परमात्मा ने सबको समान दी है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं अपने-अपने तरीके से सब लोग शक्ति सम्पन्न होते जाते हैं, लेकिन कुछ बातें सबमें समान होती हैं।
इनमें से एक है भीतरी अशांति। सांसारिक रूप से समर्थ और असमर्थ दोनों ही तरह के लोग भीतर से समान रूप से अशांत पाए जाते हैं। इसलिए अध्यात्म की जरूरत जीवन में जरूरी हो जाती है। अपने भीतर उतरते ही आदमी एक ऐसे निराकार रूप से परिचित होता है जिसका नाम परमात्मा है। जो अपने भीतर के भगवान से परिचित हो जाता है उसके बाहर का मामला बदल जाता है और यहीं से मनुष्य, मनुष्य बनने लगता है।
कुछ लोग एक बार गुरुनानक को ढूंढ रहे थे। पता लगा वे मरघट की ओर गए हैं, सब चौंक गए। नानक जीते जी वहां क्यों गए? नानक का जवाब था जो मरघट पर जीते जी पहुंच गया, फिर वह कभी नहीं मरता। जिसे हमने संसार का घर-परिवार कहा है वह एक दिन मरकर रहेगा और जिसने मरघट पर जीना सीख लिया उसे कोई नहीं मार सकेगा।
नानक की बात आध्यात्मिक लगती है, पर शहीद भगतसिंह जैसे लोगों ने इसी आध्यात्मिक दर्शन को जीवन में क्या गजब उतारा है। कोई फांसी का फंदा भगतसिंह को नहीं मार सका। नानक की भाषा में भगतसिंह और उनके साथी तो पहले से ही मरघट पर पहुंच चुके थे और इसीलिए वे आज भी जीवित हैं। हम अपने भीतर उतरकर अपने परमात्मा से परिचित होते ही जीवन की बाहरी परिस्थितियों के नए अर्थ जान लेंगे।
थोड़ी देर ध्यान करें स्वयं का और ऐसे महान् लोगों का जो हमें मनुष्य का मनुष्य बनना सिखा गए।
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मंगलवार, 17 मई 2011

लोककथा: स्वर्ग का चाचा

बहुत पहले की बात है। धरती पर दो सालों तक बिलकुल वर्षा नहीं हुई। अकाल पड़ गया।
अपने तालाब को सूखता देख कर मेढ़क मेंढक को चिंता हुई। उसने सोचा, अगर ऐसा रहा तो वह भूखा मर जाएगा। उसने सोचा कि इस अकाल के बारे स्वर्ग में जाकर वहां के राजा को बताया जाए।

साहस कर मेंढक अकेला ही स्वर्ग की ओर चल पड़ा। राह में उसे मधुमक्खियों का एक झुंड मिला। मक्खियों के पूछने पर उसने बताया कि भूखे मरने से अच्छा है कि कुछ किया जाए। मक्खियों का हाल भी अच्छा नहीं था। जब फूल ही नहीं रहे तो उन्हें शहद कहां से मिलता। वे भी मेंढक के साथ चल दीं।
आगे जाने पर उन्हें एक मुर्गा मिला। मुर्गा बहुत उदास था। जब फसल ही नहीं हुई, तो उसे दाने कहां से मिलते। उसे खाने को कीड़े भी नहीं मिल रहे थे। इसलिए मुर्गा भी उनके साथ चल दिया।
अभी वे सब थोड़ा ही आगे गए थे कि एक खूंखार शेर मिल गया। वह भी बहुत दुखी था। उसे खाने को जानवर नहीं मिल रहे थे। उनकी बातें सुन शेर भी उनके साथ हो लिया।
कई दिनों तक चलने के बाद वे स्वर्ग में पहुंचे। मेंढक ने अपने सभी साथियों को राजा के महल के बाहर ही रुकने को कहा। उसने कहा कि पहले वह भीतर जाकर देख आए कि राजा कहां है।
मेंढक उछलता हुआ महल के भीतर चला गया। कई कमरों में से होता हुआ वह राजा तक पहुंच ही गया। राजा अपने कमरे में बैठा परियों के साथ बातें कर रहा था। मेंढक को क्रोध आ गया। उसने लम्बी छलांग लगाई और उनके बीच पहुंच गया। परियां एकदम चुप हो गईं। राजा को एक छोटे से मेंढक की करतूत देख गुस्सा आ गया।
‘पागल जीव! तुमने हमारे बीच आने का साहस कैसे किया?’ राजा चिल्लाया। परंतु मेंढक बिलकुल नहीं डरा। उसे तो धरती पर भी भूख से मरना था। जब मौत साफ दिखाई दे तो हर कोई निडर हो जाता है।
राजा फिर चीखा। पहरेदार भागे आए ताकि मेंढक को पकड़ कर महल से बाहर निकाल दें। मगर इधर-उधर उछलता मेंढक उनकी पकड़ में नहीं आ रहा था। मेंढक ने मधुमक्खियों को आवाज दी। वे सब भी अंदर आ गईं। वे सब पहरेदारों के चेहरों पर डंक मारने लगीं। उनसे बचने के लिए सभी पहरेदार भाग गए।
राजा हैरान था। तब उसने तूफान के देवता को बुलाया। पर मुर्गे ने शोर मचाया और पंख फड़फड़ा कर उसे भी भगा दिया। तब राजा ने अपने कुत्तों को बुलाया। उनके लिए भूखा खूंखार शेर पहले से ही तैयार बैठा था।
अब राजा ने डर कर मेंढक की ओर देखा। मेंढक ने कहा, ‘महाराज! हम तो आपके पास प्रार्थना करने आए थे। धरती पर अकाल पड़ा हुआ है। हमें वर्षा चाहिए।’
राजा ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए कहा, ‘अच्छा चाचा! वर्षा को भेज देता हूं।’
जब वे सब साथी धरती पर वापस आए तो वर्षा भी उनके साथ थी। इसलिए वियतनाम में मेंढक को ‘स्वर्ग का चाचा’ कह कर पुकारा जाता है। लोगों को जब मेंढक की आवाज़ सुनाई देती है वे कहते हैं, ‘चाचा आ गया तो वर्षा भी आती होगी।’

लोककथाः चिड़ा-चिड़िया की कहानी

देवेश सिंगी
एक चिड़िया के जोड़े को अंडे देने के लिए घोंसला बनाना था। उन्होंने एक बूढ़े साधू से पूछकर उसकी लम्बी दाढ़ी में अपना घोंसला बनाया और उसमें दो अंडे दिए। एक शाम को चिड़िया अंडे सेने लगी थी और चिड़ा चिड़िया के लिए खाने की तलाश में गया। एक बड़ा-सा सुंदर कमल का फूल देखकर वह उसपर बैठकर उसका मीठा रस चूसने लगा। तभी आकाश काला होने लगा, रात घिरी और कमल बंद हो गया। चिड़ा भी उसमें बंद हो गया। वह जब घोंसले पर वापस नहीं आया, तो चिड़िया समझी कि वह उसे छोड़कर कहीं ओर चला गया है।

दूसरे दिन सुबह जब कमल फिर से खिला तो चिड़ा हांफता-कांपता हुआ वापस घोंसले में पहुंचा। चिड़िया बहुत नाराज़ थी। चिड़े ने लाख समझाया कि वह किस तरह कमल के अंदर बंद हो गया था। परंतु चिड़िया मानने को तैयार नहीं थी। चिड़ा चतुर था बोला, ‘मैं सौगंध खाकर कहता हूं कि यदि मैं झूठ बोल रहा हूं तो अभी इसी समय इस बूढ़े साधू का सिर कटकर धरती पर गिर जाए।’ साधू ने सुना तो वह गुस्सा हो गया। उसने उन्हें अपनी दाढ़ी में घोंसला बनाने की जगह दी और वह उसी के मरने की बात कह रहा है। उसने उसी समय घोंसला अपनी दाढ़ी में से निकाला और दूर एक घाटी में फेंक दिया। घोंसला घनी लम्बी घास पर जा गिरा। चिड़ा चिड़ी दोनों घबराए। लड़ना भूलकर वे उड़कर अंडों के पास गए। अंडे सुरक्षित देखकर उनकी जान में जान आई।
कुछ समय बाद अंडे फूटे और उसमें से प्यारे से बच्चे निकलकर चीं-चीं करने लगे। वे दोनों खुश थे परंतु एक दिन कुछ लोग घाटी में आए और सफाई करने के लिए घास में आग लगा दी। बच्चे बहुत छोटे-छोटे थे। उनके तो पंख भी नहीं निकले थे। दोनों क्या करें? आग लगातार पास आ रही थी। चिड़िया ने कहा, ‘मैं बच्चों के ऊपर और तुम नीचे रहो। हम अपने बच्चों के साथ ही मरेंगे। मैं पहले मरुंगी।’
परंतु चिड़ा नहीं माना, ‘नहीं, मैं ऊपर रहता हूं, तुम नीचे रहो। पहले मैं मरुंगा।’ अंत में यही तय हुआ कि चिड़ा ऊपर रहेगा। आग के नज़दीक आते ही चिड़ा फुर्ती से उड़ गया। आग ने घोंसले को जला दिया। चिड़िया और बच्चे मर गए। चिड़िया मर कर दूसरे जन्म एक राजा के यहां पैदा हुई परंतु उसे यह याद रहा कि कैसे धोखा देकर चिड़ा उन्हें मरने के लिए छोड़कर उड़ गया था। वह दुनिया के हर आदमी से इतनी नाराज़ थी कि वह किसी से बोलती भी न थी। चिड़ा भी कुछ समय बाद मर कर एक आदमी के रूप में पैदा हुआ। राजा ने घोषणा कर रखी थी, जो राजकुमारी को बात करना सिखा देगा वह उसका विवाह भी उससे कर देगा।
एक नवयुवक ने घोषणा सुनी। वह एक शोवा (बहुत बुद्धिमान व्यक्ति जिसे सभी कुछ मालूम होता है) के पास गया और उसकी मदद मांगी। शोवा चिड़िया के जलने वाली बात जानता था। उसने कहा, ‘तुम्हें याद है कि जब घाटी की बड़ी-बड़ी घास में आग लगी थी तब तुम चिड़िया और बच्चों को जलने के लिए छोड़कर उड़ गए थे। तुम वहां जाओ राजा के समाने तुम उसे चिड़ा-चिड़िया की वही कहानी सुनाना परंतु ध्यान रखना, यह कहने के बजाय कि तुम चिड़िया और बच्चों को जलता छोड़ कर उड़ गए थे, कहना कि चिड़िया घोसले के ऊपर थी और वह तुम्हें व बच्चों को जलने के लिए छोड़कर उड़ गई थी।’
वह नवयुवक राजा को साथ लेकर राजकुमारी के पास गया। और अपनी कहानी सुनाने लगा। बहुत समय पहले एक सुंदर चिड़िया का जोड़ा था। वे एक दूसरे को बहुत चाहते थे। उन्होंने मिलकर एक बूढ़े साधू की लम्बी दाढ़ी में घोंसला बनाया परंतु किसी बात पर गुस्सा होकर साधू ने घोंसला निकालकर घाटी की बड़ी-बड़ी घास पर फेंक दिया। कुछ लोगों ने घाटी की घास में आग लगा दी तो चिड़े ने चिड़िया से कहा मैं ऊपर रहता हूं तुम नीचे रहो। हम बच्चों के साथ ही मरेंगे। परंतु चिड़िया नहीं मानी। और उसने खुद ऊपर रहने की ज़िद की। परंतु जब आग पास आई तो वह फुर्र से उड़ गई। बेचारा चिड़ा बच्चों के साथ जलकर मर गया। राजकुमारी युवक के इस झूठ को सहन न कर सकी। वह गुस्से से लाल होकर चिल्ला पड़ी, ‘झूठ, बिलकुल झूठ। तेरी बात बिलकुल झूठ है। ऊपर चिड़ा था और वह धोखा देकर उड़ गया था।’
‘नहीं राजकुमारी जी, सच्चाई यही है कि चिड़िया ऊपर थी और मरने से डरकर उड़ गई थी।’ युवक ने फिर कहा।
वे दोनों ‘कौन बचा, कौन जला’ पर बहस करने लगे। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। राजा चकित होकर उन्हें देख रहा था। अंत में उसने उन्हें रोककर कहा, ‘नौजवान, तुम्हारी इस चिड़ा-चिड़ी की कहानी का कुछ-कुछ मतलब मैं समझ गया हूं। लगता है तुमने जानबूझकर चिड़िया को धोखा दिया था परंतु तुम राजकुमारी को बुलवाने में सफल रहे हो अत: वादे के अनुसार मैं राजकुमारी का विवाह तुमसे करता हूं। इस बार उसे धोखा मत देना।’
युवक ने मुस्कुराकर राजकुमारी की ओर देखा। फिर दोनों का विवाह हो गया।
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एक शहादत ऐसी भी!

चमनपुर पर घोर संकट आ गया था। शत्रु सेना ने चारों ओर से उसे घेर लिया था। किसी भी समय हमला हो सकता था। इस मुसीबत का सामना करने के लिए सेना तैयार नहीं थी। समय बहुत कम था। राजा तिमनपाल ने सेनापतियों और मंत्रियों की एक बैठक बुलाई। संकट से निपटने के लिए विचार-विमर्श किया जाने लगा।

सभी को असमंजस में पड़ा देखकर वृद्ध और सेवानिवृत सेनापति बोल पड़े, ‘चमनपुर की रक्षा मैं अकेले करुंगा।’
‘आप निश्चित हो जाइए, महाराज’, सेवानिवृत सेनापति महायायन आत्मविश्वास से बोले और उठकर बाहर चले गए।
शत्रु सेना गांवों और नगरों को रौंदती हुई दो दिन बाद चमनपुर के एकदम नज़दीक आ गई। एक दिन शत्रु सेना ने आसपास घूमते हुए वृद्ध महायायन को पकड़ लिया और अपने राजा के सामने पेश किया।
‘यह कौन है?’ राजा ने प्रश्न किया। ‘हुज़ूर, यह हमारे पड़ाव के आसपास घूम रहा था। शायद यह शत्रु का जासूस है’, सेनापति ने जवाब दिया। ‘नहीं’, महायायन गरजकर बोले। ‘मैं जासूस नहीं हूं बल्कि चमनपुर का सैनिक हूं। तुम चमनपुर को उजाड़ नहीं सकते। उसपर हमले का विचार छोड़ दो।’
‘यदि हम विचार न छोड़ें तो?’ शत्रु राजा ने ठहाका मारकर प्रश्न किया।
‘तब तुम्हें मेरी लाश पर से गुज़रना होगा’ वृद्ध ने दृढ़ता से कहा।
तभी शत्रु राजा को एक मज़ाक सूझा। ‘हम चमनपुर पर हमले का विचार त्याग सकते हैं, लेकिन हमारी एक शर्त है।’
‘तुम्हें नदी में डुबकी लगानी होगी। जितनी देर तुम्हारा सिर पानी में डूबा रहेगा, मैं आक्रमण नहीं करूंगा। लेकिन जैसे ही तुम्हारा सिर पानी से बाहर आया तो मेरी सेना कूच कर देगी।’ शत्रु राजा ने ठहाका मारकर कहा। वृद्ध महायायन गम्भीर थे। कुछ देर विचार कर वह बोले, ‘मुझे शर्त मंज़ूर है।’
भद्रावती नदी के तट पर भारी भीड़ थी। एक और शत्रु सेना कूच की तैयारी के साथ खड़ी थी, दूसरी और चमनपुर की जनता। महायायन नदी में कूद पड़े।
समय बीतता गया। एक घंटा हो गया पर महायायन का सिर पानी से ऊपर न आया। शत्रु राजा को संदेह हुआ कि बूढ़ा पानी के अंदर तैर कर भाग तो नहीं गया। उसने गोताखोर पानी में उतारे।
कुछ देर में वे एक लाश को निकाल लाए। वह लाश महायायन की ही थी। ‘महाराज’ गोताखोरों ने कहा, ‘इसने नदी के तल में एक चट्टान को हाथों से जकड़ रखा था। बड़ी मुश्किल से हम इसे चट्टान से अलग कर पाए।’
गोताखोरों का जवाब सुनकर शत्रु राजा सन्न रह गया। उस का दिल पिघल गया और वह हमला किए बगैर ही वापस लौट गया। दूसरे तट से महायायन की जय-जयकार गूंजने लगी।
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